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Saturday, August 3, 2013
पत्रकारिता / जनसंचार
पत्रकारिता / जनसंचार
प्रथम समाचार पत्र
भारत में पहला समाचार पत्र कम्पनी के एक असंतुष्ट सेवक 'विलियम वोल्ट्स' ने 1766 ई. में निकालने का प्रयास किया, लेकिन अपने इस कार्य में वह असफल रहा। इसके बाद भारत में प्रथम समाचार पत्र निकालने का श्रेय 'जेम्स ऑगस्टस हिक्की' को मिला। उसने 1780 ई. में 'बंगाल गजट' का प्रकाशन किया, किन्तु इसमें कम्पनी सरकार की आलोचना की गई थी, जिस कारण उसका प्रेस जब्त कर लिया गया।
अंग्रेज़ों द्वारा सम्पादित समाचार पत्र समाचार पत्र स्थान वर्ष
टाइम्स ऑफ़ इंडिया बम्बई 1861ई.
स्टेट्समैन कलकत्ता 1878ई.
इंग्लिश मैन कलकत्ता -
फ़्रेण्ड ऑफ़ इंडिया कलकत्ता -
मद्रास मेल मद्रास 1868ई.
पायनियर इलाहाबाद 1876ई.
सिविल एण्ड मिलिटरी गजट लाहौर -
इस दौरान कुछ अन्य अंग्रेज़ीअख़बारों का प्रकाशन भी हुआ, जैसे- बंगालमें 'कलकत्ता कैरियर', 'एशियाटिक मिरर', 'ओरियंटल स्टार'; मद्रासमें 'मद्रास कैरियर', 'मद्रास गजट'; बम्बईमें 'हेराल्ड', 'बांबे गजट' आदि। 1818 ई. में ब्रिटिश व्यापारी 'जेम्स सिल्क बर्किघम' ने 'कलकत्ता जनरल' का सम्पादन किया। बर्किघम ही वह पहला प्रकाशक था, जिसने प्रेस को जनता के प्रतिबिम्ब के स्वरूप में प्रस्तुत किया। प्रेस का आधुनिक रूप जेम्स सिल्क बर्किघम का ही दिया हुआ है। हिक्की तथा बर्किघम का पत्रकारिता के इतिहास में महत्पूर्ण स्थान है। इन दोनों ने तटस्थ पत्रकारिता एवं स्वतंत्र लेखन का उदाहरण प्रस्तुत कर पत्रकारों को पत्रकारिता की ओर आकर्षित किया।
प्रथम साप्ताहिक अख़बार
पहला भारतीय अंग्रेज़ी समाचार पत्र 1816 ई. में कलकत्तामें गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा 'बंगाल गजट' नाम से निकाला गया। यह साप्ताहिक समाचार पत्र था। 1818 ई. में मार्शमैन के नेतृत्व में बंगाली भाषामें 'दिग्दर्शन' मासिक पत्र प्रकाशित हुआ, लेकिन यह पत्र अल्पकालिक सिद्ध हुआ। इसी समय मार्शमैन के संपादन में एक और साप्ताहिक समाचार पत्र 'समाचार दर्पण' प्रकाशित किया गया। 1821 ई. में बंगाली भाषामें साप्ताहिक समाचार पत्र 'संवाद कौमुदी' का प्रकाशन हुआ। इस समाचार पत्र का प्रबन्ध राजा राममोहन रायके हाथों में था। राजा राममोहन राय ने सामाजिक तथा धार्मिक विचारों के विरोधस्वरूप 'समाचार चंद्रिका' का मार्च, 1822 ई. में प्रकाशन किया। इसके अतिरिक्त राय ने अप्रैल, 1822 में फ़ारसी भाषामें 'मिरातुल' अख़बार एवं अंग्रेज़ी भाषामें 'ब्राह्मनिकल मैगजीन' का प्रकाशन किया।
प्रतिबन्ध
समाचार पत्र पर लगने वाले प्रतिबंध के अंतर्गत 1799 ई. में लॉर्ड वेलेज़लीद्वारा पत्रों का 'पत्रेक्षण अधिनियम' और जॉन एडम्स द्वारा 1823 ई. में 'अनुज्ञप्ति नियम' लागू किये गये। एडम्स द्वारा समाचार पत्रों पर लगे प्रतिबन्ध के कारण राजा राममोहन राय का मिरातुल अख़बार बन्द हो गया। 1830 ई. में राजा राममोहन राय, द्वारकानाथ टैगोर एवं प्रसन्न कुमार टैगोर के प्रयासों से बंगाली भाषा में 'बंगदूत' का प्रकाशन आरम्भ हुआ। बम्बई से 1831 ई. मेंगुजराती भाषामें 'जामे जमशेद' तथा 1851 ई. में 'रास्त गोफ़्तार' एवं 'अख़बारे सौदागार' का प्रकाशन हुआ।
लॉर्ड विलियम बैंटिकप्रथम गवर्नर-जनरलथा, जिसने प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण अपनाया। कार्यवाहक गर्वनर-जनरल चार्ल्स मेटकॉफ़ने 1823 ई. के प्रतिबन्ध को हटाकर समाचार पत्रों को मुक्ति दिलवाई। यही कारण है कि उसे 'समाचार पत्रों का मुक्तिदाता' भी कहा जाता है। लॉर्ड मैकालेने भी प्रेस की स्वतंत्रता का समर्थन किया। 1857-1858के विद्रोह के बाद भारतमें समाचार पत्रों को भाषाई आधार के बजाय प्रजातीय आधार पर विभाजित किया गया। अंग्रेज़ीसमाचार पत्रों एवं भारतीय समाचार पत्रों के दृष्टिकोण में अंतर होता था। जहाँ अंग्रेज़ी समाचार पत्रों को भारतीय समाचार पत्रों की अपेक्षा ढेर सारी सुविधाये उपलब्ध थीं, वही भारतीय समाचार पत्रों पर प्रतिबन्ध लगा था।
सभी समाचार पत्रों में 'इंग्लिश मैन' सर्वाधिक रूढ़िवादी एवं प्रतिक्रियावादी था। 'पायनियर' सरकार का पूर्ण समर्थक समाचार-पत्र था, जबकि 'स्टेट्समैन' कुछ तटस्थ दृष्टिकोण रखता था।
पंजीकरण अधीनियम
1857 ई. में हुए विद्रोह के परिणामस्वरूप सरकार ने 1857 ई. का 'लाईसेंसिग एक्ट' लागू कर दिया। इस एक्ट के आधार पर बिना सरकारी लाइसेंस के छापाखाना स्थापित करने एवं उसके प्रयोग करने पर रोक लगा दी गई। यह रोक मात्र एक वर्ष तक लागू रही।
विभिन्न समाचार पत्र अधिनियम अधिनियम वर्ष व्यक्ति
समाचार पत्रों का पत्रेक्षण अधिनियम 1799 ई. लॉर्ड वेलेज़ली
अनुज्ञप्ति नियम 1823 ई. जॉन एडम्स
अनुज्ञप्ति अधिनियम 1857ई. लॉर्ड केनिंग
पंजीकरण अधिनियम 1867ई. जॉन लॉरेंस
देशी भाषा समाचार पत्र अधिनियम 1878ई. लॉर्ड लिटन
समाचार पत्र अधिनियम 1908ई. लॉर्ड मिण्टो द्वितीय
भारतीय समाचार पत्र अधिनियम 1910ई. लॉर्ड मिण्टो द्वितीय
भारतीय समाचार पत्र (संकटकालीन शक्तियाँ) अधिनियम 1931ई. लॉर्ड इरविन
1867ई. के 'पंजीकरण अधिनियम' का उद्देश्य था, छापाखानों को नियमित करना। अब हर मुद्रित पुस्तक एवं समाचार पत्र के लिए यह आवश्यक कर दिया कि वे उस पर मुद्रक, प्रकाशक एवं मुद्रण स्थान का नाम लिखें। पुस्तक के छपने के बाद एक प्रति निःशुल्क स्थानीय सरकार को देनी होती थी। वहाबी विद्रोहसे जुड़े लोगों द्वारा सरकार विरोधी लेख लिखने के कारण सरकार ने 'भारतीय दण्ड संहिता' की धारा 124 में 124-क जोड़ कर ऐसे लोगों के लिए आजीवन निर्वासन, अल्प निर्वासन व जुर्माने की व्यवस्था की।
स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव
1857 ई. के संग्रामके बाद भारतीय समाचार पत्रों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई और अब वे अधिक मुखर होकर सरकार के आलोचक बन गये। इसी समय बड़े भयानक अकाल से लगभग 60 लाख लोग काल के ग्रास बन गये थे, वहीं दूसरी ओर जनवरी, 1877में दिल्लीमें हुए 'दिल्ली दरबार' पर अंग्रेज़सरकार ने बहुत ज़्यादा फिजूलख़र्ची की। परिणामस्वरूप लॉर्ड लिटनकी साम्राज्यवादी प्रवृति के ख़िलाफ़ भारतीय अख़बारों ने आगउगलना शुरू कर दिया। लिंटन ने 1878ई. में 'देशी भाषा समाचार पत्र अधिनियम' द्वारा भारतीय समाचार पत्रों की स्वतन्त्रता नष्ट कर दी।
वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट
'वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट' तत्कालीन लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी समाचार पत्र 'सोम प्रकाश' को लक्ष्य बनाकर लाया गया था। दूसरे शब्दों में यह अधिनियम मात्र 'सोम प्रकाश' पर लागू हो सका। लिटन के वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट से बचने के लिए 'अमृत बाजार पत्रिका' (समाचार पत्र), जो बंगला भाषाकी थी, अंग्रेज़ी साप्ताहिक में परिवर्तित हो गयी। सोम प्रकाश, भारत मिहिर, ढाका प्रकाश, सहचर आदि के ख़िलाफ़ मुकदमें चलाये गये। इस अधिनियम के तहत समाचार पत्रों को न्यायलय में अपील का कोई अधिकार नहीं था। वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट को 'मुंह बन्द करने वाला अधिनियम' भी कहा गया है। इस घृणित अधिनियम को लॉर्ड रिपनने 1882ई. में रद्द कर दिया।
समाचार पत्र अधिनियम
लॉर्ड कर्ज़नद्वारा 'बंगाल विभाजन' के कारण देश में उत्पन्न अशान्ति तथा 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' में चरमपंथियों के बढ़ते प्रभाव के कारण अख़बारों के द्वारा सरकार की आलोचना का अनुपात बढ़ने लगा। अतः सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए 1908ई. का समाचार पत्र अधिनियम लागू किया। इस अधिनियम में यह व्यवस्था की गई कि जिस अख़बार के लेख में हिंसा व हत्या को प्रेरणा मिलेगी, उसके छापाखाने व सम्पत्ति को जब्त कर लिया जायेगा। अधिनियम में दी गई नई व्यवस्था के अन्तर्गत 15 दिन के भीतर उच्च न्यायालय में अपील की सुविधा दी गई। इस अधिनियम द्वारा नौ समाचार पत्रों के विरुद्व मुकदमें चलाये गये एवं सात के मुद्रणालय को जब्त करने का आदेश दिया गया।
1910ई. के 'भारतीय समाचार पत्र अधिनियम' में यह व्यवस्था थी कि समाचार पत्र के प्रकाशक को कम से कम 500 रुपये और अधिक से अधिक 2000 रुपये पंजीकरण जमानत के रूप में स्थानीय सरकार को देना होगा, इसके बाद भी सरकार को पंजीकरण समाप्त करने एवं जमानत जब्त करने का अधिकार होगा तथा दोबारा पंजीकरण के लिए सरकार को 1000 रुपये से 10000 रुपये तक की जमानत लेने का अधिकार होगा। इसके बाद भी यदि समाचार पत्र सरकार की नज़र में किसी आपत्तिजनक साम्रगी को प्रकाशित करता है तो सरकार के पास उसके पंजीकरण को समाप्त करने एवं अख़बार की समस्त प्रतियाँ जब्त करने का अधिकार होगा। अधिनियम के शिकार समाचार पत्र दो महीने के अन्दर स्पेशल ट्रिब्यूनल के पास अपील कर सकते थे।
अन्य अधिनियम
प्रथम विश्वयुद्ध के समय 'भारत सुरक्षा अधिनियम' पास कर राजनैतिक आंदोलन एवं स्वतन्त्र आलोचना पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। 1921ई. सर तेज बहादुर सप्रू की अध्यक्षता में एक 'प्रेस इन्क्वायरी कमेटी' नियुक्त की गई। समिति के ही सुझावों पर 1908 और 1910 ई. के अधिनियमों को समाप्त किया गया। 1931ई. में 'इंडियन प्रेस इमरजेंसी एक्ट' लागू हुआ। इस अधिनियम द्वारा 1910 ई. के प्रेस अधिनियम को पुनः लागू कर दिया गया। इस समयगांधी जीद्वारा चलाये गये सविनय अवज्ञा आंदोलनके प्रचार को दबाने के लिए इस अधिनियम को विस्तृत कर 'क्रिमिनल अमैंडमेंट एक्ट' अथवा 'आपराधिक संशोधित अधिनियम' लागू किया गया। मार्च, 1947में भारत सरकार ने 'प्रेस इन्क्वायरी कमेटी' की स्थापना समाचार पत्रों से जुड़े हुए क़ानून की समीक्षा के लिए किया।
भारतमें समाचार पत्रों एवं प्रेस के इतिहासके विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ एक ओर लॉर्ड वेलेज़ली, लॉर्ड मिण्टो, लॉर्ड एडम्स, लॉर्ड कैनिंगतथा लॉर्ड लिटनजैसे प्रशासकों ने प्रेस की स्वतंत्रता का दमन किया, वहीं दूसरी ओर लॉर्ड बैंटिक, लॉर्ड हेस्टिंग्स, चार्ल्स मेटकॉफ़, लॉर्ड मैकालेएवं लॉर्ड रिपनजैसे लोगों ने प्रेस की आज़ादी का समर्थन किया। 'हिन्दू पैट्रियाट' के सम्पादक 'क्रिस्टोदास पाल' को 'भारतीय पत्रकारिता का ‘राजकुमार’ कहा गया है।
19वीं शताब्दी में भारतीयों द्वारा प्रकाशित समाचार पत्र समाचार पत्र संस्थापक/सम्पादक भाषा प्रकाशन स्थान वर्ष
अमृत बाज़ार पत्रिका मोतीलाल घोष बंगला कलकत्ता 1868ई.
अमृत बाज़ार पत्रिका मोतीलाल घोष अंग्रेज़ी कलकत्ता 1878ई.
सोम प्रकाश ईश्वरचन्द्र विद्यासागर बंगला कलकत्ता 1859ई.
बंगवासी जोगिन्दर नाथ बोस बंगला कलकत्ता 1881ई.
संजीवनी के.के. मित्रा बंगला कलकत्ता
हिन्दू वीर राघवाचारी अंग्रेज़ी मद्रास 1878ई.
केसरी बाल गंगाधर तिलक मराठी बम्बई 1881ई.
मराठा बाल गंगाधर तिलक[1] अंग्रेज़ी - -
हिन्दू एम.जी. रानाडे अंग्रेज़ी बम्बई 1881 ई.
नेटिव ओपीनियन वी.एन. मांडलिक अंग्रेज़ी बम्बई 1864ई.
बंगाली सुरेन्द्रनाथ बनर्जी अंग्रेज़ी कलकत्ता 1879ई.
भारत मित्र बालमुकुन्द गुप्त हिन्दी - -
हिन्दुस्तान मदन मोहन मालवीय हिन्दी - -
हिन्द-ए-स्थान रामपाल सिंह हिन्दी कालाकांकर (उत्तर प्रदेश) -
बम्बई दर्पण बाल शास्त्री मराठी बम्बई 1832 ई.
कविवचन सुधा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी उत्तर प्रदेश 1867ई.
हरिश्चन्द्र मैगजीन भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी उत्तर प्रदेश 1872ई.
हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड सच्चिदानन्द सिन्हा अंग्रेज़ी - 1899ई.
ज्ञान प्रदायिनी नवीन चन्द्र राय हिन्दी - 1866ई.
हिन्दी प्रदीप बालकृष्ण भट्ट हिन्दी उत्तर प्रदेश 1877ई.
इंडियन रिव्यू जी.ए. नटेशन अंग्रेज़ी मद्रास -
मॉडर्न रिव्यू रामानन्द चटर्जी अंग्रेज़ी कलकत्ता -
यंग इंडिया महात्मा गाँधी अंग्रेज़ी अहमदाबाद 8 अक्टूबर, 1919ई.
नव जीवन महात्मा गाँधी हिन्दी, गुजराती अहमदाबाद 7 अक्टूबर, 1919 ई.
हरिजन महात्मा गाँधी हिन्दी, गुजराती पूना 11 फ़रवरी, 1933ई.
इनडिपेंडेस मोतीलाल नेहरू अंग्रेज़ी - 1919ई.
आज शिवप्रसाद गुप्त हिन्दी - -
हिन्दुस्तान टाइम्स के.एम.पणिक्कर अंग्रेज़ी दिल्ली 1920ई.
नेशनल हेराल्ड जवाहरलाल नेहरू अंग्रेज़ी दिल्ली अगस्त, 1938ई.
उद्दण्ड मार्तण्ड जुगल किशोर हिन्दी (प्रथम) कानपुर 1826 ई.
द ट्रिब्यून सर दयाल सिंह मजीठिया अंग्रेज़ी चण्डीगढ़ 1877ई.
अल हिलाल अबुल कलाम आज़ाद उर्दू कलकत्ता 1912ई.
अल बिलाग अबुल कलाम आज़ाद उर्दू कलकत्ता 1913ई.
कामरेड मौलाना मुहम्मद अली अंग्रेज़ी - -
हमदर्द मौलाना मुहम्मद अली उर्दू - -
प्रताप पत्र गणेश शंकर विद्यार्थी हिन्दी कानपुर 1910ई.
गदर गदर पार्टी द्वारा उर्दू/गुरुमुखी सॉन फ़्रांसिस्को 1913ई.
गदर गदर पार्टी द्वारा पंजाबी - 1914ई.
हिन्दू पैट्रियाट हरिश्चन्द्र मुखर्जी अंग्रेज़ी - 1855 ई.
मद्रास स्टैंडर्ड, कॉमन वील, न्यू इंडिया एनी बेसेंट अंग्रेज़ी - 1914ई.
सोशलिस्ट एस.ए.डांगे अंग्रेज़ी - 1922ई.
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
↑ (आरम्भ में आगरकर ने 'केसरी' का एवं केलकर ने 'मराठा' का सम्पादन किया)
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01/20/13--08:23: आज़ादी में पत्रकारिता का योगदान / डॉ. के. एन. पी. श्रीवास्तव (chan 7710543)
भारत के पत्रकार मूलतः जनता का प्रतिनिधि मानकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आए थे। यदि सही ढंग से आँका जाए तो स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि पत्रों एवं पत्रकों ने ही तैयार की, जो आगे चलकर राजनेताओं एवं स्वतंत्रता संग्रामियों को पहले पत्रकार बनने के लिए प्रेरित किया। पं, बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू एवं डॉ. राजेंद्र प्रसाद आदि सभी पत्रकारिता से संबद्ध रहे।
कांग्रेस भी जब दो विचारों में विभाजित हुई, उस समय भी गरम दल का दिशा-निर्देश 'भारतमित्र', अभ्युदय', 'प्रताप', 'नृसिंह', केशरी एवं रणभेरी आदि पत्रों ने किया तथा नरम दल का 'बिहार बंधु', 'नागरीनिरंद', 'मतवाला', 'हिमालय' एवं 'जागरण' ने किया।
पत्रकारों के संघर्ष का युग
भारतेंदु युग मात्र साहित्यिक युग ही नहीं, अपितु स्वतंत्रता एवं राष्ट्रीय जागरण का युगबोध करानेवाला युगदृष्टा का युग था। महात्मा गांधी के लिए यही प्रेरक युग कहा जाना पत्रकारिता का शाश्वत सत्य होगा। स्वतंत्रता आंदोलन के लिए राजनेताओं को जितना संघर्ष करना पड़ा, उससे तनिक भी कम संघर्ष पत्रों एवं पत्रकारों को नहीं करना पड़ा। बुद्धिजीवी, ऋषियों की मौन साधना, तपस्या और त्याग इतिहास की धरोहर है, जिसे मात्र साहित्य तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि स्वतंत्रता की बलिवेदी पर आहूति करनेवालों को शृंखलाबद्ध समूह के रूप में भी माना जाना चाहिए।
तकनीकी रूप में प्रारंभिक पत्रकार स्वयं रिपोर्टर, लेखक, लिपिक, प्रूफरीडर, पैकर, प्रिंटर, संपादक एवं वितरक भी थे। क्रूरता, अन्याय, क्षोभ, विरोध, क्लेश, संज्ञास एवं गतिरोध उनकी दिनचर्या थी, फिर भी वे अटल थे, अडिग थे, क्योंकि उनके समक्ष एक लक्ष्य था। वे देशभक्त थे। देशभक्त के समक्ष सभी अवरोधों, प्रतिरोधों एवं बाधक विचारों का खंडन उनका उद्देश्य था। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार की दमनात्मक नीतियों के समक्ष सरकारी सहायता कौन कहे, साधारण सहिष्णुता भी उपलब्ध नहीं, जो आज सर्वत्र दृष्टव्य है। भले ही इनकी दिशाविहीनता के कारण उन आदर्शों के निकट नहीं है। उस समय न नियमित पाठक थे, न नियमित प्रेस अथवा प्रकाशन। मुद्रण के लिए दूसरे प्रेसों के समक्ष हाथ-पाँव जोड़कर चिरौरी करनी पड़ती थी, ताकि कुछ अंक निकल पाएँ। ग्राहकों और पाठकों की स्थिति यह थी कि महीनों-महीना पत्र मँगाते थे और पैसा माँगने पर वे वापस कर देते थे। ऐसी स्थिति में प्रायः सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रार्थना, तगादा, चेतावनी औऱ धमकियों के लिए कतिपय शीर्षकों में प्रकाशन होता था- जैसे 'इसे भी पढ़ लें' विज्ञापन एवं सूचना के रूप में आदि-आदि।
उदंड मार्तंड से शुरुआत
निःसंदेह हिंदी का सर्वप्रथम समाचार पत्र 'उदंड मार्तंड' ३०.०५.१८२६ को कलकत्ता से प्रकाशित हुआ था, जिसके संचालक पं. युगल किशोर थे एवं सन १८९१ को गोरखपुर से मुद्रित 'विद्याधर्म दीपिका' भारत वर्ष की सर्वप्रथम निःशुल्क पत्रिका थी, किंतु आंग्ल महाप्रभुवों के प्रभाव में चल रहे पाठकों के अभाव में यह पत्रिका भी अनियमित होते-होते काल-कवलित हो गई।
भारत वर्ष की पत्रकारिता इसी पृष्ठभूमि में १८वीं सदी के उत्तरार्द्ध में अंकुरित हुई। ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थापनोपरांत कई स्वतंत्र व्यापारी भी यहाँ प्रवेश पा चुके थे। ये व्यापारी भारतीय जन जीवन के साथ अपनत्व स्थापित कर स्वतंत्र पत्र-पत्रिका निकालने को तत्पर हुए। विलियम बोल्टस प्रथम व्यापारी था जिसने १७६४ में प्रथम विज्ञापन प्रसारित किया कि 'कंपनी शासकों की गतिविधियों से जन सामान्य को अवगत कराने के लिए वह पत्र निकालना चाहता है। कंपनी इस विज्ञापन को पढ़ते ही उसे देश निर्वासित कर इंग्लैंड वापस भेज दिया। अंग्रेज़ों का पत्र, पत्रिकाओं, पत्रकारों एवं पत्रकारिता के खिलाफ़ दमन का श्रीगणेश यहीं से प्रारंभ हुआ, किंतु वोल्टस द्वारा लगाया हुआ बीज अंकुरित होकर अगस्टस हिकी के हाथों में आकर एक पत्र के रूप में प्रस्फुटित हो गया जिसका नाम पड़ा 'बंगाल गजट एंड कलकत्ता जनरल एडवर टाइज़र' जिसने 'हिकीगजट' के नाम से १७८० में प्रथम पत्र के रूप में जन्म लिया। वारेन हेस्टिंग्स उस समय भारत वर्ष का गवर्नर जनरल था, जो अपने अथवा अपने मंत्रिमंडल के प्रतिकूल एक साधारण आलोचना भी बर्दाश्त नहीं कर सकता था। हिकीगजट इसका कटु आलोचक बन गया और फलस्वरूप १४-११-१७८० को प्रथम दमनात्मक प्रहार के रूप में इस पत्रिका को जो डाक से भेजने की सुविधा प्राप्त थी, उसे छीन ली गई। आलोचना तीव्रतर बढ़ती गई, जिसके चलते जेम्स अगस्टस को कारागार में डाल दिया गया और अंततः उसे देश से निर्वासित कर दिया गया। इसी शृंखला में एक दूसरे पत्रकार विलियम हुआनी को भी निर्वासित किया गया। अन्य प्रदेशों से भी जो पत्र निकलते थे उनके लिए सरकार से लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य किया गया। मद्रास से 'इंफ्रेस' ने बिना लाइसेंस प्राप्त किए 'इंडिया हेराल्ड' निकालना प्रारंभ कर दिया। इसके लिए इनको कानूनी कार्रवाई के तहत गिरफ्तार किया गया और अंत में इन्हें भी निर्वासित कर इंग्लैंड भेज दिया गया।
प्रेस संबंधी प्रथम कानून
१८वीं शताब्दी के अंत तक लगभग २०-२५ अंग्रेज़ी पत्रों का प्रकाशन हो चुका था जिसमें प्रमुख ते बॉम्बे हेराल्ड, बॉम्बे कैरियर, बंगाल हरकारू, कलकत्ता कैरियर, मॉर्निंग पोस्ट, ओऱियंट स्टार, इंडिया गजट तथा एशियाटिक मिरर आदि। पत्र-पत्रिकाओं की उत्तरोत्तर वृद्धि अंग्रेज़ों की दमनात्मक कार्रवाइयों को भी उसी अनुपात में बढ़ाने के लिए बाध्य करती गई। सन १७९९ में लार्ड वेलसली ने प्रेस संबंधी प्रथम कानून बनाया कि पत्र प्रकाशन के पूर्व समाचारों को सेंसर करना अनिवार्य है तथा अन्य शर्तें इस तरह लागू कर दी गईं।
(क) पत्र के अंत में मुद्रक का नाम एवं पता स्पष्ट रूप से छापा जाए।
(ख) पत्र के मालिक एवं संपादक का नाम पता एवं आवास का पूर्ण विवरण सरकारी सेक्रेटरी को दिया जाए।
(ग) सेक्रेटरी के देखे बिना कोई पाठ्य सामग्री छापी नहीं जाए एवं
(घ) प्रकाशन रविवार को बंद रखा जाए।
अब तक के सभी पत्र अंग्रेज़ी भाषा में प्रकाशित हो रहे थे तथा सभी पत्रों के संपादक भी अंग्रेज़ थे, फिर भी विरोधात्मक स्थिति में केवल इन्हें निर्वासित कर देना ही पर्याप्त दंड माना जाता था। बाद में सरकार के किसी कार्य पर टीका-टिप्पणी करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया जो बेलेसली से लार्ड मिंटो तक चला। भारतीय पत्रकारिता इसे बेहद दुष्प्रभावित हुई। लार्ड हेस्टिंग्स के गवर्नर जनरल बनते ही उपर्युक्त शर्तों में ढील बरती गई, जिसके अंतर्गत प्रकाशन के पूर्व सेंसर की प्रथा समाप्त करते हुए रविवार को प्रकाशन प्रतिबंध समाप्त कर निम्न आदेश जारी किए गए-
सरकारी आचरण पर आक्षेप लगानेवाला समाचार नहीं छापा जाए।
भारतवासियों के मन में शंका उत्पन्न करनेवाला समाचार नहीं छापा जाए।
धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जाए।
ब्रिटिश सरकार की प्रतिष्ठा पर आँच आनेवाला समाचार नहीं छापा जाए।
व्यक्तिगत दुराचार विषयक कोई चर्चा पत्रों में नहीं की जाए।
भारतीय भाषाओं के समाचार पत्र
इन शर्तों के बावजूद हेर्स्टिग्स का रवैया उदारवादी था, इसलिए इनका पालन सख्ती से नहीं हो पाया फलतः भारतीय भाषाओं में भी पत्र प्रकाशित होने लगे। इनमें प्रमुख पत्र थे- कलकत्ता जर्नल १८१८, बंगाल गजट १८१८, दिग्दर्शन १८१८, फ्रेंड ऑफ इंडिया १८१९, ब्रह्गनिकल मैग्ज़िन १८२२, संवाद कुमुदिनी १८२२, मिरातुल अखबार १८२२ आदि। इनमें कलकत्ता जर्नल एवं संवाद कुमुदिनी सबसे उग्र थे, क्योंकि उस समय भारतीय जीवन के अग्रदूत के रूप में राजा राममोहन राय नेतृत्व कर रहे थे।
हेस्टिंग्स के अवकाशग्रहण के बाद तथा जॉन आडम के नए गवर्नर जनरल के रूप में आते ही, पत्रों की स्वतंत्रता पुनः समाप्त हो गई और ०४.०४.१८२३ को प्रेस संबंधी नए कानूनों द्वारा ये प्रतिबिंब फिर लगा दिए गएः
कोई व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह सरकारी स्वीकृति के बिना फोर्ट विलियम के आबादी वाले क्षेत्रों में कोई समाचार पत्र, पत्रिका, विज्ञप्ति अथवा पुस्तक किसी भाषा में प्रकाशित नहीं करेगा, जिस पर सरकारी नीति एवं कार्य पद्धति पर टीका-टिप्पणी हो।
लाइसेंस प्राप्ति के लिए जो आवेदन पत्र दिए जाएँ उसके साथ शपथ पत्र भी दिया जाए जिसमें पत्र, पत्रिका, पुस्तक, मुद्रक, प्रकाशक एवं प्रेस मालिक का पूर्ण विवरण सहित भवन विवरण भी दिया जाए, जहाँ से प्रकाशन होगा।
बिना लाइसेंस प्राप्त किए पत्र प्रकाशित पाए जाने पर प्रकाशक को चार सौ रुपया जुरमाना अथवा चार महीने कैद की सज़ा दी जाएगी।
छापाखाने के लिए भी लाइसेंस अनिवार्य बनाया गया। बिना लाइसेंस के छापाखाने को ज़ब्त कर, मालिक को छह माह का कारावास एवं एक सौ रुपया जुरमाना होगा।
जिस पत्र का प्रकाशन रोका गया है। उसके वितरक को भी एक हज़ार रुपया जुरमाना तथा दो माह का कारावास का दंड होगा।
इन प्रतिबंधों का पूरे देश में घोर विरोध किया गया, जिसके फलस्वरूप बंगाल का 'मिरातुल अखबार एवं कलकत्ता जर्नल' की आहूति हो गई। सन १८२८ में विलियम बेंटिक के गवर्नर जनरल का प्रभार लेते ही उपर्युक्त कानून हटाए तो नहीं गए, किंतु कार्यान्वयन में उदारता बरती गई। सन १८३५ में 'सरचार्ल्स मेटकफ' के कार्यभार लेने के बाद भी, वही उदारनीति बरकरार रही और अंततः ०३.०८.१८३५ में इन्हें समाप्त कर दिया गया, किंतु नियंत्रण रखने के लिए कुछ नियम बनाए गए। इस उदार नीति के कारण १८३९ में पत्र-पत्रिकाओं की संख्या इस तरह हो गई- कलकत्ता मे २६ यूरोपियन पत्र जिनमें नौ भारतीय थे एवं नौ दैनिक, बंबई में दस यूरोपियन पत्र थे तथा चार भारतीय। मद्रास में नौ यूरोपियन पत्र थे। इसके अतिरिक्त दिल्ली, लुधियाना एवं आगरा से भी पत्र प्रकाशित होने लगे। सरसैयद अहमद खाँ द्वारा १८३९ में ही 'सैयदुल अखवाराय' दिल्ली का पत्र लोकप्रिय हो गया।
इस प्रकार प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लिए पूरे भारत वर्ष में पत्र, पत्रकारों एवं पत्रकारिता का चैतन्यपूर्ण परिवेस सृजित हो गया। लॉर्ड केनिंग ने इस सुलगती आग की गहराई को महसूस कर भारतीय पत्रों पर नियंत्रण के लिए १३.०६.१८५७ को प्रेस संबंधी नए कानून बनाकर सरकारी नियंत्रण बरकरार रखा।
इंडियन पैनल कोड में संशोधनःलॉर्ड मेकाले द्वारा १८३६ में जो धारा ११० लगाई गई थी उसे १८६० में समाप्त कर दिया गया।
रेगुलेशन ऑव प्रिंटिंग प्रेस एंड न्यूजपेपर्स एक्ट १८७६ - इस अधिनियम के अनुसार समाचार पत्रों एवं पुस्तकों के प्रकाशन की स्वतंत्रता समाप्त कर दी गई। इंडियन पैनल कोड में एक नई धारा जोड़कर आपत्तिजनक लेखकों को दंडित करने का प्रावधान कर दिया गया। इन प्रावधानों का विरोध करनेवाले प्रमुख पत्रों में 'स्टेटसमैन', 'पायोनियर', 'अमृत बाज़ार पत्रिका' तथा 'टाइम्स ऑफ इंडिया' प्रमुख थे।
गैगिंग प्रेस एक्ट ऑव १८७८- स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम १८५७ के बाद पत्रकारों के बीच नवजागरण उत्पन्न हुआ जो मूलतः भारतेंदु युग का प्रथम चरण बना। इनके नेतृत्व में पत्रकार 'स्व' से निकलकर 'देशहित' में अग्रसर हुए। इस युग के प्रमुख पत्रों में 'बिहार बंधु', 'कविवचन सुधा' हरिश्चंद्र मैगज़िन, ब्राह्मण, 'भारतमित्र', 'सारसुधानिधि' हिंदी 'वंशावली', 'हिंदी प्रदीप' एवं उचित वक्ता आदि अग्रणी रहे।
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट-१८७८- भारतेंदु युग से प्रस्फुटित उत्साह देखकर अंग्रेज़ घबरा उठे एवं इस कानून द्वारा देशी भाषा के पत्रों के संपादकों, प्रकाशकों एवं मुद्रकों के लिए एक शर्त अनिवार्य कर दी गई कि वे कोई ऐसा प्रकाशन नहीं करें जिससे घृणा एवं द्रोह उत्पन्न हो। अंग्रेज़ी पत्रों को मुक्त रखा गया, किंतु १८८० में लॉर्ड रिपन के आने पर वर्नाकुलर एक्ट ०७.०९.१८८१ में रद्द कर दिया गया। उसकी उदार एवं सुधार नीतियों के कारण सर्वत्र उल्लासपूर्ण वातावरण फैलल गया। सन १८८५ में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना हुई।
ऑफिशियल सिक्रेटस एक्ट ऑव १८८९- लार्ड रिपन की उदारता अंग्रेज़ों के लिए असह्य हो उठी। अतः अंग्रेज़ी पत्रों ने सरकार को 'कार्यालय गोपनीय प्रविष्टीकरण' को १७.१०.१८८९ से लागू करने के लिए बाध्य कर दिया। उसके द्वारा किसी योजना का प्रकाशन कानूनी अपराध घोषित कर दिया गया। वस्तुतः योजना का अर्थ राष्ट्रीय जागरण से संबंधित था।
राजद्रोह अधिनियम १८९८- लार्ड कर्जन के १८९८ में कार्यभार ग्रहण करते ही भारतीय समाचार पत्रों पर नियंत्रण करना पुनः प्रारंभ कर दिया गया, क्योंकि अब तक लखनऊ से 'हिंदुस्तानी अवध बिहार' 'विद्या विनोद', एडवोकेट' मेरठ से 'शाहना-ए-हिंदी', 'अनीस-ए-हिंद' इटावा से 'आलवसीर', बरेली से 'युनियन' तथा इलाहाबाद से 'अभ्युदय' आदि राष्ट्रीय स्तर पर शंखनाद कर रहे थे।
प्रेस एक्ट १९१०- बीसवीं शती के प्रारंभ होते ही विभिन्न घटनाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर झंझावात उत्पन्न कर दिया जिसमें १९०५ का बंगाल विभाजन भी प्रमुख था। सुधार के बहाने सरकार ने विभिन्न समितियों का गठन किया, किंतु १९१० में यह अधिनियम पारित हो ही गया। इसके बाद अंततः १९२२ में यह कानून रद्द कर दिया गया।
प्रेस एंड अनऑथराइज्ड न्यूजपेपर्स १९३०-वाइसराय इरविन ने देशव्यापी आंदोलन को देखकर इस अध्यादेश को मई-जून से लागू कर १९१० की संपूर्ण पाबंदियों को पुनः लागू कर जमानत की राशि ५०० से बढ़ाकर, हैंडबिल एवं पर्चों पर भी प्रतिबंध लगा दिया।
प्रेस बिल १९३१- पूरा देश एवं राजनेता 'राउंड टेबुल कान्फ्रेंस में व्यस्त थे और सरकार ने इसी बीच अध्यादेश को कानून के रूप में इसे पेश कर पारित करा लिया। इसके अंतर्गत समाचार एवं पत्रों के शीर्षक, संपादकीय टिप्पणियों को बदलने का भी अधिकार सुरक्षित रख लिया गया।
इसके बाद १९३५ में भारतीय प्रशासन कांग्रेस के हाथ में आ गया औऱ फलतः समाचार पत्रों को स्वतंत्रता प्राप्त हुई। सन १८३९ में द्वितीय युद्ध प्रारंभ होते ही कांग्रेस सरकार को पदत्याग करना पड़ा और पत्रों की स्वतंत्रता पुनः नष्ट हो गई जो १९४७ तक चली। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद १९५० में नया कानून बना जिसके द्वारा लगभग सभी प्रतिरोध समाप्त कर दिए गए।
१० अगस्त २००९
01/21/13--05:57: दिल्ली के गुमनाम बलिदानी (chan 7710543)
देशभक्तों के बलिदान
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देशभक्तों के बलिदान
(कुछ विशेष पृष्टों का संकलन)
सम्पादक - स्वामी ओमानन्द सरस्वती
प्रकाशक - हरयाणा साहित्य संस्थान, गुरुकुल झज्जर, जिला झज्जर (हरयाणा) द्वितीय संस्करण - 2000 ई०
Digital text of the printed book prepared by - Dayanand Deswal दयानन्द देसवाल
Acharya Bhagwan Dev alias Swami Omanand Saraswati
Contents
1जाट वंश के बलिदान
2सौ साल पहले दो जाटों ने छः महीने तक महाराजा जींद का मुकाबला किया था
3हरयाणा का स्वातन्त्र्य संग्राम
3.1लिबासपुर का बलिदान
3.2मुरथल का बलिदान
3.3कुण्डली का बलिदान
3.4अलीपुर की घटना
3.5रोहट गांव
4वीर अमरसिंह
5हांसी का शहीद हुकमचन्द
6झज्जर के नवाब
7कुतानी की गढ़ी
8फरुखनगर
9बराणी के ठाकुर
10बल्लभगढ़ नरेश नाहरसिंह
11हरयाणा प्रान्त के महान् योद्धा राव राजा तुलाराम
12जब करनाल के वीरों ने अंग्रेजों के दांत खट्टे किये
13सर्वखाप पंचायत का योगदान
जाट वंश के बलिदान
(पृष्ठ - 325-334)
लेखक ने यह लेख जाटवंश के वीरों की कुछ घटनाओं को लेकर ही लिखा है । इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य वंशीय लोगों के बलिदानों को भुला दिया । वह स्वयं लिखता है कि "इस लेख में मैं केवल जाटों से सम्बन्धित कुछ बातें लिखूंगा । बाकी लोगों के संबन्ध में अन्य लेखों में ।" वैसे लेखक ने जाट, अहीर, राजपूत, ब्राह्मण और वैश्य आदि सभी का सामान्यतः इसमें उल्लेख किया है । जाति-पांति के झंझट में फंसना हमारा सिद्धान्त नहीं परन्तु पृथक-पृथक नामों से कुछ समूह प्रसिद्ध हो चुके हैं । उनका उसी नाम से वर्णन करने में कुछ सुविधा रहती है । जाट एक क्षत्रिय वंश है । उसके नाम मात्र को सुनकर नाक भौं सिकोड़कर साम्प्रदायिक कहना उचित नहीं । लेखक को इतिहास सामग्री से लाभ उठाना ही अभिप्रेप्सित होना चाहिये । - वेदव्रत सम्पादक
पिछले पांच हजार साल से भारत के भाग्य निर्णायक युद्ध हरयाणेकी वीर-भूमि में लड़े जाते रहे हैं । धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रमें भाई से भाई का जो युद्ध हुआ उसमें ऐसी परम्परा पड़ी कि आज भी इस धरती पर भाई से भाई लड़ता कतराता नहीं । और इसी हरयाणे की पवित्र भूमि के ठीक मध्य में दिल्ली है जो न्यूनाधिक अपनी स्थापना से आज तक इस राष्ट्र की राजधानी चली आई है । हजारों साल से वे देश के स्वातन्त्र्य युद्धों में सामूहिक रूप से भाग लेते आये हैं । परन्तु इतिहास में उनके अमर बलिदानों की कहानी का उल्लेख नहीं हुआ है । जाट रणभूमि में अपने जौहर बार-बार दिखला चुका है, फिर भी राजपूत, सिख, मराठों जैसे युद्ध सम्बन्धी प्राचीन दन्त-कथायें उसके भाग्य में नहीं हैं । परन्तु अपनी मातृभूमि के लिए जिस दृढ़ता से जाट लड़ सकता है, उनमें से कोई भी नहीं लड़ सकता । अधिक से अधिक प्रतिकूल परिस्थिति में भी पूर्ण रूप से शान्त बने रहने और घबरा न उठने की प्राकृतिक शक्ति से जाट भरपूर होता है । भय तो जाट को छू भी नहीं सकता । जो भी चोट उस पर पड़ती है, उससे वह और भी कड़ा बन जाता है । उद्योग और साहस में तो जाट अद्वितीय होता है । शारीरिक संगठन, भाषा, चरित्र, भावना, शासन-क्षमता, सामाजिक परिस्थिति आदि के विचार से जाट ऊँचा स्थान रखता है ।
भारतीय इतिहास के निर्माण में जाट वंश का महत्वपूर्ण भाग रहा है । हिन्दू जाति और हिन्दू धर्म के लिए जाटों ने जो जो कार्य किये हैं, वे सदैव स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य हैं । परन्तु आज भी आम हिन्दू में जाटों के प्रति जो भावना है उसे भला नहीं कहा जा सकता है । प्रेस और प्लेटफार्म से राजपूत, मराठा, सिख, गोरखों का यशोगान करते रहिये । आपको कोई कुछ न कहेगा परन्तु आपने भूल कर भी जाट के लिये कुछ लिख दिया या कह दिया तो आप फौरन साम्प्रदायिक घोषित कर दिये जावेंगे। जिन जाटों के लिए देश पर बलि देना बायें हाथ का खेल रहा है, जिनके रक्त में पवित्र कर्त्तव्य-पालन और देशभक्ति के भावों के परमाणु पूरी तरह से मिले हुए हैं, जो आन पर लड़ना और जान पर मरना खूब जानते हैं, आन के लिये घर बिगाड़ना जिस जाट के लिए साधारण बात रही है, उसके यशोगान से नफरत करना क्या हिन्दू जाति की ऐसान-फरामोशी नहीं है ?
