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Friday, September 16, 2011

सच ही हैं तुम्हारी...

सच ही हैं तुम्हारी सुनी बातें
सच ही हैं तुम्हारी कही बातें
कल एक बूढ़े इतिहास से मैं मिला था,
उस ने भी वही कहा है
जो तुम ने कहा था
वह कहता गया...मैं सुनता गया, सुनता गया...
इतिहास अपनी डायरी खोल कर कह रहा है--
"देखो, इस देश का जब मानचित्र आँका गया

तब तुम्हारे पितामह भी थे

यह सीमा तुम्हारे पितामह की आँकी हुई है
और,वह दूसरी रेखा तुम्हारे पिता की आँकी हुई
चाहे पूर्णिमा के चांद की दमकती चांदनी हो
चाहे अमावस की घनी रात
चाहे पौष-माघ की कँपकँपाती ठंड
चाहे सावन-भादों की बाढ़ उफ़नाती वर्षा
तुम्हारे पितामह यहाँ खड़े होकर संगीन से

आँकते थे मानचित्र

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