Monday, May 18, 200
ताराचंद साहू की हार के साथ ही छत्तीसगढि़या फैक्टर का तिलस्म टूट गया। या यूं कहे कि ताराचंद साहू खुद को छत्तीसगढिया स्वाभिमान का प्रतीक साबित करने में मुकम्मल न हो सके। इसी के साथ छत्तीसगढ़ी भावनाओं पर आधारित राजनीतिक बिसात को तेज करने का एक और मंसूबे पर पानी फिर गया है।दो दफे विधायकी व लगातार चार बार सांसद तक पहुंचे नेता यदि अपने उपक्रम में सफल नहीं हो पाए, तो समझा जा सकता है कि क्षेत्रवाद आधारित राजनीतिक वर्चस्व का फलसफा अभी दूर की कौड़ी है।
यद्यपि तारांचद साहू न तो चुनाव जीत सके और न ही दूसरे स्थान पर आ पाए, मगर उनकी राजनीतिक ताकत को कम नहीं आंका जा सकता। उन्हें मिलने वाला 2 लाख 63 हजार मत छत्तीसगढ़ में सामने आए स्थानीयवाद की ताकत मानी जा सकती है। तीनों प्रमुख प्रत्याशियों में हार-जीत का अंतर मामूली है। मतदाताओं के एक बड़े तबके ने स्थानीयता से ज्यादा भरोसा विकास पर जताया है। मगर, चुनाव परिणाम से स्पष्ट है कि छत्तीसगढि़या हितों के मसले पर लामबंद हुए लोगों की संख्या भी कम नहीं है। कांग्रेसी मतों ने साबित किया है कि दुर्ग लोकसभा क्षेत्र में अभी भी कांग्रेस का मजबूत वोटबैंक है। पूरे देश में कांग्रेस के प्रति चले लहर के विपरीत जाकर छग की जनता ने रमन के विकास के मु़द्दे को स्वीकार कर लिया है। मगर दुर्ग संसदीय सीट पर आये परिणाम से भाजपा को चौकस हो जाना चाहिए, कि जनअपेक्षाओं पर खरा न उतरने पर जनता भविष्य में अपनी मानसिकता बदल भी सकती है।
हालांकि ताराचंद साहू को तीसरे तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा है, पर स्वाभिमान मंच ने इस चुनाव की पूरी सिरत व्यापक तौर पर बदल दिया था। चुनाव कैंपनिंग के मध्यवर्ती दौर में स्वाभिमान मंच उम्मीद से कहीं ज्यादा मजबूत दिखा।
सियासी फि़ज़ा में ताराचंद साहू इस तरह छा गए थे, कि कई राजनीतिक पंडित छत्तीसगढ़ में तीसरे शक्ति की उदय होते देख रहे थे। पर परिणाम खुलने पर उनकी उम्मीद तीसरे क्रम पर सरक गई। वस्तुत: यही बात भारतीय गणतंत्र की महानता है। तमाम अटकलों के बावजूद मतदाता ने स्वविवेक से निर्णय लिया, और बहुसंख्यक मतदाता ने स्पष्ट कर दिया कि यहां अभी स्थानीयतावाद व क्षेत्रीय कट्टरता से कहीं अहम विकास का स्वप्न तथा उसे पूरा करने की इच्छा है।
उत्तर भारत की जनता ने जहां लालू, मायावती, पासवान के तिलस्म को तोड़ कर स्थिरता व विकास को समर्थन दिया है, वहीं छग की जनता ने भी रमन के विकास के मुद़दें पर भरोसा जताया है। छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच के मुहिम को एक-एक छत्तीसगढि़यें का साथ नहीं मिलने का यही अर्थ है। शत प्रतिशत छत्तीसगढिया इस राय से इत्तफाक नहीं रखता कि परप्रांतियों ने यहां आकर स्थानीय लोगों के हितों पर पूर्णतय: कुठाराघात किया है। या फिर बाहरी लोगों के हाथों स्थानीय लोग इस कदर शोषित हुए हैं कि महाराष्ट की मनसे की तर्ज पर गैरछत्तीसगढि़यों के खिलाफ विघटनकारी मुहिम चलाया जाए।
यूं तो चुनाव में जीत का मतलब ही जीत होता है, चाहे वह अंतर कितना भी रहे, दुर्ग संसदीय चुनाव में हार'जीत का अंतर दस हजार मतों के आसपास रहा। माना जा सकता है कि भाजपा, कांग्रेस के अलावा स्वाभिमान मंच की ताकत दुर्ग में कमोबेश बराबर ही है। जीतने वाले ही नहीं बल्कि हारने वाले प्रत्याशी का भी हार-जीत के मुगालते में रहकर जीत-हार का सीधा अर्थ समझना उचित नहीं होगा। नहीं भूला जा सकता कि छत्तीसगढ स्वाभिमान मंच की ताकत तीन विधानसभा क्षेत्रों में दूसरों के बनिस्बत् कहीं ज्यादा है। यही हाल कांग्रेस का भी है। जीतने वाले प्रत्याशी का छोटा सा गलत निर्णय भी बड़ा असर दिखा सकता है। इसलिए इस पंचवर्षीय डगर पर फूंक-फूंककर कदम रखने की जरूरत है। मूल छत्तीसगढ़ी मतदाताओं के एक बड़े तबके ने भाजपा व सरोज पांडेय पर जो विश्वास जताया है, उसे कायम रखने की चुनौती खडी है। क्योंकि छग की राजनीति संक्रमणकाल के दौर से गुजर रही है। कम से कम ताराचंद साहू ने आम लोगों के समक्ष एक विकल्प जरूर रख दिया है। आम मतदाता हालात पर बारिक नजर रखे हुए हैं, यही वह समय है जब भविंष्य के लिए वह अपनी मान्यता बदल सकता है या फिर मजबूत भी कर सकता है।कतिपय राजनीतिक प्रेक्षकों का यह विचार सतही नहीं है कि छग में भी तीसरे मोर्चे की राह प्रशस्त हो रही है। आज भले ही ताराचंद साहू इस राह पर गच्चा खा गए। मगर किसी सार्थक विचार को मुख्य जनधारा बनने से रोकना मुमकिन नहीं। जरूरत पड़ेगी तो प्रदेश की जनता फिर लामबंद हो सकती है, अमुमन नेतृत्वकर्ता भले ही बदल सकता है। इस स्थिति से बचने के लिए वर्तमान नेतृत्व को वह सवाल बदलना होगा, जो अभी उठ रहा है। सवाली तो समय के साथ बदलते ही रहते हैं। यदि सवाली बदल गए और सवाल वही रहे, तो अभी जो नहीं बदला, वह भी बदल सकता हैं।
बहुत बढिया प्रस्तुति व विचार, आभार
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