अन्ना हजारे का आंदोलन सारे देश की चेतना को उभार रहा था. गली-गली, मैदान-मैदान, हर जगह आंदोलन हो रहे थे. ऐसे समय में संसद के ऊपर ज़िम्मेदारी थी कि वह कोई हल निकाले, लेकिन संसद अन्ना हजारे के आंदोलन के खिला़फ खड़ी नज़र आई.. ऐसे समय में राहुल गांधी के ऊपर लोगों की निगाहें थीं. राहुल गांधी ने जब संसद में भाषण दिया, कांग्रेस के लोगों ने उनका समर्थन किया. राहुल गांधी के भाषण में कोई रास्ता नहीं था, कोई समाधान नहीं था. वह बस एक भाषण था. उस भाषण में दूरंदेशी भी नहीं थी. उन्होंने जो सवाल खड़े किए, उनसे यह ध्वनि निकली कि राहुल गांधी भ्रष्टाचार से नहीं लड़ना चाहते, क्योंकि यह तर्क कि क्या एक लोकपाल बनने से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा, यह भ्रष्टाचार के पक्ष में खड़ा हुआ तर्क है. उन्हें और रास्ते सुझाने चाहिए थे कि इन-इन से भ्रष्टाचार खत्म होगा, लेकिन वे रास्ते राहुल गांधी ने नहीं सुझाए.हम यह नहीं कहते कि राहुल गांधी में समझ नहीं है, पर जब समझ की और जैसी समझ की जहां ज़रूरत होती है, वैसी समझ उस समय वहां दिखाई नहीं देती, तो देश का नेता बनने का सपना पालने वाले व्यक्ति के लिए यह खतरनाक स्थिति है. अगर सही मौक़े पर उसकी अक्ल काम न करे या सही मौक़े पर उसके सलाहकार उसे स्ट्राइक करने की सलाह न तो फिर यह मानना चाहिए कि देश को संभालने लायक़ अभी उसका व्यक्तित्व, उसकी समझ और बुद्धिमानी नहीं बनी है. वह अभी उतना परिपक्व नहीं है कि ऐसी स्थितियों का सामना कर सके.अन्ना हजारे के साथ 80 प्रतिशत नौजवान थे. वही नौजवान, जिन्हें राहुल गांधी अपनी कंस्टीट्यूएंसी मानते हैं, जिन्हें सत्ता में हिस्सेदारी या जिनके सपनों को पूरा करने की बात वह करते हैं, जिनके सहारे वह अगला चुनाव जीतने की योजना बना रहे हैं. वह नौजवान तो अन्ना हजारे के साथ खड़ा दिखाई दिया तो राहुल गांधी के साथ कौन सा नौजवान है? राहुल गांधी को एक बात समझनी चाहिए कि देश में नौजवानों के पास आप अपनी बात नहीं पहुंचाएंगे और उनसे उनकी बात नहीं सुनेंगे तो आप धोखा खाएंगे. फिर नौजवान कम से कम आपको अपना नेता नहीं मानेगा. -- sabhar संतोष भारतीय
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