विशाल हिन्दू जाति में से प्रसिद्ध इतिहासज्ञ श्री कालिका रंजन कानूनगोही ऐसे हैं जिन्होंने इस ऋण से अनृण होने का प्रयत्न किया है । जाटों के सम्बन्ध में श्री कानूनगो के जो विचार हैं, उन्हें मैं उद्धृत करना आवश्यक समझता हूं । वे लिखते हैं -
"एक जाट उतना कल्पनाशील और भावुक नहीं होता जितना सुदृढ़ और धर्मशाली । शब्द प्रमाण की अपेक्षा उस पर प्रत्यक्ष उदाहरण का विशेष प्रभाव पड़ता है । स्वातन्त्र्य-प्रियता और परिश्रम-शीलता उसके विशेष गुण हैं । उसे अपने व्यक्तित्व का बड़ा ध्यान रहता है । वह स्वजाति सत्ता का समर्थक होने के साथ संगठन-कला में भी दक्ष होता है । जाट जिस बात को ठीक समझता है उसे करने में तुरन्त प्रवृत हो जाता है । यद्यपि वह स्वतन्त्र प्रकृति का होने के कारण, अपनी इच्छानुसार ही सब कुछ कर डालता है, तथापि वह उचित बात को सुनने, समझने और तदनुसार काम करने के लिए सदैव तैयार रहता है ।"
भारतीय इतिहास में जाटों की जो उपेक्षा की गई है, उसके दोषी जाट स्वयं किसी से कम नहीं है । जाटों ने लेखकों का कभी सम्मान नहीं किया, न ही कभी खुद लिखा । पीढ़ियों से उनके दो ही काम रहे हैं - देश की पुकार पर युद्ध करना और शान्ति के समय हल चलाकर, अन्न पैदा कर देश का पेट भरना । आज जाटों में पढ़े लिखों की कमी नहीं । उनमें अनेक डी.लिट., पी-एच.डी., एम.ए., बी.ए., आचार्य, शास्त्री, प्रभाकर, ज्ञानी इत्यादि हैं । उनके अपने अनेक कालिज हैं, जिनमें अनेक नवयुवक सुन्दर सुखद भविष्य की कल्पना में लीन हैं । आज जाटों के पास साधनों की भी कमी नहीं है । उनमें अनेक शक्तिशाली पुरुष हैं । पर क्या उनमें से कोई माई का लाल नहीं जो जयचन्द्र विद्यालंकार की तरह अपने जीवन को शोध में लगा दे ? क्या जाटों की कोई संस्था है जो ऐसे जन की रोटी, कपड़े, निवास की व्यवस्था कर सके ? ईरानसे इलाहाबाद तक के विशाल भूखंड में जाटों के वीरत्व-पूर्ण बलिदानों की कहानियाँ चप्पा-चप्पा भूमि में बिखरी पड़ी हैं । उनका संग्राहक चाहिये । जीवन की बाजी लगाने वाला चाहिये जो भारतीय इतिहास की अनेक टूटी कड़ियों को मिला सके, अपनी शोध द्वारा ।
दो हजार वर्ष पूर्व दुर्दान्त हूणों के आक्रमण से अपने प्रबल पराक्रम द्वारा जाटों ने भारत की रक्षा की और उन्हें देश से निकाल बाहर किया ।
छठी शताब्दी में जाट राजा हर्षवर्धनउत्तर भारत के सर्वशक्तिमान् सम्राट् थे जिनके राज्य-प्रबन्ध की प्रशंसा चीनी यात्रियों ने भी की है । इन्हीं के राज्य में बाण जैसा कवि था जिसके सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि "बाणोच्छिष्टं जगत् सर्वम्" । संस्कृत साहित्य का कोई ऐसा शब्द न होगा जिसका बाण ने प्रयोग न किया हो । सौलह सौ वर्ष पूर्व उत्तर भारत में जाटों के अनेक उदाहरण थे जिनमें रोहतकका यौधेयगण राज्यसर्वाधिक प्रसिद्ध था । यहाँ के वीर क्षत्रियों ने अपने रक्त की अन्तिम बूंद तक बहाकर पंचायती राज्य की रक्षा के लिए अकथनीय बलिदान दिये । उनके समृद्धिशाली राज्य की कहानी रोहतक का खोखरा कोटपुकार-पुकार कर कह रहा है । थानेसर, कैथल, अग्रोहा, सिरसा, भादराआदि इनके प्रसिद्ध जनपद थे ।
१०२५ में जब महमूद गजनवी गुजरात के संसार-प्रसिद्ध देवालय सोमनाथ को लूटकर रेगिस्तान के रास्ते वापिस गजनवी जा रहा था तब भटिण्डाके जाट राजा विजयराव ने उसे सिन्ध के मरुस्थल में घेरा और उसकी असंख्य धनराशि अपने कब्जे में की तथा उसे खाली हाथ लौटने के लिए (प्राण बचाकर भागने के लिए) विवश किया । नौ सौ साल पहले बुटाना के जाटों ने अत्याचारी मुगलों को घातरट (सफीदों के पास) के मुकाम पर हराया और गठवाले (मलिक) जाटों ने पठानों को कलानौरमें शिकस्त दी ।
मुगलिया सल्तनत के दौरान में हरयाणा के वीर-पुत्रों ने सर्वखाप पंचायतके मातहत अनेक लड़ाइयां लड़ीं और महत्वपूर्ण बलिदान दिये जो अलग ही लेख का विषय है । औरंगजेब ने ब्रज के गोकुला जाटको मुसलमान न बनने पर जिन्दा चर्खी पर चढ़ा दिया था और माड़ू जाटकी जिन्दा जी खाल (चमड़ी) उतरवा ली थी । उसी समय बोदर के महन्तों की वैरागी फौजों में शामिल होकर जाट मुगलों से निरन्तर संघर्षरत होते रहे ।
महाराजा सूरजमलने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए जो किया उसे भुलाना कृतघ्नता होगी । ढीली पड़ती मुगलिया सल्तनत की कमजोरी से लाभ उठा उन्होंने विशाल राज्य स्थापित किया । वे शरणागत-वत्सल थे । जिस समय जयपुर पर राजपूताने के राजाओं और मराठों की सम्मिलित शक्ति का आक्रमण हुआ तो महाराजा ईश्वरी सिंह की करुण कथा सुन तथा दूत द्वारा केवल पत्र पुष्प ही ग्रहण कर, बीस सहस्र जाट सैनिकों के साथ आमेर जा पहुंचे । राजपूतों तथा मराठों की सम्मिलित शक्ति को पराजित कर ईश्वरीसिंह को निष्कंटक राजा तो बना ही दिया, अपने शक्ति की धाक भी सब पर जमा दी । वे उस समय उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली राजा थे । जिस समय अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर १७६१ में चतुर्थ आक्रमण किया और पेशवा के प्रतिनिधि सदाशिवराव भाऊ ने उसके आक्रमण का प्रतिशोध करने के लिए हिन्दू शक्ति का आह्वान किया, उस समय जहाँ राजपूत राजाओं ने भाऊ का साथ देने से इन्कार किया, वहां महाराजा सूरजमल अपने पचास हजार रणबांकुरों को लेकर मैदान में आ पहुंचे । यही नहीं, उन्होंने विशाल मराठा वाहिनी के लिए अपने खजाने से एक महीने का राशन भी दिया ।
बादलीके युद्ध में घायल दत्ता जी सिंधिया को उठाकर जाट सैनिक कुम्भेरके दुर्ग में ले गये । अब्दाली के आतंक के कारण दिल्ली के जिस वजीर गाजीउद्दीन को कोई शरण देने के लिए तैयार न था और जो महाराजा सूरजमलका प्रबल विरोधी था, उसे भी उन्होंने शरण दी । यदि सदाशिवराव भाऊ महाराजा सूरजमल की सलाह मान गुरिल्ला युद्ध ठान लेते तथा प्रतापी जाट राजा को अपमानित नहीं करते, तो भारतवर्ष का इतिहास ही दूसरा होता । महाराजा सूरजमल के जाने के बाद भाऊ जबपानीपतके मैदान में खेत रहे, उनका खजाना लुट गया । आज भी हरयाणे में भाऊ की लूट मुहावरे के रूप में प्रसिद्ध है । मराठा सैनिकों और स्त्रियों को कहीं ठिकाना न रहा, तब महाराजा भरतपुरने अपने दुर्ग के द्वार शरणागतों के लिए खोल दिये । अपने राज्य की प्रजा को आदेश दिया कि वे युद्ध से बचकर भागे मराठा सैनिकों का यथाशक्ति सम्मान करें । स्वयं भरतपुर दुर्ग से महारानी किशोरीअपनी देख रेख में चालीस-चालीस हजार आहत सैनिकों को दोनों समय भोजन कराती थी । एक पखवाड़े तक यह क्रम जारी रहा । इसके उपरान्त उनको विदा करते समय प्रत्येक बड़े सरदार को एक सहस्र रुपये, प्रत्येक सैनिक को सौ रुपये, लत्ते-कपड़े तथा अन्न दिया और अपनी सेना की देख-रेख में ग्वालियर दुर्गतक भेजा । यदि महाराजा सूरजमल आड़े न आते तो बहुत थोड़े मराठे नर्मदा पार कर अपने देश को पहुंच पाते । यदि वे बदला लेने पर उतारू होते तो एक भी मराठा सैनिक बचकर ग्वालियर न पहुँच पाता । एक मराठा सरदार लिखता है "महाराजा सूरजमलने हाथ जोड़ कर हम से कहा - मैं तुम्हारे पास का हूँ, मैं तुम्हारा एक सेवक हूं, यह राज्य तुम्हारा ही है ।" सूरजमल जैसे उदार प्रवृत्ति के मनुष्य संसार में बहुत कम हुए हैं ।
जब महाराजा सूरजमलशाहदरा के पास धोखे से मारे गये तो महारानी किशोरी (होडलके प्रभावशाली सोलंकी जाटनेता चौ. काशीराम की पुत्री) ने महाराजा जवाहरसिंहको एक ही ताने में यह कहकर कि "तुम पगड़ी बांधे हुए फिरते हो, तुम्हारे पिता की पगड़ी शाहदरा के झाऊओं में उलटी पड़ी है", युद्ध के लिए तैयार कर दिया । महाराजा जवाहरसिंह ही पहले हिन्दू नरेश थे जिन्होंने आगरे के किले और दिल्ली के लाल किले को जीतकर विजय वैजयन्ती फहराई थी । दिल्ली के लाल किले के युद्ध में जब किसी भी तरह किला फतह न हो पा रहा था तब महाराजा जवाहरसिंह के मामा और महारानी किशोरीबाई के भाई वीरवर बलरामने किले के फाटकों के लम्बे-लम्बे कीलों पर छाती अड़ा हाथी के मस्तिष्क पर बड़े-बड़े तवे बन्धवा पीलवान से हाथी हूलने को कहा । हाथी की मार से किले के किवाडों और तवों के बीच में बलराम का शरीर निर्जीव हो उलझ गया पर उनके अमर बलिदान से अजेय दुर्ग के फाटक टूट गए और वह जीत लिया गया । भारतीय इतिहास में ऐसे अपूर्व बलिदान की एक ही कहानी और मिलती है और वह है उदयपुर के महाराणा अमरसिंह के समय रणथम्भौर के आक्रमण में चूड़ावतों व शेखावतों के झगड़े में शेखावत सरदार की आत्माहुति ।
कौन नहीं जानता कि भारतेन्द्र महाराजा जवाहरसिंहही एकमात्र ऐसे हिन्दू नरेश थे जिन्होंने हिन्दू जाति के मुसलमानों द्वारा नष्ट किये हुए गौरव की रक्षा करके हमारी मान मर्यादा को सुरक्षित किया था । इतिहास-वेत्ता और इतिहास-प्रेमी पाठकों से यह बात छिपी हुई नहीं है कि महमूद गजनवी, चंगेज खाँ, तैमूरलंग, औरंगजेब आदि मुगल आक्रान्ताओं, लुटेरों और बादशाहों ने हिन्दुओं के अनेक मन्दिरों को तोड़ा, मूर्तियों को खण्डित किया, मंदिरों में शंख, घड़ियाल व घण्टों का बजाना बंद कर के उनमें आरती होने तक को बंद करा दिया था । अनेक हिन्दुओं को बलात् मुसलमान बना लिया था । यहां तक कि हिन्दुओं की बहिन-बेटियों को छीनकर मुसलमान बना लिया था । यदि इन अत्याचारों का बदला किसी ने लिया तो सच्चे वीर क्षत्रिय महाराजा जवाहरसिंह ने । उन्होंने आगरा आदि नगरों में अपने राज्य बल से मुल्लाओं को प्रातः-सायं बांग देने से रोक दिया था । आगरा की जामा मस्जिद में बाजार लगवा दिया था परन्तु उसे तुड़वाया नहीं । इससे उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया था । अन्यथा वे चाहते तो क्षण भर में नष्ट भ्रष्ट करा देते और उसका चिन्ह तक मिटा देते । देहली से लौटते हुए उन्होंने सैंकड़ों नव-मुस्लिमों को जाट बना लिया था, जो आज भी हिन्दू जाति का गौरव बढ़ा रहे हैं । वही एक ऐसे प्रातः स्मरणीय हिन्दू नरेश हुए हैं जिन्होंने सच्चे अर्थों में हिन्दुत्व की रक्षा की तथा अकबर के सिंहासन पर बैठकर आगरे में शासन किया ।
१८०५ में भरतपुरके दुर्ग पर जब अंग्रेजों ने आक्रमण किया तो महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों के जिस तरह दांत खट्टे किये वह तो इतिहास की अद्वितीय गाथा बन गया है । और उसी समय से यह कहावत प्रसिद्ध हो गई है कि - आठ फिरंगी, नौ गोरे, लड़ें जाट के दो छोहरे । कविवर वियोगी हरि ने भी अपनी वीर सतसईं में लिखा है "एही भरतपुर को दुग्ग है, जहं जट्टन के छोहरे .....दिये अंग्रेज सुभट्ट पछारी ।"
मातृभूमि के पैरों में से दासता की बेड़ियाँ उतरवाने के लिए, उसकी स्वतन्त्रता प्राप्ति के हित जो अंग्रेजों के विरुद्ध १८५७ का युद्ध लड़ा गया, उसमें सबसे बढ़-चढ़ कर भाग अहीरों और जाटों ने लिया जिसका फल इन्हें अंग्रेजों के राज्य में बहुत बुरे तरह भोगना पड़ा और इन्हें अनेक राज्यों में विभक्त कर दिया गया ।
१०२ वर्ष पूर्व जीन्दराज्य के प्रसिद्ध गाँव लजवानामें भूरा अन्द निघांईया दो जाट चौधरी बसते थे । मजदा और दुर्गा के बहकाने से महाराजा जीन्द ने उन पर आक्रमण कर दिया । यह युद्ध छः महीने तक चला । भूरा और निघांईया की मदद चारों ओर की जटैत करती थी जो समय के अनुसार घटती, बढ़ती रहती थी । धन, जन की कभी कमी न रहती थी । भूरा और निघांईया अपने मातहत काम करने वालों को आठ रुपये महीना देते थे । तोपची को सोलह रुपये महीना । सात सौ हेड़ी उनकी फौज में तोपची का काम करते थे । गोला, बारूद, रसद उन्हें रिठाना, फड़वाल और खुडाली (किला जफरगढ़) के ठिकानों से पहुंचती थी । खुडाली में तो पुराने घरों में अब तक शोरा, गन्धक, पुरानी बन्दूक, गंडासे आदि बड़ी तादाद में खुदाई पर निकल आते हैं । इस युद्ध में पटियाला, नाभा, जीन्द आदि राज्यों की बीस हजार से अधिक फौज काम आई थी । अंग्रेजी फौज ने आकर बड़ी कठिनाई से लजवाना को फतह किया था । आज भी पटियालाके देहात में बहनें यह गीत बड़े दर्द के साथ गाती हैं कि –
"लजवाने, तेरा नाश जाइयो, तैने बड़े पूत खपाये"
हरयाणा के स्वाभिमानी पुरुष अंग्रेजी राज्य की स्थापना के कितने विरुद्ध थे, यह उपर्युक्त घटना से अच्छी तरह ज्ञात हो जाता है । अन्त में भूरा और निघांईया पकड़े गये तथा उन्हें कालवा (जीन्दराज्य का प्रसिद्ध गांव) में फांसी पर लटका दिया गया । फांसी गांव के बाहर वृक्षों पर दी गई तथा सारे इलाके के लोगों को बुलाकर, जिससे अंग्रेज की दहशत सब पर छा जावे और कोई भी ब्रिटिश प्रभु के खिलाफ सिर न उठ सके ।
सन् १८०९ में जब कर्नल वारिन पलटन लेकर भिवानीफतह के लिए गये, उस समय उसके चारों ओर बसने वाले जाटों, राजपूतों, ब्राह्मणों और वैश्यों ने डटकर लोहा लिया था । और तो और, जिन वैश्यों की व्यापारी कहकर उपेक्षा की जाती है, उनके अगुआ ला० नन्दराम अपने चार बेटों के साथ युद्ध में काम आये ।कोसलीके प्रसिद्ध पंडित तुलसीराम जी अपने भाई तोताराम के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में जूझे थे । १८०२ में जार्ज थामस ने पहले पहल हरयाणा की भूमि पर कब्जा किया । उसने बेरी, झज्जरतथा महमअपने अधीन किये, तथा सारे पंजाब पर कब्जा करने का विचार करने लगा । उसकी सफलता का कारण था तत्कालीन राजाओं व नवाबों का आपसी विग्रह । परन्तु हरयाणा वाले जल्दी ही संभल गये और उन्होंने बापू जी सिंधिया तथा भरतपुर के जाट नरेश महाराजा रणजीतसिंहकी अध्यक्षता में युद्ध करके जार्ज थाम्स को इस प्रदेश पर से भगा दिया था । बाद में ईस्ट इंडिया कम्पनी की शासन सत्ता छा गई और यहाँ के निवासी सन् ५७ तक अन्दर ही अन्दर अंग्रेज के विरुद्ध धधकते रहे । १८५७ के स्वातन्त्र्य युद्ध में हरयाणे के राजाओं, नवाबों, सैनिकों और जन साधारण ने जो महत्त्वपूर्ण भाग लिया है, वह अलग ही लेख (लेख नहीं, पुस्तक) का विषय है । इस में कोई सन्देह नहीं कि हरयाणा के वीर पुत्रों (सभी जातियों) ने जो भाग आजादी की लड़ाई में लिया उसका उल्लेख बहुत कम हुआ है । रामपुरा, रिवाड़ी, फर्रुखनगर, बहादुरगढ़, झज्जर, बल्लभगढ़, नसीरपुर (नारनौल), श्यामड़ी, रोहतक, थानेसर, पानीपत, करनाल, पाई, कैथल, सिरसा, हाँसी, नंगली, जमालपुर, हिसार आदि सभी स्थान विद्रोहियों के केन्द्र रहे हैं । उपरोक्त सभी स्थानों पर कुछ न कुछ दिन आजादी के दीवानों की हकूमत रही है । इस लेख में मैं केवल जाटों से सम्बन्धित कुछ बातें लिखूंगा । बाकी लोगों के संबन्ध में अन्य लेखों में ।
१० मई को मेरठ से जो चिन्गारी छूटी वह ११ को देहली आ पहुँची । मेरठ की फौजों में सबसे अधिक हरयाणे के जाट और राजपूत थे । उनके बाद अहीर । उन फौजी सिपाहियों द्वारा यह आग सारे प्रदेश में व्याप्त हो गई । उस समय तक रोहतक बंगाल के गवर्नर के मातहत था, तथा कमिश्नरी का हेड-क्वार्टर आगरा । यहाँ के डिप्टी कमिश्नर जॉन एडमलौक थे । २३ मई को बहादुरगढ़में शाही फौज ने प्रवेश किया और २४ मई को रोहतक पहुंची । डिप्टी कमिश्नर गोहाने के रास्ते करनालभाग गया । रहे हुए अंग्रेज अधिकारी मारे गये । जेल के दरवाजे खोल दिये गये, कचहरी को आग लगा दी गई । शाही दस्ते ने शहर के हिन्दुओं को लूटना चाहा पर जाटों ने ऐसा न करने दिया । दो दिन ठहर कर विद्रोहियों ने खजाने से दो लाख रुपया निकाल लिया । मांडौठी, मदीना, महमकी चौकियाँ लूट ली गईं । सांपलातहसील में आग लगा दी गई । सभी अंग्रेज स्त्रियों को जाटों ने मुस्लिम राजपूतों (रांघड़ों) के विरोध के बावजूद सही सलामत उनके ठिकानों पर पहुंचा दिया । गोहानापर गठवाले जाटों ने कब्जा जमा लिया । ३० मई को अंग्रेजी फौज अंबाला से रोहतक चली, पर देशी फौजों के बिगड़ने से श्यामड़ी के जंगल में हार गई । बचे खुचे अंग्रेज दिल्ली को भागे । लुकते-छिपते ये लोग १० जून को सांपला पहुंचे । डिप्टी कमिश्नर सख्त धूप न सह सकने के कारण अंधा हो गया । रोहतक के विद्रोही १४ जून को दिल्ली पहाड़ी की लड़ाई में सम्मिलित हुए थे । जब अंग्रेज रोहतक पर किसी तरह भी काबू न पा सके तो मजबूर होकर उन्होंने २६ जुलाई सन् ५७ को एक घोषणा द्वारा जींदके महाराजा स्वरूपसिंह को सौंप दिया । दिसम्बर के अन्त तक जहां लोग अंग्रेज से लड़ते रहे, वहां जाटों की खापें आपस में भी एक दूसरे पर आक्रमण करती रहीं और बीच-बीच में रांघड़ों और कसाइयों से भी लड़ते रहे ।
जब गदर समाप्त हुआ तो प्रायः सभी गावों के मुखिया लोगों और खासकर नम्बरदारों को फांसी पर चढ़ा दिया गया था । झज्जरके चारों ओर की सड़कें उल्टे लटके मनुष्यों की लाशों से सड़ उठीं थीं । मुसलमान राजपूत गांवों के नम्बरदारों को तथा श्यामड़ी गांव के १० जाट नम्बरदारों व १ ब्राह्मण को रोहतक की कचहरियों व शहर के बीच नीम के वृक्षों पर (वर्तमान चौधरी छोटूरामकी कोठी के सामने के वृक्षों पर) फांसी पर लटका दिया गया था । फांसी देने से पहले दसों जाट नम्बरदारों को बुलाकर अंग्रेज हाकिमों ने पूछा - बोलो क्या चाहते हो ? जाटों ने कहा कि हमारे ग्यारहवें साथी मुल्का ब्राह्मण को छोड़ दो । मुल्का ब्राह्मण ने अपने साथियों से अलग होने से इन्कार कर दिया । उसे भी उनके साथ ही फाँसी दे दी गई । सारी लाशें गाँव में लाकर जलाईं गईं । फांसी पाने वालों के खोज करने के बाद ९ नाम जान सका, दो का पता न चला । क्रमशः नाम ये हैं - मुल्का ब्राह्मण, हरदयाल, श्योगा, हरकू, बहादुरचन्द, जमनासिंह, हरिराम, शिल्का, भाईय्या (सब जाट) ।
कप्तान हडसन १६ अगस्त सन् ५७ को १२ बजे रोहतक पहुंचा था । उसने कुछ लोगों को इकट्ठे देखकर गोली चला दी जिससे १६ आदमी मारे गये । यह घटना चारों ओर के देहात में फैल गई । अगले दिन १७ अगस्त को सिंहपुरा, सुन्दरपुर, टिटौलीआदि के १५०० आदमी चढ़ आये, जिनमें से ५० रणभूमि में ही खेत रहे । झज्जरके नवाब अब्दुर्रहमान को २३ दिसम्बर १८५७ को फांसी के तख्ते पर लटका दिया गया । २१ अप्रैल १९५८ को बल्लभगढ़नरेश नाहरसिंहफांसी पर झुला दिये गये और उन्हीं के साथ नवाब झज्जर के तीन वजीरों में से एक वजीर बादलीके गुलाबसिंह जाटभी फांसी पर चढ़ा दिये गये । राव तुलाराम व राव कृष्णगोपाल ने जो अतुल पराक्रम दिखाया, वह स्वर्णाक्षरों में अंकित होने योग्य है । इसी अर्से में बहादुरगढ़, दादरी, फर्रुखनगर के नवाब समाप्त कर दिये गये । फर्रुखनगर के नवाब मुहम्मद अली खाँ को फांसी दी गई और उनके ११ साथियों को गोली से उड़ा दिया गया । महाराजा नाहरसिंह के साथ फांसी पाने वालों में कुंवर खुशहालसिंह और ठाकुर भूरेसिंह भी थे ।
हिसारमें सन् ५७ में हरयाणवी फौज की लाइट पलटन तैनात थी और १४वां घुड़सवार रिसाला था । पंजाब के तत्कालीन चीफ कमिश्नर सर जान लारेन्स ने एक अनुभवी सेना नायक जनरल वान कोटलैंड को भेजा । हिसार, सिरसा, हांसीऔर उनके देहात में जहाँ भी, जो भी अंग्रेज फंसा, समाप्त कर दिया गया । जहाँ रोहतक-करनालके युद्धों में सिक्खों ने अंग्रेजों की सहायता की, वहां हिसार के युद्ध में महाराजा बीकानेर के८०० सिपाही अंग्रेज की ओर से लड़े । हांसी के देहात में जो मारकाट मची, वह रोंगटे खड़े करने वाली है । जो अमानवीय अत्याचार यहाँ हुए, वह लिखे नहीं जा सकते । यदि उनका मुकाबला किया जा सकता है तो सन् १९४७ के नरमेध से । जमालपुर मंगली आदि गांव राख के ढ़ेर बना दिये गये । युद्ध की समाप्ति पर देहात से पकड़कर १५० के लगभग लोगों को फांसी पर सरे आम लटका दिया गया ।
कुरुक्षेत्रके ब्राह्मणों के आदेश से हरयाणवी फौज ने इलाके के जाटों के साथ मिलकर थानेसरकी सरकारी इमारतें जला दीं और तहसील पर कब्जा कर लिया । पाई के जाटों ने कैथल जीत लिया । असन्ध के मुसलमान राजपूत पानीपत तक चढ़ आये । खरखोदा (रोहतक) के लोग दिल्ली की बादशाही फौजों से जा मिले । खरखोदा की देहात के २० आदमी गोली से उड़ा दिये गये और १४ फाँसी पर लटका दिये गये ।
इस तरह हरयाणा के अन्दर फैले विद्रोह को दबाने के लिये सिक्ख व राजपूत फौज के साथ अंग्रेजी फौज ने भारी अत्याचार किये तथा सन् ५७ के अन्त तक सम्पूर्ण प्रदेश पर अधिकार कर लिया । लार्ड केनिंग चाहते थे कि हरयाणे की शूरवीर जातियों का सम्मान करना चाहिये । पर जनरल नील और मिंटगुमरी सम्मान करना तो दूर रहा, उजाड़ने पर तुले हुए थे ।
क्रान्ति १८५७ में हुई थी पर सन् १९०२ तक हरयाणा की सड़कें व जंगल उजाड़े जाते रहे । ग्रामों में संस्कृत की पाठशालायें बंद की गईं । मन्दिर उजाड़े गये । दो और तीन हजार के बीच पंचायतें तोड़ीं गईं । न्यायालयों में हिन्दी के स्थान पर उर्दू जारी की गई । जिन पंजाब वालों से हरयाणा का न रहन-सहन मिलता है न बोल-चाल, उन्हीं के साथ हरयाणा को आगरा से अलग कर मिला दिया गया । कुछ भाग जीन्द, नाभा, पटियाला की रियासतों के साथ मिला दिये गये । पंजाब के मुकाबले में इस प्रदेश की भारी उपेक्षा की गई । नये-नये कर लगाये गये । यहाँ के पैसे से पंजाब में नहरें निकाली गईं । कर्नल रैनक अंग्रेज को डिप्टी कमिश्नर बनाकर, २० वर्ष तक बारी-बारी करनाल, रोहतक, हिसार, गुड़गाँवजिलों में भेजा जाता रहा जो इस प्रदेश के स्वाभिमानी वीर क्षत्रियों के हृदयों को ठेस लगाता रहा । उसने क्रान्ति में भाग लेने वाले अनेकों वंशों की जागीरें छीनीं, अमानुषिक दंड दिये । पर कर्नल रैनक के अत्याचार भी इस प्रदेश की वीरतापूर्ण भावना को दबा न सके ।
ऋषि दयानन्दकी कृपा इस प्रदेश पर हुई, आर्यसमाजका प्रचार धीरे-धीरे बढ़ा । सभी जाट आर्यसमाजी हो गये । स्वदेशी की भावना पनपी । जहाँ उन्होंने सन् १९१४ के विश्व युद्ध में फौज में भरती होकर जर्मनी जैसी विश्वशक्ति को युद्ध में पछाड़ा (पहले विश्व-युद्ध में ६ नं. जाट पलटन के जौहर प्रसिद्ध हैं, उनके शौर्य की प्रशंसा शत्रुओं ने भी की है), वहाँ उन्हीं दिनों उनके कानों में जाट सरदार अजीत सिंहकी यह आवाज भी पड़ी कि "पगड़ी संभाल ओ जट्टा, पगड़ी संभाल" । उन्होंने गांधी जी के आन्दोलनों में बढ़ चढ़ कर भाग लिया तथा अनेक लोगों ने घर-द्वार छोड़ देश की आजादी के लिये सर्वस्व न्यौछावर किया ।
राजा महेन्द्रप्रतापआजादी की चसक में रियासत छोड़कर ३३ साल तक संसार के अनेक देशों की खाक छानते फिरे परन्तु उनके बलिदान की कीमत किसने की ? आज अनेकों नकारा राजनीतिज्ञ राज्यपाल बने बैठे हुए हैं पर राजा जी लोकसभा में आये तो कांग्रेस के विरोध में ।
द्वितीय विश्वयुद्ध में जब जनरल मोहनसिंह ने आजाद हिन्द फौज बनाई और नेता जी सुभाषचन्द्र बोस ने उसका नेतृत्व संभाला तब उसमें सबसे बड़ी संख्या जाटों की थी । यह बात दूसरी है कि इन्हें वह यश नहीं मिला जो दूसरे लोगों को । कर्नल दिलसुखमानइतने सीनियर आफीसर थे कि वे आज स्थल सेनाध्यक्ष होते । पर आज वे आजाद हिन्द फौज के कारण घर बैठे हैं, उन्हें कोई पूछने वाली नहीं । मांडौठीके कप्तान कंवलसिंहने नेता जी सुभाषचन्द्र के साथ बर्लिन से टोकियो तक पनडुब्बी में यात्रा की और रंगून से जापान के लिए उड़ने से पहले तक उनके साथ रहे, इस बात को कौन जानता है ? काश्मीर युद्ध में रिटौली, कबूलपुरके जमादार हरद्वारीलाल ने १० हजार फुट की उंचाई पर टैंक चढ़ाकर संसार में अद्भुत आश्चर्य उत्पन्न किया था । आज तक कोई भी इतनी उंचाई तक टैंक नहीं चढ़ा सका है । समालगाँव के हुशियारसिंह अभी पिछले दिनों नागा पहाड़ियों में नागाओं से लड़ते हुए काम आये । भगतसिंहक्रांति की ज्वाला जलाते-जलाते फाँसी पर झूल गये । ऊधमसिंह सात समुद्र पर जनरल ओडायर को मारकर बलि हो गये । ऊधमसिंह-ताराचन्दअभी पिछले दिनों जोधपुर में डाकू कल्याणसिंह के मुकाबले में कुर्बान हो गये और उनकी कुर्बानी का ही यह परिणाम है कि आज राजस्थान, पाकिस्तान की सीमा डाकू-विहीन हो गई है ।
जिन मिस्टर जिन्ना से सारे हिन्दुस्तान के राजनीतिज्ञ मुकाबला करते घबराते थे, उन्हीं जिन्ना साहब को विचक्षण जाट राजनीतिज्ञ चौधरी छोटूरामने कान पकड़कर पंजाब से निकाल दिया था । सन् ४२ में भक्त फूलसिंहजी आतताइयों के हाथ कत्ल हो गये । स्वामी स्वतंत्रानन्दजी महाराज गोरक्षा के लिए बलि हो गये ।
सन् १९४७ के गृह-युद्ध में यदि जाट गिरिराजशरणसिंह उर्फ बच्चूसिंहके नेतृत्व में मेव आक्रमण का मुकाबला न करते तो भारतीय इतिहास की धारा ही दूसरी होती और शायद दिल्ली हमारी न होती । इस गृह-युद्ध में जाट लोगों ने जिस वीरता के साथ भाग लिया है, वह किसी जानकार की लेखनी ही लिख सकती है । यह लम्बी कहानी है । वर्तमान हिन्दी सत्याग्रह संग्राम में जाटों ने ही सब से बढ़-चढ़कर बलिदान दिया । हैदराबाद में घर्मयुद्ध में सबसे अधिक सत्याग्रही हरयाणा से गये और उनमें भी सबसे ज्यादा थे जाट । पर जो यश उन्हें मिलना चाहिए था, नहीं मिला । आज भी जाटों में बलिदाताओं की कमी नहीं है । यदि कमी है तो उनको प्रकाश में लाने वालों की । हो सकता है नई पढ़ी-लिखी सन्तति इस तरफ कुछ ध्यान देकर विशाल भू-प्रदेश में बिखरे अपने इतिहास को संग्रहीत करने का प्रयत्न करे । जाटों का इतिहास उत्तर भारत का इतिहास है । आर्यों के विशाल साम्राज्य का इतिहास है ।
काश ! जाट तलवार की तरह कलम का भी धनी होता तो उनका इतिहास यों छिन्न-भिन्न न होता । इस धर्म-निरपेक्ष गणतन्त्र में वे संभल जायें तो भी अच्छा है । आशा है दूसरे लोग भी जाटों से बिदकना छोड़कर इनकी उदारता से नाजायज लाभ उठाना छोड़ेंगे ।
सौ साल पहले दो जाटों ने छः महीने तक महाराजा जींद का मुकाबला किया था
(पृष्ठ - 321-325)
