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Friday, May 22, 2009

प्रदूषण

प्रदूषण की मार से बेजार हो चले रायगढ की जनता ने एक समिति गठित कर जिस तरह प्रदूषण के खिलाफ जो अभियान शुरू किया है, दरअसल ऐसे ही अभियान की जरूरत रायपुर व दुर्ग-भिलाई क्षेत्र को भी है। रायपुर व दुर्ग जिले का एक बडा प्रमुख हिस्‍सा औद्योगिक निकायों से निकलने वाले जहरीली गैस की चपेट में है। रायपुर एवं भिलाई के आसपास की 40 किलोमीटर ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र में प्रदूषण का सीधा असर दिखता है।
दुर्ग जिले में दुर्ग- भिलाई के अलावा धमधा, पाटन, बेरला, गुंडरदेही आदि विकासखंडों में खेती व आमजनजीवन पर प्रदूषण का असर स्‍पष्‍ट दिखने लगा है। गांव के चारागाहों व तालाब प्रदूषित हो चुके हैं। इस घास व पानी के सेवन से मवेशी जल्‍दी’जल्‍दी मर रहे है। दूसरी ओर किसानों का कहना है कि उनका उत्‍पादन भी प्रदूषण के चलते कम होता जा रहा है। अमुमन प्रदूषण के असर से बंजर होते जमीनों की कीमतें उत्‍पादन घटने के बावजूद कई गुणा बढ गए हैं। औद्योगिकीरण की चलते खेती से विमुख होते जा रहे किसान जमीनों की बढी कीमतों से खुश हैं और प्रदूषण से उत्‍पन्‍न होने वाले दीर्घकालीन दुष्‍परिणामों को किसान अनदेखा कर रहे हैं।
अलबत्‍ता प्रदूषण रोकने व इसके दुष्‍परिणाम से निपटने की दिशा में सरकार भी कुछ विशेष कार्ययोजना अमल में नहीं ला रही है। रैन वाटर हार्वेस्टिंग की तरह प्रदूषण की रोकथाम की सरकारी योजनाएं भी अब तक सेमीनारों का विषय बना हुआ है।
इन हालातों में यदि आम आदमी प्रदूषण के खिलाफ स्‍वस्‍फूर्त लामबंद होने लगा है, कि इसका समर्थन किया जाना हमारा फर्ज है। रायगढ संघर्ष समिति ने रैली निकाल कर शहर के भीतर चौक-चौराहों पर लगे धूल-धुसरित प्रतिमाओं को सफेद कपडे से ढंक कर विरोध का बेहतर तरीका अपनाया है। दरअसल प्रदूषण आज एक-एक आदमी के लिए बडी समस्‍या बन चुकी है। लिहाजा एक-एक आदमी को इसके खिलाफ खडे होना होगा, तभी कल के लिए कुछ बेहतर हो सकेगा। रायगढ से शुरू हुए पहल को आंदोलन का रूप देना निहायत जरूरी है। नहीं तो हम आम लोगों के हाथों से साफ हवा, पानी भी छिन जाएगी।

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