क्या हम हिन्दुओं की जान इतनी सस्ती है कि कोई हमारे लिए रो भी नहीं सकता? अगर रोया तो साम्प्रदायिक कहलाएगा।
गुजरात दंगों (जिन्हें दस वर्ष हो गए और इसके बाद गुजरात में कोई हिंसा नहीं हुई) पर तो खूब चिल्ल-पौं मचा चुके, किन्तु तीस साल पहले कश्मीर से हिन्दुओं को मार कर भगाए जाने पर इन मीडियाई कुत्तों को कब्जी हो जाती है। आज तक कश्मीर में यही सब चल रहा है। क्या कभी एक शब्द भी फूटेगा इन कश्मीरी पंडितों की कश्मीर वापसी के लिए?
गुजरात दंगों (जिन्हें दस वर्ष हो गए और इसके बाद गुजरात में कोई हिंसा नहीं हुई) पर तो खूब चिल्ल-पौं मचा चुके, किन्तु तीस साल पहले कश्मीर से हिन्दुओं को मार कर भगाए जाने पर इन मीडियाई कुत्तों को कब्जी हो जाती है। आज तक कश्मीर में यही सब चल रहा है। क्या कभी एक शब्द भी फूटेगा इन कश्मीरी पंडितों की कश्मीर वापसी के लिए?
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