जिला रोहतकके पश्चिम में (जहाँ रोहतक की सीमा समाप्त होकर जीन्दकी सीमा प्रारम्भ होती है), रोहतक से 25 मील पश्चिम और पटियाला संघ के जीन्द शहर से 15 मील पूर्व में "लजवाना" नाम का प्रसिद्ध गांव है । सौ साल पहले उस गांव में 'दलाल' गोत के जाट बसते थे । गांव काफी बड़ा था । गांव की आबादी पांच हजार के लगभग थी । हाट, बाजार से युक्त गाँव धन-धान्य पूर्ण था । गांव में 13 नम्बरदार थे । नम्बरदारों के मुखिया भूरा और तुलसीराम नाम के दो नम्बरदार थे । तुलसीराम नम्बरदार की स्त्री का स्वर्गवास हो चुका था । तुलसी रिश्ते में भूरा का चाचा लगता था । दोनों अलग-अलग कुटुम्बों के चौधरी थे । भूरे की इच्छा के विरुद्ध तुलसी ने भूरे की चाची को लत्ता (करेपा कर लिया) उढ़ा लिया जैसा कि जाटों में रिवाज है । भूरा के इस सम्बंध के विरुद्ध होने से दोनों कुटुम्बों में वैमनस्य रहने लगा ।
समय बीतने पर सारे नम्बरदार सरकारी लगान भरने के लिये जीन्द गये । वहाँ से अगले दिन वापिसी पर रास्ते में बातचीत के समय भोजन की चर्चा चल पड़ी । तुलसी नम्बरदार ने साथी नम्बरदारों से अपनी नई पत्नी की प्रशंसा करते हुए कहा कि "साग जैसा स्वाद (स्वादिष्ट) म्हारे भूरा की चाची बणावै सै, वैसा और कोई के बणा सकै सै ?" भूरा नम्बरदार इससे चिड़ गया । उस समय तक रेल नहीं निकली थी, सभी नम्बरदार घर पैदल ही जा रहे थे । भूरा नम्बरदार ने अपने सभी साथी पीछे छोड़ दिये और डग बढ़ाकर गांव में आन पहुंचा । आते ही अपने कुटुम्बी जनों से अपने अपमान की बात कह सुनाई । अपमान से आहत हो, चार नौजवानों ने गांव से जीन्द का रास्ता जा घेरा । गांव के नजदीक आने पर सारे नम्बरदार फारिग होने के लिए जंगल में चले गए । तुलसी को हाजत न थी, इसलिए वह घर की तरफ बढ़ चला । रास्ता घेरने वाले नवयुवकों ने गंडासों से तुलसी का काम तमाम कर दिया और उस पर चद्दर उढ़ा गांव में जा घुसे । नित्य कर्म से निवृत्त हो जब बाकी के नम्बरदार गांव की ओर चले तो रास्ते में उन्होंने चद्दर उठाकर देखा तो अपने साथी तुलसीराम नम्बरदार को मृतक पाया । गांव में आकर तुलसी के कत्ल की बात उसके छोटे भाई निघांईया को बताई । निघांईया ने जान लिया कि इस हत्या में भूरा का हाथ है । पर बिना विवाद बढ़ाये उसने शान्तिपूर्वक तुलसी का दाह कर्म किया तथा समय आने पर मन में बदला लेने की ठानी ।
कुछ दिनों बाद रात के तीसरे पहर तुलसीराम के कातिल नौजवानों को निघांईया नम्बरदार (भाई की मृत्यु के बाद निघांईया को नम्बरदार बना दिया गया था) के किसी कुटुम्बीजन ने तालाब के किनारे सोता देख लिया और निघांईया को इसकी सूचना दी । चारों नवयुवक पशु चराकर आये थे और थके मांदे थे । बेफिक्री से सोए थे । बदला लेने का सुअवसर जान निघांईया के कुटुम्बीजनों ने चारों को सोते हुए ही कत्ल कर दिया । प्रातः ही गांव में शोर मच गया और भूरा भी समझ गया कि यह काम निघांईया का है । उसने राजा के पास कोई फरियाद नहीं की क्योंकि जाटों में आज भी यही रिवाज चला आता है कि वे खून का बदला खून से लेते हैं । अदालत में जाना हार समझते हैं । जो पहले राज्य की शरण लेता है वह हारा माना जाता है और फिर दोनों ओर से हत्यायें बन्द हो जाती हैं । इस तरह दोनों कुटुम्बों में आपसी हत्याओं का दौर चल पड़ा ।
उन्हीं दिनों महाराज जीन्द (स्वरूपसिंह जी) की ओर से जमीन की नई बाँट (चकबन्दी) की जा रही थी । उनके तहसीलदारों में एक वैश्य तहसीलदार बड़ा रौबीला था । वह बघरा का रहने वाला था और उससे जीन्द का सारा इलाका थर्राता था । यह कहावत बिल्कुल ठीक है कि –
बणिया हाकिम, ब्राह्मण शाह, जाट मुहासिब, जुल्म खुदा ।
अर्थात् जहाँ पर वैश्य शासक, ब्राह्मण साहूकार (कर्ज पर पैसे देने वाला) और जाट सलाहकार (मन्त्री आदि) हो वहाँ जुल्म का अन्त नहीं रहता, उस समय तो परमेश्वर ही रक्षक है ।
तहसीलदार साहब को जीन्द के आस-पास के खतरनाक गांव-समूह "कंडेले और उनके खेड़ों" (जिनके विषय में उस प्रदेश में मशहूर है कि "आठ कंडेले, नौ खेड़े, भिरड़ों के छत्ते क्यों छेड़े") की जमीन के बंटवारे का काम सौंपा गया । तहसीलदार ने जाते ही गाँव के मुखिया नम्बरदारों और ठौळेदारों को बुला कर डांट दी कि "जो अकड़ा, उसे रगड़ा" । सहमे हुए गांव के चौधरियों ने तहसीलदार को ताना दिया कि - ऐसे मर्द हो तो आओ 'लजवाना' जहाँ की धरती कटखानी है (अर्थात् मनुष्य को मारकर दम लेती है) । तहसीलदार ने इस ताने (व्यंग) को अपने पौरुष का अपमान समझा और उसने कंडेलों की चकबन्दी रोक, घोड़ी पर सवार हो, "लजवाना" की तरफ कूच किया । लजवाना में पहुंच, चौपाल में चढ़, सब नम्बरदारों और ठौळेदारों को बुला उन्हें धमकाया । अकड़ने पर सबको सिरों से साफे उतारने का हुक्म दिया । नई विपत्ति को सिर पर देख नम्बरदारों और गांव के मुखिया, भूरा व निघांईया ने एक दूसरे को देखा । आंखों ही आंखों में इशारा कर, चौपाल से उतर सीधे मौनी बाबा के मंदिर में जो कि आज भी लजवाना गांव के पूर्व में एक बड़े तालाब के किनारे वृक्षों के बीच में अच्छी अवस्था में मौजूद है, पहुंचे और हाथ में पानी ले आपसी प्रतिशोध को भुला तहसीलदार के मुकाबले के लिए प्रतिज्ञा की । मन्दिर से दोनों हाथ में हाथ डाले भरे बाजार से चौपाल की तरफ चले । दोनों दुश्मनों को एक हुआ तथा हाथ में हाथ डाले जाते देख गांव वालों के मन आशंका से भर उठे और कहा "आज भूरा निघांईया एक हो गये, भलार (भलाई) नहीं है ।" उधर तहसीलदार साहब सब चौधरियों के साफे सिरों से उतरवा उन्हें धमका रहे थे और भूरा तथा निघांईया को फौरन हाजिर करने के लिए जोर दे रहे थे । चौकीदार ने रास्ते में ही सब हाल कहा और तहसीलदार साहब का जल्दी चौपाल में पहुंचने का आदेश भी कह सुनाया । चौपाल में चढ़ते ही निघांईया नम्बरदार ने तहसीलदार साहब को ललकार कर कहा, "हाकिम साहब, साफे मर्दों के बंधे हैं, पेड़ के खुंडों (स्तूनों) पर नहीं, जब जिसका जी चाहा उतार लिया ।" तहसीलदार बाघ की तरह गुर्राया । दोनों ओर से विवाद बढ़ा । आक्रमण, प्रत्याक्रमण में कई जन काम आये । छूट, छुटा करने के लिए कुछ आदमियों को बीच में आया देख भयभीत तहसीलदार प्राण रक्षा के लिए चौपाल से कूद पड़ौस के एक कच्चे घर में जा घुसा । वह घर बालम कालिया जाट का था । भूरा, निघांईया और उनके साथियों ने घर का द्वार जा घेरा । घर को घिरा देख तहसीलदार साहब बुखारी में घुसे । बालम कालिया के पुत्र ने तहसीलदार साहब पर भाले से वार किया, पर उसका वार खाली गया । पुत्र के वार को खाली जाता देख बालम कालिया साँप की तरह फुफकार उठा और पुत्र को लक्ष्य करके कहने लगा–
जो जन्मा इस कालरी, मर्द बड़ा हड़खाया ।तेरे तैं यो कारज ना सध, तू बेड़वे का जाया ॥
अर्थात् - जो इस लजवाने की धरती में पैदा होता है, वह मर्द बड़ा मर्दाना होता है । उसका वार कभी खाली नहीं जाता । तुझसे तहसीलदार का अन्त न होगा क्योंकि तेरा जन्म यहां नहीं हुआ, तू बेड़वे में पैदा हुआ था । (बेड़वा लजवाना गांव से दश मील दक्षिण और कस्बा महम से पाँच मील उत्तर में है । अकाल के समय लजवाना के कुछ किसान भागकर बेड़वे आ रहे थे, यहीं पर बालम कालिए के उपरोक्त पुत्र ने जन्म ग्रहण किया था )।
भाई को पिता द्वारा ताना देते देख बालम कालिए की युवति कन्या ने तहसीलदार साहब को पकड़कर बाहर खींचकर बल्लम से मार डाला ।
मातहतों द्वारा जब तहसीलदार के मारे जाने का समाचार महाराजा जीन्द को मिला तो उन्होंने "लजवाना" गाँव को तोड़ने का हुक्म अपने फौज को दिया । उधर भूरा-निघांईया को भी महाराजा द्वारा गाँव तोड़े जाने की खबर मिल चुकी थी । उन्होंने राज-सैन्य से टक्कर लेने के लिए सब प्रबन्ध कर लिये थे । स्*त्री-बच्चों को गांव से बाहर रिश्तेदारियों में भेज दिया गया । बूढ़ों की सलाह से गाँव में मोर्चे-बन्दी कायम की गई । इलाके की पंचायतों को सहायता के लिए चिट्ठी भेज दी गई । वट-वृक्षों के साथ लोहे के कढ़ाये बांध दिये गए जिससे उन कढ़ाओं में बैठकर तोपची अपना बचाव कर सकें और राजा की फौज को नजदीक न आने दें । इलाके के सब गोलन्दाज लजवाने में आ इकट्ठे हुए । महाराजा जीन्द की फौज और भूरा-निघांईया की सरदारी में देहात निवासियों की यह लड़ाई छः महीने चली । ब्रिटिश इलाके के प्रमुख चौधरी दिन में अपने-अपने गांवों में जाते, सरकारी काम-काज से निबटते और रात को लजवाने में आ इकट्ठे होते । अगले दिन होने वाली लड़ाई के लिए सोच विचार कर प्रोग्राम तय करते । गठवालों के चौधरी रोज झोटे में भरकर गोला बारूद भेजते थे । राजा की शिकायत पर अंग्रेजी सरकार ने वह भैंसा पकड़ लिया ।
जब महाराजा जीन्द (सरदार स्वरूपसिंह) किसी भी तरह विद्रोहियों पर काबू न पा सके तो उन्होंने ब्रिटिश फौज को सहायता के लिए बुलाया । ब्रिटिश प्रभुओं का उस समय देश पर ऐसा आतंक छाया हुआ था कि तोपों के गोलों की मार से लजवाना चन्द दिनों में धराशायी कर दिया गया । भूरा-निघांईया भाग कर रोहतक जिले के अपने गोत्र बन्धुओं के गाँव चिड़ी[[1]] में आ छिपे । उनके भाइयों ने उन्हें तीन सौ साठ के चौधरी श्री दादा गिरधर के पास आहूलाणाभेजा । (जिला रोहतक की गोहानातहसील में गोहाना से तीन मील पश्चिम में गठवालागौत के जाटों का प्रमुख गांव आहूलाणा है। गठवालों के हरयाणा प्रदेश में 360 गांव हैं । कई पीढ़ियों से इनकी चौधर आहूलाणा में चली आती है । अपने प्रमुख को ये लोग "दादा" की उपाधि से विभूषित करते हैं । इस वंश के प्रमुखों ने कभी कलानौर की नवाबी के विरुद्ध युद्ध जीता था । स्वयं चौधरी गिरधर ने ब्रिटिश इलाके का जेलदार होते हुए भी लजवाने की लड़ाई तथा सन् 1857 के संग्राम में प्रमुख भाग लिया था) ।
जब ब्रिटिश रेजिडेंट का दबाव पड़ा तो डिप्टी कमिश्नर रोहतक ने चौ. गिरधर को मजबूर किया कि वे भूरा-निघांईया को महाराजा जीन्द के समक्ष उपस्थित करें । निदान भूरा-निघांईया को साथ ले सारे इलाके के मुखियों के साथ चौ. गिरधर जीन्द राज्य के प्रसिद्ध गांव कालवा (जहां महाराजा जीन्द कैम्प डाले पड़े थे), पहुंचे तथा राजा से यह वायदा लेकर कि भूरा-निघांईया को माफ कर दिया जावेगा, महाराजा जीन्द ने गिरधर से कहा - मर्द दी जबान, गाड़ी दा पहिया, टुरदा चंगा होवे है"। दोनों को राजा के रूबरू पेश कर दिया गया । माफी मांगने व अच्छे आचरण का विश्वास दिलाने के कारण राजा उन्हें छोड़ना चाहता था, पर ब्रिटिश रेजिडेंट के दबाव के कारण राजा ने दोनों नम्बरदारों (भूरा व निघांईया) को फांसी पर लटका दिया ।
दोनों नम्बरदारों को 1856 के अन्त में फांसी पर लटकवा कर राजा ने ग्राम निवासियों को ग्राम छोड़ने की आज्ञा दी । लोगों ने लजवाना खाली कर दिया और चारों दिशाओं में छोटे-छोटे गांव बसा लिए जो आज भी "सात लजवाने" के नाम से प्रसिद्ध हैं । मुख्य लजवाना से एक मील उत्तर-पश्चिम में "भूरा" के कुटुम्बियों ने "चुडाली" नामक गांव बसाया । भूरा के बेटे का नाम मेघराज था ।
मुख्य लजवाना ग्राम से ठेठ उत्तर में एक मील पर निघांईया नम्बरदार के वंशधरों ने "मेहरड़ा" नामक गांव बसाया ।
जिस समय कालवे गांव में भूरा-निघांईया महाराजा जीन्द के सामने हाजिर किये गए थे, तब महाराजा साहब ने दोनों चौधरियों से पूछा था कि "क्या तुम्हें हमारे खिलाफ लड़ने से किसी ने रोका नहीं था ?" निघांईया ने उत्तर दिया - मेरे बड़े बेटे ने रोका था । सूरजभान उसका नाम था । राजा ने निघांईया की नम्बरदारी उसके बेटे को सौंप दी । अभी दो साल पहले निघांईया के पोते दिवाना नम्बरदार ने नम्बरदारी से इस्तीफा दिया है । इसी निघांईया नम्बरदार के छोटे पुत्र की तीसरी पीढ़ी में चौ. हरीराम थे जो रोहतक के दस्युराज 'दीपा' द्वारा मारे गए । इन्हीं हरीराम के पुत्र दस्युराज हेमराज उर्फ 'हेमा' को (जिसके कारण हरयाणे की जनता को पुलिस अत्याचारों का शिकार होना पड़ा था और जिनकी चर्चा पंजाब विधान सभा, पंजाब विधान परिषद और भारतीय संसद तक में हुई थी), विद्रोहात्मक प्रवृत्तियाँ वंश परम्परा से मिली थीं और वे उनके जीवन के साथ ही समाप्त हुईं ।
लजवाने को उजाड़ महाराजा जीन्द (जीन्द शहर) में रहने लगे । पर पंचायत के सामने जो वायदा उन्होंने किया था उसे वे पूरा न कर सके, इसलिए बड़े बेचैन रहने लगे । ज्योतिषियों ने उन्हें बताया कि भूरा-निघांईया के प्रेत आप पर छाये रहते हैं । निदान परेशान महाराजा ने जीन्द छोड़ संगरूर में नई राजधानी जा बसाई । स्वतंत्रता के बाद 1947 में सरदार पटेल ने रियासतें समाप्त कर दीं । महाराजा जीन्द के प्रपौत्र जीन्द शहर से चन्द मील दूर भैंस पालते हैं और दूध की डेरी खोले हुए हैं । समय बड़ा बलवान है । सौ साल पहले जो लड़े थे, उन सभी के वंश नामशेष होने जा रहे हैं । समय ने राव, रंक सब बराबर कर दिये हैं । समय जो न कर दे वही थोड़ा है । समय की महिमा निराली है ।
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हरयाणा का स्वातन्त्र्य संग्राम
लेखक - स्वामी ओमानन्द सरस्वती (आचार्य भगवान् देव)
(पृष्ठ - 112-150)
दिल्ली के चारों ओर डेढ़ सौ - डेढ़ सौ मील की दूरी तक का प्रदेश हरयाणा प्रान्त कहलाता है । सारे प्रान्त में जाट, अहीर, गूजर, राजपूत आदि योद्धा (जुझारू) जातियां बसती हैं । इसीलिये हरयाणा ने इस युद्ध में सब प्रान्तों से बढ़-चढ़कर भाग लिया था । इसी प्रान्त के एक भाग मेरठ में यह क्रान्ति की चिन्गारी सब से पहले सुलगी और शनैः-शनैः सारे भारत में फैल गई । इस स्वतन्त्रता के युद्ध के शान्त होने पर हरयाणा प्रान्त की जनता पर जो भीषण अत्याचार अंग्रेजों ने किए उनको स्मरण करने से वज्रहृदय भी मोम हो जाता है । कोटपुतली जयपुर राज्य के ठिकाने खेवड़ी के राजा को दे दिया । इसी के फलस्वरूप अंग्रेजों ने इस प्रान्त को अनेक भागों में विभाजित करके इस वीर प्रान्त की संगठन शक्ति को चूर-चूर कर दिया । मेरठ, आगरा, सहारनपुर आदि इसके भाग उत्तर-प्रदेश में मिला दिये । भरतपुर, अलवर आदि राजस्थान में मिला दिये । कुछ भाग को दिल्ली प्रान्त का नाम देकर के पृथक कर दिया । नारनौल को पटियाला राज्य, बावल को नाभा और दादरी-नरवाना को जीन्द स्टेट, जो फुलकिया राज्य कहलाते हैं, उन में मिला दिया जो झज्जर प्रान्त के भाग थे । शेष गुड़गावां, रोहतक, हिसार, करनाल आदि को पंजाब में मिला दिया । इस प्रकार हरयाणा की वीर-भूमि को खण्डशः करके नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ।
हरयाणा के एक एक ग्राम ने बड़ी वीरता से अंग्रेज के साथ युद्ध किया है, आज उन सब का इतिहास नहीं मिलता । आज तक सन् 57 के क्रान्तियुद्ध में भाग लेने वाले अनेक ग्रामों के वीर भूमिहीन कृषक के रूप में अपने कष्टपूर्ण दिन काट रहे हैं । जैसे लिबासपुर, कुण्डली, भालगढ़, खामपुर, अलीपुर, हमीदपुर, सराय इत्यादि जी. टी. रोड, जो दिल्ली से लाहौर की ओर जाता है, उस पर बसते हैं । कुछ ग्रामों के विषय में संक्षेप से लिखता हूं ।
लिबासपुरका बलिदान
जी० टी० रोड में से एक टुकड़ा सड़क का सोनीपतको जाता है, उसी स्थान पर यह गाँव बसा हुआ है । उस समय से अब तक इसमें जाटकुल क्षत्रिय बसते हैं । क्रांतियुद्ध के समय उदमी राम नाम का एक वीर युवक इसी ग्राम का निवासी था, जो अंग्रेज सैनिक दिल्ली से भागकर इधर से जते थे, यह उनके साथ युद्ध करता था । इसने अपने 22 वीर योद्धाओं का एक संगठन बना रखा था, जो अत्यन्त वीर, स्वस्थ, सुन्दर, सुदृढ़ शरीर वाले युवक थे । अतः उस सड़क पर से गुजरने वाले अंग्रेज सैनिकों को चुन-चुन कर मारते थे और सब को समाप्त कर देते थे । एक दिन एक अंग्रेज अपने धर्मपत्नी सहित ऊंटकराची में जी० टी० रोड पर देहली से पानीपत को जा रहा था । जब वह लिबासपुरके निकट आया तो इन वीरों ने उसे पकड़ लिया और अंग्रेज को तो उसी समय मार दिया, किन्तु भारतीय सभ्यता के अनुसार उस अंग्रेज औरत को नहीं मारा । ग्राम के कुछ दुष्ट प्रकृति के लोगों ने उस अंग्रेज स्त्री को गांव के चारों ओर मई की धूप में चक्कर लगवाया और खलिहान (पैर) में बैलों का गांहटा भी हंकवाया । इस प्रकार की घटनाओं को कुछ इतिहास लेखक झूठी और अंग्रेजों की घड़ी हुई बतलाते हैं । हरयाणा के ही नहीं, बल्कि सभी भारतीयों ने अंग्रेजी देवियों और बच्चों पर कहीं अत्याचार नहीं किए । सायंकाल भालगढ़में रहने वाली बाई जी (ब्राह्मणी) को उस अंग्रेज स्त्री की देखभाल के लिए सौंप दिया । उसे समुचित भोजन वस्त्रादि देकर सेवा की । इस घटना के समाचार आस पास के सभी ग्रामों में फैल गये । कितने ही बाहर के ग्रामों के लोग समाचार जानने के लिए लिबासपुर आये । इनमें राठधना निवासी सीताराम भी था । उसने ग्राम में आकर सब वृत्त को जानने का विशेष यत्न किया और भालगढ़ ग्राम में बाई जी के पास, जहां वह अंग्रेज स्त्री ठहरी थी, उसके पास भी पहुंच गया । उस अंग्रेज स्त्री को इन्होंने बता दिया कि लिबासपुर के उदमीराम, गुलाब, जसराम, रामजस, रतिया आदि ने बहुत से अंग्रेजों को मृत्यु के घाट उतारा है और तुझे भी मारने का षड्यंत्र कर रहे हैं । सीताराम और बाई जी ने उस अंग्रेज महिला के साथ गुप्त मन्त्रणा की । उस अंग्रेज देवी ने इन्हें अनेक प्रकार के वचन दिये और प्रलोभन दिया कि यदि आप मुझे रातों रात पानीपतके सुरक्षित स्थान पर जहां अंग्रेजों का कैंप है, पहुंचा दो तो बहुत सारी सम्पत्ति मैं दोनों को दिलवाऊंगी । उन दोनों ने सवारी का प्रबन्ध करके उसे पानीपत में अंग्रेजों के कैम्प में पहुंचा दिया । युद्ध शान्त होने पर क्रांतियुद्ध के समय की कई रिपोर्टों के आधार पर अंग्रेजों ने लोगों को दण्ड और पारितोषिक देना आरम्भ किया और अपने निश्चित कार्यक्रम के अनुसार एक दिन अंग्रेज सेना ने प्रातःकाल चार बजे लिबासपुर ग्राम को चारों ओर से घेर लिया । उदमी, जसराम, रामजस, सहजराम, रतिया आदि वीर योद्धाओं ने अपने साधारण शस्त्र जेली, तलवार, गण्डासे, लाठियां और बल्लम संभाले, किन्तु ये गिने चुने वीर साधारण शस्त्रों के एक बहुत बड़ी अंग्रेज सेना के साथ जो आधुनिक शस्त्रों से सुसज्जित थी, कब तक युद्ध कर सकते थे ? बहुत से मारे गए और शेष सब गिरफ्तार कर लिए गए । गिरफ्तार हुए व्यक्तियों की पहचान के लिए देश-द्रोही बाई जी और सीताराम को बुलाया गया । उन्होंने जिन जिन व्यक्तियों को बताया कि इन्होंने अंग्रेज मारे हैं, गिरफ्तार कर लिए गए । सारे ग्राम को बुरी प्रकार से लूटा गया । तीस पैंतीस बैलगाड़ियां गांव के तमाम धन-धान्य, मूल्यवान सामान से भर कर देहली भेज दीं गईं । ग्राम की सब स्त्रियों के आभूषण बलपूर्वक छीन लिए गए । किसी व्यक्ति के पास कुछ भी न रहने दिया । शेष गांव के निवासी मृत्यु के भय से गांव छोड़कर भाग गये और जीन्द राज्य के रामकली ग्राम, झज्जरतहसील के खेड़काग्राम में और सोनीपत तहसील के कल्याणाऔर रत्नगढ़ ग्राम में जाकर बस गये । ये लोग इन ग्रामों में तीन वर्ष तक बसे रहे । जब तीन वर्ष के पश्चात् पूर्ण शान्ति हो गई, लौटकर अपने ग्राम में आये । ग्राम तीन वर्ष तक सर्वथा उजड़ा हुआ (निर्जन) पड़ा रहा । शान्ति होने पर सीताराम ने अपने सम्बन्धियों को मुरथल से तथा अन्य स्थानों से लाकर उस में बसा दिया और लिबासपुर का निवासी लिखवा दिया । उसने इस प्रकार की धूर्तता की । सीताराम ने इस ग्राम के कागजात में अपना नाम लिखवा दिया और लिबासपुर ग्राम को खरीदा हुआ बताया और कागजी कार्यवाही पूरी कर दी । तभी से लिबासपुर ग्राम सीताराम के बेटे पोतों की अध्यक्षता में है और कागजात में भी इसी प्रकार लिखा हुआ है ।
Libaspur
ग्राम के यथार्थ निवासी भूमिहीन (मजारे) के रूप में चले आ रहे हैं । गांव का कोई भी व्यक्ति एक बीघे जमीन का भी (बिश्वेदार) स्वामी नहीं है । ग्रामवासियों ने जो कष्ट सहन किये उनका लिखना सामर्थ्य से बाहर है । इन कष्टों को तो वे ही जानते हैं जिन्होंने उन्हें सहर्ष सहन किया है । जिन व्यक्तियों को गिरफ्तार किया था उन्हें राई के सरकारी पड़ाव में ले जाकर सड़क पर लिटाकर भारी पत्थर के कोल्हूओं के नीचे डालकर पीस दिया गया । उन कोल्हुओं में से एक कोल्हू का पत्थर अब भी 23वें मील के दूसरे फर्लांग पर पड़ा हुआ है ।
Libaspur-2
वीर योद्धा उदमीरामको पड़ाव के पीपल के वृक्ष पर बांधकर हाथों में लोहे की कीलें गाड़ दीं गईं, उनको भूखा-प्यासा रक्खा गया । पीने को जल मांगा तो जबरदस्ती उसके मुख में पेशाब डाला गया । अंग्रेजों का सख्त पहरा लगा दिया गया । भारत मां का यह सच्चा सपूत 35 दिन तक इसी प्रकार बंधा हुआ तड़फता रहा । इस वीर ने अपने प्राणों की आहुति देकर सदा के लिए हरयाणा प्रान्त और अपने गांव का नाम अमर कर दिया । उसके शव को भी अंग्रेजों ने कहीं छिपा दिया ।
जो व्यक्ति अंग्रेजों के अत्याचार के कारण हुतात्मा (शहीद) हुए उनके सम्बन्धियों की पीढ़ी (कुल) इस प्रकार है –
लिबासपुर के शहीदों की वंशावली - देखिये ऊपर वाले चित्र -
यह लेख लिखने में श्री बलवीरप्रसाद चतुर्वेदी मुख्याध्यापक "संस्कृत हाई स्कूल लिबासपुर" बहालगढ़ से मुझे पूरी सहायता मिली । यह सामग्री एक प्रकार से आप ने ही इकट्ठी करके दी है । इसके लिए मैं आपका आभारी हूं । जब मैं आपके पास पहुंचा तो आपने तुरन्त स्कूल के सब कार्य छोड़कर मुझे यह लेख लिखने के लिए सामग्री लाकर दी और श्री भगवानसिंह आर्य भी लिबासपुर बुलाने से तुरन्त उसी समय आ गये । यह स्कूल पं. मनसाराम जी आर्य जाखौलीनिवासी ने खोला हुआ है जहाँ बैठकर मैंने यह सामग्री एकत्रित की । आपका सारा जीवन आर्यसमाज के प्रचार में बीता है ।
मुरथल का बलिदान
मुरथलग्रामवासियों ने भी इसी प्रकार अत्याचारी अंग्रेजों के मारने में वीरता दिखाई थी । अंग्रेज शान्ति होने पर मुरथल ग्राम को भी इसी प्रकार का दण्ड देना चाहते थे । किन्तु नवलसिंह नम्बरदार मुरथल निवासी अंग्रेज सेना को मार्ग में मिल गया । अंग्रेज सेना ने उससे पूछा कि मुरथल ग्राम कहाँ है? तो नम्बरदार ने बताया कि आप उस गांव को तो बहुत पीछे छोड़ आये हैं । उस समय अंग्रेज सेना ने पीछे लौटना उचित न समझा और यह बात नम्बरदार की चतुराई से सदा के लिए टल गई । देशद्रोही सीताराम को इनाम के रूप में लिबासपुर ग्राम सदा के लिए दे दिया और उस बाई जी (ब्राह्मणी) को बहालगढ़ गांव दे दिया । आज भी इन दोनों ग्रामों के निवासी भूमिहीन (मजारे) कृषक के रूप में अपने दिन कष्ट से बिता रहे हैं । देश को स्वतन्त्र हुए 38 वर्ष हो गए किन्तु इनको कोई भी सुविधा हमारी सरकार ने नहीं दी । इनके पितरों (बुजुर्गों) ने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपने सर्वस्व का बलिदान दिया । किन्तु किसी प्रकार का पारितोषिक तो इनको देना दूर रहा, इनकी भूमि भी आज तक इनको नहीं लौटाई गई । सन् 1957 में स्वतन्त्रता के प्रथम युद्ध की शताब्दी मनाई गई, किन्तु देशभक्त ग्रामों को पारितोषिक व प्रोत्साहन तो देना दूर रहा, किसी राज्य के बड़े अधिकारी ने धैर्य व सान्त्वना भी नहीं दी । मेरे जैसे भिक्षु के पास देने को क्या रखा है, यह दो चार पंक्तियां इन देशभक्तों के लिए श्रद्धांजलि के रूप में इस बलिदानांक में लिख दी हैं । इस प्रकार के सभी देशभक्त ग्रामों के लिए यही श्रद्धा के पुष्प भेंट हैं ।
कुण्डली का बलिदान
सूबा देहली में नरेला के आस-पास लवौरकगोत्र के जाटकुल क्षत्रियों के दस बारह ग्राम बसे हुए हैं । उनमें से ही यह कुण्डलीग्राम सोनीपतजिले में जी. टी. रोड पर है । इस ग्राम के निवासियों ने भी सन् 1857 के स्वतन्त्रता युद्ध में बढ़ चढ़ कर भाग लिया था । यहां के वीर योद्धाओं ने भी इसी प्रकार अत्याचारी भागने वाले अंग्रेज सैनिकों का वध किया था ।
एक अंग्रेज परिवार ऊँटकराची में बैठा हुआ इस गांव के पास से सड़क पर जा रहा था । वे चार व्यक्ति थे, एक स्वयं, दो उसके पुत्र और एक उसकी धर्मपत्नी । जब वे चारों इस ग्राम के पास आए तो गांव के लोगों ने उँटकराची को पकड़ लिया । ऊँट को भगा दिया और कराची को एक दर्जी के बगड़ में बिटोड़े में रखकर भस्मसात् कर दिया । उस अंग्रेज और उसके दोनों लड़को को मार दिया । उस देवी को भारतीय सभ्यता के अनुसार कुछ नहीं कहा । उसे समुचित भोजनादि की व्यवस्था करके गांव में सुरक्षित रख लिया । जब युद्ध की समाप्ति पर शान्ति हुई तो एक अंग्रेज नरेलाके पास पलाश-वन में, जो कुण्डली से मिला हुआ है, शिकार खेलने के लिए आया । उसकी बन्दूक के शब्द को सुनकर अंग्रेज स्त्री आंख बचाकर उसके पास पहुंच गई और उसने अपने परिवार के नष्ट होने की सारी कष्ट-कहानी उसको सुना दी । वह उसे अपने साथ लेकर तुरन्त देहली पहुंच गया । एक किंवदन्ती यह भी है कि उस कराची में 80 हजार का माल था जो उस ग्राम वालों ने लूट लिया । अंग्रेज आदि उस समय कोई कत्ल नहीं किया । वह माल लूटकर इस भय से कभी तलाशी न हो, नरेला भेज दिया गया । कुण्डली ग्राम के कुछ निवासी इस घटना को असत्य भी बताते हैं । कुछ भी हो, इस ग्राम को दण्ड देने के लिए एक दिन प्रातः चार बजे अंग्रेजी सेना ने आकर घेर लिया ।
