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Wednesday, January 25, 2012

राष्ट्रीय मतदाता दिवस की हार्दिक शुभकामना …



राष्ट्रीय मतदाता दिवस की हार्दिक शुभकामना …..


25 जनवरी , 2011 को पहला राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया गया था .
दरअसल 25 जनवरी 1950 को भारत निर्वाचन आयोग का गठन हुआ था
और इस लिहाज से यह शुभ दिन लोकतंत्र के इस अधिष्ठान का स्थापना दिवस भी है .
और विगत वर्ष को यही तिथि मतदाताओं के नाम कर दी गयी ...
उन्हें लोकतंत्र के प्रति उनके दायित्वों को याद दिलाने
और खुद उनके महत्त्व और गौरव गान के लिए ...

                              गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामना ….

रोटी का कानून ..


रोटी का कानून यहाँ भरमाने के लिए है 
अपने अरमान ही बस जलाने के लिए हैं
रोशनी के राहबर कभी होते थे यहाँ पर
अब सियासत हमें बहलाने के लिए है.

Friday, January 20, 2012

देश भक्तो को दो मत तो नव भारत निर्माण हो..

चिंगारी ऐसी भर लो की सबको अभिमान हो...
देश भक्तो को दो मत तो नव भारत निर्माण हो..

वादों ने हमको अब तक बहुत ही लुभाया
हर बार तोडा दिल घर पानी तक न आया ...

इस बार सारे वादों का मिलके तुम हिसाब लो..
दे दो देश निकला अब ठोकपाल जवाब हो...

DURGWALA: tasvir bolti hai

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tasvir bolti hai

Monday, January 16, 2012

पूरे देश में संविलियन, पर छत्तीसगढ़ में ही दिक्कत

पूरे देश में संविलियन, पर छत्तीसगढ़ में ही दिक्कत
दुर्ग। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का प्रमुख दारोमदार संभाले पौने दो लाख शिक्षाकर्मियों के सम्मानजनक वेतन, संविलियन सहित अन्य मांगों के संतोषजनक हल के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित हाईपावर कमेटी की रिपोर्ट फरवरी महीने की तीन-चार तारीख  तक आने की उम्मीद है। अलबत्ता, हाईपावर कमेटी के इतर प्रदेश के शिक्षाकर्मी संघ के नेताओं ने भी अपनी एक कमेटी गठित कर देश के आठ बड़े राज्यों की स्थिति का अध्ययन किया है। जिसके अनुसार देश के ज्यादातर् राज्य पैरा शिक्षकों को नियमित कर उन्हें बेहतर वेतन दे रहे हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में ऐसा नहीं हो रहा। शिक्षाकर्मियों की रिपोर्ट 8 बड़े राज्यों का दौरा कर वहां पैरा शिक्षकों की स्थिति, सेवा शर्तो और वेतन की पड़ताल कर तैयार की।
यहंा उल्लेख करना लाजि़मी होगा कि वैश्विक मंदी के दौर में विकसित देशों ने अपने खर्चों में कटौती करना शुरू तो किया, पर स्वास्थ्य व शिक्षा जैसे बुनियादी जनक्षेत्रों पर इसका असर पडऩे नहीं दिया। उन देशों में स्वास्थ्य व शिक्षा में कटौती कभी स्वीकार नहीं किया गया। जबकि, हमारे देश में शायद राज्य से लेकर राज्य सरकार तक की नजर में शिक्षा अति महत्वपूर्ण बुनियादी अवश्यकता नहीं है। यहंा तक कि प्रशासन के विकासखंड स्तर के अधिकारी से लेकर बाबू भी शिक्षाकर्मियों को समय पर वेतन देने में भारी कोताही बरतते हैं। कई दफे तो जानबुझकर महीनों तक वेतन लटका कर रखा जाता है।
किस राज्य में कैसी सुविधा

उड़ीसा:
यहां पैरा शिक्षकों को शिक्षा सहायक कहा जाता है। निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के तहत 3 वर्ष की परिवीक्षा अवधि पर प्रशिक्षित शिक्षा सहायक की नियुक्ति पैरा शिक्षक के रूम में सर्वशिक्षा अभियान के तहत जिला परिषद द्वारा अनुबंध के आधार पर की जाती है। 3 साल के संतोषजनक प्रोबेशन के बाद उन्हें फिर से 3 साल के प्रोबेशन पर रखा जाता है। इसके बाद उन्हें प्राइमरी स्कूल में नियमित शिक्षक के तौर पर नियुक्त कर दिया जाता है।

आंध्र प्रदेश:
 यहां पैरा शिक्षकों को विद्या वॉलिंटियर्स कहा जाता है। शुरुआत में इनकी नियुक्ति 1000 से 1500 रुपए के फिक्स पेमेंट पर होती है। 2 साल की अप्रेंटिसशिप के बाद उन्हें नियमित वेतनमान पर नौकरी दे दी जाती है।
महाराष्ट्र: यहां पैरा शिक्षकों को शिक्षा सेवक कहा जाता है। शुरुआत में उन्हें 3 हजार रुपए का तय वेतन मिलता है। 3 साल तक संतोषजनक काम के बाद उन्हें स्थायी शिक्षक के रूप में प्रमोट कर दिया जाता है। फिर उन्हें नियमित शिक्षक के बराबर वेतन और दूसरी सुविधाएं मिलने लगती हैं।
गुजरात:
 इस राज्य में पैरा टीचर्स को विद्या सहायक के तौर पर नियुक्ति दी जाती है। 1998 से 2010 के बीच राज्य में कुल 1,21,358 विद्या सहायकों की नियुक्ति राज्य सरकार कर चुकी है। इनमें से 85,194 विद्या सहायकों का नियमित वेतनमान पर संविलियन भी हो गया है।

झारखंड:
 यहां पैरा शिक्षकों की तीन कैटेगरी है। उन्हें अतिरिक्त पैरा टीचर्स, महिला पैरा टीचर्स और व्यायाम पैरा टीचर्स के पद पर रखा जाता है। कुछ समय पहले संविलियन के लिए यहां बड़ा आंदोलन हुआ था। इसके बाद सरकार ने स्थायी प्राइमरी शिक्षकों की भर्ती में 50 फ ीसदी पद पैरा टीचर्स के लिए आरक्षित करने का ऐलान किया है।

उत्तर प्रदेश:
यूपी में पैरा टीचर्स को शिक्षा मित्र कहा जाता है। शिक्षा मित्र भी संविलियन की मांग कर रहे थे। इस पर सरकार ने जुलाई 2011 में केबिनेट की बैठक में इस पर फैसला ले लिया। इसका क्रियान्वयन जारी है।
केरल: यहां पैरा शिक्षकों को प्रोटेस्टेड टीचर कहा जाता है। यहां शिक्षा के अधिकार के तहत शासकीय शिक्षक बनाने का आदेश जारी कर दिया गया है।
राजस्थान:
 यहां पैरा शिक्षकों को शिक्षा सहयोगी कहा जाता है। उन्हें प्राइमरी के लिए पहले 8 हजार रुपए मिलते थे। अब शिक्षा का अधिकार कानून के तहत उन्हें पुनरीक्षित वेतनमान और बेहतर सुविधाएं देने का फैसला सरकार ने ले लिया है।

Tuesday, December 20, 2011

क्या आप मुझे बताएंगे कि ये महानुभाव कौन हैं


कभी तो इतना शरीफ हों जाता था कि चोरों और डाकुओं को भी जी लगाकर बोलता था (लादेन जी इत्यादि )
तो कभी इतना उद्दंड हों जाता था कि साधुओं के लिए भी अभद्र भाषा का प्रयोग (हिन्दू आतंकवाद, साध्वी प्रज्ञा आतंकवादी हैं इत्यादि) करता था
पर अपनी इटेलियन मम्मी कि हर बात मानता था,
एक दिन पत्नी के साथ घरेलू सामान खरीदने गया, पत्नी ने आलू के भाव पूँछे तो सब्जी वाले ने बताया २० रूपये किलो, इस पर वो महानुभाव बोले तुम ठग रहे हों मेरी मम्मी ने वताया है कि आलू १० रूपये प्रति किलो हैं, इसी प्रकार गोभी, मटर, टमाटर, मेथी, प्याज लहसन, बैंगन इत्यादि के साथ भी हुआ,
पत्नी को बहुत गुस्सा आया, सामने से ही संघ का जुलुस गुजर रहा था, पत्नी ने क्रोधावेश में स्वयमसेवक से झंडा छीनकर उसकी पिटाई शुरू कर दी, वो व्यक्ति व्न्द्रों कि तरह उछल कूद करके खुद को बचाने का प्रयत्न करने लगा, अंततः स्वय्म्सेवको ने उसे बचा लिया
उस दिन के बाद उसे हर जगह स्वयंसेवक ही स्वयंसेवक नजर आने लगे, चाहे कहीं भी कोई अप्रिय घटना घटे वो व्यक्ति १ ही तोतारटंत बोलता है कि "इसमें संघ का हाथ है".

क्या आप मुझे बताएंगे कि ये महानुभाव कौन हैं

ऊदा देवी

ऊदा देवी पासी जाति से संबद्ध महिला थीं जिन्होने १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीय सिपाहियों की ओर से युद्ध में भाग लिया था। ये अवध के छठे नवाबवाजिद अली शाह के महिला दस्ते की सदस्या थीं। इस विद्रोह के समय हुई लखनऊ की घेराबंदी के समय लगभग २००० भारतीय सिपाहियों के शरणस्थल सिकन्दर बाग़ पर ब्रिटिश फौजों द्वारा चढ़ाई की गयी थी और १६ नवंबर१८५७ को बाग़ में शरण लिये इन २००० भारतीय सिपाहियों का ब्रिटिश फौजों द्वारा संहार कर दिया गया था।
इस लड़ाई के दौरान ऊदा देवी ने पुरुषों के वस्त्र धारण कर स्वयं को एक पुरुष के रूप में तैयार किया था। लड़ाई के समय वो अपने साथ एक बंदूक और कुछ गोला बारूद लेकर एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गयी थीं। उन्होने हमलावर ब्रिटिश सैनिकों को सिकंदर बाग़ में तब तक प्रवेश नहीं करने दिया था जब तक कि उनका गोला बारूद खत्म नहीं हो गया।
ऊदा देवी, १६ नवंबर १८५७ को ३२ अंग्रेज़ सैनिकों को मौत के घाट उतारकर वीरगति को प्राप्त हुई थीं। ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें जब वो पेड़ से उतर रही थीं तब गोली मार दी थी। उसके बाद जब ब्रिटिश लोगों ने जब बाग़ में प्रवेश किया, तो उन्होने ऊदा देवी का पूरा शरीर गोलियों से छलनी कर दिया। इस लड़ाई का स्मरण कराती ऊदा देवी की एक मूर्ति सिकन्दर बाग़ परिसर में कुछ ही वर्ष पूर्व स्थापित की गयी है।
वाजिद अली शाह दौरे वली अहदी में परीख़ाना की स्थापना के कारण लगातार विवाद का कारण बने रहे। फरवरी, १८४७ में नवाब बनने के बाद अपनी संगीत प्रियता और भोग-विलास आदि के कारण बार-बार ब्रिटिश रेजीडेंट द्वारा चेताये जाते रहे। उन्होंने बड़ी मात्रा में अपनी सेना में सैनिकों की भर्ती की जिसमें लखनऊ के सभी वर्गों के गरीब लोगों को नौकरी पाने का अच्छा अवसर मिला। ऊदादेवी के पति भी काफी साहसी व पराक्रमी थे, इनकी सेना में भर्ती हुए। वाजिद अली शाह ने इमारतों, बाग़ों, संगीत, नृत्य व अन्य कला माध्यमों की तरह अपनी सेना को भी बहुरंगी विविधता तथा आकर्षक वैभव दिया।
उन्होंने अपनी पलटनों को तिरछा रिसाला, गुलाबी, दाऊदी, अब्बासी, जाफरी जैसे फूलों के नाम दिये और फूलों के रंग के अनुरूप ही उस पल्टन की वर्दी का रंग निर्धारित किया। परी से महल बनी उनकी मुंहलगी बेगम सिकन्दर महल को ख़ातून दस्ते का रिसालदार बनाया गया। स्पष्ट है वाजिद अली शाह ने अपनी कुछ बेगमों को सैनिक योग्यता भी दिलायी थी। उन्होंने बली अहदी के समय में अपने तथा परियों की रक्षा के उद्देश्य से तीस फुर्तीली स्त्रियों का एक सुरक्षा दस्ता भी बनाया था। जिसे अपेक्षानुरूप सैनिक प्रशिक्षण भी दिया गया। संभव है ऊदा देवी पहले इसी दस्ते की सदस्य रही हों क्योंकि बादशाह बनने के बाद नवाब ने इस दस्ते को भंग करके बाकायदा स्त्री पलटन खड़ी की थी। इस पलटन की वर्दी काली रखी गयी थी।

भ्रमित संत्रास

भ्रमित संत्रास के दौर से गुजर रहे दौर में जीवन कa  सामान्य सफर भी कठिन प्रतीत होने लगा है। आज त मैं खुद •ो आशावादी व्यक्ति समझता रहा हूं। पर अब इस•ी मीमांसा  जी चाहता है। ऐसा समाज जहंा श्रम  •ी •ीमत चु•ाने में डंडी मारने •ी गहरी प्रवृत्ति है। इंसान श्रम क मुफ्त में खरीदना चाहता है। जीवन में सफल •हलाने दूसरे •ा ह• व हु•ू• छीनना नितांत जरूरी गुण बन गया है। •मोबेश, प्रत्ये• जीवन •े जर्रे-जर्रे में मुनाफे •ा स्वार्थ सौदेबाजी करता है। जहंा, चतुर्दि• दिशाओं में झूठ, फरेब व गैरजिम्मेदारी •ा बोलबाला है। शायद यही मेरे देश •ी  •हानी है, यहंा भूख लगने पर आदमी पानी पीता है।
ऐसा देश, जहंा •ी सूचना प्रौद्योगि•ी •ो आगे ले जाने •े लिए जिसे अगुवा बनाते हैं, वही लाखों •रोड़ रूपयों •ा घपला •रता है। मैें और आप सब इसी छत्तीसगढ़ में देख रहे हैं •ि जिन पर प्रदेश राज्य •ो आगे ले जाने •ी जिम्मेदारी है, वही प्रदेश बेच रहे हैं। देश •ी जनता जिन हाथों में अपना त•दीर व तद्बीर सौंपती है, वे ही चंद लोग वतन बेचने पर तुले हैं। जिस पुलिस पर जनता अत्याचार व आतं• से निजात दिलाने •ा भरोसा रखती है, वहीं सर्वाधि• •रप्ट है। जिन पर सडक़ बनाने व उसे ठी• रखने •ा दायित्व है, वे ही सडक़ खोद •र छोड़ देते हैं। न्याय •े मंदिर में बैठने वाले जज रूपयों •े लिए ईमान बेच रहे हैँ। •लम •े सिपाही खेत हो गए और रूपया बनाने वाले पत्र•ार बन गए। नेताओं •े आगे-पीछे घूमने वाले चमचे आज सरताज बन गए, खिलाफत •रने वाले मिट्टी पलित हो गए। सिद्धांत व आदर्श •िस चिडिय़ा •ा नाम है, इसे नहीं जानने वाले राजनीति• नेतृत्व •र रहे है, और जिन•े पास दृष्टि भी नहीं वे खेवनहार बन गए।
यह सब चल रहा है, पर ऊपर ही ऊपर ईमानदारी •ा दुर्दुंभी बजना भी बंद नहीं हुआ।
In an era of terror confused undergoing a normal way of life has begun to seem too hard. Considers appropriate, I'm an optimist today • random. • Minister wants to live the truth now. • together • chu • locating labor Jhna society Imt • bone deep in Dundee has a tendency to kill. Of human labor is free to buy. • Hlane others are successful in life • get • • and John • decided to take away the property has become absolutely necessary. • Mobesh, each • Life • Area Jrre - Jrre • received interest in the deal is profitable. Jhna, Cturdi • directions lies, deceit and irresponsibility • get dominated. Maybe this is my country • Minister • Hani, Yhna hungry man drinks water.This country, Minister of Information Prudyogi Jhna • • • Minister • BENEFITS forward the guide to make the port, road money that millions • • • cum mix is ​​obtained. Me and all you see in the Chhattisgarh State on that person • • • Minister's responsibility to take random, are selling the same state. People get together in the hands of the • • Dir and Tdbir submits, only few people are trying to sell land. The public on police torture and Atn • • get rid of the trust holds, there is Srwadi • • Rpt. • • to create and it immediately got on the road to responsibility, they dug up the road • R leave. • Your money just sitting in the temple area • There are areas to sell the trust. • Lam • nine soldiers were farm and making money became the letters • the doors. • Area leaders back and forth swivel spoon became lord today, opposition • Rne were Plit the soil. • • Is Cidiyha principle and ideal base name, not knowing it is the politics • Leadership • r, and the • sector not the pilot became a vision.It's going to get very superficial honest • Clank Durdunbi was not even close.

Friday, December 2, 2011

YP.