ग्राम के वस्त्र, आभूषण, पशु इत्यादि सब अंग्रेजी सेना ने लूट लिये और सारे पशु इत्यादि को अलीपुर ले जाकर नीलाम कर दिया । स्त्रियों के आभूषण बलपूर्वक उतारे गये, यहां तक कि भूमि खोद-खोद कर गड़ा हुआ धन भी निकाल लिया गया । बहुत से व्यक्ति तो जो भागने में समर्थ थे, ग्राम को छोड़कर भाग गए । ग्राम के कुछ मुख्य-मुख्य आदमी जो भागे नहीं थे, गिरफ्तार कर लिए गए । कुछ व्यक्ति ग्राम के सर्वनाश का एक कारण और भी बताते हैं । जब अत्याचारी मिटकाफजो काणा साहब के नाम से प्रसिद्ध था और हरयाणा के वीर ग्रामों को दण्ड देता और आग लगाता हुआ फिर रहा था, वह नांगलकी ओर से आया तो कुछ व्यक्ति उसके स्वागत के लिए दूध इत्यादि लेकर नांगल की ओर चले गए । वे मार्ग में ही इसका स्वागत करके अपने गांव को बचाना चाहते थे । किन्तु उस दिन मिटकाफ ने दूसरे किसी ग्राम का प्रोग्राम नांगल, जाखौली इत्यादि का बना लिया । कुण्डली वाले विवश हो लौट आये । जिस समय यह लौट रहे थे, तो अंग्रेजी सरकार की चौकी पर मालिम नाम का व्यक्ति रहता था । उसने ग्रामवासियों से दूध मांगा कि यह दूध मुझे दे जाओ, किन्तु चौधरी सुरताराम जो कठोर प्रकृति के थे, उसे यह कहकर धमका दिया कि तेरे जैसे तीन सौ फिरते हैं, तेरे लिए यह दूध नहीं है । उस व्यक्ति ने कहा - अच्छा, मुझे भी उन तीन सौ में से एक गिन लेना, समय पड़ने पर मैं भी आप लोगों को देखूंगा । उसी व्यक्ति ने मिटकाफ साहब को सूचना दी कि अंग्रेजों को कुण्डली ग्राम वालों ने मारा है । और अंग्रेज अपनी सेना लेकर ग्राम पर चढ़ आये । निम्नलिखित व्यक्तियों को गिरफ्तार किया –
1- श्री सुरताराम जी, 2- उनक पुत्र जवाहरा, 3- बाजा नम्बरदार 4- पृथीराम 5- मुखराम 6- राधे 7- जयमल । कुछ व्यक्ति जो और भी गिरफ्तार हुए थे, उनके नाम किसी को याद नहीं । यह लोकश्रुति है कि 14 व्यक्ति गिरफ्तार किए गए थे - ग्यारह को दण्ड दिया गया और तीन को छोड़ दिया गया । इनमें से 8 को एक-एक वर्ष का कारागृह का दण्ड मिला । तीन को अर्थात् सुरताराम, उनके पुत्र जवाहरा तथा बाजा नम्बरदार को आजन्म काले पानी का दण्ड दिया गया । इनको अण्डमान द्वीप (कालेपानी में) भेज दिया गया । वहां पर चक्की, कोल्हू, बेड़ी इत्यादि भयंकर दण्ड देकर खूब अत्याचार ढ़ाये गये । अतः ये तीनों वीर अपने देश की स्वतन्त्रता के लिए बलिवेदी पर चढ़ गये, इनमें से कोई लौटकर नहीं आया । इसके विषय में लोगों ने बताया कि जब इनको गिरफ्तार करके ले जाने लगे तो बाजा नम्बरदार ने सुरता नम्बरदार को कहा - यह ग्राम सुख से बसे, हम तो लौटकर आते नहीं । सुरता ने कहा - बाजिया, तू तो यों ही घबराता है, मेरे माथे में मणि है (अर्थात् मैं भाग्यवान् हूं), हम अलीपुर व देहली से ही छूटकर अवश्य घर लौट आयेंगे, हमारा दोष ही क्या है ? बात यथार्थ में यह है कि अंग्रेजों ने खूब यत्न किया । इस ग्राम के द्वारा अंग्रेजों के कत्ल के अभियोग को सिद्ध नहीं क्या जा सका । सुरता की बात सुनकर बाजा ने कहा - जिनके ढोर, पशुधन आदि ही नहीं रहा, वह लौटकर कैसे आयेगा ? हुआ भी ऐसा ही । ये तीनों बहीं पर समाप्त हो गए । जो इस ग्राम के वीर स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर चढ़े, उन की पीढ़ियां निम्न प्रकार से हैं -
Kundali Martyrs
कुंडली के शहीदों की वंशावली
आजकल कुंडली ग्राम के स्वामी सोनीपत निवासी ऋषिप्रकाश आदि हैं, यह ग्राम उनको किस प्रकार मिला, इसके विषय में यह किंवदन्ती है कि सोनीपत निवासी मामूलसिंह नाम का ब्राह्मण (मोहर्रिर) लेखक था । सड़क पर एक आदमी की लाश पड़ी थी । कोई यह कहता है कि वह किसी अनाथ का ही शव था । उसके ऊपर वस्त्र डालकर उसके पास बैठकर मामूलसिंह रोने लगा । जब उसके पास से कुछ अंग्रेज गुजरे तो कहने लगा - यह मेरा आदमी आप लोगों की सेवा में मर गया । इसी के फलस्वरूप अंग्रेजों ने प्रसन्न होकर उसे पहले तो खामपुर ग्राम पारितोषिक के रूप में दिया था किन्तु पीछे कुण्डली ग्राम का स्वामी बना दिया । जिस समय नोटिश (विज्ञापन) लगाया गया था कि यह गांव तीन वर्ष के लिए जब्त किया जा रहा है और मामूलसिंह को दिया जा रहा है, ग्राम वालों का कहना है कि उस समय उसने अपनी चालाकी, दबाव अथवा लोभ से दबा और सिखाकर सदा के लिए अपने नाम लिखा लिया । ग्राम के लोगों ने अनेक बार मुकदमा भी लड़ा और कलकत्ते तक भाग दौड़ भी की, किन्तु नकल ही नहीं मिली । मुकदमे में यह झूठ बोल दिया गया कि यह ग्राम मेरे बाप दादा का है, हमारी यह पैतृक सम्पत्ति है । इसीलिए आज तक भी मामूलसिंह के व्यक्ति इस ग्राम के स्वामी हैं और गांव के देशभक्त कृषक जो ग्राम के निवासी और स्वामी हैं, भूमिहीन (मजारे) के रूप में अनेक प्रकार से कष्ट सहकर अपने दिन काट रहे हैं । मामूलसिंह के बेटे पोतों ने इस ग्राम को खूब तंग किया । अनेक प्रकार के पूछी आदि टैक्स लगाये, चौपाल तक नहीं बनाने दी । ग्रामवासियों ने भी खूब संघर्ष किया । अनेक बार जेल में गये । अन्त में चौपाल तो बनाकर ही छोड़ी । श्री रत्नदेव जी आर्य, जो सुरता और जवाहरा के परिवार में से हैं, इन्होंने ग्राम पर होने वाले अत्याचारों को दूर करने के लिए संघर्षों में नेतृत्व किया और खूब सेवा की । इस ग्राम के निवासी प्रायः सभी उत्साही हैं । अंग्रेजी राज्य के रहते इस ग्राम के पढ़े लिखे को किसी भी सरकारी नौकरी में नहीं लिया गया । सभी प्रकार के कष्ट यह लोग सहते रहे और यह आशा लगाये बैठे थे कि जब देश स्वतन्त्र होगा तब हमारे कष्ट दूर हो जायेंगे । जब सन् 47 में 15 अगस्त को देश को स्वतन्त्रता मिली और लाल किले पर तिरंगा झण्डा फहराया गया उस समय यह गांव बड़े हर्ष में मग्न था कि अब हमारे भी सुदिन आ गये हैं । किन्तु आज देश को स्वतन्त्र हुए 38 वर्ष हो चुके हैं, यहां के ग्रामवासी पहले से भी अधिक दुःखी हैं । हमारे राष्ट्र के कर्णधारों व राज्याधिकारियों का इनके कष्टों की ओर कोई ध्यान नहीं । भगवान् ही इनके कष्टों को दूर करेगा । कुण्डली ग्राम के निवासी वृद्ध जीतराम जी जिनकी आयु 85 वर्ष है, तथा सुरता और जवाहरा के परिवार के श्री महाशय रत्नदेव जी और उनके बड़े भाई आशाराम जी ने इस ग्राम के इतिहास की सामग्री इकट्ठी करने में मुझे पूरा सहयोग दिया है, इन सबका मैं आभारी हूँ ।
खामपुर, अलीपुर, हमीदपुर, सराय आदि अनेक ग्राम हैं जिन्होंने सन् 1857 के युद्ध में बड़ी वीरता से अपने कर्त्तव्य का पालन किया था । जब कभी मुझे समय मिला, मेरी इच्छा है मैं हरयाणा का एक बहुत बड़ा इतिहास लिखूं, तब इनके विषय में विस्तार से लिखूंगा । खामपुर आदि ग्राम भी जब्त कर लिए गए थे । ग्राम खामपुर दिल्ली निवासी एक ब्राह्मण लछमनसिंह के बाप दादा को दिया गया था । आज भी वह परिवार उस ग्राम का स्वामी है । खामपुर ग्राम के जाट जो निवासी थे वे भाग गये थे, वह खेड़े आदि अन्य ग्रामों में बसते हैं । इस ग्राम में तो अन्य मजदूरी करने वाले लोग बसते हैं । अलीपुर ग्राम के आदमियों को भी लिबासपुर के निवासियों के समान सड़क पर डालकर कोल्हू से पीस दिया गया था और अलीपुर ग्राम को बुरी तरह लूटकर जलाकर राख कर दिया गया था । अलीपुर ग्राम को जब्त करके दिल्ली के कुछ देशद्रोही मुसलमानों को दे दिया गया था । उन मुसलमानों के परिवार ने जो इस ग्राम के स्वामी थे, चरित्र संबन्धी गड़बड़ कुण्डली ग्राम में आकर की । कुंडली ग्राम के दलितों ने इन पापियों के ऊपर अभियोग चलाया और उसी अभियोग में विवश होकर वह अलीपुर ग्राम मुसलमानों को जाटों के हाथ बेचना पड़ा । हमीदपुर ग्राम भी जब्त करके मुसलमानों को दिया गया था । इसी प्रकार ही ऐसे देशभक्त ग्रामों को जब्त करके देशद्रोहियों को दे दिया गया था । इसके विषय में विस्तार से कभी समय मिलने पर लिखूंगा ।
अलीपुर ग्राम की घटना जो माननीय वयोवृद्ध पं० बस्तीराम जी आर्योपदेशक के मुखारविन्द से सुनी, निम्न प्रकार से है ।
अलीपुरकी घटना
अलीपुर की घटना - मानेलुक नाम का एक अंग्रेज घोड़े पर सवार अलीपुर ग्राम से जा रहा था । वह प्यास से अत्यन्त व्याकुल था । उसने एक किसान को, जो सड़क के पास ही अपने खलिहान (पैर) में गाहटा चला रहा था, संकेत से जल पीने को मांगा । किसान को दया आई और वह घड़े में से जल लेने के लिए गाहटा छोड़कर चल दिया किन्तु उस समय घड़े में जल न मिला । विवश होकर किसान अपने घड़े को उठाकर कुएं पर जल भरने को चला गया । किसान के इस सहानुभूति पूर्ण व्यवहार को देखकर अंग्रेज विचारने लगा इस व्यक्ति ने मेरे लिए अपना काम भी छोड़ दिया । वह अंग्रेज उसके खलिहान में आ गया और घोड़े से उतर कर, यह समझ कर कि किसान के कार्य में हानि न हो, उसमें घुस गया और बैलों को हांकना प्रारम्भ कर दिया और अपना घोड़ा पास के किसी वृक्ष से बांध दिया । उसी समय एक दूसरा अंग्रेज घुडसवार, जिसका नाम गिलब्रट था, उसी सड़क से जा रहा था । उसने यह समझा कि मानेलुक से बलपूर्वक गाहटा हंकवाया जा रहा है और वह शीघ्रता से वहां से भागकर चला गया और अपने डायरी में अलीपुर ग्राम के विषय में अंग्रेजों पर अत्याचार करने के लिए नोट लिख दिया, अर्थात् अलीपुर पर अत्याचार का आरोप लगाया । वह गिलब्रट नाम का अंग्रेज जो वहां से भय के मारे शीघ्रता से भाग गया, उसने भय के कारण सत्यता का अन्वेषण भी नहीं किया । इधर जब किसान जल का घड़ा भरकर लाया तो अंग्रेज गाहटे में खड़ा था और बैल उससे बिधक कर (डरकर) भाग गये थे । किसान ने अंग्रेज को सहानुभूतिपूर्ण शब्दों में कहा - आपने ऐसा कष्ट क्यों किया ? उस किसान ने मानेलुक अंग्रेज के कपड़े झाड़े, धूल साफ की, जल पिलाया और रोटी भी खिलाई । इस प्रकार उसकी अच्छी सेवा की और वह अंग्रेज चला गया । उस अंग्रेज (मानेलुक) ने डायरी में लिखे गए अपने नोट में अलीपुर के विषय में बहुत अच्छा लिखा । शान्ति होने के पश्चात् गिलब्रट की डायरी, जिसमें अलीपुर के बारे में बुरा लिखा हुआ था, उसी के अनुसार अलीपुर ग्राम को बुरी तरह लूटा गया और मनुष्य, पशु आदि प्राणियों सहित अग्नि में जलाकर भस्मसात् कर दिया गया । कुछ दिन पीछे मानेलुक की सच्ची रिपोर्ट भी अंग्रेजों के आगे पेश हुई । तब अंग्रेजों को ज्ञात हुआ कि जिस अलीपुर ग्राम को पारितोषिक मिलना चाहिए था उसको तो भीषण अग्निकांड में जला दिया गया । यह अंग्रेजों की मूर्खता का एक उदाहरण है और हरयाणा के ग्रामों पर दोष लगाया जाता है कि यहां के किसानों ने सब अंग्रेज स्त्रियों से गाहटा चलवाया था । यह सब बात इस अलीपुर के गाहटे की घटना के समान मिथ्या और भ्रम फैलाने वाली है । भारतीयों ने अंग्रेज महिलाओं और बच्चों पर कभी अत्याचार नहीं किये ।
अलीपुर का बलिदान
अलीपुरग्राम कई शताब्दियों से बड़ी सड़क जी. टी. रोड पर बसा हुआ है । इसी सड़क से अंग्रेजों की सेनायें गुजरती थीं । यहां के वीर लोगों ने भी सन् 1857 के स्वातन्त्र्य संग्राम में खूब बढ़ चढ़ कर भाग लिया और इस सड़क पर गुजरने वाले अनेक अत्याचारी अंग्रेजों को काल के गाल में पहुंचाया गया । यही नहीं, इस स्वतन्त्रता समर में बलिदान देने वाले वीरों की संख्या इस ग्राम में सबसे बढ़कर है । अलीपुर ग्राम में 1857 में सड़क के निकट ही सरकारी तहसील विद्यमान थी और उसके पास ही बाहर बाजार था । क्रांति के समय ग्राम के लोगों ने तहसील में घुसकर सब सरकारी कागजों को फूंक दिया और बाजार को भी लूट लिया । ऐसा अनुमान है कि बाजार में जो दुकान थीं, या तो वे सरकार की थी या सरकारी पिट्ठुओं की थी । इसलिए उन्हें लूटा गया । तहसील पर जिस समय जनता के लोगों ने आक्रमण किया तो तहसील के सरकारी नौकरों ने अवश्य कुछ न कुछ विरोध किया होगा । उसके फलस्वरूप युद्ध हुआ और वीरों ने गोलियां चलाईं । उन गोलियों के निशान आज भी लकड़ी के किवाड़ों पर विद्यमान हैं । उन्हीं दिनों अनेक अंग्रेज ग्रामीण योद्धाओं के द्वारा मारे गये ।
अलीपुर ग्राम को दण्ड देने के लिए मिटकाफ (काना साहब) सेना लेकर अलीपुर पहुंच गया । उसने अपनी सेना का शिविर दो कदम्ब (कैम) के वृक्षों के नीचे लगाया जो आज भी विद्यमान हैं । ये ऐतिहासिक वृक्ष अंग्रेजों के अत्याचार के मुंह बोलते चित्र हैं । गांव के चारों ओर सेना ने घेरा डाल दिया । तोपखाना भी लगा दिया । किसी व्यक्ति को भी गांव से बाहर नहीं निकलने दिया गया । सेना के बड़े बड़े अधिकारी गांव में घुस गए और गांव के 70-75 चुने हुए व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया गया । हंसराम नाम का एक व्यक्ति उस समय हलुम्बी ग्राम की ओर शौच गया हुआ था, उसे पकड़ने के लिए कुछ अंग्रेज जंगल में ही पहुंच गए और उसे गिरफ्तार कर लिया । वह खेड़े के निकट कुण्डों के पास पकड़ा गया । वह अत्यन्त स्वस्थ, सुन्दर आकृति का युवक था । पकड़ने वाले अंग्रेज अधिकारी के मन में दया आ गई तथा उसकी सुन्दर आकृति व स्वास्थ्य से प्रभावित होकर उसे छोड़ दिया । किन्तु उस युवक ने कहा कि मैं तो अपने साथियों के साथ रहना चाहता हूँ, जहां वे जायेंगे मैं भी वहीं जाऊंगा । मेरा कर्त्तव्य है कि मैं अपने साथियों के साथ जीऊँ और साथियों के साथ ही मरूँ । अंग्रेज सिपाहियों ने उसे बहुत छोड़ना चाहा और उसे भागने के लिए बार बार प्रेरणा की किन्तु उसने भागने से इन्कार कर दिया और गिरफ्तार हुए साथियों के साथ मिल गया । अंग्रेज 70-75 व्यक्तियों को गिरफ्तार करके लाल किले में ले गये और उन सब को फांसी पर चढ़ा दिया गया ।
यह घटना 1857 के मई मास के अन्तिम सप्ताह की है ।
लाल किले में से हंसराम को घसियारे के रूप में अंग्रेजों ने निकालना चाहा । वह अंग्रेज उसके सुन्दर शरीर तथा स्वास्थ्य को देखकर उसे छोड़ना चाहता था, किन्तु उसने फिर इन्कार कर दिया । तो फिर उसे भी फांसी पर चढ़ा दिया ।
मुहम्मद नाम का एक मुसलमान किसी प्रकार बचकर भाग आया । वह फिर सकतापुर भोपाल राज्य में जाकर बस गया ।
कुछ व्यक्तियों का ऐसा भी मत है कि इन व्यक्तियों को फांसी नहीं दी गई थी किन्तु इन सब को पत्थर के कोल्हू के नीचे सड़क पर डालकर पीसकर मार डाला गया था । वे पत्थर के कोल्हू अभी तक इस सड़क पर पड़े हुए हैं ।
जिन व्यक्तियों को फांसी दी गई उनमें से तुलसीराम और हंसराम के अतिरिक्त और किसी के भी नाम का पता यत्न करने पर भी नहीं चल सका । अलीपुर ग्राम का भाट सोनीपत का निवासी है जो आजकल जाखौली ग्राम में रहता है । उसकी पोथी में पैंतीस व्यक्तियों के नाम मिलते हैं । उस विश्वम्भरदयाल भाट के पास जाखौली इन्हीं नामों को जानने के लिये मैं गया, किन्तु जिस पोथी में ये नाम हैं, उस पोथी को उस भाट का पुत्र लेकर किसी गांव में अपने यजमानों के पास चला गया था, दुर्भाग्य से वे नाम नहीं मिल सके ।
अलीपुर ग्राम में भी मैं इसी कार्य के लिए तीन बार गया । जिन घरों में इन नामों के मिलने की आशा थी, खोज करवाने पर भी वे नाम नहीं मिल सके । यह हमारा दुर्भाग्य ही रहा कि जिन हुतात्मा वीरों ने हंसते हंसते देश की स्वतन्त्रता के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया, आज उनके नाम भी हमें उपलब्ध न हो सके ।
जिस किसी ने भी 1857 के स्वातन्त्र्य समर के विषय में लिखा है, हरयाणा प्रान्त के विषय में दो चार शब्द लिखने का भी कष्ट नहीं किया । यथार्थ में यह युद्ध हरयाणा प्रान्त के सैनिकों ने ही लड़ा था । सभी रिसाले और पलटनों में, मेरठ आदि सभी छावनियों में हरयाणा के वीर सैनिक ही अधिक संख्या में थे । उस समय तक हरयाणा प्रान्त के सभी ग्रामों में पंचायती सैनिक थे । सभी गांवों में अखाड़े चलते थे जहां पंचायती सैनिक तैयार किए जाते थे, किसी प्रकार की आपत्ति पड़ने पर जो धर्मयुद्ध में भाग लेते थे । अलीपुर गांव के जो नवयुवक इस क्रांति में हंसते-हंसते बलिवेदी पर चढ़ गये वे भी इसी प्रकार के पंचायती सैनिक थे । इन सबको फांसी देने के लिए जिस समय गिरफ्तार किया गया, तोपों के द्वारा गांव पर गोले बरसाये गए । जिस समय तोपें चलीं, उस समय तोपें चलाने वाला कोई अंग्रेज अफसर दयालु स्वभाव का था । उसने इस ढ़ंग से तोपें चलवाईं कि तोप के गोले गांव के ऊपर से गुजरकर जंगल में गिरते रहे । ग्राम नष्ट होने से बच गया । कुछ का ऐसा भी मत है कि ग्राम को लूटा भी गया । जितने व्यक्ति इस ग्राम के मारे गये, उनमें भंगी से लेकर ब्राह्मण तक सभी सम्मिलित थे । जाट उनमें कुछ अधिक संख्या में थे ।
एक पटवारी और एक नम्बरदार ने, जब उनको बहुत तंग किया गया, तब इन सब लोगों के नाम लिखवाये थे जिनको फांसी दी गई थी । फांसी आने के बाद जो देवियां विधवा हो गईं थीं, उन्होंने उस नम्बरदार के घर के आगे आकर अपनी चूड़ियां फोड़कर डाल दीं । इस प्रकार उनकी सहानुभूति में ग्राम की अन्य देवियों ने भी अपनी चूड़ियां फोड़कर ढ़ेर लगा दिया । यहां यह लोकश्रुति है कि उस समय उस नम्बरदार के घर के सामने सवा मन चूड़ियों का ढ़ेर लग गया ।
जिस समय ग्राम पर यह आपत्ति आई, ग्राम के सब बाल-बच्चे, स्त्री और बूढ़े भागकर हलुम्बी ग्राम में चले गये । नवयुवक सब ग्राम में ही विद्यमान थे जिनमें से गिरफ्तार करके पचहत्तर को फांसी दी गई । ग्राम पर यही दोष लगाया गया था कि इन्होंने तहसील को जलाया और कुछ अंग्रेजों का वध किया था । एक दो व्यक्तियों ने ऐसा भी बताया कि दोनों प्रकार के प्रमाण-पत्र गांव में मिले । ग्राम ने कुछ अंग्रेजों को मारा और कुछ को बचाया भी । इसलिए एक अंग्रेज स्त्री के निषेध करने पर इस गांव को जलाया नहीं गया और न ही जब्त किया गया । बारह वर्ष पूर्व ही यह गांव कुछ नम्बरदारों के सरकारी लगान स्वयं खा जाने पर एक मुसलमान के पास चार हजार रुपये में गिरवी रख दिया गया था । क्रांति युद्ध के पीछे यहां के निवासियों ने रुपये देकर इसे खरीद लिया । जो अंग्रेज अलीपुर में मारे गए थे, उनकी कब्रें अलीपुर के पास ही बना दी गईं थीं, जो कुछ वर्ष पहले विद्यमान थीं ।
अंग्रेज अफसरों की आज्ञा से सिक्ख सेना ने बादली ग्राम के आस पास के बारह ग्रामों के अहीर आदि सभी कृषकों के सब पशु हांक लिए थे । उस समय तोताराम नाम के एक चतुर व्यक्ति ने अपने अलीपुर ग्राम के सब निवासियों को उत्साहित किया और युद्ध करके सिक्खों से अपना सब पशुधन छुड़वा लिया और उन ग्रामों के, जिनके ये पशु थे, उनको ही सौंप दिये । किन्तु वह चतुर वीर तोताराम इस युद्ध में मारा गया । अब तक बादली, समयपुर आदि ग्रामों के निवासी उस उपकार के कारण अलीपुर के निवासियों का बड़ा आदर करते हैं ।
पीपलथला, सराय आदि ग्रामों को भी इसी प्रकार लूटा और जलाया गया । इसी सराय ग्राम (भड़ोला) के पास आज भी एक अंग्रेज अफसर का स्मारक बना हुआ है जो उस समय ग्रामवासियों द्वारा मारा गया था । इस सराय ग्राम में कभी एक छोटी सी गढ़ी (दुर्ग) थी जो आज खण्डहर के रूप में पड़ी हुई है, केवल उसके दो द्वार खड़े हुए हैं । अनुमान यही है कि इस क्रान्तियुद्ध में ये अंग्रेजों द्वारा ही नष्ट किये गए ।
हरयाणा के सैंकड़ों ग्रामों ने सन् 1857 के युद्ध में इसी प्रकार भाग लिया और पीछे अंग्रेजों द्वारा दंडित हुए । इनके विषय में मैं समय मिलने पर लिखूँगा ।
रोहट गांव
छोटे थाने वाले भागे हुए अंग्रेजों को ढ़ूंढ़-ढ़ूंढ़ कर मारते थे । एक दिन नहर की पटरी पर एक अंग्रेज अपने एक बच्चे और स्त्री सहित घोड़ा गाड़ी में आ रहा था, यह नहर का मोहतमीम था । इसके तांगे से एक अशर्फियों की थैली नीचे गिर गई । स्त्री स्वभाव के कारण वह अंग्रेज स्त्री उसे उठाने के लिए उतरकर पीछे चली गई । थाने ग्राम के निवासी पहले ही पीछे लगे हुए थे । उन्होंने वह थैली छीन ली और उस अंग्रेज स्त्री को न जाने मार दिया या कहीं लुप्त कर दिया । आगे चलकर रोहट ग्राम का रामलाल नाम का ठेकेदार उसे मिला जो इसे जानता था । उसने उस मोहतमीम को बचाने के लिए बच्चे सहित घास के ढ़ेर में छिपा दिया, बाद में अपने घर ले गया । थाने ग्राम के लोगों को यह कह दिया कि तांगा आगे चला गया, उसी में अंग्रेज है । वह ग्राम में कई दिन रहा । फिर उसको ग्राम के बाहर उसकी इच्छा के अनुसार आमों के बाग में रखा । वहां वह आम के वृक्ष पर बन्दूक लिए बैठा रहता था । पचास ग्राम वाले भी उसकी रक्षा करते थे । शान्ति होने पर उसे सुरक्षित स्थान पर भेज दिया गया । रोहट ग्राम की 14 वर्ष तक के लिए नहरी और कलक्ट्री उघाई माफ कर दी गई । बोहर और थाने ग्राम के लोगों ने अंग्रेजों को मारा था, अतः इन दोनों ग्रामों को दण्डस्वरूप जलाना चाहते थे किन्तु रामलाल ने कहा था कि पहले मुझे गोली मारो फिर इन ग्रामों को दण्ड देना । रामलाल के कहने पर यह दोनों ग्राम छोड़ दिये गये । रामलाल को एक तलवार, प्रमाणपत्र और मलका का एक चित्र पुरस्कार में दिया गया । उस रामलाल ठेकेदार के लिए यह लिखकर दिया कि इसके परिवार में से कोई मैट्रिक पास भी हो तो उसे अच्छा आफीसर बनाया जाये । वह अंग्रेज ग्राम वालों की सहायता से शान्ति होने पर करनाल पहुंच गया । मार्ग में कलाये ग्राम में उसका लड़का मर गया । गाड़ने के लिए ग्राम वालों ने भूमि नहीं दी । एक किसान ने भूमि दी जिसमें उसकी कब्र बना दी गई । चिन्हस्वरूप उसका स्मारक बना दिया गया । रोहट ग्राम में सर्वप्रथम छैलू को जेलदारी मिली । सुजान, छैलू ठेकेदार और रामलाल ठेकेदार को प्रमाणपत्र दे दिया गया ।
वीर अमरसिंह
अमरसिंह सुनारियांग्राम (रोहतकशहर से थोड़ी दूर) का निवासी था । वह डी. सी. साहब के यहां (रोहतक में) चपरासी का कार्य करता था । वह डी. सी. चरित्रहीन था । अमरसिंह को यह बुरा लगा और उसने त्यागपत्र देकर अपना वेतन मांगा । डी.सी ने उसे वेतन नहीं दिया । इस पर अनबन बढ़ गई ।
अमरसिंह ग्राम में जाकर बल्लू लुहार से कसोला लेकर आया और डी.सी की कोठी में जाकर रात को उसे जगाकर कत्ल कर दिया । कसोला वहीं डाल दिया । उसकी मेम को नहीं मारा, उसे स्त्री समझकर छोड़ दिया । इसके बाद नीम पर चढ़कर जब वह बाहर निकला तो मेम ने शिकारी कुत्ते छोड़ दिये, वह उन कुत्तों ने फाड़ लिया । वह ग्राम में चला गया ।
अंग्रेजों ने वहाँ जाकर सारे गांव को तोपों से उड़ाना चाहा किन्तु अमरसिंह स्वयं उपस्थित हो गया । अंग्रेज उसे घोड़े के पीछे बांधकर ले गए और उसके ऊपर दही छिड़क कर शिकारी कुत्तों से फड़वाया गया । यह वृत्तान्त कचहरी में लिखा हुआ है ।
हांसी का शहीद हुकमचन्द
(जिसको घर के सामने ही फाँसी पर लटका दिया गया)
1857 की महान् क्रंति ने भारत के कोने कोने में उथल पुथल मचा दी थी । अनेक देशभक्त वीर हंसते-हंसते आजादी की बलिवेदी पर अपना जीवन न्यौछावर कर गए । इतिहास प्रसिद्ध हांसीनगर पृथ्वीराज चौहान के समय से अपनी विशेषता रखता है । सन् 1857 में भी हांसी नगर किसी से पीछे नहीं रहा । दिवंगत दुनीचन्द के सुपुत्र श्री हुकमचन्द जी (जो हांसी, हिसार और करनाल के कानूनगो थे) को मुगल बादशाह ने 1841 में विशिष्ट पदों पर नियुक्त करके इन प्रान्तों का प्रबन्धक बना दिया ।
जब भारतवासी अंग्रेजों की परतन्त्रता से स्वतन्त्र होने के लिए संघर्ष कर रहे थे तब श्री हुकमचन्द जी ने फारसी भाषा में मुगल बादशाह जाफर को निमंत्रण पत्र भेजा कि वह अपनी सेना लेकर यहां के अंग्रेजों पर चढ़ाई कर दे ।
सितम्बर 1857 के अन्तिम सप्ताह में जब शाह जफर को अंग्रेजों ने बन्दी बना लिया तब उनकी विशेष फाइल में वह निमन्त्रण पत्र मिला जो कि हुकमचन्द ने बादशाह को भेजा था । हिसार की सरकारी फाइल में वह पत्र आज तक भी विद्यमान है ।
देहली के अंग्रेज कमिश्नर ने वह पत्र हिसार डिवीजन के कमिश्नर को उस पर तत्काल कार्यवाही हेतु भेज दिया । किन्तु सरकार का विरोध करने के अपराध में 19 जनवरी 1858 को श्री हुकमचन्द को उनके घर के सामने फांसी पर लटका दिया गया । उनके सम्बन्धियों को उनका शव तक भी नहीं दिया गया । लाला हुकमचन्द के शव को जलाने के स्थान पर भूमि में दफना कर हमारी धार्मिक भावनाओं पर कुठाराघात किया और उनकी चल और अचल सम्पत्ति भी जब्त कर ली गई । उस समय अपने देश से प्रेम करने वालों को गद्दार बताकर बिना अपराध असंख्य लोगों को फांसी पर चढ़ाकर अंग्रेजों ने अपनी पिपासा को शान्त किया ।
लाला हुकमचन्द जी के दो भाई और थे, किन्तु केवल उन्हीं के भाग की 84-85 एकड़ भूमि जब्त कर ली गई जो अंग्रेजों के चाटुकारों ने आपस में बांट ली । शेष दोनों की पितृ-संपत्ति अब तक चली आ रही है ।
50 वर्ष की आयु में हुकमचन्द जी को फांसी पर लटकाया गया था । उनके दो सुपुत्र एक 8 वर्ष का और दूसरा केवल 19 दिन का ही था । कोई 400 तोला सोना, 4 हजार तोले चांदी, अनेक गाय, भैंस, ऊँट आदि पशु और अन्न तथा घर का सामान अल्पतम मूल्य पर नीलाम कर दिया गया ।
श्री हुकमचन्द जी के दस कुटुम्ब अब भी फल फूल रहे हैं । हरयाणा प्रान्त का इतिहास ऐसे ही वीरों के बलिदानों से भरपूर है ।
झज्जरके नवाब
रोहतकके दक्षिण में 22 मील व दिल्ली के पश्चिम-दक्षिण में 36 मील झज्जरनाम का प्रसिद्ध कस्बा है । यह कस्बा एक हजार साल पहले झज्झू नाम के जाट ने बसाया था और उसी के नाम से झज्जर प्रसिद्ध हुआ । मुगलकाल में यह शहर अपने व्यापार के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध था । झज्जर, रिवाड़ी, भिवानीएक त्रिकोण बनाते हैं, जो आज की तरह पूर्व काल में भी व्यापारिक केन्द्र थे । अकेले झज्जर शहर में 300 अत्तारों और गन्धियों की दुकानें थीं । झज्जर से दिल्ली जाने वाली सड़क पर शहर से बाहर बादशाह शाहजहां के जमाने की अनेक पुरानी इमारतें व मकबरे हैं जिनके द्वारों पर फारसी लिपि में अनेक वाक्य खुदे हुए हैं । उन भवनों व मकबरों के बीच में सदियों पुराना एक बहुत बड़ा पक्का तालाब है, जहां म्युनिसिपैलिटी की ओर से पशुओं का मेला भरता (लगता) है ।