दोस्तों वो कहते है :- हर खूबसूरत लड़की के चेहरे पर नकाब होता हैं !
दोस्तों ये कहते है :- हर खूबसूरत लड़की का हुश्न लाजवाब होता हैं !!
दोस्तों हम कहते है :- ये सब आशिक के लिए अजब होता हैं !!!

दोस्तों वो कहते है ,'' अगर समय ठीक होगा तो हम भ्रष्टाचार ज़रूर मिटायेंगे ''
हम पूछते है ''अगर भ्रष्टाचार नहीं मिटा तो हम कैसे जी पाएंगे ''........

दोस्तों वो कहते है :- मोहबत एक से हो जाये तो मेकप होता हैं !
दोस्तों ये कहते है :- मोहबत दो से हो जरे तो ब्रेकअप होता हैं !!
दोस्तों हम कहते है :- मोहबत कियो से हो जाये
 तो HIV -POSITIVE का चैकप होता है !!!

Friday, November 25, 2011

Forecast on 4 Ps - Four Pillars of Democracy, Democratic India


Though Legislature, Executive, Judiciary & Press are considered as 4 pillars but I (personally) strongly disagree with that. Public is no pillar, that's why the other 4 are trembling without it's support. And, Judiciary can't be part of it... For, Law is Above All !

From my perspective, The four pillars have a sensitive, crucial, responsible &  dutiful role in a healthy democracy. All begin with 'P', and what are those?:
  1. Politics
  2. Press
  3. Police (consider including executive)
  4. Public
They together constitute democracy but  the astonishing facts are :
  • All these 4 Ps are no friends to each other
  • No P of these 4 trusts the other
  • Some of these Ps have a well formed nexus to crush or harass the other P or Ps
  • 3rd P is not occupying suitable place
  • 2nd P is deceitfully occupying this position
  • 4th P is always pathetic and awkward at that position
  • 4th P retains most of the 3 Ps - Power, Potential & Patience
  • 4th P has the ability to completely  reform the other 3Ps which take the top positions above it
The times are changing...
The Wheel of Creation Moves and takes its own course

The 2nd P will be the first to be rewarded with a suitable P
The 1st P will be the 2nd to be rewarded with a suitable P
The 3rd P will make a choice of Friends & Foes
The 3rd P will also make a choice - Perform or Perish
The 4th P still has some hopes on 3rd P

Guess! Which P am I?

Anyways, if any of the other 3 Ps feels enraged...
The other P or Ps may feel free to harass or crush me!

But my 6th Sense says this is going to happen
जय हिन्द! 
सत्यमेव जयते

सड़क , बांध , जंगल , तलाव , समसान भी बेच दी

सड़क , बांध , जंगल , तलाव , समसान भी  बेच दी

Tuesday, November 15, 2011

तीन चौथाई संपत्ति आठ हजार भारतीयों के पास

तीन चौथाई संपत्ति आठ हजार भारतीयों के पास भारत में धनकुबेरों की संख्या बढ़ती जा रही है।

यूएचएनडब्ल्यू यानी दिग्गज दौलतमदों की संख्या 8,200 है और उनकी कुल संपत्ति 945 अरब डॉलर (47.58 लाख करोड़ रुपये) आंकी गई है। यह धन भारत के वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के करीब तीन चौथाई के बराबर है।
वैश्विक स्तर पर संपत्तियों का आकलन और अध्ययन करने वाली फर्म वेल्थ एक्स की रिपोर्ट के मुताबिक इनमें 115 लोगों... के पास एक अरब डॉलर से ज्यादा की संपत्ति है। सभी 8,200 लोगों की संपत्ति भारत की कुल अर्थव्यवस्था के 70 फीसदी के बराबर है।
भारत में रोज करोड़पतियों की संख्या बढ़ रही है। इनमें से कुछ तो हाल ही में अरबपति बने हैं। वेल्थ एक्स के मुताबिक यूएचएनडब्ल्यू की सूची में शामिल प्रत्येक धनकुबेर के पास कम से कम 3 करोड़ डॉलर (151 करोड़ रुपये) हैं। 6,150 भारतीयों के पास तीन करोड़ डॉलर से 10 करोड़ डॉलर की संपत्ति है। करीब 900 दौलतमंदों के पास 10 करोड़ से 20 करोड़ डॉलर की संपत्ति है। 20 करोड़ से 50 करोड़ डॉलर की दौलत रखने वाले भारतीयों की संख्या करीब 880 है, जबकि 50 करोड़ डॉलर से 99 करोड़ डॉलर की संपत्ति 160 भारतीयों के पास है। 4,960 आप्रवासी भारतीयों धनकुबेरों के पास कुल 465 अरब डॉलर (2,341 करोड़ रुपये) की दौलत है।

कोई है जो हवाओं के पर कतरता है.


पहले अन्ना अपनी टीम में उन लोगों से बचें जिनकी सोच देश को ही बांटने वाली है. अगर वो ऐसा नहीं करते तो दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेसी एक-एक तीर से कई-कई निशाने साधते रहेंगे. यह मौका क्यूं दिया जाये उन नेताओं को जिनकी रोज़ी सत्ता की रोटी सेंकने से चलती है.
ये बहस जारी रहेगी और हमारी कोशिश होगी कि अन्ना के भोलेपन को अपना मुखौटा बनाने वाले टीम अन्ना के कुछ लोगों के चेहरे से नकाब खींचा जाए क्योंकि ये वो लोग हैं जो इतने बड़े जनांदोलन के लिए सत्ता से भी ज्यादा घातक हैं

Monday, November 14, 2011

अब तो बस आसमान बाकी है |


अब तो बस आसमान बाकी है |
सर क़लम होंगे कल यहाँ उनके,
जिनके मुंह में ज़बान बाक़ी है ||

डालर में खरीदना होग गोमूत्र

अमेरिका के वैज्ञानिक आते ही चढ़ बैठे- "आप विश्व हित की टेक्नोलाजी को छुपा रहे हो। आप वसुदैव कुटूंबकम की हिंदू संस्कृती भूल गये हो।" आपके यहां गायें के पीछे गोबर इकठ्ठा करने के लिये भागना पड़ता है। फ़िर भी आप उस गोबर से मीथेन गैस बना, इंधन के मामले में आत्म निर्भर हो गये। हम दस हजार गायें एक एक फ़ार्म मे पालते है, सबका गोबर आटॊमेटिक एकठठा हो जाता है। फ़िर भी हम उसका उपयोग करने मे असमर्थ हैं।" हमने कहा- " हम आपको गोबर की तकनीक विशेष शर्तो पर उपलब्ध करा सकते हैं। इस तकनीक में काम आने वाला गौ मूत्र, शुद्ध भारतीय होगा और यह गोमूत्र आपको सौ डालर प्रति लीटर पर खरीदना होगा।"

Friday, November 11, 2011

वे मनुष्य ही धन्यवाद् के पात्र

जितने मनुष्य से भिन्न जातिस्थ प्राणी है उनमे दो प्रकार का स्वाभाव है ----- बलवान से डरना, निर्बलो को डराना और पीड़ा देना, अर्थात दुसरे का प्राण तक निकालके अपना मतलब साध लेना, ऐसा देखने में आता है | जो मनुष्य ऐसा स्वाभाव रखता है उसको भी इन जातियों में गिनना उचित है, परन्तु जो निर्बलो पर दया, उनका उपकार आर निर्बलो को पीड़ा देनेवाले अधर्मी बलवानो से किंचितमात्र भी भय शंका न करे इनको परपीड़ा से हटाके निर्बलो की रक्षा तन,मन,धन से सदा करना ही मनुष्य जाती का निजगुन है, क्यों की जो बुरे कामो के करने में भय और सत्य कामो के करने में किंचित भी भय-शंका नहीं करते वे ही मनुष्य धन्यवाद् के पात्र  कहाते है |