हरयाणा का यह प्रदेश सन् 1718 में बादशाह फरुखसियर ने अपने वजीर अलीदीन को जागीर में दिया । सन् 1732 में फरुखनगर के नवाब को दे दिया । सन् 1760 में महाराजा सूरजमल (भरतपुर) ने फरुखनगर के नवाब मूसा खां को हराकर यह प्रदेश उससे छीन लिया । इस समय दिल्ली नगर की चारदीवारी तक उनका राज्य था । बादलीनाम का प्रसिद्ध गांव उनकी एक तहसील था । सन् 1754 में बलोच सरदार बहादुरखां को बहादुरगढ़ बादशाहों से जागीर में मिला । झज्जर बेगम सामरू के पति वेनरेल साहब के कब्जे में आ गया । गोहाना, महम, रोहतक, खरखौदाआदि दिल्ली के वजीर नब्ज खां के कब्जे में थे । सन् 1790 में बेगम सामरू की मुलाजमत में रहने वाले अंग्रेज इस्किन्दर ने उत्तर हिन्दुस्तान में जाटों, मराठों, सिक्खों की खींचातानी देखकर हांसी, महम, बेरी, रोहतक, झज्जर पर कब्जा कर लिया और जहाजगढ़ में किला बनाकर अपना सिक्का भी चलाया । 1803 में अंग्रेजों ने मराठों को हराया । दिल्ली के साथ हरयाणा पर भी कब्जा जमा लिया । झज्जर, बल्लभगढ़, दुजानाआदि रियासतें कायम कीं । हरयाणा का बाकी हिस्सा 1836 तक गवर्नर बंगाल की मातहती में बंगाल के साथ रहा । इसके बाद आगरे के नये सूबे में शामिल कर दिया गया ।
1857 में हरयाणा में उस समय अनेक राजा राज्य करते थे । झज्जर इलाके में अब्दुल रहमान खां नवाब की नवाबी थी । झज्जर प्रान्त झज्जर, बादली, दादरी, नारनौल, बावल और कोटपुतली आदि परगनों में विभाजित था । झज्जर का नवाब जवान किन्तु भीरू प्रकृति का था । सदैव नाच-गान, राग-रंग व भोग-विलास में ही फंसा रहता था । इसके दुराचार से प्रजा उस समय प्रसन्न नहीं थी, फिर भी उसका राज्य अंग्रेजों की अपेक्षा अच्छा था । ठाकुर स्यालुसिंह कुतानी निवासी नवाब के बख्शी थे । दीवान रामरिछपाल झज्जर निवासी नवाब के कोषाध्यक्ष (खजान्ची) थे । नवाब प्रकट रूप से तो दिल्ली बादशाह बहादुरशाह की सहायता कर रहा था क्योंकि हरयाणा की सारी जनता इस स्वतन्त्रता युद्ध में बड़े उत्साह से भाग ले रही थी । अतः नवाब भी विवश था किन्तु भीरु होने के कारण उसे यह भय था कि कभी अंग्रेज जीत गए तो मेरी नवाबी का क्या बनेगा । इसलिए गुप्त रूप से धन से अंग्रेजों की सहायता करना चाहता था । अपने दीवान मुन्शी रामरिछपाल द्वारा 22 लाख रुपये इसने अंग्रेजों को सहायता के लिए गुप्त रूप से भेजने का प्रबन्ध किया । मुन्शी रामरिछपाल ने ठाकुर स्यालुसिंह कुतानीनिवासी को जो एक प्रकार से झज्जर राज्य के कर्त्ता-धर्त्ता थे, यह भेद बता दिया । ठाकुर स्यालुसिंह ने मुन्शी रामरिछपाल को समझाया कि नवाब तो भीरु और मूर्ख है । अंग्रेजों को रुपया किसी रूप में भी नहीं मिलना चाहिये । हम दोनों बांट लेते हैं । उन दोनों ने ग्यारह-ग्यारह लाख रुपया आपस में बांट लिया, अंग्रेजों के पास नहीं भेजा ।
ठाकुर स्यालुसिंह ने उस समय यह कहा - यदि अंग्रेज जीत गए तो नवाब मारा जायेगा, हमारा क्या बिगाड़ते हैं, यदि अंग्रेज हार ही गये तो हमारा बिगाड़ ही क्या सकते हैं । नवाब के भीरु और चरित्रहीन होने का कारण लोग यों भी बताते हैं कि नवाब अब्दुल रहमान खां किसी बेगम के पेट से उत्पन्न नहीं हुआ किन्तु वह किसी रखैल स्त्री (वेश्या) का पुत्र था । उसके विषय में एक घटना भी बताई जाती है । इसके चाचा का नाम समद खां था । नवाब ने अपने इसी चाचा की लड़की के साथ विवाह किया था । समदखां इससे अप्रसन्न रहता था, इससे बोलता भी नहीं था । समदखां वैसे बहादुर और अभिमानी था । एक दिन नवाब ने अपनी बेगम को जो समदखां की लड़की थी, चिढ़ाने की दृष्टि से यह कहा कि समदखां की औलाद की नाक बड़ी लम्बी होती है । उसी समय बेगम ने जवाब दिया - जब मेरा विवाह (वेश्यापुत्र) आपके साथ हो गया तो क्या अब भी समदखां की औलाद की नाक लम्बी रह गई ? नवाब ने इसी बात से रुष्ट होकर बेगम को तलाक दे दिया । समदखां नवाब से पहले ही नाराज था, इस बात से वह और भी नाराज हो गया । वह नवाब से सदैव रुष्ट रहता था और कभी बोलता नहीं था । उन्हीं दिनों अंग्रेज फौजी अफसर मिटकाफ साहब जो आंख से काना था, किन्तु शरीर से सुदृढ़ था, छुछकवासअपने पांच सौ सशस्त्र सैनिक लेकर पहुंच गया और झज्जर नवाब की कोठी में ठहर गया । वहां नवाब झज्जर को मिलने के लिए उसने सन्देश भेजा । झज्जर का नवाब मिटकाफ साहब से मिलने के लिए हथिनी पर सवार होकर जाना चाहता था । उसकी 'लाडो' नाम की हथिनी थी, उसने सवारी के लिए उसे उठाना चाहा किन्तु हथिनी हठ कर के बैठ गई, उठी ही नहीं । नवाब के चाचा समदखां ने कहा - हैवान हठ करता है, खैर नहीं है, आप वहां मत जाओ । नवाब ने उत्तर दिया - आप नवाब होकर भी शकुन अपशकुन मानते हैं ? समदखां ने कहा हमने तेरे से बोलकर मूर्खता की । नवाब हथिनी पर बैठकर छुछकवास चला गया । मिटकाफ साहब ने वहां नवाब का आदर नहीं किया । नवाब हथिनी से उतरकर कुर्सी पर बैठना चाहता था किन्तु मिटकाफ ने नवाब को आज्ञा दी कि अपका स्थान आज कुर्सी नहीं अपितु काठ का पिंजरा है, वहां बैठो । नवाब को काठ के पिंजरे में बन्द करके दिल्ली पहुंचा दिया गया । वहां झज्जरके नवाब को और बल्लभगढ़के राजा नाहरसिंहतथा लच्छुसिंह कोतवाल को जो दिल्ली का निवासी था, फांसी के तख्ते पर लटका दिया गया ।
बहादुरशाह के विषय में उन दिनों एक होली गाई जाती थी । यह होली ठाकुरों, नवाबों, राजे-महाराजों के यहां नाचने वाली स्त्रियां गाया करतीं थीं ।
टेक –
मची री हिन्द में कैसो फाग मचो री ।बारा जोरी रे हिन्द में कैसो फाग मचो री ॥
कली -
गोलन के तो बनें कुङ्कुमें, तोपन की पिचकारी ।
सीने पर रखा लियो मुख ऊपर, तिन की असल भई होरी ।
शोर दुनियां में मचो री हिन्द में कैसो फाग मचो री ॥
बहादुरशाह दीन के दीवाने, दीन को मान रखो री ।
मरते मरते उस गाजी ने, दीन दी देन कहो री ॥दीन वाको रब न रखो री, हिन्द में कैसो फाग मचो री ॥
नवाब झज्जर के पकड़े जाने पर उसका चाचा समदखां और बख्शी ठाकुर स्यालुसिंह कई सहस्र सेना लेकर काणोड के दुर्ग (गढ़) को हथियाने के लिए आगे बढ़े । रिवाड़ी की तरफ से राव तुलाराम, राव श्री गोपाल और गोपालकृष्ण सहित जो रामपुरा के आसपास के राजा थे, बड़ी सेना सहित काणोड के गढ़ की ओर बढ़े । काणोड वही स्थान है जिसे आजकल महेन्द्रगढ़ कहते हैं । अंग्रेज भी अपनी सेना सहित उधर बढ़ रहे थे । जयपुर आदि के नरेशों ने अपनी सात हजार सैनिकों की सेना जो नागे और वैरागियों की थी, अंग्रेजों की सहायतार्थ भेजी । नवाब झज्जर और राव तुलाराम की सेना दोनों ओर से बीच में घिर गई । नारनौल के पास लड़ाई हुई, हरयाणे के सभी योद्धा बड़ी वीरता से लड़े । राव कृष्णगोपाल और श्री गोपाल वहीं लड़ते लड़ते शहीद हो गये । राव तुलाराम बचकर काबुल आदि के मुस्लिम प्रदेशों में चले गये । सहस्रों वीर इस आजादी की लड़ाई में नसीरपुरकी रणभूमि में खेत रहे ।
युद्ध के पश्चात् शान्ति हो जाने पर अंग्रेजों ने भीषण अत्याचार किये । अंग्रेज सैनिक लोगों को पकड़ पकड़ कर सारे दिन तक इकट्ठा करते थे और सायंकाल 3 बजे के पश्चात् सब मनुष्यों को तोपों के मुख पर बांध कर गोलियों से उड़ा दिया जाता था । ठाकुर स्यालुसिंह को भी परिवार सहित गिरफ्तार करके गोली से उड़ाने के लिए पंक्ति में खड़ा कर दिया । उस समय एक अंग्रेज जो जीन्दके महाराजा का नौकर था, जो पहले झज्जर भी नवाब के पास नौकरी कर चुका था, वह ठाकुर स्यालुसिंह का मित्र था । वह झज्जरआया हुआ था । उसने ठाकुर स्यालुसिंह को अपने परिवार सहित पंक्ति में खड़े देखा । उसने ठाकुर साहब से पूछा क्या बात है ठाकुर साहब ? ठाकुर साहब ने उत्तर दिया मेरे साथ अन्याय हो रहा है । नवाब ने तो मुझे अंग्रेजों का वफादार समझकर मेरी गढ़ी को कुतानीमें तोपों से उड़ा दिया और आज मैं नवाब का साथी समझकर परिवार सहित मारा जा रहा हूं । यदि मैं अंग्रेज का शत्रु था तो मेरी गढ़ी नवाब द्वारा तोपों से क्यों उड़ाई गई और मैं नवाब का शत्रु हूं तो मुझे क्यों परिवार सहित गोली का निशाना बनाया जा रहा है ? यह सब सुनकर उस अंग्रेज की सिफारिश पर स्यालुसिंह को छोड़ दिया गया और उसे निर्दोष सिद्ध करने का प्रमाण देने के लिए वचन लिया गया । वह घोड़े पर सवार हो नंगे शरीर ही दिल्ली, चौधरी गुलाबसिंह बादली निवासी के पास पहुंचा । वह उस समय अंग्रेजों की नौकरी करता था । पहले ठाकुर स्यालुसिंह ने बादली से चौ. गुलाबसिंह को निकाल दिया था । फिर भी ठाकुर स्यालुसिंह के बार बार प्रार्थना करने पर चौ. गुलाबसिंह ने सहायता करने का वचन दे दिया और उसने ठा. स्यालुसिंह की गवाही देकर अपकार के बदले में उपकार किया । ठा. स्यालुसिंह का एक भाई ठा. शिवजीसिंह सेना में दानापुर में अंग्रेजों की सेना में सूबेदार था, उसने भी ठा. स्यालुसिंह की सहायता की । इस प्रकार ठा. स्यालुसिंह का परिवार बच गया । ठाकुर साहब के परिवार के लोग आज भी कुतानी व धर्मपुरा आदि में बसते हैं । उन्हीं में से ठा. स्वर्णसिंह जी आर्यसमाजी सज्जन हैं, जो धर्मपुरा में भदानी के निकट बसते हैं ।
झज्जर मे नवाब की नवाबी को तोड़ दिया गया और भिन्न-भिन्न प्रान्तों में बांट दिया गया, जैसा कि पहले लिखा जा चुका है । अंग्रेज कोटपुतली को जयपुर नरेश को देना चाहते थे किन्तु उनके निषेध कर देने पर खेतड़ी नरेश को दे दिया गया ।
बहादुरगढ़में भी उस समय नवाब का राज्य था । सिक्खों की सेना जो 12 हजार की संख्या में थी, बहादुरगढ़ डेरा डाले पड़ी थी । हरयाणा के वीरों ने इसे आगे बढ़ने नहीं दिया । सिक्खों की सेना ग्रामों से भोजन सामग्री लूटकर अंग्रेजों की सहायता करती थी । उस समय कुछ नीच प्रकृति के मुसलमान भी चोरी से जनाजा (अर्थी) निकालकर मांस, अन्न, रोटी छिपाकर अंग्रेज सेना को बेच देते थे । उस समय एक-एक रोटी एक-एक रुपये में बिकती थी, जल भी बिकता था । कोतवाल लच्छुसिंह ने इस बात को भांप लिया । उस ने उन नीच मुसलमानों को जो काले पहाड़ पर घिरी हुई अंग्रेजी सेना को अन्न मांस बेचकर सहायता करते थे, पकड़वा कर मरवा दिया । अंग्रेजों ने इसी कोतवाल लच्छुसिंह, नरेश नाहरसिंह तथा नवाब झज्जर को इन्दारा कुंए के पीपल के वृक्ष पर बांधकर फांसी दी थी ।
सन् 1857 के युद्ध के बाद बहादुरगढ़, बल्लभगढ़, फरुखनगर, झज्जर आदि की रियासतें समाप्त कर दीं । लोहारू, पटौदी, दुजाना की रियासतें रहने दीं । इसके बाद 1858 में हरयाणा को आगरा से निकाल कर सजा के तौर पर पंजाब के साथ जोड़ दिया । दिल्ली को कमिश्नरी का हैडक्वार्टर बना दिया । सिरसाऔर पानीपतके जिले तोड़कर उन्हें तहसील बना दिया गया ।
कुतानीकी गढ़ी
ठाकुर स्यालुसिंह अपने छः भाइयों सहित निवास करते थे । यह झज्जर के नवाब के बख्शी थे अर्थात् वही सर्वेसर्वा थे । नवाब क्या, यही ठाकुर स्यालुसिंह राज्य किया करते थे । इसने नवाब की फौज में हरयाणा के वीरों को भर्ती नहीं किया, आगे चलकर इस भूल का फल भी उसे भोगना पड़ा । उसने सब पूर्वियों को ही फौज में भरती किया, वह यह समझता था कि यह अनुशासन में रहेंगे । एक पूर्वीय सैनिक को ठाकुर स्यालुसिंह ने लाठी से मार दिया था, अतः सब पूर्वीय सैनिक उस से द्वेष करने लगे थे । एक दिन काणोड के दुर्ग में नाच गाना हो रहा था । एक पूर्वीय सैनिक ने ठाकुर स्यालुसिंह पर अवसर पाकर तलवार से वार किया । तलवार का वार पगड़ी पर लगा और ठाकुर साहब बच गये किन्तु इस पूर्वीय को ठाकुर साहब ने वहीं मार दिया । पूर्वीयों ने दुर्ग का द्वार बंद कर दिया और द्वार पर तोप लगा दी और टके भरकर तोपें चलानी शुरू कर दीं । उस समय ठाकुर स्यालुसिंह के साथ 11 अन्य साथी थे । ठाकुर हरनाम सिंह रतनथल निवासी ने तोपची को मार दिया । इस प्रकार बचकर ये लोग अपने घर चले गए । ठाकुर स्यालुसिंह अपनी ससुराल पाल्हावास में जो भिवानी के पास है, जहां इसके बाल-बच्चे उस समय रहते थे, चला गया । किन्तु पीछे से सब पूर्वियों ने कुतानी की गढ़ी पर चढ़ाई कर दी । नवाब ने पूर्वी सैनिकों को ऐसा करने से बहुत रोका, उसने यह भी कहा कि तुम ठाकुर के विरुद्ध मेरे पास मुकद्दमा करो, मैं न्याय करूंगा, किन्तु वे किसी प्रकार भी नहीं माने । नवाब ने कुतानी के ठाकुरों के पास भी अपना सन्देश रामबख्श धाणक खेड़ी सुलतान के द्वारा भेजा कि गढ़ी को खाली कर दें । इस प्रकार यह सन्देश तीन बार भेजा किन्तु गढ़ी में स्यालुसिंह का भाई सूबेदार मेजर शिवजीसिंह था । वह यही कहता रहा कि स्यालुसिंह के रहते हुए हमारा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता । किन्तु रात्रि को पूर्वीय सैनिकों ने सारी गढ़ी को घेरकर तोपों से आक्रमण कर दिया । ठाकुर शिवजीसिंह ने अपनी मानरक्षा के लिए छः ठाकुरानियों को तलवार से कत्ल कर दिया । दो लड़कों का भी वध कर दिया । किन्तु वह अपनी मां का वध नहीं कर सका । उसकी मां ने स्वयं अपना सिर काट लिया और यह कहा कि मैं यदि पकड़ी गई तो कलकत्ता तक सब ठाकुर बदनाम हो जायेंगे । कुतानी की गढ़ी के सब लोग गांव छोड़कर भाग गये । कुतानी के ठाकुरों की हवेली आज भी टूटी पड़ी है । तोप के गोलों के चिन्ह अब तक दीवारों पर हैं । गढ़ी उजड़ अवस्था में पड़ी है ।
फरुखनगर
फरुखनगर के नवाब ने भी इस स्वतन्त्रता के युद्ध में भाग लिया था । नवाब का नाम फौजदार खां था । फरुखनगर का बड़ा अच्छा 'दुर्ग' था । नगर के चारों ओर भी परकोटा बना हुआ था, जो आजकल भी विद्यमान है । इस नवाब को भी गिरफ्तार करके फांसी पर लटका दिया । नवाब हिन्दू प्रजा को भी अपने पुत्र के समान समझता था । एक बार हिन्दुओं ने मिलकर नवाब से प्रार्थना की कि पशुओं का वध नगर में न किया जाये क्योंकि इससे हमारा दिल दुखता है । नवाब ने उनकी प्रार्थना मान ली और पशु वध बंद कर दिया । इसी कारण चारण, भाट, डूम इत्यादि उसके विषय में गाया करते थे - जुग जुग जीओ नवाब फौजदार खां ।
पांच पुत्र पाचों श्रीश पांचों गुणनागर ।नख तुल्लेखां मुखराज करैं जो वंश उजागर ॥
नवाब फौजदार खां ईश्वर का बड़ा भक्त था । वह सत्संग करने के लिए एक बार भरतपुर गया । रूपराम ब्राह्मण, महाराजा भरतपुर का मन्त्री तथा महाराजा भरतपुर की महारानी गंगा भी ईश्वरभक्त थी, और भी वहां अनेक ईश्वरभक्त रहते थे । नवाब हाथी पर चढ़कर सत्संग करने के लिए ही रानी और मन्त्री के पास गया था । उसने महाराजा भरतपुर को अपने आने की कोई सूचना पहले नहीं भेजी थी । अतः वह पकड़कर जेल में डाल दिया गया । उन्हीं दिनों महारानी गंगा के यहां पुत्र उत्पन्न हुआ । नवाब को प्रातःकाल हाथी पर चढ़कर भ्रमण करने की आज्ञा मिली हुई थी । एक दिन वह भ्रमण के लिए जा रहा था तो महारानी के महल को देखकर पूछा कि यह महल किसका है ? किसी ने उत्तर दिया - यह महारानी गंगा का महल है । नबाब कवि था, उसने उसी समय कहा –
गंगा गंगा सब कहें यह गंगा वह नाय ।वह गंगा जगतारणी यह डोबे धारा मांह ॥
महारानी गंगा उस समय महल पर थी, उसने उसे सुनाने के लिए ही यह कहा था । उसने भी यह सुन लिया । रूपराम मन्त्री का भी महल मार्ग में आया । नवाब के पूछने पर किसी ने बताया कि यह मन्त्री रूपराम का महल है । नवाब ने उसी समय कविता में कहा –
रूपराम तब तें सुना जब तें पड़ो न कामकाम पड़े पायो नहीं तां में रूप न राम ॥
पुत्रोत्सव की प्रसन्नता में राजा ने दो सौ कैदियों को छोड़ने की आज्ञा दी । रूपराम ने दो सौ कैदियों में से सर्वप्रथम नवाब को छोड़ दिया । भरतपुर के महाराजा ने पीछे सूचना भेजी कि नवाब को न छोडे किन्तु वह पहले ही रूपराम के द्वारा छोड़ा जा चुका था । मंत्री रूपराम ने राजा के पास सूचना भेजी कि नवाब तो सत्संग करने के लिए आया था, बिना आज्ञा के नहीं आया । राजा की आज्ञा से वह एक मास तक भरतपुर में रहकर सत्संग करता रहा । राज्य की ओर से अतिथि के रूप में उसकी सेवा की गई । वह सत्संग करके सहर्ष फरुखनगर लौट गया ।
बराणी के ठाकुर
ठाकुर नौरंगसिंह छोटी बोन्द के निवासी थे । उनको ऊण ग्रामके पास फौजी अंग्रेज मिटकाफ साहब, जो काणा था, मिल गया । नौरंगसिंह ने उसको हलवा इत्यादि खिलाकर खूब सेवा की और फिर उसे सुरक्षित ऊँट पर बिठाकर भिवानीऔर हिसारपहुंचा दिया । इस सेवा के बदले उस अंग्रेज ने एक पत्र लिखकर ठाकुर साहब को दे दिया । उसी पत्र को देखकर जोन्ती के पास ठाकुरों को भूमि देना चाहा किन्तु ठाकुर के निषेध करने पर नवाब की भूमि में से 10 हजार बीघे जमीन छुछकवासके बीड़ में से देनी चाही, ठाकुर साहब ने कहा कि यह जमीन बहुत अधिक है । बड़ी कठिनता से 4 हजार बीघे जमीन स्वीकार की जहां आजकल बराणी ग्राम बसा हुआ है । कुछ जमीन 400 बीघे इनके संबन्धियों को खेतावासमें दी गई । इसी प्रकार की सेवा से छुछकवास के पठानों को 6 हजार बीघे भूमि का बीड़ दिया । मौड़ी वाले जाटों को भी इसे प्रकार की सेवा के बदले भूमि दी गई ।
बल्लभगढ़नरेश नाहरसिंह
1857 में भारतीय स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु प्रज्वलित प्रचण्ड समराग्नि में परवाना बनकर जलने वाले अगणित ज्ञात एवं अज्ञात नौनिहाल शहीदों में बल्लभगढ़ नरेश राजा नाहरसिंह का नाम अत्यन्त महत्वपूर्ण है । दिल्ली की जड़ में अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा लगाने का श्रेय इसी महावीर को मिला । रणक्षेत्र में उसे पराजित करना असंभव ही था क्योंकि अंग्रेज बल्लभगढ़को दिल्ली का "पूर्वी लोह द्वार" मानकर उससे भय-त्रस्त रहते थे और बल्लभगढ़ नरेश से युद्ध करने का साहस तक उनमें न था । राजा नाहरसिंह के जीते जी उनको किसी पेन्शन या उत्तराधिकार की भी ऐसी कोई उलझन न थी, जिसके कारण महारानी लक्ष्मीबाई या नाना साहब की भांति उनके व्यक्तिगत स्वार्थों को अंग्रेजों ने कोई धक्का पहुंचाया हो । फिर भी रोटी और लाल फूल का संकेत पाते ही राजा नाहरसिंह देश की स्वतन्त्रता की रक्षार्थ स्वेच्छा से समराग्नि में कूद पड़े और दिल्ली के पराभव के उपरान्त भी अंग्रेजों से नाक से चना बिनवाते रहे ।
यह थी उनकी निस्पृह देशभक्ति की प्रबल भावना जिससे अंग्रेज चकरा गए और अन्त में छल से सफेद झंडा दिखाकर धोखे से उन्हें दिल्ली लाए और वहां एक रात सोते हुए इस 'नाहर' को फिरंगियों ने कायरतापूर्वक जेल के सीखचों में बन्द कर दिया ।
गिरफ्तारी के बाद भी अंग्रेज बराबर यह चेष्टा करते रहे कि नाहरसिंह उनकी मित्रता स्वीकार कर लें, किन्तु वह महावीर तो उस फौलद का बना था जो टूट सकती है किन्तु झुकना नहीं जानती । परिणामतः अंग्रेजों की मैत्री को अस्वीकार करने के अपराध में राजा नाहरसिंह ने दिल्ली के ऐतिहासिक फव्वारे पर सहर्ष फांसी के तख्ते पर झूल कर जर्जर भारत माता का अपने रक्त से अभिषेक किया और एक महान् उद्देश्य की प्राप्ति के मार्ग में वह मरकर भी अमर हो गए ।
महत्वपूर्ण क्यों नहीं ?
यह दूसरी बात है कि विदेशी दासत्व के युग में लिखे गए भारतीय इतिहास ग्रन्थों में भारत के इस अमर नौनिहाल को वह महत्वपूर्ण स्थान नहीं दिया गया है जिसका वह वास्तविक अधिकारी है । पर क्या अब स्वतन्त्र भारत में भी हम इस पिछली भूल को दोहराते रहें ?
कदाचित् राजा नाहरसिंह के इस अमर बलिदान को दो कारणों से अधिक महत्त्व नहीं मिला । प्रथम तो यह कि बल्लभगढ़ उन रजवाड़ों में सबसे छोटा था जिन्होंने सन 1857 के स्वातन्त्र्य समर में खुल कर भाग लिया और उसमें अपना अस्तित्व ही लीन कर दिया । उगते सूर्य को नमस्कार करने वाली हमारी मनोवृत्ति इस डूबते सूर्य की ओर आकृष्ट नहीं हुई या फिर दूसरा कारण यह था कि राजा नाहरसिंह को फाँसी देने से पूर्व कूटनीतिज्ञ अंग्रेजों ने उन्हें जबरन "नाहर खाँ" प्रचारित करके जनता में एक भ्रम फैला दिया था । हिन्दू धर्मानुसार राजा अवध्य होता है, किन्तु अंग्रेजों के हित में इस राजा का मारा जाना उस समय अनिवार्य था । अस्तु ।
अंग्रेजों ने एक विरोधी शक्ति के रूप में राजनैतिक उद्देश्य से राजा नाहरसिंह के विरुद्ध जो कुछ भी किया, हम यहां उस पर विचार करना नहीं चाहते, क्योंकि स्वयं ब्रिटिश इतिहासकारों ने महाराजा नाहरसिंह का जिस रूप में उल्लेख किया है वही उनके व्यक्तित्व एवं वीरत्व की परख की उत्तम कसौटी है । यदि महाराजा और उनके पूर्वज अद्वितीय वीर, सुयोग्य सैन्य संचालक, चतुर राजनीतिज्ञ तथा प्रजा-वत्सल शासक न होते तो मुगल साम्राज्य की नाक के तले ही यह स्वतन्त्र जाट-राज्य बल्लभगढ़ शान से मस्तक उठाए यों खड़ा न रहता ।
मुगलों से सन्धि
बल्लभगढ़ का यह छोटा सा राज्य दिल्ली से केवल 20 मील दूर ही तो था । मुगल सिंहासन की जड़ में ही एक शक्तिशाली हिन्दू राज्य स्वयं मुगलों को ही कब सहन होता ? इतिहास साक्षी है कि बार बार शाही सेना ने बल्लभगढ़ पर आक्रमण किए । पर बल्लभगढ़ के सुदृढ़ दुर्ग की अजेयता को स्वीकार करके दिल्ली दरबार बल्लभगढ़ नरेशों के साथ मित्रता के स्थायी सम्बंध में बंध गया । नवयुवक राजा नाहरसिंह की यह दूरदर्शिता ही कही जायेगी कि इन्होंने दिन-दूने बढ़ने वाले अंग्रेजी खतरे का सामना करने की दृष्टि से मुगल बादशाह से मित्रता कर ली ।
मित्रता के साथ ही लड़खड़ाते मुगल साम्राज्य का बहुत सा उत्तरदायित्व भी राजा नाहरसिंह ने अपने कन्धों पर सम्भाला । परिणामतः दिल्ली नगर की सुरक्षा एवं सुव्यवस्था की बागडोर बादशाह ने राजा को दे दी । शाही दरबार में राजा नाहरसिंह को विशेष सम्मान के रूप में 'सोने की कुर्सी' मिलती थी और वह भी बादशाह के बिल्कुल समीप ।
इस प्रकार टूटते हुए मुगल साम्राज्य की ढ़ाल के रूप में सम्राट् बहादुरशाह के यदि कोई विश्वस्त सहायक थे तो वह राजा नाहरसिंह ही थे । हर संकट में वह दिल्ली की गद्दी की रक्षार्थ तत्पर रहते थे ।
परन्तु समय की गति तो किसी के रोके नहीं रुकती । धीरे-धीरे दिल्ली का तख्त अंग्रेजों के चंगुल में आता गया । यह दशा देखकर राजा नाहरसिंह सशंक हो उठे । उन्होंने रात-दिन दौड़-धूप करके सैन्य संगठन किया और इस योजना की सफलता के लिए यूरोपीय कप्तानों को अपनी सेना में सम्मानपूर्ण पद दिए । श्री पीयरसन को दिल्ली में बल्लभगढ़ राज्य का रेजीडेन्ट नियत किया तथा बल्लभगढ़ की सेना को यथासम्भव आधुनिक शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित किया ।
16 मई 1857 को जब कि दिल्ली फिर से आजाद हुई, राजा नाहरसिंह की सेना दिल्ली की पूर्वी सीमा पर तैनात हुई । शाही सहायता के लिए 15000 रुहेलों की फौज सजाकर मुहम्मद बख्त खां दिल्ली में आ चुका था किन्तु उसने भी पूर्वी मोर्चे की कमान राजा नाहरसिंह पर ही रहने दी । सम्राट् बहादुरशाह भी अपनी दाहिनी भुजा नाहरसिंह को ही मानते थे ।
मजबूत मोर्चाबन्दी
अंग्रेजी आधिपत्य से मुक्त राजधानी दिल्ली के 134 दिन के स्वतन्त्र जीवन में राजा नाहरसिंह ने रात दिन परिश्रम करके सुव्यवस्था बनाए रखने तथा मजबूत मोर्चाबन्दी करने का प्रयत्न किया । उन्होंने दिल्ली से बल्लभगढ़ तक फौजी चौकियां तथा गुप्तचरों के दल नियुक्त कर दिए । उनकी इस तैयारी से त्रस्त होकर ही सर जॉन लारेन्स ने पूर्व की ओर से दिल्ली पर आक्रमण करना स्थगित कर दिया । लार्ड केनिंग को लिखे गए एक पत्र में सर जॉन लारेन्स ने लिखा था - "यहां पूर्व और दक्षिण की ओर बल्लभगढ़ के नाहरसिंह की मजबूत मोर्चाबन्दी है और उस सैनिक दीवार को तोड़ना असंभव ही दीख पड़ता है, जब तक कि चीन अथवा इंग्लैंड से हमारी कुमक नहीं आ जाती ।"
यही हुआ भी - 13 सितंबर को जब अंग्रेजी पलटनों ने दिल्ली पर आक्रमण किया तब वह कश्मीरी दरवाजे की ओर से ही किया गया । एक बार जब गोरे शहर में घुस पड़े तब अधिकांश भारतीय सैनिक तितर-बितर होने लगे । बादशाह को भी किला छोड़कर हुमायूं के मकबरे में शरण लेनी पड़ी । इस बिगड़ी परिस्थिति में राजा ने बादशाह से बल्लभगढ़ चलने का आग्रह किया किन्तु इलाहीबख्श नामक एक अंग्रेज एजेन्ट के बहकाने से बादशाह ने हुमायूं के मकबरे से आगे बढ़ना अस्वीकार कर दिया ।
राजा नाहरसिंह की बात न मानने का प्रतिफल यह हुआ कि 21 सितंबर को कप्तान हड़सन ने चुपचाप बहादुरशाह को गिरफ्तार कर लिया । फिर भी राजा ने बहादुरी दिखाई और अंग्रेजी फौज को ही घेरे में डाल लिया । खतरे को पहचान कर कप्तान हडसन ने शाहजादों को गोली मार दी और सम्राट् को भी मार डालने की धमकी दी । अतः राजा ने सम्राट् की प्राणरक्षा की दृष्टि से घेराबन्दी उठा ली । दिल्ली के तख्त का यह अन्तिम अध्याय था ।
रणबांकुरे नाहरसिंह ने तब भी हिम्मत नहीं हारी । उसने रातों रात पीछे हटकर बल्लभगढ़ के किले में घुसकर नए सिरे से मोर्चा लगाया और आगरे की ओर से दिल्ली को बढ़ने वाली गोरी पलटनों की धज्जियां उड़ाई जाने लगीं । हजारों गोरे बन्दी बना लिये गए और अगणित बल्लभगढ़ के मैदान में धराशायी हुए । कहा जाता है कि बल्लभगढ़ में रक्त की नाली बहने लगी थी जिससे राजकीय तालाब का रंग रक्तिम हो गया था । सम्राट् के शहजादों के रक्त का बदला बल्लभगढ़ में ले लिया गया ।
धोखा
परन्तु चालाक अंग्रेजों ने धोखेबाजी से काम लिया और रणक्षेत्र में सन्धिसूचक सफेद झंडा दिखा दिया । चार घुड़सवार अफसर दिल्ली से बल्लभगढ़ पहुंचे और राजा से निवेदन करने लगे कि सम्राट् बहादुरशाह से सन्धि होने वाली है, उसमें आपका उपस्थित होना आवश्यक है । अंग्रेज आपसे मित्रता ही रखना अभीष्ट समझते हैं ।
भोला जाट नरेश अंग्रेजी जाल में फंस गया । उसने अंग्रेजों का विश्वास कर 500 चुने हुए जवानों के साथ दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दिया ।
इस प्रकार अंग्रेजी कूटनीति बल्लभगढ़ की स्वतन्त्रता का अभिशाप बनकर राजा नाहरसिंह के सम्मुख उपस्थित हुई । दिल्ली में प्रवेश करते ही छिपी हुई गोरी पलटन ने अचानक राजा नाहरसिंह को बन्दी बना लिया । उनके बहादुर साथियों को मार-काट दिया गया ।
दूसरे ही दिन पूरी शक्ति से अंग्रेजों ने बल्लभगढ़ पर आक्रमण कर दिया । वह सुदृढ़ दुर्ग जिसे अंग्रेज लौह द्वार कहते थे, तीन दिन तोप के गोलों से गले मिलता रहा । राजा ने अपने दुर्ग को गोला-बारूद का केन्द्र बना रखा था । बरसों तक लड़ने की क्षमता थी उस छोटे से किले में । किन्तु बिना सेनापति के आखिर कब तक लड़ा जा सकता था ?