Thursday, November 10, 2011

मामले की अगली सुनवाई 15 नवंबर को होगी।

कानून तोड़ने वालों के मानवाधिकार की वकालत बढ़ने की खबरों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोई भी भुखमरी, किसानों की आत्महत्या और आतंकवादी कार्रवाई में मारे गए जवानों के मानवाधिकारों की बात नहीं करता।रायसीना ब्लास्ट मामले में फांसी की सजा पाए देवेंदर पाल सिंह भुल्लर की अर्जी पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की। भुल्लर की दया याचिका राष्ट्रपति ने खारिज कर दी थी। उसकी ओर से दाखिल अर्जी में कहा गया है मेरी दया याचिका के निपटारे में 8 साल लगे हैं, ऐसे में मेरी सजा कम की जानी चाहिए।जस्टिस जी. एस. सिंघवी और जस्टिस एस. जे. मुखोपाध्याय ने माना कि मानवाधिकार कुछ खास लोगों तक सीमित नहीं रह सकता। यह उन तमाम लोगों के लिए है, जो समाज में हाशिये पर हैं और हिंसा के शिकार हैं। संसद की रक्षा में कई सुरक्षाकर्मियों ने जान दी। ऐसे बहादुर लोगों को भुला दिया गया। रायसीना ब्लास्ट में 9 लोगों की जान गई थी और 29 लोग घायल हो गए थे। ऐसे लोगों की भावनाओं को किसी ने जाना है। इनके मानवाधिकार का क्या हुआ?
भुल्लर की ओर से पेश सीनियर वकील के. टी. एस. तुलसी ने दलील दी थी कि 2003 से भुल्लर की दया याचिका पेंडिंग थी और उसके निपटारे में 8 साल का वक्त लगा, जो कहीं न कहीं गैर मानवीय और प्रताड़ना की श्रेणी में आता है। जब वकील ने हवाला दिया कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में मौत की सजा के खिलाफ माहौल बन रहा है। इसके बाद बेंच ने कहा, हां, हम उदार देश हैं। कई भूख से मरते हैं, किसान आत्महत्या कर चुके हैं, उनके मानवाधिकार का क्या?भुल्लर के वकील से सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि याचिका के निपटारे में हुई देरी फांसी की सजा कम किए जाने का आधार है? मामले की अगली सुनवाई 15 नवंबर को होगी।

Monday, November 7, 2011

शब्दों की खोई गठरी


सब देखता हूँ, सब जानता हूँ, फिर भी अपनी आँखे मै मूँद रहा हूँ |

इन शब्दों में थोड़ी है शर्म, और ज्यादा लाचारी है |
क्यूँ की इन शब्दों की ताकत कुछ शब्दों से ही हारी है |
उन "कुछ शब्दों" की अपनी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं है |
उन "कुछ शब्दों" को, किताब की पीड़ा का कोई भान नहीं है |

मै भी ये सब होते देख रहा हूँ, हार कर अपने घुटने टेक रहा हूँ |
मेरी भी लाचारी पर मै बस सूखी मिट्टी को तलवो से गूंध रहा हूँ|

सब देखता हूँ, सब जानता हूँ फिर भी अपनी आँखे मै मूँद रहा हूँ
शब्दों की खोई गठरी से ....

शर्मिन्दा शब्दों के मुखिया को ही, इन शब्दों से जैसे कोई बैर है
मानो वो कुछ शब्द ही है उनके अपने, बाकी हर शब्द जैसे गैर है |
उन "कुछ शब्दों" को बचाने को, उनका हर अपराध छुपाने को
ये "शर्मिन्दा शब्दों का मुखिया" हर आक्षेप खुद पर ही लेता हैं |

मै भी ये सच जान रहा हूँ, दोषी दोनों को ही मै मान रहा हूँ |
कैसे किसी को निर्दोष कहूँ, खुद से ही मै ये पूँछ रहा हूँ |

सब देखता हूँ, सब जानता हूँ, फिर भी अपनी आँखे मै मूँद रहा हूँ|
शब्दों की खोई गठरी से ....

"कुछ शब्दों" की मक्कारी से, मासूम शब्दों की गरिमा घटती है|
उन मासूमों की छाती भी, शायद इस मक्कारी से फटती है !
"कुछ शब्दों" की इस मक्कारी को, मासूम कहाँ समझ पाते हैं ?
और यही बात है जिसका फायदा, ये सारे मक्कार उठाते हैं |

मै भी इस मक्कारी को समझ रहा हूँ, दर्द में मै भी तडप रहा हूँ |
पर आक्रोश की आंधी मे, मै अब परिवर्तन की महक सूंघ रहा हूँ |

सब देखता हूँ, सब जानता हूँ फिर भी अपनी आँखे मै मूँद रहा हूँ |
शब्दों की खोई गठरी से ....

भेड़ चाल


इस सृष्टि में कोई भी मनुष्य पूर्णतः निष्पाप निर्मल निर्दोष नहीं है और न ही होगा|
फिर विरोध प्रदर्शन में मर्यादा को लांघना, किसी के नीजी जीवन से सम्बंधित आपतिजनक संभाषण देना क्या उचित है ???
आज की पीढ़ी में एक यही कमी है की वो उग्रता को, बहकावे और भड़काऊ भाषणबाज को देश का सच्चा भक्त मान लेती है|
वास्तव में भेड़ चाल शुरू हो जाती है|
सभी के लेखन में भाषण में वही उग्रता, अमर्यादा...
एक सच्चा राजा प्रजा को बहका कर डराकर धमकाकर नहीं जीतता, वह तो चोट खाने पर भी सच को सम्मान दिलाता है और प्रजा के मन में भी सच को स्थान दिलाता है| दुःख होता है आज की युवा पीढ़ी को यु भटकते देखने पर,
आज के युवा पत्रकार तो मानो विश्लेषण, चिंतन, संशोधन जैसे शब्दों को भुला बैठे है और बस वो भी वर्तमान की मार खाए हुए बैल की भाति एक ही भाषा एक ही दिशा में चल रहे है|

Friday, November 4, 2011

अब्राहम लिंकन की वकालत

वकालत से कमाई की दृष्टि से देखें तो अमेरिका के राष्ट्रपति बनने से पहले अब्राहम लिंकन ने बीस साल तक असफल वकालत की. लेकिन उनकी वकालत से उन्हें और उनके मुवक्किलों को जितना संतोष और मानसिक शांति मिली वह धन-दौलत बनाने के आगे कुछ भी नहीं है. उनके वकालत के दिनों के सैंकड़ों सच्चे किस्से उनकी ईमानदारी और सज्जनता की गवाही देते हैं.
लिंकन अपने उन मुवक्किलों से अधिक फीस नहीं लेते थे जो ‘उनकी ही तरह गरीब’ थे. एक बार उनके एक मुवक्किल ने उन्हें पच्चीस डॉलर भेजे तो लिंकन ने उसमें से दस डॉलर यह कहकर लौटा दिए कि पंद्रह डॉलर पर्याप्त थे. आमतौर पर वे अपने मुवक्किलों को अदालत के बाहर ही राजीनामा करके मामला निपटा लेने की सलाह देते थे ताकि दोनों पक्षों का धन मुकदमेबाजी में बर्बाद न हो जाये. इसके बदलें में उन्हें न के बराबर ही फीस मिलती था. एक शहीद सैनिक की विधवा को उसकी पेंशन के 400 डॉलर दिलाने के लिए एक पेंशन एजेंट 200 डॉलर फीस में मांग रहा था. लिंकन ने उस महिला के लिए न केवल मुफ्त में वकालत की बल्कि उसके होटल में रहने का खर्चा और घर वापसी की टिकट का इंतजाम भी किया.



लिंकन और उनके एक सहयोगी वकील ने एक बार किसी मानसिक रोगी महिला की जमीन पर कब्जा करने वाले एक धूर्त आदमी को अदालत से सजा दिलवाई. मामला अदालत में केवल पंद्रह मिनट ही चला. सहयोगी वकील ने जीतने के बाद फीस में बँटवारा करने की बात की लेकिन लिंकन ने उसे डपट दिया. सहयोगी वकील ने कहा कि उस महिला के भाई ने पूरी फीस चुका दी थी और सभी अदालत के निर्णय से प्रसन्न थे परन्तु लिंकन ने कहा – “लेकिन मैं खुश नहीं हूँ! वह पैसा एक बेचारी रोगी महिला का है और मैं ऐसा पैसा लेने के बजाय भूखे मरना पसंद करूँगा. तुम मेरी फीस की रकम उसे वापस कर दो.”



आज के हिसाब से सोचें तो लिंकन बेवकूफ थे. उनके पास कभी भी कुछ बहुतायत में नहीं रहा और इसमें उन्हीं का दोष था. लेकिन वह हम सबमें सबसे अच्छे मनुष्य थे, क्या कोई इस बात से इनकार कर सकता है?
लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नहीं करते थे और किसी चर्च से सम्बद्ध नहीं थे. एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के बारे में पूछा. लिंकन ने कहा – “बहुत पहले मैं इंडियाना में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था ‘जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ, और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ’. यही मेरा धर्म है’.
                                       (A motivational / inspiring anecdote of Abraham Lincoln in Hindi)














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बुनियादी सवाल ही नहीं पूछा, कि यात्रा शुरू करे

बुद्ध को दिखाई पड़ा है एक मुर्दा। और बुद्ध ने पूछा कि यह क्या हो गया? बुद्ध के सारथी ने कहा कि यह आदमी मर गया है। तो बुद्ध ने तत्काल पूछा कि क्या मैं भी मर जाऊंगा! अगर आप होते बुद्ध की जगह, तो आप कहते, बेचारा! बड़ा बुरा हुआ। इसके बच्चों का क्या होगा? इसकी पत्नी का क्या होगा? अभी तो कोई उम्र भी न थी मरने की। लेकिन एक बात पक्की है कि बुद्ध ने जो पूछा, वह आप न पूछते।
बुद्ध ने न तो यह कहा कि बेचारा; न कहा यह कि इसकी पत्नी का क्या होगा; कि इसके बच्चों का क्या होगा; अभी तो कोई उम्र न थी, अभी तो मरने का कोई समय न था। बुद्ध ने दूसरा सवाल सीधा जो पूछा, वह यह कि क्या मैं भी मर जाऊंगा?
यह आपने, कभी कोई रास्ते पर मरे हुए आदमी की अर्थी निकली, तब पूछा है कि क्या मैं भी मर जाऊंगा? जब किसी को बूढ़ा हुआ देखा है, तो पूछा है कि क्या मैं भी बूढ़ा हो जाऊंगा? जब किसी को अपमानित होते देखा है, तो पूछा है कि क्या मैं भी अपमानित हो जाऊंगा? जब कोई स्वर्ण-सिंहासन से उतरकर और धूल में गिर गया है, तब कभी पूछा है कि क्या मैं भी गिर जाऊंगा?नहीं पूछा, तो फिर बुद्ध जैसे योग की प्रतिष्ठा को आप उपलब्ध होने वाले नहीं। आपने बुनियादी सवाल ही नहीं पूछा है कि जो यात्रा शुरू करे।

शर्म आती है

अगर ऐसा वाकया आपको देखने को मिले जहाँ कोई अपनी माँ को माँ कहने में शर्म महसुस करता हो और पुछने पर कहता हो ये बताने के लिए कि ये माँ है,माँ कहना जरुरी नहीं है। जरा सोचिए कितनी शर्मसार करने वाली घटना है। मेरा ये कहना उनके लिए है जो की अपने आपको भारतीय कहते है और "वन्दे मातरम्" जैसे पवित्र शब्द जो की हमारा राष्ट्रिय गीत है, को गाने से इनकार करते है और कहते है कि ये इस्लाम विरोधी है। जिसकी खाते है, जह...ाँ रहते है, उसको समर्पित दो शब्द कहने की बारी आती है तो उसे धर्म विरोधी बताकर उसका गान करने से मना करना कितनी शर्म की बात है एक कहावत है "जिस थाली में खाना उसी में छेद करना" यहा फिट बैठती है। धरती माँ जिससे हमें जीवन मिलता है, जिससे पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी मिलती है, जिसकी लाज बचाने के लिए न पता कितनो नें अपने प्राण की आहूती दे दी उसको सम्मान देनें में जिसे शर्म आती है उसे सच कह रहा हूँ कहीं डुब मरना चाहिए।

बदलते अरमान

हर लम्हा मेरे चंचल मन के अरमान बदलते रहते हैं,
किस्सा तो वही फरसूदा है उनवान बदलते रहते हैं
कायम हैं जहां में दो चीजें इक हुस्न तेरा इक इश्क मेरा
पूजा के मगर ऐ बुत तेरी सामान बदलते रहते हैं।

जब जीस्त का अपना मकसद ही तेरी खिदमत करना ठहरा
फिर इसकी शिकायत क्या तेरे फरमान बदलते रहते हैं।

जो पत्थर ..चोट नहीं खाता






जो पत्थर हथोडी की चोट नहीं खाता

मुश्किलें तो जिंदगी कि तस्वीर का अनोखा रंग हैं
बिना इस रंग को पाए अगर जीत भी गए तो भी जीत की तस्वीर में मज़ा नहीं आता.

जो पानी उपर से नीचे नहीं आता
वो न तो किसी की लिए अमृत होता न ज़हर बन पाता
गिरना तो जिंदगी का एक कदम हैं
                              बिना इस कदम को रखे आकाश छूने का मज़ा भी नहीं आता            
जो पत्थर हथोडी की चोट नहीं खाता
वो न तो मंदिर में न किसी मस्जिद में जगह कभी पाता

Thursday, November 3, 2011

शांत बैठ जाओ कोमल संगीत को सुनो

निर्देश: देववाणी का अर्थ है परमात्मा की वाणी। इसमें साधक को माध्यम बनाकर दिव्यता ही गति करती है और बोलती है; साधक एक रिक्त पात्र और ऊर्जा प्रवाह के लिए एक मार्ग बन जाता है। यह ध्यान जीभ का लातिहान है। यह विधि चेतन मन को इतनी अधिक गहराई से शिथिल करती है कि जब इसका प्रयोग रात सोने के पहले किया जाए, तो निश्चित ही इसके बाद गहन निद्रा आने वाली है। इस विधि में पंद्रह-पंद्रह मिनट के चार चरण हैं। सभी चरणों में आंखें बंद रखो।
पहला चरण: पंद्रह मिनट
शांत बैठ जाओ कोमल संगीत को सुनो।
दूसरा चरण: पंद्रह मिनट
निरर्थक आवाजें निकालना शुरू करो, उदाहरण के लिए ‘ल, ल, ल’ से प्रारंभ करो और इसे उस समय तक जारी रखो जब तक कि एक अज्ञात भाषा-प्रवाह जैसे लगने वाले शब्द न आने लगें। ये आवाजें मस्तिष्क के उस अपरिचित हिस्से से आनी चाहिए जिसका उपयोग बचपने में शब्द सीखने के पहले तुम करते थे। बातचीत की शैली में कोमल ध्वनि वाले शब्द-प्रवाह को आने दो। न रोओ, न हंसो, न चीखो, न चिल्लाओ।
तीसरा चरण: पंद्रह मिनट
खड़े हो जाओ और अनजानी भाषा में बोलना जारी रखो और अब उच्चारित शब्दों के साथ एक लयबद्धता में शरीर को धीरे-धीरे गति करने दो, मुद्राएं बनाने दो। यदि तुम्हारा शरीर शिथिल है तो सूक्ष्म ऊर्जाएं तुम्हारे भीतर एक लातिहान नामक मुद्राएं और गतियां पैदा करेंगी, जो तुम्हारे कुछ भी किये बिना ही जारी रहेंगी।...............ओशो

कहीं ये मैं तो नहीं


मद्धिम आभा से
पहरो चुपचाप हीं निहारते हुये
आस-पास
कोई संध्या अजनबी सा वजूद
डोलता है मेरे आस-पास
कहीं ये मैं तो नहीं
 