उधर स्वाभिमानी राजा ने अंग्रेजों का मित्र बनने से साफ इन्कार कर दिया । उसने कहा - "शत्रुओं को सिर झुकाना मैंने सीखा नहीं है" । 36 वर्षीय राजा की सुन्दर लुभावनी मुखाकृति को देखकर हड़सन ने बड़ा दयाभाव दर्शाते हुए समझाया "नाहरसिंह ! मैं तुम्हें अब भी फांसी से बचा सकता हूँ । थोड़ा सा झुक जाओ ।" राजा ने हड़सन की ओर पीठ करते हुए उत्तर दिया - "कह दिया, फिर सुन लो । गोरे मेरे शत्रु हैं, मेरे देश के शत्रु हैं, उनसे क्षमा मैं कदापि नहीं मांग सकता । लाख नाहरसिंह कल पैदा हो जायेंगे ।"
नाहर के उपर्युक्त उत्तर से अंग्रेज बौखला गए । उन्होंने राजा को फांसी देने का निश्चय किया और चांदनी चौक में आधुनिक फव्वारे के निकट, जहां राजा नाहरसिंह का दिल्ली स्थित आवास था, उनको खुले आम फांसी देने की व्यवस्था की गई । दिल्ली की वह जनता जो किसी दिन राजा को शक्ति का देवता मानकर उसे अपनी सुरक्षा और सुव्यवस्था का अधिष्ठाता समझती थी, उदास भाव से गर्दन झुकाए, बड़ी संख्या में अन्तिम दर्शन को उपस्थित थी । उस दिन राजा की 36वीं वर्षगांठ थी जिसे मनाने के लिए वह वीर इस प्रकार फांसी के तख्ते के निकट आया मानो अपनी वर्षगांठ के उपलक्षय में तुलादान की तराजू के निकट आकर खड़ा हुआ हो । राजा के साथ उसके तीन अन्य विश्वस्त साथी और थे - खुशालसिंह, गुलाबसिंह और भूरासिंह । बल्लभगढ़ के ये चार नौनिहाल देशभक्ति के अपराध में साथ-साथ फांसी के तख्ते पर खड़े हुए ।
दिल्ली की जनता नैराश्यभाव से साश्रु इस हृदयविदारक दृश्य को देख रही थी । परन्तु राजा नाहरसिंह के मुखमंडल पर मलिनता का कोई चिन्ह न था, वरन् एक दिव्य तेज शत्रुओं को आशंकित करता हुआ उनके मुख-मंडल पर छाया हुआ था ।
चिंगारी बुझने न देना
अन्त में फांसी की घड़ी आई और हड़सन ने सिर झुका कर राजा से उनकी अन्तिम इच्छा पूछी । राजा ने सतेज स्वर में उत्तर दिया, "तुम से कुछ नहीं मांगना । परन्तु इन भयत्रस्त दर्शकों को मेरा यह सन्देश दो कि जो चिंगारी मैं आप लोगों में छोड़े जा रहा हूं उसे बुझने न देना । देश की इज्जत अब तुम्हारे हाथ है ।"
हड़सन समझ नहीं सका । उसने दुभाषिये की ओर इशारा किया । किन्तु दुभाषिये ने जब उसे राजा की यह इच्छा सुनाई तब वह सन्न रह गया और राजा की इस अन्तिम इच्छा को उपस्थित दर्शकों को कहने में अपनी असमर्थता प्रकट की ।
इस प्रकार राजा नाहरसिंह निस्वार्थ भाव से देश की बलिवेदी पर चढ़कर अमर हो गए । उनका पार्थिव उनके परिवार को नहीं दिया गया । अतः उनके राजपुरोहित ने राजा का पुतला बनाकर, गंगा किनारे अन्तिम संस्कार की रस्म पूरी की ।
हरयाणा प्रान्त के महान् योद्धा राव राजा तुलाराम
इस असार संसार में कितने ही मनुष्य जन्म लेते हैं और अपना सांसारिक जीवन सामाप्त कर मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं । संस्कृत के एक कवि का वचन है –
परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ।स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् ॥
अर्थात् इस संसार में वह मनुष्य ही पैदा हुआ है जिसके पैदा होने से वंश वा जाति उन्नति को प्राप्त होती है । वैसे तो इस संसार में कितने ही नर पैदा होते हैं और मरते हैं । इस वचन के अनुसार रेवाड़ी के राव राजा तुलाराम अपनी अपनी उद्दात्त कार्यावली से अपने प्रान्त एवं जाति को प्रकाशित कर गए ।
आज से 101 वर्ष पूर्व, जबकि ऋषियों एवं महान् योद्धाओं की पवित्र भूमि भारत विदेशी अंग्रेज जाति द्वारा पददलित की जा रही थी और अंग्रेज जाति इस राष्ट्र की फूट की बीमारी का पूर्ण लाभ उठाकर अपनी कूटनीति द्वारा इस राष्ट्र के विशाल मैदानों की स्वामिनी बन बैठी थी । इस विदेशी जाति ने मुसलमान बादशाहों एवं हिन्दू राजाओं को अपनी कूटनीति से बुरी तरह कुचला और इतना कुचला कि वे अपनी वास्तविकता को भूल ग्ये । किन्तु किसी जाति के अत्याचार ही दूसरी जाति को आत्म-सम्मान एवं आत्म-गौरव के रक्षार्थ प्रेरित करते हैं ।
ठीक इसी समय जबकि अंग्रेज जाति भारतीय जनता पर लोम-हर्षण अत्याचार कर रही थी और भारतीय जनता इसका बदला लेने की अन्दर ही अन्दर तैयारी कर रही थी, उसी समय 10 मई 1857 को चर्बी वाले कारतूस के धार्मिक जोश की आड़ में मेरठ में भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा बुलन्द कर ही तो दिया । प्रसुप्त भावनायें जाग उठीं, देश ने विलुप्त हुई स्वतन्त्रता को पुनः प्राप्त करने के लिए करवट बदली, राजवंशों ने तलवार तान स्वतन्त्रता देवी का स्वागत किया, समस्त राष्ट्र ने फिरंगी को दूर करने की मन में ठान ली ।
भला इस शुभ अवसर को उपस्थित देख स्वाधीन भावनाओं के आराधक राव राजा तुलाराम कैसे शान्त बैठते ? उन्होंने भी उचित अवसर देख स्वतन्त्रता के लिए शंख ध्वनि की । वीर राजा तुलाराम की ललकार को सुन हरयाणा के समस्त रणबांकुरे स्वतन्त्रता के झण्डे के नीचे एकत्रित हो, अपने यशस्वी नेताओं के नेतृत्व में चल दिए, शत्रु से दो हाथ करने के लिए दिल्ली की ओर ।
जब राव तुलाराम अपनी सेना के साथ दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे, तो मार्ग में सोहना और तावड़ू के बीच अंग्रेजी सेना से मुठभेड़ हो गई, क्योंकि फिरंगियों को राव तुलाराम के प्रयत्नों का पता चल गया था । दोनों सेनाओं का घमासान युद्ध हुआ । आजादी के दीवाने दिल खोल कर लड़े और मैदान जीत लिया । मिस्टर फोर्ड को मुंह की खानी पड़ी और उसकी सारी फौज नष्ट हो गई और वह स्वयं दिल्ली भाग आया ।
उधर मेरठमें स्वाधीनता यज्ञ को आरम्भ करने वाले राव राजा तुलाराम के चचेरे भाई राव कृष्ण गोपाल जो नांगल पठानी (रेवाड़ी) के राव जीवाराम के द्वितीय पुत्र थे और मेरठ में कोतवाल पद पर थे, उन्होंने समस्त कैदखानों के दरवाजों को खोल दिया तथा नवयुवकों को स्वतन्त्रता के लिए ललकारा और समस्त वीरों को स्वाधीनता के झण्डे के नीचे एकत्र किया । अपने साथियों सहित जहां अंग्रेज विद्रोह का दमन करने के लिए परामर्श कर रहे थे, उस स्थान पर आक्रमण किया तथा समस्त अंग्रेज अधिकारियों का सफाया कर दिया और फिर मार-धाड़ मचाते अपने साथियों सहित दिल्ली की तरफ बढ़े ।
दिल्ली आये । भारत के अन्तिम मुगल सम्राट् बहादुरशाह के समीप पहुंचे । अकबर, जहांगीर आदि के चित्रों को देख-देख ठण्डी आहें भरकर अपने पूर्वजों के वैभव को इस प्रकार लुटता देख बहादुरशाह चित्त ही चित्त में अपने भाग्य को कोसा करता था । आज उसने सुना कि कुछ भारतीय सैनिक मेरठ में स्वाधीनता का दीपक जलाकर तेरे पास आये हैं । उनका सोया हुआ मुगल-शौर्य जाग उठा । तुरन्त वीर सेनापति कृष्णगोपाल ने आगे बढ़कर कहा - जहांपनाह ! उठो, अपनी तलवार संभालो, अपना शुभाशीर्वाद दो, जिससे हम अपनी तलवार द्वारा भारतभूमि को फिरंगियों से खाली कर दें । बादशाह ने डबडबाई सी आंखें खोलकर कहा - मेरे वीर सिपाही ! क्या करूं ? आज मेरे पास एक सोने की ईंट भी नहीं जो तुम्हें पुरस्कार में दे सकूं ।
वीर कृष्णगोपाल साथियों सहित गर्ज उठे - "महाराज, हमें धन की आवश्यकता नहीं है, हम इस प्रशस्त मार्ग में आपका शुभाशीर्वाद चाहते हैं । हम संसार की धन-दौलत को अपनी तलवार से जीतकर आपके चरणों पर ला डालेंगे ।"
वीर की सिंहगर्जना सुनकर वृद्ध बादशाह की अश्रुपूर्ण आंखें हो गईं और कह ही तो दिया कि –
"गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की ।तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिन्दुस्तान की ।"
राव कृष्णगोपाल को तब यह समाचार मिला कि रेवाड़ी में राजा तुलाराम स्वतन्त्रता के लिए महान् प्रयत्न कर रहे हैं, तो वे स्वयं अपने साथियों सहित रेवाड़ी पहुंच गए । उन्हीं दिनों मि० फोर्ड से युद्ध के ठीक उपरान्त राजा तुलाराम ने अपने प्रान्त की एक सभा बुलाई । इस सभा में महाराजा अलवर, राजा बल्लभगढ़, राजा निमराणा, नवाब झज्जर, नवाब फरुखनगर, नवाब पटौदी, नवाब फिरोजपुर झिरका शामिल हुए । राम तुलाराम ने अपने विशेष मित्र महाराजा जोधपुर को विशेष रूप से निमन्त्रित किया किन्तु उन्होंने राव तुलाराम को लिखकर भेज दिया कि अंग्रेज बहादुर से लोहा लेना कोई सरल कार्य नहीं है । नवाब फरुखनगर, नवाब झज्जर एवं नवाब फिरोजपुर झिरका ने भी नकारात्मक उत्तर दे दिया । इस पर उनको बड़ा क्रोध आया और उन्होंने सभा में ही घोषणा कर दी कि "चाहे कोई सहायता दे या न दे, वह राष्ट्र के लिए कृत-प्रतिज्ञ हैं ।" अपने अन्य वीर साथियों की तरफ देखकर उनका वीर हृदय गर्ज उठा - "हे भारतमाता ! मैं सब कुछ तन, मन, धन तुम्हारी विपत्तियों को नष्ट करने में समर्पित कर दूंगा । यह मेरी धारणा है । भगवान् सूर्य ! मुझे प्रकाश दो । भूमि जननी ! मुझे गम्भीरता दो, वायु शान्ति दो और दो बाहुओं में अपार बल, जो सच्चे चरित्र के नाम पर मर मिटे तथा मार भगाये कायरता को हृदय मंदिरों से ।" आओ वीरो ! अब सच्चे क्षत्रियत्व के नाते इस महान् स्वाधीनता युद्ध (यज्ञ) को पूरा करें ।" उनकी इस गर्जना से प्रभावित होकर उपरोक्त राजा, नवाबों के भी पर्याप्त मनचले नवयुवक योद्धा राजा तुलाराम की स्वाधीनता सेना में सम्मिलित हो गये जिनमें नवाब झज्जर के दामाद समदखां पठान भी थे ।
राजा तुलाराम ने अंग्रेजों के विरुद्ध और नई सेना भी भरती की और स्वातन्त्र्य-संग्राम को अधिक तेज कर दिया । उन्होंने अपने चचेरे भाई गोपालदेव को सेनापति नियत किया । जब अंग्रेजों को यह ज्ञात हुआ कि राव तुलाराम हम से लोहा लेने की पुरजोर तैयारी कर रहे हैं और आस-पास के राजाओं एवं नवाबों को हमारे विरुद्ध उभार रहे हैं तो मि० फोर्ड के नेतृत्व में पुनः एक विशाल सेना राव तुलाराम के दमन के लिए भेजी । जब राव साहब को यह पता चला कि इस बार मि० फोर्ड बड़े दलबल के साथ चढ़ा आ रहा है तो उन्होंने रेवाड़ी में युद्ध न करने की सोच महेन्द्रगढ़ के किले में मोर्चा लेने के लिए महेन्द्रगढ़ की ओर प्रस्थान किया । अंग्रेजों ने आते ही गोकुलगढ़ के किले तथा राव तुलाराम के निवासघर, जो रामपुरा (रेवाड़ी) में स्थित है, को सुरंगें लगाकर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और तुलाराम की सेना के पीछे महेन्द्रगढ़ की तरफ कूच किया ।
राव तुलाराम ने पर्याप्त प्रयत्न किया कि किसी प्रकार महेन्द्रगढ़ किले के फाटक खुल जावें, किन्तु दुर्ग के अध्यक्ष ठाकुर स्यालुसिंह कुतानी निवासी ने हजार विनती करने पर भी किले के द्वार आजादी के दीवानों के लिए नहीं खोले । (बाद में अंग्रेजों ने दुर्ग न खोलने के उपलक्ष्य में स्यालुसिंह को समस्त कुतानी ग्राम की भूमि प्रदान कर दी ।)
वीर सेनापति तुलाराम दृढ़ हृदय कर, असफलताओं को न गिनते हुए नारनौल के समीप एक पहाड़ी स्थान नसीबपुर के मैदान में साथियों सहित वक्षस्थल खोलकर रणस्थल में डट गये । अंग्रेजों के आते ही युद्ध ठन गया । भीषण युद्ध डटकर हुआ । रणभेरियां बज उठीं । वीरों के खून में उबाल था । गगनभेदी जयकारों से तुमुल निनाद गुंजार करने लगा । साधन न होने पर भी सेना ने संग्राम में अत्यन्त रणकौशल दिखाया । रक्त-धारा बह निकली । नरमुंडों से मेदिनी मंडित हो गई । शत्रु सेना में त्राहि-त्राहि की पुकार गूंज उठी ।
तीन दिन तक भीषण युद्ध हुआ । तीसरे दिन तो इतना भीषण संग्राम हुआ कि हिन्दू कुल गौरव महाराणा प्रताप के घोड़े की भांति राव तुलाराम का घोड़ा भी शत्रु सेना को चीरते हुए अंग्रेज अफसर (जो काना साहब के नाम से विख्यात थे) के हाथी के समीप पहुंचा । पहुंचते ही सिंहनाद कर वीरवर तुलाराम ने हाथी का मस्तक अपनी तलवार के भरपूर वार से पृथक् कर दिया । दूसरे प्रहार से काना साहब को यमपुर पहुंचाया ।
काना साहब के धराशायी होते ही शत्रु सेना में भगदड़ मच गई । शत्रु सेना तीन मील तक भागी । मि० फोर्ड भी मैदान छोड़ भागे और दादरी के समीप मोड़ी नामक ग्राम में एक जाट चौधरी के यहां शरण ली । बाद में मि० फोर्ड ने अपने शरण देने वाले चौधरी को जहाजगढ़ (रोहतक) के समीप बराणी ग्राम में एक लम्बी चौड़ी जागीर दी और उस गांव का नाम फोर्डपुरा रखा, वहां पर आजकल उस चौधरी के वंशज निवास करते हैं ।
परन्तु इस दौरान में पटियाला, नाभा, जीन्दएवं जयपुरकी देशद्रोही नागा फौज के अंग्रेजों की सहायता के लिए आ जाने से पुनः भीषण युद्ध छिड़ गया । वीरों ने अन्तिम समय सन्निकट देखकर घनघोर युद्ध किया परन्तु अपार सेना के समक्ष अल्प सेना का चारा ही क्या चलता ? इसी नसीबपुर के मैदान में राजा तुलाराम के महान् प्रतापी योद्धा, मेरठ स्वाधीनता-यज्ञ को आरम्भ करने वाले, अहीरवाल के एक-एक गांव में आजादी का अलख जगाने वाले, राव तुलाराम के चचेरे भाई वीर शिरोमणि राव कृष्णगोपाल एवं कृष्णगोपाल के छोटे भाई वीरवर राव रामलाल जी और राव किशनसिंह, सरदार मणिसिंह, मुफ्ती निजामुद्दीन, शादीराम, रामधनसिंह, समदखां पठान आदि-आदि महावीर क्षत्रिय जनोचित कर्त्तव्य का पालन करते हुए भारत की स्वातन्त्र्य बलिवेदी पर बलिदान हो गये । उन महान् योद्धाओं के पवित्र रक्त से रंजित होकर नसीबपुर के मैदान की वीरभूमि हरयाणा का तीर्थस्थान बन गई । दुःख है कि आज उस युद्ध को समाप्त हुए एक शताब्दि हो गई किन्तु हरयाणा निवासियों ने आज तक उस पवित्र भूमि पर उन वीरों का कोई स्मारक बनाने का प्रयत्न ही नहीं, साहस भी न किया । यदि भारत के अन्य किसी प्रान्त में इतना बलिदान किसी मैदान में होता तो उस प्रान्त के निवासी उस स्थान को इतना महत्व देते कि वह स्थान वीरों के लिए आराध्य-भूमि बन जाता तथा प्रतिवर्ष नवयुवक इस महान् बलिदान-भूमि से प्रेरणा प्राप्त कर अपना कर्त्तव्य पालन करने के लिए उत्साहित होते ।
आज मराठों की जीवित शक्ति ने सन् 1857 के स्वातन्त्र्य युद्ध की अमर सेनानी लक्ष्मीबाई एवं तांत्या टोपे नाना साहब के महान् बलिदान को अंग्रेजों के प्रबल दमनचक्र के विपरीत भी समाप्त नहीं होने दिया । अंग्रेजों के शासन काल में भी उपर्युक्त वीरों का नाम भारत के स्वातन्त्र्य-गगन में प्रकाशित होता रहा । बिहार के बूढ़े सेनापति ठा. कुंवरसिंह के बलिदान को बिहार निवासियों ने जीवित रखा । जहां कहीं भी कोई बलिदान हुआ, किसी भी समय हुआ, वहां की जनता ने अपने प्राचीन गौरव के प्रेरणाप्रद बलिदानों को जीवित रखा । आज मेवाड़ प्रताप का ही नहीं, अपितु उसके यशस्वी घोड़े का "चेतक चबूतरा" बनाकर प्रतिष्ठित करता है । चूड़ावत सरदार के बलिदान को "जुझार जी" का स्मारक बनाकर जीवित रखे हुए हैं । परन्तु अपने को भारत का सबसे अधिक बलशाली कहने वाला हरयाणा प्रान्त अपने 100 वर्ष पूर्व के बलिदान को भुलाये बैठा है । यदि यह लज्जा का विषय नहीं तो क्या है ? जर्मन के महान् विद्वान मैक्समूलर लिखते हैं - A nation that forgets the glory of its past, loses the mainstay of its national character. अर्थात् जो राष्ट्र अपने प्राचीन गौरव को भुला बैठता है, वह राष्ट्र अपनी राष्ट्रीयता के आधार स्तम्भ को खो बैठता है । यही उक्ति हरयाणा के निवासियों पर पूर्णतया चरितार्थ होती है ।
नसीबपुर के मैदान में राव तुलाराम हार गये और अपने बचे हुए सैनिकों सहित रिवाड़ी की तरफ आ गये । सेना की भरती आरम्भ की । परन्तु अब दिन प्रतिदिन अंग्रेजों को पंजाब से ताजा दम सेना की कुमुक मिल रही थी ।
निकलसन ने नजफगढ़ के स्थान में नीमच वाली भारतीय सेनाओं के आपसी झगड़े से लाभ उठाकर दोनों सेनाओं को परास्त कर दिया । सारांश यह है कि अक्तूबर 1857 के अन्त तक अंग्रेजों के पांव दिल्ली और उत्तरी भारत में जम गये । अतः तुलाराम अपने नये प्रयत्न को सफल न होते देख बीकनेर, जैसलमेर पहुंचे । वहां से कालपी के लिए चल दिये । इन दिनों कालपी स्वतन्त्रता का केन्द्र बना हुआ था । यहां पर पेशवा नाना साहब के भाई, राव साहब, तांत्या टोपे एवं रानी झांसी भी उपस्थित थी । उन्होंने राव तुलाराम का महान् स्वागत किया तथा उनसे सम्मति लेते रहे । इस समय अंग्रेजों को बाहर से सहायता मिल रही थी । कालपी स्थित राजाओं ने परस्पर विचार विमर्श कर राव राजा तुलाराम को अफगानिस्तान सहायता प्राप्त करने के उद्देश्य से भेज दिया । राव तुलाराम वेष बदलकर अहमदाबाद और बम्बई होते हुए बसरा (ईराक) पहुंचे । इस समय इनके साथ श्री नाहरसिंह, श्री रामसुख एवं सैय्यद नजात अली थे । परन्तु खाड़ी फारस के किनारे बुशहर के अंग्रेज शासक को इनकी उपस्थिति का पता चल गया । भारतीय सैनिकों की टुकड़ी जो यहां थी, उसने राव तुलाराम को सूचित कर दिया और वे वहां से बचकर सिराज (ईरान) की ओर निकल गये । सिराज के शासक ने उनका भव्य स्वागत किया और उन्हें शाही सेना की सुरक्षा में ईरान के बादशाह के पास तेहरान भेज दिया । तेहरान स्थित अंग्रेज राजदूत ने शाह ईरान पर उनको बन्दी करवाने का जोर दिया, शाह ने निषेध कर दिया । तेहरान में रूसी राजदूत से राव तुलाराम की भेंट हुई और उन्होंने सहायता मांगी और राजदूत ने आश्वासन भी दिया । परन्तु पर्याप्त प्रतीक्षा के पश्चात् राव तुलाराम ने अफगानिस्तान में ही भाग्य परखने की सोची । उनको यह भी ज्ञात हुआ कि भारतीय स्वातन्त्र्य संग्राम में भाग लेने वाले बहुत से सैनिक भागकर अफगानिस्तान आ गये हैं । राजा तुलाराम डेढ़ वर्ष पीछे तेहरान से अमीर काबुल के पास आ गये, जो उन दिनों कंधार में थे । वहां रहकर बहुत प्रयत्न किया परन्तु सहायता प्राप्त न हो सकी । राव तुलाराम को बड़ा दुःख हुआ और छः वर्ष तक अपनी मातृभूमि से दूर रहकर उसकी पराधीनता की जंजीरों को काटने के प्रयत्न में एक दिन काबुल में पेचिस द्वारा इस संसार से प्रयाण कर गये । उन्होंने वसीयत की कि उनकी भस्म रेवाड़ी और गंगा जी में अवश्यमेव भेजी जावे । ब्रिटिश शासन की ओर से 1857 के स्वातन्त्र्य संग्राम में भाग लेने वालों के लिए सार्वजनिक क्षमादान की सूचना पाकर उनके दो साथी राव नाहरसिंह व राव रामसुख वापस भारत आये ।
लेख को समाप्त करते हुए अन्तरात्मा रो उठती है कि आज भारतीय जनता उस वीर शिरोमणि राव तुलाराम के नाम से परिचित तक नहीं । मैं डंके की चोट पर कहता हूं कि यदि झांसी की लक्ष्मीबाई ने स्वातन्त्र्य-संग्राम में सर्वस्व की बलि दे दी, यदि तांत्या टोपे एवं ठाकुर कुंवरसिंह अपने को स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर उत्सर्ग कर गये - यदि यह सब सत्य है तो यह भी सुनिर्धारित सत्य है कि सन् 1857 के स्वातन्त्र्य महारथियों में राव तुलाराम का बलिदान भी सर्वोपरि है । किन्तु हमारी दलित भावनाओं के कारण राजा तुलाराम का बलिदान इतिहास के पृष्ठों से ओझल रहा । आज भी अहीरवाल में जोगी एवं भाटों के सितारे पर राजा तुलाराम की अमर गाथा सुनी जा सकती है । किं बहुना, एक दिन उस वीर सेनापति राव तुलाराम के स्वतन्त्रता शंख फूंकने पर अहीरवाल की अन्धकारावृत झोंपड़ियों में पड़े बुभुक्षित नरकंकालों से लेकर रामपुरा (रेवाड़ी) के गगनचुम्बी राजप्रसादों की उत्तुंग अट्टालिकाओं में विश्राम करने वाले राजवंशियों तक ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध किये जा रहे स्वातन्त्र्य आन्दोलन में अपनी तलवार के भीषण वार दिखाकर क्रियात्मक भाग लिया था । आज भी रामपुरा एवं गोकुलगढ़ के गगन-चुम्बी पुरातन खंडहरावशेष तथा नसीबपुर के मैदान की रक्तरंजित वीरभूमि इस बात की साक्षी दे रहे हैं कि वे अपने कर्त्तव्य पालन में किसी से पीछे नहीं रहे ।
इस प्रान्त को स्वातन्त्र्य-युद्ध में भाग लेने का मजा तुरन्त ब्रिटिश सरकार ने चखा दिया । राव तुलाराम के राज्य की कोट कासिम की तहसील जयपुर को, तिजारा व बहरोड़ तहसील अलवर को, नारनौल व महेन्द्रगढ़ पटियाला को, दादरी जीन्द को, बावल तहसील नाभा को, कोसली के आस-पास का इलाका जिला रोहतक में और नाहड़ तहसील के चौबीस गांव नवाब दुजाना को पुरस्कार रूप में प्रदान कर दिया । यह था अहीरवाल का स्वातन्त्र्य संग्राम में भाग लेने का परिणाम, जो हमारे संगठन को अस्त-व्यस्त करने का कारण बना । और यह एक मानी हुई सच्चाई है कि आज अहीर जाति का न तो पंजाब में कोई राजनैतिक महत्व है और न राजस्थान में । सन् 1857 से पूर्व इस जाति का यह महान् संगठन रूप दुर्ग खड़ा था, तब था भारत की राजनीति में इस प्रान्त का अपना महत्व ।
अन्त में भारतवर्ष के स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास लेखकों से यह आशा करता हूं कि वे भारत के नवीन इतिहास में इस वीर प्रान्त की आहुति को उपयुक्त स्थान देना न भूलेंगे ।
जब करनाल के वीरों ने अंग्रेजों के दांत खट्टे किये
(पृष्ठ - 483-484)
प्रथम स्वातन्त्र्य समर में देहली से जब स्वतन्त्रता की लहरें उठीं तो इसका पूरा प्रभाव जिला करनाल पर भी पड़ा । देहली और अम्बाला के बीच में जिला करनालएक प्रसिद्ध ऐतिहासिक नगर है और जिला करनाल को यह अधिकार जगतप्रसिद्ध महाभारत-युद्ध के काल से ही पितृ-संपत्ति की भांति प्राप्त है । जिला करनाल भारत के इतिहास को सदा उज्जवल करता रहा है । सन् 1857 के स्वातन्त्र्य समर में यह किस प्रकार पीछे रह सकता था ? सन् 1857 के युद्ध नेता श्री नाना साहब की दूरदर्शिता तथा अजीमुल्ला के सहयोग के कारण इलाहाबाद, झांसी और देहली के लोग सन् 1857 के स्वातन्त्र्य युद्ध के लिए कटिबद्ध हो गये । 16 अप्रैल 1857 में नानासाहब और अजीमुल्ला तीर्थयात्रा के बहाने से थानेसर पधारे । उस समय अंग्रेज प्रधान सेनापति डानसन का केन्द्र अम्बाला ही था ।
नानासाहब की योजना थी कि जब देहली के लोग अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करें तब अम्बाला से अंग्रेजी सेना और उनका प्रधान सेनापति अंग्रेजों की सहायता न कर सके । इसके लिए थानेसर, करनाल और पानीपत जैसे पुराने ऐतिहासिक नगर जो बड़ी सड़क देहली-अम्बाला विभाग पर निवास करते थे, उनको उत्साहित किया जिससे अंग्रेजी सर्प यदि देहली की ओर बढ़े तो मध्य में ही उसके सिर को कुचल दें । नानासाहब और इनके सहयोगी अजीमुल्ला अंग्रेजों की प्रत्येक कूटनीति को भली प्रकार से जानते थे । थानेसर के पश्चात् नानासाहब करनाल और पानीपत गये । इस नगर के निकटवर्ती देहातों के प्रसिद्ध व्यक्तियों से मिले । योजना तैयार की गई । थानेसर की ब्राह्मण पंचायत ने नानासाहब से प्रतिज्ञा की कि हम आपका यह सन्देश हरयाणा प्रान्त के प्रत्येक ग्राम में पहुंचायेंगे । वास्तव में ऐसा ही हुआ । एतत्पश्चात् कुरुक्षेत्र के पवित्र तीर्थों का 'लाल कमल' सन्देश हरयाणा प्रान्त के प्रत्येक घर पहुँचा ।
नानासाहब के चले जाने पर जिला करनाल के नेताओं ने गुप्त सभा करके अम्बाला के स्वतन्त्रता को दबाने वाले प्रत्येक कर्मचारी के घर को फूंकने का प्रस्ताव पारित किया । इसके पश्चात् प्रतिदिन कर्मचारियों के घरों में आग लगाने की सूचना प्रधान सेनापति अम्बाला के पास जाने लगी । अपराधियों की खोज के लिए सहस्रों रुपये का पारितोषिक रखा गया परन्तु सफलता प्राप्त न हुई और विवशतावश गवर्नर जनरल को लिखना पड़ा ।
जब 18 मई 1857 को करनाल में देहली पर आक्रमण की सूचना मिली तो थानेसर में स्थित सैनिकों ने जनता के साथ मिलकर अंग्रेज कर्मचारियों को मारकर शहर पर अधिकार कर लिया । 20 मई तक देहली अम्बाला सड़क सर्वथा बन्द रही और अंग्रेजी सेना देहली में सहायतार्थ जाने से रोकी गई । 21 मई 1857 को स्वतन्त्रता के शत्रु महाराजा पटियाला की सेना ने अंग्रेजों की सहायता की । स्वतन्त्रता प्रेमियों को कुचल दिया गया । स्वराज्य के दीवाने हिसार के रांघड़ों को जेल में बन्द करके कड़ा पहरा बिठाया गया । परन्तु अंग्रेजों को भय था कि कैथल के राजपूत 31 मई को इनको छुड़ाने के लिए आक्रमण करेंगे । इसलिए स्वतन्त्रता के प्रेमियों को अम्बाला की जेल में भेजना पड़ा ।
19 जून 1857 को महाराजा पटियाला अपनी सेना सहित अपने राज्य की रक्षा के लिए चला गया । प्रान्त के लोगों ने पुनः थानेसर पर अधिकार कर लिया । थानेसर के देशद्रोही चौहान राजपूतों ने अंग्रेजों की सहायता की ।
सन् 1857 में कैथल में अंग्रेज रजिडेन्ट मिस्टर मैकब था । जून 1857 में पाटी के जाटों ने कैथल पर आक्रमण कर उस पर अपना अधिकार कर लिया । अंग्रेजी सेना को तलवार का पानी पिलाया । मिस्टर मैकब अपने परिवार सहित ग्राम मोढ़ी में छुपे । फतेहपुर के कलालों ने मिस्टर मैकब को परिवार सहित मार दिया । जिस समय अंस की आज्ञानुसार प्रधान सेनापति हडसन फतेहपुर को तोपों से उड़ाने के लिए करनाल से रोहतक जा रहा था, तब एक कलाल ने मिस्टर मैकब को मारने का उत्तरदायित्व लिया परन्तु उसे तोप के मुंह पर बांधकर उड़ाया गया । इस वीर के बलिदान ने समस्त ग्राम को बचा लिया, निर्दयी हडसन ग्रामों में जनता के साधारण लोगों को मारता हुआ रोहतक की ओर चला गया ।
कम्पनी सरकार की आज्ञा से महाराजा पटियाला और महाराजा जीन्द ने थानेसर और पानीपत को अधिकृत करके अंग्रेजों को पंजाब की ओर से निश्चिन्त कर दिया । सिख आरंभ से ही अंग्रेजों के साथ थे । जिला करनाल के जाटों और राजपूतों को बुरी तरह कुचला गया । 25 मई सन् 1857 को अंस अम्बाला से देहली की ओर जा रहा था परन्तु विसूचिका (हैजा) से मार्ग में ही हत्यारे को जीवन से हाथ धोने पड़े ।
अंग्रेजों ने करनाल को मेरठ पर आक्रमण करने का केन्द्र बनाया । जमना पार आक्रमण किया गया, परन्तु असफलता मिली । अम्बाला से देहली के मार्ग में हजारों लोगों को पकड़ कर कोर्ट मार्शल के पश्चात् अत्यन्त बुरे ढ़ंग से मारा जाता था । हजारों हिन्दुस्तानियों को फांसी की रस्सी से लटका दिया गया । इनके सिरों के बाल एक-एक करके उखाड़े गये । इनके शरीरों को संगीनों से नोचा गया । भालों और संगीनों से हिन्दू व देहातियों के मुख में गोमांस डालकर उनका धर्म भ्रष्ट किया गया । इस प्रकार जिला करनाल के असंख्य लोगों ने असंख्य बलिदान इस स्वतन्त्रता युद्ध में दिये ।
सर्वखापपंचायत का योगदान
लेखक - चौ. कबूल सिंह (मन्त्री, सर्वखापपंचायत)
(पृष्ठ - 485-486 )
सं० १९१४ वि० (1857 ई०) में भारतीयों ने अंग्रेजी राज्य को भारत से उखाड फेंकने के लिए प्रथम यत्न किया । सैनिक विद्रोह भी हुआ । जनता ने पूरी शक्ति लगाई । यह यत्न यद्यपि सफल न हो सका परन्तु इससे अंग्रेजों की मनोवृत्ति अवश्य बदली ।
विरोधी
अंग्रेजी राज्य के विरोधी और विरोध के कारण नीचे लिखे जाते हैं ।
1.अंग्रेजों का प्रथम विरोधी हरयाणासर्वखापपंचायत का संगठन था क्योंकि –
क - अंग्रेजों ने गरीब किसानों पर अत्याचार किये । अन्न बलपूर्वक लेते थे । किसानों और गरीबों से बेगार लेते थे । कारीगरों की देशी चीजों को बाहर नहीं जाने देते थे । छोटे मोटे व्यापार धन्धे नष्ट कर डाले ।
ख - अदालतें बनाकर पंचायतों के संगठन और शक्ति को नष्ट कर डाला । लोगों के आपसी झगड़े अदालतों में जाने लगे । गरीबों की लुटाई होने लगी । झूठ, मक्कारी, बेईमानी और रिश्वत फैलाई जाने लगी । लोग तंग हो गये ।
ग - किसानों पर साहूकारों के अत्याचार बढ़ने लगे ।
घ - अंग्रेजी माल जबरदस्ती बेचा जाने लगा ।
ङ - अच्छे-अच्छे आचार वाले कुलों को दबाया जाने लगा ।
च - पंचायती नेताओं का अपमान किया जाने लगा ।
इन कारणों से सर्वखाप पंचायत ने सबसे पहले अंग्रेजों के विरोध में झंडा ऊँचा किया । हरयाणा सर्वखाप पंचायत के दो भाग किये । जमना आर और पार । पंचायत ने दोनों ओर देहली को केन्द्र मानकर मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बुलन्दशहर, बहादुरगढ़, रेवाड़ी, रोहतक और पानीपत में अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंका जिसके कारण भारी कष्ट सहन किये । जनता कोल्हू में पेली गई । जायदाद छीन ली गई । खेद है कि यह जायदाद अब तक नहीं लौटाई गई है ।
2.दूसरा विरोधी दल मराठों का था क्योंकि मराठों का राज्य छिन गया था ।
3.तीसरा दल उन मुसलमानों का था जिनको कि अंग्रेजों ने अपमानित किया था और जागीरें हड़प ली थीं । नवाबों को कंगाल बना दिया था ।
4.यह दल पंडे-पुजारियों और मुल्ला-मौलवियों का था क्योंकि इनके पास धर्म और मजहब के नाम पर जो जायदाद थी, वह छीनी गई ।
5.अनेक जागीरदारों की भूमि छीन ली गई और दूसरों को दे दी गई ।
6.पुराने कर्मचारी नौकरी से निकाल दिए गये थे ।
7.जनता के साथ की गई प्रतिज्ञाओं को तोड़ दिया गया और अंग्रेजों के वचन से विश्वास उठ गया ।
8.ईसाई धर्म का प्रचार राज्य के बल पर किया जाने लगा था । इंग्लैंड की पार्लियामेंट में ऐसा करने का भाषण दिया गया था ।
9.पण्डारी दल के मार्ग में बाधा डाली गई ।
10.बड़े-बड़े राजनैतिक दल समाप्त किये जा रहे थे ।
11.भारतीय सेना में नये कारतूस दिए गए जो कि दांत लगाकर काटने पड़ते थे । इससे हिन्दू और मुसलमान सैनिकों में असन्तोष बढ़ा ।
इसी प्रकार भिन्न-भिन्न कारणों से भारतीय जनता, राजा, नवाब और अन्य दलों में असन्तोष हुआ ।
बहादुरशाह का पत्र
देहली के बहादुरशाह बादशाह ने ऐसे समय सर्वखाप पंचायत के प्रधान को एक पत्र लिखा जिसका आशय यह है -
"सर्वखाप पंचायत के नेताओ ! अपने पहलवानों को लेकर फिरंगी को निकालो । आप में शक्ति है । जनता आपके साथ है । आपके पास योग्य वीर और नेता हैं । शाही कुल में नौजवान लड़के हैं परन्तु इन्होंने कभी युद्ध में बारूद का धुआँ नहीं देखा । आपके जवानों ने अंग्रेजी सेना की शक्ति की कई बार जाँच की है । आजकल यह राजनैतिक बात है के नेता राजघराने का हो । परन्तु राजा और नवाब गिर चुके हैं । इन्होंने अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार कर ली है । आप पर देश को अभिमान और भरोसा है । आप आगे बढ़ें । फिरंगी को देश से निकालें । निकलने पर एक दरबार किया जाये और राजपाट स्वयं पंचायत संभाले । मुझे कुछ उजर नहीं होगा ।"
इस पत्र को पाकर पंचायत ने अपने शक्ति का संग्रह करना आरम्भ किया और अन्य शक्तियों से सम्पर्क बढ़ाया ।
हरद्वारमें नाना साहब और अजीमुल्ला पंचायत नेताओं से मिले ।
नेता
आन्दोलन के मुख्य नेता यह थे - नाना साहब, तांत्या टोपे, झाँसी की रानी, कुंवरसिंह, अजीमुल्ला, बख्त खाँ पठान आदि । पंचायतों के दो नेता चुने गये - नाहरसिंह सूबेदार और हरनामसिंह जमादार ।
परिणाम
जो कुछ परिणाम हुआ, आपको ज्ञात है । आन्दोलन सफल न हो सका ।
विफलता के कारण
यद्यपि सब पेशों और सम्प्रदायों के लोग आन्दोलन में थे । परन्तु शीघ्रता करने से शक्ति संग्रह न हो सका । अंग्रेजों ने फाड़ने की नीति से काम लिया और उनकी सेना नए शस्त्रों से सुसज्जित थी । राजा और नवाबों की शक्ति अलग रही । मराठों में आपसी झगड़े थे । यह कारण सबको ज्ञात है । हमने उन बातों पर ही प्रकाश डाला है जो कि इतिहास के पत्रों पर नहीं लिखी गई ।
Digital text of the printed book prepared by - Dayanand Deswal दयानन्द देसवाल
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01/21/13--06:26: पुरानी बोतल में राहुल ( नयी शराब ) का नशा होगा ? (chan 7710543)
क्या हैं राहुल गांधी की पाँच चुनौतियाँ?