जब गलत कट जाता है, तो जो शेष रह जाता है वह शुभ है।


इस जमीन पर, इस अस्तित्व में कोई बिलकुल बुरा है, ऐसा नहीं है। और कोई बिलकुल भला है, ऐसा भी नहीं है। लेकिन आपके चुनाव पर निर्भर है कि आप क्या चुनते हैं। आपके अभ्यास पर निर्भर है कि आप क्या चुनते हैं। अगर आपने तय कर रखा है कि बुरा ही चुनेंगे, तो आपको बुरा मिलता चला जाएगा। जिंदगी में भरपूर बुरा है। अगर आपने तय कर लिया है कि अंधेरा ही चुनेंगे, तो दिनभर विश्राम करना आप आंख बंद करके, रात को निकल जाना खोजने; मिल जाएगा। मिलेगा वही-वही।
         बुरे को खोजना है, बुरा मिल जाएगा। दुख को खोजना है, दुख मिल जाएगा। पीड़ा खोजनी है, पीड़ा मिल जाएगी। शैतान खोजना है, शैतान मिल जाएगा। परमात्मा खोजना है, तो वह भी मौजूद है, जस्ट बाई दि कार्नर। वहीं, जहां शैतान खड़ा है। शायद इतना भी दूर नहीं है। शायद शैतान भी परमात्मा के चेहरे को गलत रूप से देखने के कारण है।
जिस आदमी को कांटों के बीच फूल खिला हुआ मालूम पड़ता है और जो कहता है, धन्य है! लीला है, रहस्य है प्रभु का! इतने कांटों के बीच फूल खिलता है! उस आदमी को बहुत दिन कांटे दिखाई नहीं पड़ेंगे। जो इतने कांटों के बीच फूल को देख लेता है, वह थोड़े ही दिनों में कांटों को फूल के मित्र की तरह देख ही पाएगा। वह, कांटे फूल की रक्षा के लिए हैं, यह भी देख पाएगा। अंततः वह यह भी देख पाएगा कि कांटों के बिना फूल नहीं हो सकता है, इसलिए कांटे हैं। और आखिर में कांटों का जो कांटापन है, खो जाएगा; और कांटे भी धीरे-धीरे फूल ही मालूम पड़ने लगेंगे।
और जिस आदमी ने देखा कि कांटे ही कांटे हैं; कहीं एकाध फूल खिल जाता है भूल-चूक से, यह एक्सिडेंट मालूम होता है। यह फूल एक्सिडेंट है, कांटे असलियत हैं। बात भी ठीक लगती है। कांटे बहुत, फूल एक। वह आदमी बहुत दिन तक फूल में भी फूल को नहीं देख पाएगा। बहुत जल्दी उसको फूल में भी कांटे दिखाई पड़ने लगेंगे।
हमारी दृष्टि धीरे-धीरे फैलकर निरपेक्षपूर्ण हो जाती है। लेकिन अस्तित्व? अस्तित्व द्वंद्व है; वहां दोनों मौजूद हैं।
योगाभ्यासी का अर्थ है, ऐसा व्यक्ति, जो जीवन में शांति की खूंटियां खोजता है, आनंद की खूंटियां खोजता है। फूल खोजता है। आशा खोजता है। सौंदर्य खोजता है। आनंद खोजता है। जो जीवन में नृत्य खोजता है, उत्सव खोजता है। जीवन में उदासी बटोरने का जिसने ठेका नहीं लिया है। जो जगह-जगह जाकर कांटे और कंकड़ नहीं खोजता रहता है। और जिनको इकट्ठा करके छाती पर रखकर चिल्लाता नहीं है कि जिंदगी बेकार है, अर्थहीन है।
योगाभ्यास का अर्थ है, जीवन को विधायक दृष्टि से देखने का ढंग। योग जीवन की विधायक कीमिया है, पाजिटिव केमेस्ट्री है। और उसका अभ्यास करना पड़ेगा। क्योंकि आपने अभ्यास किया हुआ है। अगर आप पुराने अभ्यास को ऐसे ही, बिना अभ्यास के छोड़ने में समर्थ हों, तो छोड़ दें। तो फिर नए अभ्यास की कोई भी जरूरत नहीं है।
लेकिन वह पुराना अभ्यास जकड़ा हुआ है, भारी है; वह छूटेगा नहीं। उसे इंच-इंच जैसे बनाया, वैसे ही काटना भी पड़ेगा। जैसे घर बनाया, वैसे अब एक-एक ईंट उसकी गिरानी भी पड़ेगी। भला वह ताश का ही घर क्यों न हो, लेकिन ताश के पत्ते भी उतारकर रखने पड़ेंगे। भला ही वह कितनी ही झूठी व्यवस्था क्यों न हो, लेकिन झूठ की भी अपनी व्यवस्था है; उसको भी काटना और मिटाना पड़ेगा।
योगाभ्यास गलत अभ्यासों को काटने का अभ्यास है। ठीक विपरीत यात्रा करनी पड़ेगी। जिस व्यक्ति में कल तक देखा था बुरा आदमी, उसमें देखना पड़ेगा भला आदमी। जिसमें देखा था शत्रु, उसमें खोजना पड़ेगा मित्र। जहां देखा था जहर, वहां अमृत की भी तलाश करनी पड़ेगी। यह तो हुई एक बहिर्व्यवस्था।
और फिर अपने में भी यही करना पड़ेगा। अपने भीतर भी जिन-जिन चीजों को बुरा देखा था, उन-उन में शुभ को खोजना पड़ेगा। कामवासना में देखा था नरक का मार्ग, अब कामवासना में स्वर्ग का मार्ग भी देखना पड़ेगा। स्वर्ग का मार्ग कामवासना में देखते से ही, काम की वासना ऊर्ध्वगामी होकर स्वर्ग के मार्ग को भी लगा देती है। कल तक क्रोध में देखा था सिर्फ क्रोध, अब क्रोध में उस शक्ति को भी देखना पड़ेगा, जो क्षमा बन जाती है। क्रोध की शक्ति ही क्षमा बनती है। काम की शक्ति ही ब्रह्मचर्य बनती है। लोभ की शक्ति ही दान बन जाती है।
देखना पड़ेगा; खोजना पड़ेगा। अब तक एक तरह से देखा था जीवन को, अब ठीक विपरीत तरह से देखना पड़ेगा। उस विपरीत तरह के देखने की क्या विधियां हैं, उनकी बात मैं संध्या करूंगा। इस सूत्र पर भी पूरी बात संध्या करेंगे। अभी इतना ही खयाल में लें कि अगर गलत का अभ्यास किया है, तो गलत को काटने का भी अभ्यास करना पड़ेगा।
...            निश्चित ही, जब गलत कट जाता है, तो जो शेष रह जाता है वह शुभ है। 
                                                                                                                             ओशो     

Wednesday, November 2, 2011

जैसे ...पांव तेरे थम जाते थे

यूँ लग रहा है आफ़ताब का रुक रुक कर ढलना ..
जैसे मुझसे बिछड़ते वक्त पांव तेरे थम जाते थे

अद्भुत वस्तु' और 'भयंकर नजारे' को देख !

फटी की फटी रह गईं!

लखनऊ/बिजनौर।पिछले महिने की 25 तारीख को ब्राजील में एक अनोखी घटना हुई। यहां कुछ बच्चे पिकनीक मनाने के लिए गए हुए थे। पार्क में मस्ती करते हुए बच्चों की नजर पास के जंगल में एक अद्भुत आकति पर पड़ी। इसे देख सबके होश उड़ गए। बाद में पता चला यह आकृति किसी और की नहीं बल्कि एलियन की थी। धरती पर यूएफओ और एलियन का देखे जाने की घटना कई बार हो चुकी है। इस हालिया घटना ने एक बार फिर पृथ्वी से परे एक नए जीवन के बहस को तेज कर दिया है। याद दिला दें इसी तरह की घटना अक्तूबर 2009 में यूपी के बिजनौर में हुई थी।इस दिन आसमान में एक तेज रौशनी दिखाई दी। अपनी छत पर बैठे एक भाई-बहन की आंखे फटी की फटी रह गईं। दोनों ने इससे पहले इतनी तेज रौशनी कभी नहीं देखी थी। उन्होंने अपने मोबइल से उसका फोटो ले लिया। उन्होंने और जो कुछ बताया वह सब वाकई में अकल्पनीय था।
क्या होता है यूएफओ
यूएफओ (UFO) का मतलब उस "उड़न तश्तरी"और "उड़न डिस्क"से है जो अज्ञात होती है। यूएफओ शब्द खासकर विदेशी अंतरिक्ष यान के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता है और यूएफओ के बारे में अधिकतर चर्चाएं इसी अनुमान के इर्द गिर्द घूमती रहती हैं।
यूएफओ वर्षों से जांच का विषय बना हुआ है जो प्रयोजन और वैज्ञानिक परिशुद्धता में व्यापक रूप से भिन्न पाया गया है। सरकारों या स्वतंत्र विद्वानों ने संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जापान, पेरू, फ्रांस, बेल्जियम, स्वीडन, ब्राजील, चिली, उरुग्वे, मैक्सिको, स्पेन, और सोवियत संघ में विभिन्न समय पर यूएफओ की रिपोर्टों की जांच की है। दिसंबर 1980 में इंग्लैंड के रैंडेलशैम जंगलों में दो बार यूएफओ देखे गए।
इस इलाके में ब्रिटेन और अमेरिका के एयरफोर्स बेस थे। उनके अधिकारियों ने इन्हें देखा था। फिर भी रिसर्च में कुछ साबित नहीं हो सका। वहीं, 26 दिसंबर 1980 के दिन आरएएफ वुडब्रिज के सुरक्षा गार्डस ने रात तीन बजे जंगल के पास चमकती हुई लाइट्स देखी। उन्हें लगा कोई प्लेन गलती से यहां उतर गया होगा। पीछा करने पर पता चला ये विचित्र लाइट्स जंगल के पेड़ों के बीच से आराम से गुजर रही हैं। सबसे चमकीली लाइट एक अजीब-सी चीज से निकल रही थी
वीडियो में देखिए पूरी कहानी...वीडियो साभार यूट्यूब

प्रार्थना की एक अनदेखी कड़ी !


बाँध देती है
तुम्हारा मन, हमारा मन,
फिर किसी अनजान आशीर्वाद में-
डूबन
मिलती मुझे राहत बड़ी !

प्रात सद्य:स्नात
कन्धों पर बिखेरे केश
आँसुओं में ज्यों
धुला वैराग्य का सन्देश
चूमती रह-रह
बदन को अर्चना की धूप
यह सरल निष्काम
पूजा-सा तुम्हारा रूप
जी सकूँगा सौ जनम अँधियारियों में, यदि मुझे
मिलती रहे
काले तमस् की छाँह में
ज्योति की यह एक अति पावन घड़ी !
प्रार्थना की एक अनदेखी कड़ी !

चरण वे जो
लक्ष्य तक चलने नहीं पाये
वे समर्पण जो न
होठों तक कभी आये
कामनाएँ वे नहीं
जो हो सकीं पूरी-
घुटन, अकुलाहट,
विवशता, दर्द, मजबूरी-
जन्म-जन्मों की अधूरी साधना, पूर्ण होती है
किसी मधु-देवता
की बाँह में !
ज़िन्दगी में जो सदा झूठी पड़ी-
प्रार्थना की एक अनदेखी कड़ी !

Tuesday, November 1, 2011

जिसकी जैसी जेब है,वैसा उसका माप


जिसकी जैसी जेब है,वैसा उसका माप
वैसा उसका माप,कि बाबू पैसा आल इन वन
पैसा पास नहीं तो तय है मुरझाएगा मन
लाख पढ़ो,गुणवान बनो,बिन पैसे कुछ न होवे
अनपढ़ झूम रहा मस्ती में,ज्ञानी घर में रोवे
कह प्रीतम कविराय,रचा मालिक ने खेल निराला
मेहनतकश को मौत मिले पर मिलता नहीं निवाला
                                                                     कुंवर प्रीतम

Thursday, October 27, 2011

भुलाना इतना आशान भी नहीं,

भुलाना इतना आशान भी नहीं,
मगर भूल जाना ही बेहतर है,
कि तुम इतने बदसूरत लगने लगे,
तुम्हे और देखना मुमकिन नहीं .........

सरफरोशी की तमन्ना

खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मींद,
आशिकों का जमघट 
आज कूंचे-ऐ-कातिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
                                                 Ram Prasad Bismil

Saturday, October 22, 2011

बिचारा शिक्षा कर्मी


न ठेठरी हे न खुरमी हे ,,
न रेती हे न मुरमी हे ,,
आधा बीच माँ लटके हे ,,
तेन बिचारा शिक्षा कर्मी हे ,,
बोले बर गुरूजी
दू सौ रूपया रोजी ,,
अपने जीवन मुर्कूटाय हे ,,
लइका मन ला लुवाट सोजही,,
भाटापारा पोस्टिंग ,,
रायपुर ले जाथे
बारह ले तीन के बीच ,,
जतका आथे पढ़ाथे ,,
मध्यान भोजन के भात खाथे,,
तभे पोसाथे,,
wah re shikshakrmi...........

अतका हटर हटर कर के
राज्य के भविष्य बनाथे,,
ज्यादा ,,उम्मीद करना बेशर्मी हे ,,
तिर्शंकू असन लुलवात हे ,,
तेन बिचारा शिक्षा कर्मी हे ,,

http://www.blogger.com/post-create.g?blogID=4089015287750687771

भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् मूढ़मते।
संप्राप्ते सन्निहिते काले न हि न हि रक्षति डुकृग्करणे।।

इस मधुर गीत का पहला पद शंकर ने तब लिखा, जब वे एक गांव से गुजरते थे, और उन्होंने एक बूढ़े आदमी को व्याकरण के सूत्र रटते देखा। उन्हें बड़ी दया आई, मरते वक्त व्याकरण के सूत्र रट रहा है यह आदमी! पूरा जीवन भी गंवा दिया, अब आखिरी क्षण भी गंवा रहा है! पूरे जीवन तो परमात्मा को स्मरण नहीं किया, अब भी व्याक...रण में उलझा है! व्याकरण के सूत्र रटने से क्या होगा? शंकर की सारी वाणी में 'भज गोविन्दम्' से मूल्यवान कुछ भी नहीं है। क्योंकि शंकर मूलतः दार्शनिक हैं। उन्होंने जो लिखा है, वह बहुत जटिल है; वह शब्द, शास्त्र, तर्क, ऊहापोह, विचार है। लेकिन शंकर जानते हैं कि तर्क, ऊहापोह और विचार से परमात्मा पाया नहीं जा सकता; उसे पाने का ढंग तो नाचना है, गीत गाना है; उसे पाने का ढंग भाव है, विचार नहीं; उसे पाने का मार्ग हृदय से जाता है, मस्तिष्क से नहीं। इसलिए शंकर ने ब्रह्म-सूत्र के भाष्य लिखे, उपनिषदों पर भाष्य लिखे, गीता पर भाष्य लिखा, लेकिन शंकर का अंतरतम तुम इन छोटे-छोटे पदों में पाओगे। यहां उन्होंने अपने हृदय को खोल दिया है। यहां शंकर एक पंडित और एक विचारक की तरह प्रकट नहीं होते, एक भक्त की तरह प्रकट होते हैं।
'हे मूढ़, गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, क्योंकि अंतकाल के आने पर व्याकरण की रटन तुम्हारी रक्षा न करेगी।'
'हे मूढ़, गोविन्द को भजो।'
मूढ़ता क्या है? शंकर तुम्हें मूढ़ कह कर कोई गाली नहीं दे रहे हैं। अत्यंत प्रेमपूर्ण वचन है उनका यह।
भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़मते।
'हे मूढ़, भगवान को भज, गोविन्द को भज।'
मूढ़ता का क्या अर्थ है? मूढ़ता का अर्थ समझो।
मूढ़ता का अर्थ अज्ञानी नहीं है; मूढ़ता का अर्थ है: अज्ञानी होते हुए अपने को ज्ञानी समझना। मूढ़ता पंडित के पास होती है, अज्ञानी के पास नहीं। अज्ञानी को क्या मूढ़ कहना! अज्ञानी सिर्फ अज्ञानी है--नहीं जानता, बात सीधी-साफ है। और कई बार ऐसा हुआ है कि नहीं जानने वाले ने जान लिया और जानने वाले पिछड़ गए; क्योंकि जो नहीं जानता है, उसका अहंकार भी नहीं होता; जो नहीं जानता है, वह विनम्र होता है; जो नहीं जानता है, नहीं जानने के कारण ही उसका कोई दावा नहीं होता।
लेकिन, पंडित बिना जाने जानता है कि जानता है। शब्द सीख लिए हैं उसने; ग्रंथों का बोझ उसके सिर पर है। वह दोहरा सकता है व्याकरण के नियम। उन्हीं में डूब जाता है।
अंतकाल के आने पर, मृत्यु के आने पर, कितनी तुम भाषा जानते हो या कितनी भाषाएं जानते हो, कितना व्याकरण जानते हो--कुछ भी तो काम न पड़ेगा।
जो मौत में काम आ जाए, वह प्रज्ञा; और जो मौत में काम न आए, वह पांडित्य। मौत कसौटी है। तो जो भी तुम जानते हो, उसको इस कसौटी पर कसते रहना, कहीं भूल न हो। यह कसौटी सदा सामने रखना। जैसे सर्राफ कसता रहता है पत्थर पर सोने को, ऐसे इस कसौटी को रखे रहना सदा: जो मौत में काम आए, उसी को ज्ञान मानना; जो मौत में काम न आए, धोखा दे जाए, दगा दे जाए, उसे पांडित्य समझना।
और जो मौत में काम न आए, वह जीवन में क्या खाक काम आएगा! जो मौत तक में काम नहीं आता, वह जीवन में कैसे काम आ सकता है? क्योंकि मौत जीवन की पूर्णाहुति है; वह जीवन का चरम शिखर है; वह जीवन का समारोप है। जो मौत में काम आता है, वही जीवन में भी काम आता है। यद्यपि जीवन में धोखा देना आसान है, लेकिन मौत में धोखा देना असंभव है। मौत तो सब उघाड़ कर सामने रख देगी।
शंकर किसे मूढ़ कहते हैं? उसे मूढ़ कहते हैं, जो जानता तो नहीं है, लेकिन व्याकरण को रट लिया है; शब्द का ज्ञाता हो गया है; शास्त्र से जिसकी पहचान हो गई है; जो शास्त्र को दोहरा सकता है, पुनरुक्त कर सकता है; शास्त्र की व्याख्या कर सकता है।
पंडित को मूढ़ कह रहे हैं शंकर। अगर पंडित को मूढ़ न कहते होते, तो 'हे मूढ़, गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, क्योंकि अंतकाल के आने पर व्याकरण की रटन तुम्हारी रक्षा न करेगी', अचानक व्याकरण को याद करने की जरूरत नहीं थी। मूढ़ थोड़े ही--जिनको हम मूढ़ कहते हैं, अज्ञानी--वे थोड़े ही व्याकरण रट रहे हैं। पंडित रट रहा है। और भारत में यह बोझ काफी गहरा हो गया है। यह इतना गहरा हो गया है कि करीब-करीब हर आदमी को यह खयाल है कि वह परमात्मा को जानता है, क्योंकि परमात्मा शब्द को जानता है।
ध्यान रखना, परमात्मा शब्द परमात्मा नहीं है, न पानी शब्द पानी है। और प्यास लगी हो तो शब्द काम न आएगा, पानी चाहिए। और मौत सामने खड़ी हो तो अमरत्व के सिद्धांत काम न आएंगे, अमृत का स्वाद चाहिए।                                                               ......                          ओशो ( भज गोविन्दम )

Friday, October 21, 2011

अभी तुझसे मिलता जुलता कोई दूसरा कहाँ है

वही शख़्स जिसपे अपने दिल-ओ-जाँ निसार कर दूँ
वो अगर ख़फ़ा नहीं है तो ज़रूर बदगुमाँ है

कभी पा के तुझको खोना कभी खो के तुझको पाना
ये जनम जनम का रिश्ता तेरे मेरे दरमियाँ है

मेरे साथ चलनेवाले तुझे क्या मिला सफ़र में
वही दुख भरी ज़मीं है वही ग़म का आस्माँ है

मैं इसी गुमाँ में बरसों बड़ा मुत्मईन रहा हूँ
तेरा जिस्म बेतग़ैय्युर है मेरा प्यार जाविदाँ है

उन्हीं रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे
मुझे रोक रोक पूछा तेरा हमसफ़र कहाँ है

सुरेन्द्र दुबे की कविता

एक अमेरिकन मुझसे बोला"कविवर" बताइये आपका भारत महान है !
तो सँसार के इतने आविष्यक...रो मेँ आपके देश का क्या योगदान है ?