राजेश जोशी
बीबीसी संवाददाता
सोमवार, 21 जनवरी, 2013 को 15:43 IST तक के समाचार
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राहुल गाँधी
अगर सत्ता ज़हर है, जैसा कि राहुल गाँधी ने जयपुर में हुए चिंतन शिविर में कहा, तो आने वाले एक साल में उन्हें इस ज़हर को साधने के उपाय खोजने होंगे. उन्हें ये दिखाना पड़ेगा कि वो इस ज़हर को पियेंगे ज़रूर पर विषपायी नीलकंठ की तरह गले से नीचे नहीं उतरने देंगे.
पर राजनीति में डगमगाते क़दम बढ़ा रहे गाँधी-नेहरू परिवार के इस उत्तराधिकारी के लिए ये आसान नहीं होगा.
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टॉपिक
भारत
ख़ुद राहुल गाँधी के ही मुताबिक़ सत्ता के इस ज़हर के प्रति उन्हें उनकी माताजी सोनिया गाँधी ने आगाह किया और ऐसा करते हुए वो रो पड़ीं.
राहुल के इस बयान से चिंतन शिविर में मौजूद कई काँग्रेसी नेताओं की आँखें भीग गईं. पर आख़िर अपनी माताजी के रो पड़ने की घटना उजागर करके राहुल गाँधी कहना क्या चाहते थे?
दरअसल, सत्ता के बारे में उनका ये बयान सीधे-सीधे उस शहरी और युवा मध्यवर्ग के लिए था जो सत्ता का राजनीति से उकता चुके हैं. ये वो शहरी मध्यमवर्ग है जो दिल्ली गैंगरेप के बाद राजपथ पर उतर आया था. राहुल गाँधी ने सत्ता को ज़हर बता कर इस उग्र-युवा पीढ़ी को बताने की कोशिश की है कि सत्ता के केंद्र में रहने के बावजूद वो असल में उनके साथ खड़े हैं.
ये सन 2014 में होने वाले चुनावों की तैयारी है. राहुल गाँधी और काँग्रेस के मैनेजरों को मालूम है कि खुदरा व्यापार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सीधा पैसा लगाने की छूट देने या स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन बनाने की नीतियों से चुनाव नहीं जीता जाता. भारत में चुनाव अब भी ग़रीब-समर्थक छवि से जीता जाएगा. आइए देखते हैं कि काँग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष के तौर पर राहुल गाँधी के सामने कौन कौन सी सात चुनौतियाँ हैं.
1- नरेंद्र मोदी के बढ़ते क़दम
राहुल गाँधी
राहुल गाँधी के सामने आने वाले दिनों में कई चुनौतियाँ पेश आएँगी.
जिस तरह गुजरात में तीसरी बार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनाव जीता है उससे दिल्ली के तख़्त पर मोदी का दावा और मज़बूत हुआ है. विश्लेषक मानते हैं कि अब अगला आम चुनाव राहुल गाँधी और नरेंद्र मोदी के बीच लड़ा जाएगा.
मोदी की चुनौती से निपटने के लिए राहुल गाँधी के पार्टी मैनेजर ‘धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील’ पार्टियों के महा-गठबंधन के बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं.
इसमें वामपंथी पार्टियों की भूमिका के बारे में भी सोचा जा रहा है. काँग्रेस पार्टी का एक पक्ष मानता है कि वामपंथी पार्टियों के साथ किसी न किसी स्तर पर राजनीतिक समझदारी बनानी होगी, चाहे प्रकट में कोई गठबंधन बने या न बने.
2- ग़रीबों और दलितों का सवाल
बढ़ती महँगाई, पेट्रोल और डीज़ल के दामों में हुई बढ़ोत्तरी और विदेशी कंपनियों को खुदरा व्यापार के लिए सीधे निवेश करने की छूट आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनके कारण मनमोहन सिंह सरकार को बड़े उद्योगपतियों के पक्षधर के तौर पर देखा जाता है. जयपुर की चिंतन बैठक में शामिल कुछ काँग्रेसी बुद्धिजीवियों के मुताबिक अगले एक साल में इस छवि को बदलने की कोशिश होगी और सीधे सीधे संदेश दिया जाएगा कि मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम और मोंटेक सिंह आहलूवालिया की नीतियाँ दरअसल खारिज कर दी गई हैं. इस सिलसिले में कुछ ठोस क़दम उठाए जा सकते हैं.
i- शिल्पकारों को महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोज़गार योजना में शामिल करना.
ii- मनरेगा को शहरी बेरोज़गारों तक पहुँचाना.
iii- रोज़गार के अधिकार को मूलभूत संवैधानिक अधिकारों में शामिल करना.
iv- नक्सलवाद प्रभावित इलाक़ों में आदिवासियों की सहकारी संस्थाएँ खोलना और स्थानीय ठेके इन्हीं सरकारी संस्थाओं को देना.
3- हिंदी क्षेत्र में काँग्रेस की जड़ें जमाना
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले राहुल गाँधी ने दलितों के घरों में जाकर खाना खाना और वहीं रात काटने से लेकर अपनी ज़मीन के लिए लड़ रहे भट्टा-पारसौल के किसानों के साथ एकजुटता ज़ाहिर की.
लेकिन उनकी कड़ी मेहनत के बावजूद काँग्रेस को कोई खास चुनावी फ़ायदा नहीं हुआ. उत्तर प्रदेश में लेकिन अगर काँग्रेस को अगला चुनाव जीतना है तो उत्तर प्रदेश में उसे कम से कम 20 सीटें और बिहार में दस का आँकड़ा छूना होगा.
इसलिए ये देखना बहुत महत्वपूर्ण होगा कि काँग्रेस समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से कैसा चुनावी रिश्ता बनाने में कामयाब होगी.
4- शहरी नौजवान पर निगाह
दिल्ली में हुए गैंगरेप और इसकी शिकार छात्रा की मृत्यु को बाद जिस तरह से 18 से लेकर 24 साल की उम्र के क्रोधित नौजवान और नवयुवतियों ने इंडिया गेट पर उग्र प्रदर्शन किए, उससे काँग्रेस की नींद हराम हो गई.
काँग्रेस के चिंतन शिविर में इस मुद्दे पर गहराई से विचार विमर्श किया गया. इसमें शामिल सूत्रों के मुताबिक ये महसूस किया गया कि पढ़ा लिखा शहरी नौजवान राजनीति से उचाट होने लगा है और उसमें ग़ुस्सा है.
उसे लगता है कि सत्ता को कुछ नेताओं ने अपनी जागीरदारी समझ लिया है. इसके लिए राहुल गाँधी उनके खिलाफ़ नहीं बल्कि उनके साथ खड़े होते दिखना चाहते हैं. तभी ‘सत्ता के ज़हर’ वाला बयान सामने आया.
5- नया नेता, नया नारा
काँग्रेस को अगले चुनाव में उतारने के लिए काँग्रेसी नेताओं को एक नए नारे की तलाश है.
शर्त है कि ये नया नारा पहले के नारों से अलग हो और राहुल गाँधी को लान्च करने वाला हो. इंदिरा गाँधी का नाम ग़रीबी हटाओ से जुड़ा था, राजीव गाँधी ने भारत को 21वीं शताब्दी में ले जाने की बात कही थी.
सोनिया गाँधी ने काँग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ कहा था और अब राहुल गाँधी का लक्ष्य है नई पीढ़ी. ऐसी पीढ़ी जो उग्र है, महत्वाकांक्षी है और जिसने दबना नहीं सीखा.
इस नए नारे के लिए कांग्रेस के भीतर मंथन जारी है.
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01/21/13--06:58: पत्रकार बनना है तो कुछ और क्यों बनूं (chan 7710543)
Rajendra Tiwari के आर्टिकल्स :
हमारी बदहाली पर शेयर बाजार का जश्न!
यह खदबदाहट कहीं ले भी जायेगी क्या?
अर्थ चलायेगा समाज तो अनर्थ ही होगा
प्यारे स्वदेश के हित वरदान मांगता हूं
राजनीति नहीं सुधरेगी तो बाकी कैसे सुधरेगा
इनको सत्ता मिलती है, देश भुगतता है
कश्मीर मसले का हल करीब है!
अज्ञानता के गोल्ड मेडल मिलते हैं यहां
खुशहाली को पीछे ढ़केल रही बाजार अर्थव्यवस्था
‘स्टील जॉब्स’ हैं तो स्टीव की क्या जरूरत
।। राजेंद्र तिवारी ।।
(कारपोरेट एडीटर, प्रभात खबर)
भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मारकंडेय काटजू के बयानों से पत्रकारिता को लेकर खासकर हिन्दी पट्टी में एक बहस शुरू हो रही है. बहस शुरू होनी चाहिए, लेकिन बहस आब्जेक्टिव होनी चाहिए, सब्जेक्टिव नहीं. दूसरी बात, सालों से पत्रकारिता में एक सवाल और खड़ा किया जाता रहा है कि पत्रकारिता निष्पक्ष (अनबायस) होनी चाहिए.
राजनीतिक ककहरे में कहें तो सूडो सेकुलर (आडवाणी जी वाले अर्थ में नहीं, बल्कि इसके शाब्दिक अर्थ में). अभी जो बहस यहां-वहां चल रही है, वह सूडो सेकुलर है. अनबायस होने की बात से मैं शुरू से असहमत रहा हं. मुझे इस तरह के सवाल पूंजी के हित में की जाने वाली साजिश लगते हैं.
ये उसी साजिश का हिस्सा हैं, जो राजनीति की खबरों में पाठक की अरुचि की स्थापना देकर पत्रकारिता को सत्ता से लाभ उठाने की सीढ़ी बनाती रही हैं. यह कैसे हो सकता है कि जो राजनीति हमारे जीवन का हर पहलू तय करती हो, उसमें हमारी अरुचि हो.
खैर, हम बात कर रहे हैं पत्रकारिता की. पत्रकारिता किसके लिए है और कौन इसका उपभोक्ता है, इस सवाल का जवाब ही बताता है कि पत्रकारिता में जनपक्षधरता होगी ही. जनपक्षधरता की समझ की दित असली समस्या है. इसकी बात कोई नहीं कर रहा. जनपक्षधरता को इतने संकीर्ण तरीके से परिभाषित किया जाता है और उसी पर बहस की जाती है.
यह समस्या है क्यों? क्योंकि हमारे समाज, हमारे देश में कोई ऐसा प्लेटफ़ार्म नहीं जो पत्रकारों का हो, पत्रकारों के लिए हो और जहा सभी संस्थानों के लोग बात कर सकें पत्रकार के तौर पर. जो संगठन प्रेस के नाम पर हैं भी, वे पत्रकारिता की राजनीति तो करते हैं लेकिन पत्रकारीय कौशल, मानदंडों, संहिता आदि के लिए कुछ नहीं करते. यह मामला सिर्फ़ पत्रकांरों की चिंता का विषय नहीं बल्कि समाज की चिंता का विषय भी होना चाहिए.
अपने मित्र आलोक जोशी ने फ़ेसबुक पर एक अच्छी बहस छेड़ रखी है. आलोक जी सीएनबीसी आवाज चैनल के कार्यकारी संपादक हैं. लखनऊ में अमृत प्रभात, नवभारत टाइम्स और फ़िर दिल्ली में आजतक की टीम में थे. वह बीबीसी में काम कर चुके हैं. उन्होंने जो बात फ़ेसबुक पर छेड़ी है, मुझे लगता है कि यह बात आम आदमी यानी पत्रकारिता के उपभोक्ताओं के बीच भी आनी चाहिए. इसी उद्देश्य के साथ आलोक जी की पोस्ट मैं यहा दे रहा हं..
अंग्रेजी या हिन्दी या किसी भी भारतीय भाषा का अखबार या टीवी चैनल, जो किसी विचारधारा का मुखपत्र नहीं है, उसे निकालने वाला कोई न कोई लक्ष्य लेकर ही बाज़ार में उतरता है. लक्ष्य क्या है, ये शायद हर बार साफ़ न दिखे, लेकिन नीयत किस हद तक साफ़ है, यह तो दिख ही जाता है. कम से कम उन पत्रकारों की तो नीयत दिखती ही रहती है, जो उन में काम करते हैं. अब ये हमें और आपको (पत्रकारों को) तय करना है कि वहां काम करना है तो क्यों और क्या.
नौकरी पर रखे जाते समय आप जिन कागज़ों पर दस्तखत करते हैं, उनपर लिखा होता है कि आप संस्थान की नीतियों के तहत ही काम करेंगे. फ़िर ये सवाल क्यों कि पत्रकारों को निरपेक्ष होना चाहिए या नहीं. सभी सुधीजनों से माफ़ी मागते हए स्वर्गीय प्रभाष जोशी को ही कोट करूंगा.
एक बार मैं भी गया था जनसत्ता का टेस्ट देने. एक मैराथन टेस्ट हआ था चंडीगढ़ में. और उसके बाद उन्होंने मुझे इंटरव्यू में बुलाने लायक भी समझ लिया. मिल जाती तो यह मेरी पहली नौकरी होती. भीतर प्रभाष जी, एनके सिंह और व्यास जी (हरिशंकर व्यास) बैठे हए थे. सवाल जो होता है..पत्रकार क्यों बनना चाहते हो? मैंने क्या कहा, याद भी नहीं और प्रासंगिक भी नहीं, कोई फ़ालतू-सा जवाब दिया होगा. लेकिन प्रभाष जी अचानक जैसे मुझे भूल गये.
एनके सिंह और व्यास जी की तरफ़ मुड़े. इसका सबसे अच्छा जवाब क्या है? वे दोनों भी औचक. अब जोशी जी उवाच.. अरे मैं पत्रकार बनने के लिए पत्रकार बनना चाहता हूं. इसके आगे सफ़ाई देने की क्या जरूरत कि मैं क्या-क्या बनने के लिए पत्रकार बनना चाहता हूं? फ़िर माफ़ी चाहता हूं, लेकिन क्या ये प्रोफ़ेशनल पत्रकार बनने की पहली सीढ़ी नहीं है कि वो पत्रकारिता के प्रति हलस कर पत्रकार बना है और पत्रकारिता ही करना चाहता है.
- और अंत में
पिछले हफ्ते भवानी प्रसाद मिश्र का जन्मदिन था. मिश्र को पहली बार मैंने उप्र बोर्ड के कोर्स में पढ़ा था. कविता थी गीतफ़रोश जो इस तरह शुरू होती थी .. जी हा हजूर, मैं गीत बेचता हं. लेकिन यहा मैं उनकी दूसरी कविता प्रस्तुत कर रहा हं. पढ़िए..
- चार कौए
बहत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले,
उन्होंने तय किया कि सारे उड़ने वाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें
वे जिसको त्योहार कहें, सब उसे मनायें
कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में
दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिये चार बड़े सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गये
हंस, मोर, चातक, गौरैया किस गिनती में
हाथ बाध कर खड़े हो गये सब विनती में
हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें
पीऊ-पीऊ को छोड़ें कौए-कौए गायें
बीस तरह के काम दे दिये गौरैयों को
खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को
कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में
बड़े-बड़े मनसूबे आये उनके जी में
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01/21/13--07:04: हिंदी पत्रकारिता के छह दशक (chan 7710543)
हिंदी पत्रकारिता के छह दशक
By: Arvind Kumar | 01/Jun/2011Under: Culture, HistoryTags: विश्वनाथ, सरिता, पत्रकारिता, धर्मयुग, मधुरी, पराग, सारिका, सांध्य टाइम्स, अक्षय कुमार जैन, धर्मवीर भारती
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एक निजी विहंगावलोकन
किसी
के मन मेँ पत्रिका निकालने का कीड़ा घर कर ले, तो उसे आप लाख समझाएँ, वह अख़बार निकाल कर ही रहता है… बाद मेँ उस मित्र से शुभचिंतक एक ही प्रश्न कर सकते हैँ – क्या हैँ तुम्हारे हाल?
ये बातें मैँ ने किसी को हतोत्साहित करने के इरादे से नहीं कह रहा हूँ. मेरा उद्देश्य इतना ही है कि दुस्साहसी लोगोँ को पहले से ही सावधान कर दूँ. मैँ यह भी जानता हूँ कि जो लोग कुछ करना चाहते हैँ, वही कुछ कर दिखा सकते हैँ. तो पत्रपत्रिका आरंभ करने से पहले निम्न वातें जान लेना और उन के लिए पहले से तैयारी कर लेना ज़रूरी होता है….
पत्रपत्रिका का प्रकाशन कोई आसान काम नहीं है. पत्रिका की घोषणा करते ही आप अपने को बाँध लेते हैँ कि हर सप्ताह या महीना आप उसे छापते रहेंगे. लेकिन कोई भी सावधिक प्रकाशन आत्मनिर्भर हुए बिना जीवित नहीं रह सकता. यह बात पूरी तरह न समझ पाने के कारण ही अनेक मित्रोँ को आरंभिक संसाधन जुटा पाते ही पत्रिकाएँ आरंभ करते मैँ ने देखा है. कई को कई बार चेताया, समझाया, सलाह दी कि घरफूँक तमाशे मेँ हाथ मत जलाओ. पर वे नहीं मानते. और कुछ महीनों बाद वे या तो पाठकोँ को कोसते नज़र आते हैँ कि अच्छी चीज़ की क़द्र करना नहीं जानता;या किसी साझीदार को कोसते हैँ, जिस ने धोखा दिया;या विज्ञापकोँ की निंदा करते नहीं थकते जो विज्ञापनों का ख़ज़ाना उन पर वारने को तैयार नहीं होते… किसी मेँ तमीज़ ही नहीं है, जो उन की बात समझ सके.
वे लोग भूल जाते हैँ कि किसी पत्रिका के लिए लेख मुफ़्त मेँ मिल सकते हैँ, संपादक के रूप मेँ आप अवैतनिक हो सकते हैँ, लेकिन काग़ज़ क़ीमत चुकाए बग़ैर नहीं मिलता, छापेख़ाना वाला मित्र हुआ तो एक दो अंकोँ की छपाई ही उधारी पर कर सकता है. सब से बड़ी बात यह कि अख़बार बेचने वाले से आप बिकी प्रतियोँ के नाम पर एक भी पैसा हासिल नहीं कर सकते. जान पहचान वालोँ से चंदा और कुछ विज्ञापन भी आप ले आए.लेकिन अख़बार चलाने के लिए विज्ञापन प्राप्ति की जो स्थायी व्यवस्था चाहिए होती है, वह अच्छा सरकुलेशन हुए बग़ैर नहीं बन सकती. और सरकुलेशन बनने से पहले अख़बार के साँस उखड़ने लगते हैँ. अख़बार बंद हो जाता है.
मैँ जानता हूँ कि माधुरी, धर्मयुग, पराग, सारिकाजैसी पत्रिकाओं और नवभारत टाइम्सजैसे सफल प्रकाशनों के लिए टाइम्स आफ़ इंडिया जैसे संस्थान को कितना ज़ोर लगाना पड़ता था, फिर भी विज्ञापन पर्याप्त मात्रा मेँ नहीं जुटते थे. (दस पंदरह साल पहले तक यही हालत थी. उन दिनों विज्ञापनदाता की नज़र मेँ हिंदी ग़रीबों की भाषा थी. हालात बदल रहे हैँ, लेकिन यह आज की या आने वाले कल की बात है.) अब टाइम्स आफ़ इंडिया की वे अन्य प्रसिद्ध पत्रिकाएँ कहाँ हैँ, जो हिंदी का गौरव कहलाती थीं. सब बंद हो गईं या कर दी गईं. हिंदी ही नहीं, अँगरेजी के इलस्ट्रेटिड वीकली जैसे पत्र भी बंद करने पड़े. क्यों?
सारी बातें मैँ निजी अनुभवों के आधार पर करूँगा. इसलिए यह लेख मेरी आत्मकथा जैसा लग सकता है. पर वादा है कि बात मेरी लगेगी, बात पत्रकारिता की होगी…
मेरा पत्रकारिता से पहला संपर्क
पत्रकारिता से मेरा बाक़ायदा संबंध तो 1949-1950मेँ हुआ, लेकिन संपर्क सन 45 मेँ पहली अप्रैल मेँ ही हो गया था, जब भविष्य मेँ निकलने वाली पत्रिका सरिता के प्रकाशकोँ और मुद्रकोँ के छापेख़ाने दिल्ली प्रैस मेँ छपाई का काम सीखने दाख़िल हुआ था. मैँ ने मैट्रिक की परीक्षा दी ही थी. यह तय था कि पारिवारिक आर्थिक परिस्थितिवश आगे नहीं पढ़ पाऊँगा. कोई न कोई काम कर के घरख़र्च मेँ हाथ जुटाना होगा. तो परिणाम घोषित होने का इंतज़ार करने से क्या फ़ायदा! तत्काल क्यों नहीं!
काम क्या हो, यह पिताजी ने तय किया. स्वंतत्रता सेनानी पिताजी मेरठ मेँ कई छापेख़ाने खोल कर, जेल जाने या आंदोलन मेँ सक्रिय होने पर साझीदारोँ पर छोड़े गए प्रैसोँ मेँ बार बार कंगाल हो कर जीवन मेँ असफल हो चुके थे. 1942 से दिल्ली मेँ एक बहुत निम्नस्तरीय नौकरी मेँ लगे थे. हाँ, प्रैस खोलने की तमन्ना दिल से गई नहीं थी. पिताजी का तर्क था कि अपना प्रैस न भी खोल पाए तो मेरे हाथ मेँ कोई हुनर तो होगा. कभी भूखो मरने की नौबत ज़िंदगी भर नहीं आएगी!बात पहले से कर ली गई थी.
परीक्षा 26 मार्च को समाप्त हुई थी और 1 अप्रैल 1945 को मैँ (कंपोज़िंग से पहले जो काम सीखा जाता है) डिस्ट्रीब्यूर का काम सीखने कनाट सरकस स्थित दिल्ली प्रैस मेँ दाख़िल हुआ–शागिर्द बनाने के उपहार के तौर डिस्ट्रीब्यूशन के उस्ताद मुहम्मद शफ़ी के लिए साथ मेँ थी लड्डुओं से भरी परात और ग्यारह रुपए नक़द.
मेरे लिए पहली अप्रैल 1945 ऑल फ़ूल्स डेसाबित नहीं हुआ–यह आज 65 साल बाद 2010 मेँ मैँ दावे के साथ कह सकता हूँ. उन दिनों वहाँ से अँगरेजी पत्रिका कैरेवान निकला करती थी, और सरिता का समारंभ आधे साल बाद दशहरे पर अक्तूबर से होने वाला था. इस तरह (चाहे निम्नतम स्तर से ही सही) मुझे सरिता के समारंभ की प्रक्रिया को देखने का मौक़ा मिला और बरसोँ बाद मैँ संपादन विभाग मेँ विश्वनाथ जी का दाहिना हाथ बन गया. इस दौरान मैँ ने उस की प्रगति को निकट से देखा और भाग लिया.
1963 से मेरा संबंध मुंबई मेँ हिंदी पत्रकारिता के शिरोमणि माने जाने वाले संस्थान टाइम्स आफ़ इंडिया से माधुरी के संपादक के रूप मेँ चौदह वर्ष तक रहा. समांतर कोशबनाने की धुन मेँ मैँ 1978 मेँ वहाँ से पद त्याग कर दिल्ली फिर आ गया. फिर आर्थिक तंगी के कारण मेरा संबंध एक अत्यंत लोकप्रिय अंतरराष्ट्रीय पत्रिका रीडर्स डाइजेस्ट से हुआ जिस के हिंदी संस्करण सर्वोत्तमका समारंभ मैँ ने ही किया, और उस के अमरीका स्थित संपादकीय कार्यालय मेँ रह कर उस की संपादकीय और प्रबंध व्यवस्था को निकट से देखने का दुर्लभ अवसर भी मिला.
इस लंबे अनुभव, और बाद मेँ आडिएंस की तरह मैँ पत्रकारिता हिंदी पत्रकारिता को देखने के आधार पर भीतर और बाहर से देखे सच को कहने की कोशिश कर रहा हूँ. तकनीकी पक्ष मेँ आए परिवर्तनों के साथ साथ पत्रकारिता के भाव पक्ष – जिन दोनों को आजकल की नई भाषा मेँ हमहार्डवेअरऔर सौफ़्टवेअर कह सकते हैँ – पर संक्षेप मेँ लिखूँगा.
1945 से2000तक
सब से बड़ा अंतर तकनीक मेँ हुआ है – कंपोज़िंग, ब्लॉकमेकिंग,छपाई – सभी बदल गए हैँ. उस ज़माने मेँ कंपोज़िंग हाथ से होती थी. कंपोज़्ड मैटर को डिस्ट्रीब्यूट कर के फिर से उन ख़ानों मेँ डाला जाता था, जहाँ से कंपोज़ीटर एक एक अक्षर फिर से चुन कर स्टिक पर संजो कर गेली बनाता था. प्रूफ़रीडिंग और करक्शन के बाद गेलियोँ के प्रूफ़ों को चिपका कर संपादन विभाग डमी बनाता था, जिसे देख कर फिर कंपोज़ीटर पेज बनाता था. फिर प्रूफ़रीडिंग होती थी. कहीं कोई लाइन छूट गई है या अतिरिक्त पड़ गई है, तो उपसंपादक अपनी कारीगरी दिखा कर किसी तरह बने बनाए पेजों को वहीं का वहीं फ़िट करने का प्रयास करता था.
धीरे धीरे हाथ से कंपोज़िंग की जगह मोनोटाइप मशीन आई, जिस मेँ एक एक अक्षर का संयोजन मशीन करती थी, लेकिन करक्शन का काम हाथ से होता था. पेजों मेँ घट बढ़ करनी हो तो वही पुरानी रनऑन की समस्या आ खड़ी होती थी, यानी अगले कॉलम या पृष्ठ के मैटर को आगे पीछे करना. इस मेँ कई बार बने बनाए पेज टूट जाते थे. फिर से कंपोज़ करवाओ. इस का समय नहीं होता था. अतः रनऑन से बचने के लिए उपसंपादक जहाँ की तहाँ मैटर फ़िट करता रहता था. फिर कई बार मशीन पर जाते जाते पेज टूट जाता था. यह महान संकट होता था. पूरा पेज दोबारा कंपोज़ करो, वह भी तत्काल!एक एक अक्षर की जगह पूरी लाइन एक साथ ढालने वाली लाइनोटाइप मशीन से मैटर टूट जाने की समस्या का हल तो कुछ आसान हुआ, लेकिन अधिकतर समस्याएँ पूर्ववत ही रहीं.मोनोटाइपऔर लाइनोटाइप का एक फ़ायदा और था. हैँड कंपोज़िंग मेँ छपते छपते टाइप टूट जाते थे. फिर भी टूटे टाइपों को फिर से काम मेँ लाना पड़ता था. छपाई उच्च स्तर की हो पाना बेहद मुश्किल था. मोनो और लाइनो मेँ यह कमी दूर हो गई थी–हर बार मशीन नया टाइप ढालती थी. टाइप को फिर से काम मेँ लाने के लिए एक एक अक्षर को फिर से कंपोज़िंग केसोँ मेँ डाला जाता था. यही काम मैँ ने सब से पहले सीखा था. इस प्रक्रिया मेँ अ अक्षर का टाइप ह अक्षर के ख़ाने मेँ भी डल जाता था. कई बार दो फ़ौंटों के कुछ टाइप भी ग़लत केस मेँ पहुँच जाते थे. प्रूफ़ रीडरोँ को आँखों का तेज़ होना पड़ता था कि हर रौंग फ़ौंट को पकड़ सके. ऐसी अन्य अनेक समस्याएँ तब छपाई और पत्रकारिता का अभिन्न अंग थीं.