मैँ बोला रे अमेरिकन सुन,सँसार की पहली फायर प्रूफ लेडी भारत मेँ हुई थी !
नाम था "होलिका" आग मैँ जलती नही थी,इसलिये उस वक्त फायर ब्रिगेड चलती नही थी !!
...
सँसार की पहली वाटर प्रूफ बिल्डिँग भारत मेँ हुई नाम था भगवान विष्णु शैया "शेषनाग" !
शेषनाग पाताल गये धरती पर रहे "विशेषसनाग"

दुनिया के पहले पत्रकार "नारदजी" हुये जो किसी राजव्यवस्था से नही डरते थे !
तीने लोक की सनसनी खेज रिपोर्टिँग करते थे !!

दुनिया के पहले कॉँमेन्टेटर "सँजय" हुऐ जिनहोने नया इतिहास बनाया !
महाभारत के युद्ध का आँखो देखा हाल अँधे "ध्रतराष्ट्र" को उन्ही ने सुनाया !!

दादागिरी करना भी दुनिया हमने सिखाया क्योँ वर्षो पहले हमारे "शनिदेव" ने ऐसा आतँक मचाया !!
कि "हफ्ता" वसूली का रिवाज उन्ही के शिष्यो ने चलाया !

आज भी उनके शिष्य हर शनिवार को आते है !
उनका फोटो दिखाते है हफ्ता ले जाते है !!
अमेरिकन बोला कविवर फालतू की बाते मत बनाओ !
कोई ढँग का आविष्यकार हो तो बताओ !!

(जैसे हमने इँसान की किडनी बदल दी, बाईपास सर्जरी कर दी आदि)

मैँ बोला रे अमेरिकन सर्जरी का तो आइडिया ही दुनिया को हमने दिया था !
तू ही बता "गणेशजी" का ऑपरेशन क्या तेरे बाप ने किया था!!
अमेरिकन हडबडाया, गुस्से मैँ बडबडाया !
देखते ही देखते चलता फिरता नजर आया !!

तब से पूरी दुनिया को भान है !
दुनिया मुल्क कितने ही हो सब मे मेरा "भारत" महान है !!

                                                                     सुरेन्द्र दुबे
 

ओशो ने हर एक पाखंड पर चोट की

आचार्य रजनीश का वास्तविक नाम रजनीश चन्द्र मोहन था । जो विश्व भर में ओशो के नाम से प्रसिद्ध हुये। ओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को मध्य प्रदेश के कुचवाड़ा-जबलपुर शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम देवेंद्र जैन और माता जी का नाम लक्ष्मी था। गांव में प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई का प्रबंध जबलपुर मे हुआ। 1951 में जब 20 साल के ओशो ने धर्मसमाज में बोलना शुरू किया तभी लोगों को उनके कौशल का अंदाज़ा हो गया था। 1957 में उन्होंने दर्शन शास्त्र से एम. ए. किया और रायपुर के एक संस्कृत कॉलेज में पढ़ाने लगे। अगले साल वे जबलपुर विश्वविद्यालय में व्याख्याता हो गए। उसके बाद तीन साल में ही वे आचार्य रजनीश हो गये। 1962 में जीवन जागृति केन्द्र के नाम से संस्था बनाई। 1966 में उन्होंने प्राध्यापकी छोड़कर अपनी संस्था पर ध्यान केन्द्रित किया और 1970 में मुंबई आ गये। महेश भट्ट, विनोद खन्ना, विजय आनंद जैसी फिल्मी हस्तियां उनके सम्पर्क में आये और यहां वो भगवान कहे जाने लगे। उनके शिष्यों ने पुणे में सात एकड़ जमीन खरीद कर वहां आश्रम विकसित किया। 1974 में ओशो यहां आ गए।
ओशो के अमेरिकी शिष्यों ने 1990 में अमेरिका के ओरेगन राज्य में रजनीशपुरम् के नाम से शहर बसाने के लिए 64 हजार एकड़ खरीदी। जून,1981 में ओशो यहां पहुंच गये और 5 हजार भक्तों ने इस रेगिस्तान को हरा-भरा कम्यून बना दिया।
उनके बढ़ते प्रभाव से कट्टरपंथी ईसाई धर्मगुरू और नेता घबरा गये। सरकार पर दबाब बनाया और उन पर अप्रवास नियमों का उल्लघंन के अलावा 35 आरोप लगाये गये। एक आरोप यह भी था कि गाड़ियों के इतने बड़े बेड़े में इतनी सारी रोल्स रायस कारें कहां से आयीं? 12 दिन तक बन्द रहने के बाद जुलाई, 1986 में पुणे वापस आ गये। दिसम्बर 1988 में उन्होंने अनुरोध किया उन्हें केवल ओशो के नाम से पुकारें ना कि भगवान रजनीश के नाम से। 19 जनवरी,1990 को लम्बी बीमारी और चुप्पी के बाद उन्होंने शरीर त्याग दिया। कहा जाता है कि गिरफ्तारी के समय अमेरिका सरकार ने उन्हें थेलियम नामक धीमा जहर दिया गया था।
कार्य- ओशो एक आध्यात्मिक नेता थे, उन्होंने दुनिया भर में घूम-घूम कर प्रवचन दिये और धर्म की अलग परिभाषा दी। रजनीश ने प्रचलित धर्मों की व्याख्या की और प्यार, ध्यान और खुशी को जीवन के प्रमुख मूल्य माना। वह अपने विवादास्पद धार्मिक आन्दोलन के लिये मशहूर हुए । ओशो ने सैकड़ों पुस्तकें लिखीं, हजारों प्रवचन दिये। उनके प्रवचन पुस्तकों, आडियो कैसेट तथा विडियो कैसेट के रूप में उपलब्ध हैं। अपने क्रान्तिकारी विचारों से उन्होंने 45 देशों में लगभग 5 करोड़ अनुयायी और शिष्य बनाये। आज 350 ध्यान केन्द्र ओशो के विचारों को विश्व भर में फैला रहे हैं। भारत के बुद्धिजीवी और शिक्षित वर्ग के अलावा विदेशों में लोग ओशो के दिवाने हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, आदि देशों के अलावा जापान, इंडोनेशिया, नेपाल, श्रीलंका जैसे देशों में भी ओशो के अनुयायियों की बहुत बड़ी संख्या है।
 
 
अत्यधिक कुशल वक्ता होते हुए इनके प्रवचनों की करीब 600 पुस्तकें हैं। संभोग से समाधि की ओर इनकी सबसे चर्चित और विवादास्पद पुस्तक है। इनके नाम से कई आश्रम चल रहे है। उनकी महात्मा गांधी पर की गयी टिप्पणियों ने देश भर में हलचल मचा दी थी।
ओशो
ओशो ने हर एक पाखंड पर चोट की। सन्यास की अवधारणा को उन्होंने भारत की विश्व को अनुपम देन बताते हुए सम्यक सन्यास को पुनर्जिवित किया है। ओशो ने पुनः उसे बुद्ध का ध्यान, कृष्ण की बांसुरी, मीरा के घुंघरू और कबीर की मस्ती दी है। सन्यास पहले कभी भी इतना समृद्ध न था जितना आज ओशो के संस्पर्श से हुआ है। इसलिए यह नव-संन्यास है। उनकी नजर में सन्यासी वह है जो अपने घर-संसार, पत्नी और बच्चों के साथ रहकर पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए ध्यान और सत्संग का जीवन जिए।

Thursday, October 20, 2011

tasvir bolti hai