आज फ़ोटो टाइपसैटिंग का ज़माना है. कंपोज़िंग की कोल्ड मैटल (हाथ से कंपोज़िंग) या हौट मैटल (मशीन की ढलाई से कंपोज़िंग) कोई भी विधि हो, तैयार पेजों का भारी भरकम लैड का मैटर रखने के लिए गेलियोँ के रैक चाहिए होते थे. 100 पेजोंकी पत्रिका अगर एक साथ तैयार कर रखनी हो तो उस के लिए 100 गेलियोँकी ज़रूरत तो कम से कम थी, पेजबनने से पहले कंपोज़्ड गेलियोँ के लिए भी जगह चाहिए होती थी. टाइप के केसोँ के लिए जगह अलग दरकार थी. फिर प्रूफ़िंग मशीन के लिए जगह. पूरे 8 या 16 पेजी फ़रमोंके प्रूफ़ निकालने के लिए स्टोन, वग़ैरा, लवाज़मात काफ़ी जगह घेरते थे. जगह की किफ़ायत के लिए पत्रिकाओं और पुस्तकोँ का प्रकाशन टुकड़ों मेँ किया जाता था. आठ आठ या सोलह सोलह पेजों के फ़र्मों के हिसाब से कंपोज़िंग कराई जाती थी. अब फ़ोटो टाइपसैटिंग के ज़माने मेँ एक मेज़ पर यह सारा काम हो जाता है. मेरे समांतर कोशके 1,768 और तीन खंडों वाले बृहद् The Penguin English-Hindi/Hindi-English Thesaurus and Dictionaryद पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी के 3140 पेज ही नहीं, तमाम शब्देश्वरी, विक्रम सैंधव, जूलियस सीज़र, सहज गीता…यही क्यों तरह तरह के कोशों और विश्वकोशों के लाखों सचित्र पन्ने – कहना चाहिए एक पूरा पुस्तकालय – मेरी एक छोटी सी मेज़ पर छोटे से बक्से मेँ है, और उसी मेज़ पर पास ही स्कैनर रखा है जिस की सहायता से मैँ कोई भी चित्र छपने के लिए तैयार कर सकता हूँ, और एक प्रिंटर भी रखा है, जो प्रूफ़िंग मशीन का काम भी देता है, और पेजों को छपाई के लिए भी तैयार कर देता है… साथ साथ मेरे कंप्यूटर मेँ भारत की सभी लिपियोँ के सैकड़ों और अँगरेजी के हज़ारोँ लुभावने टाइपफ़ेस लोड हैँ… मेरे पिताजी यह क्रांति देखने के लिए ज़िंदा हो भी जाएँ तो हो सकता है ग़श खा कर फिर परलोक सिधार जाएँ!
हार्डवेअर शरीर है तो आत्मा है सौफ़्टवेअर
इस सब का – तकनीक का और साजसज्जा का – सीधा असर पत्रकारिता पर पड़ता है. मैँ एक पुराना उदाहरण देता हूँ. लाइनोटाइप मेँ एक बड़ी कमी यह थी कि उस के लिए जो हिंदी के फ़ेस बने, वे पढ़ने मेँ आसान और अच्छे नहीं थे. इस विधि का उपयोग करने वाले दैनिक हिंदुस्तानऔर साप्ताहिक हिंदुस्तानजैसे पत्रोँ के पाठकोँ के सामने यह बड़ी समस्या रहती थी, और इन पत्रोँ को पढ़ने को मन नहीं करता था. इन संस्थानों ने अपने अज्ञान या अड़ियलपन के कारण समस्या का निदान नहीं किया. परिणाम यह हुआ कि दूसरे पत्र अधिक लोकप्रिय होते चले गए. साप्ताहिक हिंदुस्तानतो बंद ही हो गया. हिंदुस्तान टाइम्सके हिंदी पत्रोँ को जो क्षति तब हुई उस का ख़मियाज़ा दसियोँ साल भुगतते रहे. कंप्यूटर युग मेँ आ कर अब हिंदुस्तानफिर उभरा है, और मृणाल पांडे ने तो उसे नई पीढ़ी की तमाम आकांक्षाओं की पूर्ति का साधन बना कर लोकप्रियता के नए शिखर तक पहुँचा दिया था.
अभी तक मैँ ने कंपोज़िंग की बात की. उस के साथ ही छपाई के क्षेत्र मेँ क्रांति पर क्रांति हो रही थी. कहाँ मेरे बाचपन का वह ज़माना जब मेरठ मेँ हमारे प्रेस मेँ ट्रेडल मशीन पर छोटे छोटे फ़रमेँ छपते थे, या फ्लैटबैड मशीन पर बड़े फ़रमे हाथ से दबा कर छापे जाते थे, और कहाँ उन्हीं दिनों के बड़े प्रैसोँ की सिलंडर मशीनों और हौट मैटल रोटरी मशीनें, जो फ़ोटोग्रेव्योर रोटरी के रास्ते आफ़सैट छपाई के सहारे विशाल रोटरियोँ तक पहुँच गई हैँ.
हार्डवेअरपत्रकारिता का शरीर है, तो सौफ़्टवेअर आत्मा. सौफ़्टवेअर का सीधा संबंध पाठक से और परिवर्तनशील समाज सेहै, और इस बात से है कि कोई पत्रिका अपने पाठकोँ को बदलते समय मेँ संतुष्ट कर पा रही है या नहीं? उस पत्रिका के पीछे संपादकोँ की अपने पाठक वर्ग की कोई समझ है या नहीं, और वह समाज के साथ साथ अपने पाठकोँ की बदलती आवश्यकताओं को पूरा कर रही है या नहीं?
सरिता का पत्रकारिता पर प्रभाव
सरिता का प्रकाशन अक्तूबर 1945 मेँ आरंभ हुआ. कोल्ड मैटल तकनीक से, लगभग दस सालोँ मेँ यह अपने संचालक-संपादक विश्वनाथ जी की (जिन्हें मैँ अपना गुरु भी मानता हूँ) दूरदर्शिता के कारण यह मोनोटाइप तकनीक तक पहुँच गई. वह इसे लाइनोटाइप के अस्पष्ट टाइप तक नहीं ले गए – यह भी उन की समझ का परिणाम था.
सन 45 से पहले हिंदी मेँ लोकप्रियता के शिखर पर थी माया. इलाहाबाद से निकलने वाली मायाकहानी पत्रिका थी. उन दिनों कोई भी आदमी सफल पत्रिका निकालने की बात मन मेँ लाता, तो वह मायाजैसी पत्रिका निकालना चाहता था. कुछ अन्य लोकप्रिय और उल्लेखनीय पत्रिकाएँ हुआ करती थीं – सरस्वतीजिस ने हिंदी को कभी नए आयाम दिए थे, और मानक हिंदी बनाने मेँ जिस का बड़ा हाथ था, चाँदजो स्वाधीनता आंदोलन के साथ साथ समाज सुधार का झंडा भी खड़ा करता था. और भी अनेक पत्रिकाओं के नाम लिए जा सकते हैँ. धार्मिक साहित्य के लिए कल्याणथा ही. कुछ लोकप्रिय साप्ताहिक भी थे. कुछ वर्ष बाद निकला नवयुग,बाद मेँ जिस के सफल संपादक बने महावीर अधिकारी, जो मुंबई मेँ नवभारत टाइम्सके अत्यंत सफल संपादक सिद्ध हुए.
यहाँ यह बात भी ध्यान मेँ रखनी चाहिए कि बहुत शीघ्र – दो साल से भी कम समय मेँ – भारत स्वाधीन होने वाला था, और स्वाधीनता के साथ साथ देश का विभाजन भी होने वाला था. उस से देश मेँ, समाज मेँ, पाठक वर्ग मेँ भारी परिवर्तन आने वाला था.
ऐसे मेँ ही आई थी सरिता, बदलते समय और समाज की बदली रुचि मेँ ढलने को तैयार. मैँ अपनी व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर कह सकता हूँ कि आरंभ मेँ सरिता की परिकल्पना मायाजैसी किसी कहानी पत्रिका की थी. नक़ल को चलाना आसान नहीं होता. यह हिंदी पाठक वर्ग और पत्रकारिता का सौभाग्य था कि बड़ी सूझबूझ दिखाते हुए सरिता को माया की नक़ल नहीं बनाया गया, बल्कि उस का आदर्श चाँदको बनाया. लेकिन चाँद का रूप आकार नहीं, और सौफ़्टवेअर भी पूरी तरह चाँदका नहीं.
यहाँ कुछ शब्द सरिताके प्रकाशक संपादक विश्वनाथ जी के बारे मेँ कहना अनुपयुक्त नहीं होगा. संपादक का व्यक्तित्व किसी पत्रिका की परिकल्पना मेँ, और उस के लोकप्रिय होने या न होने मेँ महत्त्वपूर्ण योगदान करता है. एकमात्र कारण उसे हम नहीं कह सकते, क्योंकि सही संचालन प्रतिभा और व्यावसायिक संगठन की भी आवश्यकता होती है. इस के साथ साथ आवश्यक होती है एक तटस्थता, तट पर खड़ा होने का भाव, तट जिस पर खड़ा हो कर कोई बहती नदी को देख सकता है, अपने को उस से अलग रख कर.
जैसा कि मैँ ने पहले बताया दिल्ली प्रैस से अँगरेजी पत्रिका कैरेवान निकलती थी. वह बड़ी सफल पत्रिका थी. कह सकते हैँ कि उस समय की एकमात्र लोकप्रिय भारतीय अँगरेजी पत्रिका थी. इलस्ट्रेटिड वीकली था, लेकिन वह अँगरेजों का था. कैरेवानकी संपूर्ण परिकल्पना विश्वनाथ जी की अपनी थी. वह शिक्षा दीक्षा से चार्टर्ड अकाउनटैंट थे. साहित्यकारोँ को बड़ा अजीब लगता है कि कोई चार्टर्ड अकाउनटैंट सफल पत्रकार कैसे बन गया! लेकिन चिंतन मनन पर केवल साहित्यकारोँ का एकाधिकार होगा, ऐसा कोई नियम न तो है, न हो सकता है. पढ़ाई पूरी कर के वह अपने पिता अमरनाथ के छोटे से दिल्ली प्रैस मेँ सहायता करने आए थे. प्रैस के ख़ाली समय का उपयोग करने के लिए उन्होँ ने कैरेवान निकाला था. वह लोकप्रिय हो गया. कारण – उस मेँ प्रकाशित होने वाले विषयोँ का चुनाव और संतुलन. यहाँ तटस्थता की आवश्यकता होती है. आम आदमी के लिए निकाला जाने वाला पत्र किसी आंदोलन का मुखपत्र नहीं होता, लेकिन उस का अपना एक दृष्टिकोण फिर भी हो सकता है. साथ ही यह भी सही कि आंदोलन विशेषों के पत्र भी सफल हुए हैँ. जैसे गाँधी जी का हरिजन. लेकिन आंदोलन की सटीकता काल तक ही.
प्रकाशनीय सामग्री पर विश्वनाथ जी का दृष्टिकोण स्पष्ट था
विश्वनाथ जी के लिए पत्र मेँ प्रकाशित होने योग्य सामग्री वही है, जो उन के अपने पाठक के लिए रोचक हो या लाभप्रद, जिस का उस के जीवन से सरोकार हो. इस का अर्थ यह भी है कि आम आदमी की पत्रिका किसी तकनीकी विषय की पत्रिका नहीं होती. इंजीयरिंग विषय पर कोई पत्रिका हो तो हम यह आशा नहीं करनी चाहिए कि आम आदमी भी उसे पढ़ेगा. विज्ञान की पत्रिका दो तरह की हो सकती हैँ – वैज्ञानिकोँ के लिए निकाली जाने वाली पत्रिका या आम आदमी को विज्ञान की जानकारी देने वाली पत्रिका. यही बात हम साहित्य और साहित्यक पत्रिकाओं पर लागू कर सकते हैँ. कैरेवान बाद मेँ असफल क्यों हुआ, यह बात मैँ सही अवसर आने पर करूँगा.
45 मेँ जब विश्वनाथ जी ने सरिता निकाली (प्रकाशक के तौर पर; पहले कुछ महीने उस के संपादक थे विश्वनाथ जी के अभिन्न मित्र विजय नारायण जी; संपादन की वैचारिकता मेँ दोनों का साझा योगदान था), तो उसे कैरेवानसे बिल्कुल अलग ढाँचे मेँ रखा गया. विश्वनाथ जी बख़ूबी जानते थे, अँगरेजी का नुस्ख़ा हिंगी मेँ नहीं चलेगा. सरितानिकली एक नए आकार के साथ (यह अब तक वही है) और नई साजसज्जा के साथ (इस मेँ अब तक कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं हुआ है). विश्वनाथ जी आकार शायद रीडर्स डाइजैस्टजैसा रखना चाहते थे, लेकिन उस के लिए उपयुक्त साइज़ का काग़ज़ युद्धकालीन तंगी के उन दिनों उपलब्ध नहीं था. अतः उस के निकटतम जो साइज़ हो सकता था, वह स्वीकार कर लिया गया. पुस्तक जैसा, लेकिन अलग, मायाके, चाँदके, सरस्वतीके, स्वयं कैरेवान के आकार से अलग, अपनी एक विशिष्ट पहचान स्थापित करने वाला आकार, जिसे कोई आसानी से हाथ मेँ ले कर पढ़ सके. इस आकार मेँ वैसी साजसज्जा संभव नहीं थी, जो बड़े आकार के लाइफ़या गुड हाउसकीपिंगजैसे अमरीकी पत्रोँ मेँ होती थी. लेकिन सुरुचिपूर्णता संभव थी.
सरिता के सौफ़्टवेअर पक्ष पर जाने से पहले मैँ व्यावसायिक नीति पर भी दो एक बातें कहूँगा – ये पत्रकारिता का महत्वपूर्ण अंग हैँ. बिकरी और विज्ञापन की व्यवस्था धीरे धीरे कैरेवान के समय से विकसित होती आ रही थी, सरिता के आने से उस का विकास करने मेँ और सहायता मिली.
इस से भी बड़ी बात यह थी कि हर रचना पर लेखकोँ को पारिश्रमिक – वह भी प्रकाशित होने पर नहीं, स्वीकृत होते ही. हिंदी के लिए यह नई बात थी. आज तक हिंदी की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ पारिश्रमिक नहीं देतीं. जो देती हैँ, वह बहुत कम. मुझे याद है कि सन 45 मेँ सरिता मेँ प्रकाशन के लिए स्वीकृत हर लेख और कहानी पर 75 रुपए अग्रिम दिए जाते थे – उस ज़माने मेँ यह बहुत बड़ी रक़म थी. यही नहीं, कभी कोई कहानी बहुत लोकप्रिय हो गई तो विश्वनाथ जी ने लेखक को उतनी ही अतिरिक्त रक़म बाद मेँ भेजी, निजी पत्र और प्रशंसा के साथ. ऐसी ही एक कहानी थी स्वर्गीय श्री आनंद प्रकाश जैन की साँग. (आनंद प्रकाश जी बाद मेँ टाइम्स द्वारा प्रकाशित बालपत्रिका परागके संपादक बने.)
सरिता का दृष्टिकोण एक पढ़े लिखे आधुनिक मध्यमवर्गीय हिंदी भाषी हिंदू जैसा था, जो दक़ियानूस नहीं था, जो हिंदू समाज को पुराना गौरव लौटाना चाहता था और इसी उद्देश्य से जो समाज के पुराने पाखंड को उखाड़ फेंकना चाहता था, स्त्रियोँ को जाग्रत करना और सम्मान दिलाना चाहता था, जिसे रोचक कहानियाँ पढ़ने मेँ रुचि थी, जो सहज काव्य से विह्वल होना चाहता था. मुझे याद है कि सरिता के पहले अंक मेँ ही एक लेख था – मठमंदिर और सामाजिक प्रगति.साथ ही स्त्रियोँ के लिए उपयोगी सामग्री थी. सब से बड़ी बात यह थी कि सामग्री मेँ दंभ नहीं था, पाठक को विद्वत्ता से या शैली से आतंकित करने की इच्छा नहीं थी, उसे अपने साथ ले कर चलने की भावना थी. साहित्यिक उदाहरण दें तो इस अंतर को हम तुलसीदास और केशवदास के काव्य का अंतर कह सकते हैँ. दोनों ही रामभक्त अच्छे कवि हैँ, लेकिन महान तुलसीदास हैँ.
भाषा के बारे मेँ विश्वनाथ का दिमाग़ पूरी तरह साफ़ था. अपने ही उदाहरण से बताता हूँ, वह मेरे लिखे से ख़ुश रहते थे. मेरे सीधे सादे वाक्य उन्हेँ बहुत अच्छे लगते थे. लेकिन कई शब्द? एक दिन उन्होँ ने मुझे अपने कमरे मेँ बुलाया, पूछा, “क्या तेली, मोची, पनवाड़ी, ये ही क्यों क्या आम आदमी, विद्वानों की भाषा समझ पाएगा? क्या यह विद्यादंभी विद्वान तेली आदि की भाषा समझ लेगा?”स्पष्ट है मेरे पास एक ही उत्तर हो सकता था: विद्वान की भाषा तो केवल विद्वान ही समझेंगे, आम आदमी की भाषा समझने मेँ विद्वानों को कोई कठिनाई नही होगी. थोड़े से शब्दों मेँ विश्वनाथ जी ने मुझे संप्रेषण का मूल मंत्र सिखा दिया था. जिस से हम मुख़ातिब हैँ, जो हमारा पाठक श्रोता दर्शक आडिएंस है, हमेँ उस की भाषा मेँ बात करनी होगी.
मुझ से उस संवाद का परिणाम था कि विश्वनाथ जी ने सरितामेँ नया स्थायी स्तंभ जोड़ दिया: यह किस देश प्रदेश की भाषा है?इस मेँ तथाकथित महापंडितों की गरिष्ठ, दुर्बोध और दुरूह वाक्यों से भरपूर हिंदी के चुने उद्धरण छापे जाते थे. उन पर कोई कमैँट नहीं किया जाता था. इस शीर्षक के नीचे उन का छपना ही मारक कमैँट था.
विश्वनाथ जी की स्पष्ट नीति था–रचनाएँ अपने तकनीकी कौशल से पाठक को आतंकित न करें, बल्कि उस से उस की भाषा मेँ बातचीत करती हुई उसे अपने साथ साथ आगे बढ़ाएँ.
सरिता मेँ अनेक तत्कालीन बड़े लेखकोँ ने लिखा, और अनेक भावी बड़े लेखकोँ ने सरिता मेँ लिख कर ही हिंदी जगत का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. स्वर्गीय मोहन राकेश ने तो सरिता के एक अंक का संपादन भी किया था. लेकिन सरिता ने अपने आप को साहित्यिक वाद विवाद से, उठा पटक से अपने आप को हमेशा दूर रखा. यही कारण है कि अनजाने लेखकोँ की अनगिनत रचनाएँ सरिता मेँ छपीं और छप रही हैँ.
ये रचनाएँ कैसी होती थीं, पाठक से क्या कहती थीं – यही है सरिता के सौफ़्टवेअर पक्ष की असली पहचान. उन सब का सीधा संबंध पाठक के जीवन से होता था, चाहे कहानी हो या कविता या लेख, और उस सब मेँ एक सुविचारित विविधता होती थी. यह विविधता अनेक स्तरोँ पर होती थी, जैसे विषय, देश, काल, समाज, वय, लिंग… जिस से पूरे हिंदी क्षेत्र के बच्चों, बूढ़ों, जवानों, स्त्रीपुरुषों को अपनी रुचि की पाठ्य सामग्री मिल जाए, वह भी सहज समझ मेँ आने वाली भाषा मेँ.
विविधता, विविघता, विविधता
यहाँ मैँ विविधता के उदाहरण देना चाहूँगा. मान लीजिए किसी एक अंक मेँ सात कहानियाँ हैँ. तो उन मेँ से एक या दो का विषय होगा पारिवारिक समस्याएँ, विशेषकर गृहणियोँ के अपने जीवन की समस्याएँ, एक का समाज सुधार; एक कहानी ऐतिहासिक होगी, तो एक विज्ञान कथा, एक कोरी कल्पना की उड़ान या हास्य व्यंग्य. अब इन विषयोँ का संतुलन किया जाएगा लेखों से. कुछ लेखों मेँ जीवन सुधारने वाली जानकारी होती थी. कुछ मेँ मात्र मनोरंजन. कुछ मेँ यात्रा. लेकिन लेखों मेँ सामाजिक सुधार का पक्ष अधिक प्रबल होगा, जीवन की ज्वलंत समस्याओं को छुआ जाएगा. महापुरुषों की जीवनियोँ से नवयुवकोँ को प्रेरित किया जाएगा. (स्वयं मैँ ने महापुरुषों पर एक लेखमाला लिखी थी. सामग्री का सुझाव कभी विश्वनाथ जी देते थे, कभी मैँ प्रस्तावित करता था.) छोटे छोटे चुटकुले होंगे, फ़िलर होंगे, सूक्तियाँ होंगी… कुल मिला कर सब रचनाओं मेँ क्षेत्रीय संतुलन होगा–उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम भारत तो होंगे ही, विश्व के भिन्न क्षेत्र भी पाठक को बिना बताए विविधता की झलक देंगे.
मान लीजिए भारत के विभाजन का काल है. उन दिनों समाचार पत्रोँ मेँ पाकिस्तान से भाग कर आती महिलाओं पर यौन अत्याचारोँ के विवरण भरे रहते थे. जो महिलाएँ आ रही थीं, उन के दुःखों की कहानियाँ मुँहज़बानी घर घर तक पहुँच रही थीं. आज आप के ज़ेहन मेँ उस ज़माने की वह हिंदू मानसिकता नहीं आती, जिस के रहते हर उस महिला को परित्यक्त कर दिया जाता था, जिस ने अपनी इच्छा से या मजबूरी मेँ जिस के साथ कोई यौन अतिक्रमण किया गया हो. यौन अतिक्रमण तो बड़ी बात है, कोई विधर्मी अगर किसी अबला को छू भी लेता था, तो उस महिला का परित्याग कर दिया जाता था. ऐसी ‘कुलटाओं‘को या तो वेश्या बनना पड़ता था या मुसलमान या ईसाई. संकुचित हिंदू समाज मेँ उन के लिए कोई स्थान नहीं था.
ऐसे मेँ सरिता मेँ उन लेखों की बाढ़ आ गई, जिन मेँ इस अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाई जाती थी. यह बताया जाता था कि इस मेँ बलात्कृत महिला का कोई दोष नहीं है, अगर किसी का दोष है तो उस पति का जो उस की रक्षा नहीं कर पाया और उस समाज का जो उसे सम्मान सहित स्वीकार नहीं कर रहा. आज आप नहीं समझेंगे, लेकिन उस समय यह कहना साहस का काम था. ऐसी रचनाओं ने, कहानियोँ ने, लेखों ने, पाठकोँ के मन को छुआ. मैँ दावे के साथ कह सकता हूँ कि सरिता ने समाज का दृष्टिकोण बदलने मेँ सब से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. यहाँ तक कि सीता बनवास का सवाल वहीं से उठना शुरू हुआ. लिखा गया कि यदि रावण सीता को ले गया तो दोष सीता का नहीं था, रावण का था. सीता को इस अतिक्रमण की सज़ा किस लिए दी गई? यह राम का अन्याय था, जो उन्होँ ने बाद मेँ सीता को बनवास दिया. सन 47-48-49 मेँ सरिता द्वारा प्रचारित यही मानसिकता थी, जिस की झलक हमेँ राज कपूर की फ़िल्म आवारामेँ शैलेंद्र के गीत किया कौन अपराध त्याग दई सीता महतारी (मैँ ने जो शब्द उद्धृत किए हैँ, वे शायद कुछ भिन्न हैँ, लेकिन भाव यही था) मेँ मिली. बाद मेँ कुछ इन्हीं भावों को व्यक्त करना वाला एक गीत हमेँ बिमल राय की बिराज बहूमेँ मिला.बहुत पहले रामराज्य फ़िल्म मेँ विजय भट ने एक गीत मेँ बोल रखे थे–यही राम दरबार कहाँ वैदेही.और कुछ बाद यही भाव मेरी कविता राम का अंतर्द्वंद्वका विषय बना.
शीर्ष पत्रकार
लोग विश्वनाथ जी को कोई ऐसा व्यक्ति समझते हैँ, जो व्यावसायिकता के लिए, अपनी पत्रिका की बिकरी बढ़ाने के लिए हिंदू धर्म विरोधी उत्तेजक रचनाएँ प्रकाशित करता है. लेकिन ऐसा है नहीं. हिंदू समाज कमज़ोर हुआ अपने मूर्खतापूर्ण अंधविश्वासोँ के कारण. आक्रांताओं ने अपनी सेनाओं के आगे गाएँ खड़ी कर दीं, और रक्षक राजपूतों ने तीर नहीं चलाए! ऐसी गोभक्ति और गोसेवा क्या है? मूर्खता! इस के लिए विश्वनाथ जी ने मेरे स्वर्गीय मित्र रतनलाल बंसल को भाँति भाँति की संदर्भ सामग्री दे कर आज का सब से बड़ा देशद्रोह गोहत्या लेख लिखवाया. जो रूढ़िवादी थे, उन्होँ ने तूमार खड़ा कर दिया. विश्वनाथ जी अडिग खड़े रहे. आम पाठक सरिता के साथ रहा. उस ने उसे समर्थन दिया. यही बात मैँ ने 1957 मेँ देखी जब विश्वनाथ जी मेरी कविता राम का अंतर्द्वंद्वके समर्थन मेँ पत्थर की चट्टान की तरह खड़े रहे, न कार्यालय पर तोड़फोड़ की परवाह की, न पथराव की, न आगज़नी की, न मारे जाने की धमकी की, न लंबे चलने वाले मुक़दमे की.
हिंदी मेँ मुझे उन जैसा कोई पत्रकार दिखाई नहीं देता, जो अपनी पत्रिका के द्वारा बात करता हो, भाषणोँ और वक्तव्यों के द्वारा नहीं. मुझ से पिछले साठ वर्षों का शीर्ष हिंदी पत्रकार चुनने को कहा जाए तो मैँ उन्हेँ ही चुनूँगा. उन के व्यक्तित्व ने पत्रिका को बनाया, और पत्रिका ने उन के व्यक्तित्व को. अन्यथा हम क्या देखते हैँ? संपादक बनते ही लोग नेताओं के चक्कर लगाना शुरू कर देते हैँ, और अपना निजी प्रचार करते घूमते रहते हैँ. विश्वनाथ जी कभी अपने दफ़्तर से बाहर नहीं निकले, किसी नेता से कुछ नहीं माँगा. उन्हेँ जो कुछ चाहिए था अपने पाठक से चाहिए था. उन्हेँ जो कुछ देना है अपने पाठक को और उस के द्वारा अपने समाज को देना है. ख़ैर, समाज मेँ भाँति भाँति के लोग होते हैँ. सभी अपने अपने तरीक़े से काम करते हैँ.
मुझे गर्व है कि पत्रकारिता का पाठ मैँ ने देश की स्वाधीनता के समय से ही सरिता मेँ अनेक पदों पर काम करते करते विश्वनाथ जी से सीखा. उन से अनेक मतभेदों के बावजूद वह मेरे गुरु हैँ और रहेंगे. मुझे गर्व है कि उन से सीखे पाठों के बल पर मैँ 1963 मेँ मुंबई गया – टाइम्स आफ़ इंडिया के लिए हिंदी की फ़िल्म पत्रिका सुचित्रा(बाद मेँ परिवर्तित नाम माधुरी) का समारंभ करने.
लेकिन इस से पहले दो तीन बातें और कहनी हैँ. सन 55 मेँ मैँ ने शाम के समय पढ़ते पढ़ते अँगरेजी मेँ ऐमए पास कर लिया था. उस से बहुत पहले ही विश्वनाथ जी ने मुझे कैरेवान मेँ पहले तो उपसंपादक और बाद मेँ सहायक संपादक बना दिया था. वहाँ मुझे संपादन कला मेँ अनेक प्रयोग करने का सुअवसर मिला. सजग देखरेख विश्वनाथ जी की थी, लेकिन अपने विचारोँ को अपने तरीक़े से क्रियान्वित करना मेरे अपने हाथ मेँ था.
उन दिनों कैरेवान संकट से गुज़र रहा था. अमरीका से प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं (एक ओर लाइफ़, टाइम, न्यूज़वीक,तो दूसरी ओर लेड़ीज़ होम जर्नल, गुड हाउसकीपिंग, कास्मोपोलिटन) से बिकरी को चुनौती मिल रही थी. कभी हम कैरेवान को इस दिशा मेँ मोड़ते, तो कभी उस दिशा मेँ. न पाठक समझ पा रहा था कि हम क्या हैँ, और न स्वयं हम. नौबत कैरेवान को बंद करने के विचार तक आ गई थी. ऐसे मेँ एक दिन मैँ ने, काफ़ी दिनों के विचारमंथन के बाद, विश्वनाथ जी से कहा कि एक क्षेत्र ऐसा है, जहाँ अमरीकी पत्रिकाएँ हमेँ चुनौती नहीं दे सकतीं, वह है – भारत और भारत का समाज, भारत की राजनीति. हमेँ लेआउट और सामग्री मेँ अमरीकी पत्रिकाओं के अनुकरण से हट कर सीधी सादी साजसज्जा के साथ अपनी सार्थक सामयिक सामग्री को स्थान देना चाहिए, तभी हम अपने लिए अलग राह बना पाएँगे.
विश्वनाथ जी ने सोचने मेँ एक पल का समय भी नहीं लगाया. शायद अपने निजी चिंतन से वह भी इसी नतीजे पर पहुँच चुके थे. सारी ज़िम्मेदारी मुझे सौंप दी गई. मैँ ने तत्काल अपनी योजना पर काम करना शुरू कर दिया. एक ही साल मेँ कैरेवान की बिकरी दोगुनी हो गई. विविधता वही सरिता वाली, लेकिन विषयोँ का चुनाव भारत के अँगरेजी पाठक को आंदोलित करने वाले प्रश्नों पर. आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक. उन दिनों अँगरेजी साप्ताहिक लिंकनिकलता था. वह पूरी तरह वामपंथी था. अतः उस की सामग्री मेँ सीमाएँ थीं. वह एक दृष्टिकोण के समर्थकोँ के ही काम की थी. कुछ और साप्ताहिक और पाक्षिक थे, अब नाम ठीक से याद नहीं आ रहे. शायद एक था फ़ोरम.इलस्ट्रेटिड वीकली था, वही पुराना अँगरेजी ढर्रे का और कला पक्षों पर ज़ोर देता हुआ (तब उस की लोकप्रियता का मुख्य आधार थे वर्गपहेली और नवदंपतियोँ के फ़ोटो!). (बाद मेँ मैँ ने देखा कैसे ख़ुशवंत जी ने उसे एक बिल्कुल नए भारतीय साँचे मेँ ढाल सफलता के नए झंडे गाड़े. उन के बाद कोई इलस्ट्रेटिड वीकली के गौरव को मेनटेन नहीं कर सका.) उन के बीच मेँ कम साधन वाले कैरेवान को फिर से जगह दिला पाना आसान नहीं था.
बाद मेँ कैरेवान का यह फ़ारमूला पहले पाक्षिक और अब साप्ताहिक इंडिया टुडेने अपनाया और सफलता पाई. उस के पास साधन बड़े थे, सामग्री जुटाने के लिए भरपूर धन ख़र्च करने का साहस था, जो विश्वनाथ जी कभी नहीं दिखा पाए. परिणाम सामने है – कैरेवान का नाम बदल कर ऐलाइवहो गया है. मैँ ने वह पत्रिका, ऐलाइव,आज तक नहीं देखी, इस लिए उस पर कमेँट करना मैँ ठीक नहीं समझता. मेरी अपनी धारणा है कि वह ज़्यादा नहीं बिक पाता होगा – क्योंकि कहीं उस का चर्चा दिल्ली प्रैस की ही वूमैन्स ऐराया गृहशोभा जैसा नहीं सुना. इन दो पत्रिकाओं के बारे मेँ बातें कुछ बाद मेँ करूँगा – जब फ़ेमिनाका संदर्भ आएगा.
अक्षय कुमार जैन
तो, नवंबर 1963 मेँ मैँ मुंबई पहुँचा. वहाँ पुराने मित्र केवल दो थे. मुनीश नारायण सक्सेना और नंदकिशोर नौटियाल. दोनों हिंदी ब्लिट्ज़मेँ थे – संपादक और सहायक संपादक. पुराने परिचित थे महावीर अधिकारी, नवभारत टाइम्सके मुंबई संपादक.
हिंदी पत्रकारिता का कोई भी ज़िक्र नवभारत टाइम्सके उदय और उस मेँ स्वर्गीय अक्षयकुमार जैन और महावीर अधिकारी की बात किए बिना बेमानी रहेगा. हिंदी दैनिकोँ मेँ दिल्ली मेँ दैनिक हिंदुस्तानथा. मेरा पहला लेख इसी के साप्ताहिक संस्करण मेँ पंडित गोपाल प्रसाद व्यास ने स्वीकृत किया था. शायद सन 50 मेँ, या 51 मेँ. विभाजन के बाद वीर अर्जुनऔरहिंदी मिलाप थे. मानसिकता और विषयवस्तु मेँ वे अभी तक हिंदुत्व से और पंजाब से बाहर नहीं निकल पाए, और उन मेँ विभाजन से संबंधित राजनीति का प्रभाव अधिक झलकता था. दिल्ली मेँ पंजाब केसरीका आगमन बहुत बाद मेँ हुआ. वह अभी तक पंजाबी महाशयोँ वाली मानसिकता से निकल नहीं पाया है, लेकिन अपनी लोकप्रियता के फरफराते झंडे उस ने गाड़ रखे हैँ. हिंदी दैनिकोँ मेँ मैँ नई दुनिया, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर, राष्ट्रीय सहारा, राजस्थान पत्रिका जैसे पत्रोँ का नाम लेना चाहूँगा, जिन्हों ने राष्ट्रीय और स्थानीय समाचारोँ मेँ कमाल का संतुलन दिखा कर छोटे छोटे शहरोँ से सफल संस्करण निकाले हैँ और नवभारत टाइम्सको कड़ी चुनौती दी. कहना चाहिए कि उस के दाँत खट्टे कर दिए . 21वीं सदी मेँ नवभारत टाइम्स ने एक बार फिर बढ़त हालिस की. यह बात लेख के दूसरे खंड मेँ करें तो उपयुक्त रहेगा.
तो अक्षय जी – मेरी उन से पहली मुलाक़ात 1957 मेँ तब हुई जब राम का अंतर्द्वंद्वके विरुद्ध दैनिक पत्रोँ मेँ मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगला जा रहा था. उन से मिलाने ले गए थे मुझे मेरे घनिष्ठ मित्र और सहकर्मी चंद्रमा प्रसाद खरे. अक्षय जी से मिलने से पहले हम दैनिक हिंदुस्तानके संपादक श्री मुकुट बिहारी वर्मा के पास गए थे. वर्मा जी और मैँ एक दूसरे को थोड़ा बहुत पहचानते थे, साप्ताहिक हिंदुस्तानके कार्यालय मेँ मेरे मित्र रामानंद दोषी और संपादक श्री बाँकेबिहारी भटनागर के पास मेरा आना जाना होने के कारण. हम वर्मा जी से सिर्फ़ यह कहना चाहते थे कि मुझे भी अपने बचाव मेँ कुछ कहने का मौक़ा दिया जाए. लेकिन वर्मा जी तो हमारी बात सुनने से पहले ही भड़क उठे और बुरा भला कहने लगे. दूसरी ओर भाई साहब (अक्षय जी) ने हमारी बात ध्यान से सुनी और कहा कि अपनी बात उन के पत्र के द्वारा कहने का हमारा पूरा अधिकार है. मुझ जैसे ‘बदनाम‘लेखक को उन का यह आश्वासन देना मेरी नज़र मेँ बड़ी बात थी. मेरे मन मेँ उन का सम्मान स्थापित हो गया और यह मुलाक़ात हम दोनों के बीच अग्रज और अनुज का रिश्ता बनाने मेँ सहायक हुई. इस के 6 साल बाद यह मुलाक़ात ही मुझे टाइम्स आफ़ इंडिया के मुंबई कार्यालय बोरीबंदर तक पहुँचाने का माध्यम बनी. पता नहीं भाई साहब ने मुझ मेँ क्या देखा जो स्वर्गीय श्रीमती रमा जैन और साहू शांति प्रसाद जैन को उन्होँ ने 33-वर्षीय युवक को एक बिल्कुल नई पत्रिका का भार सौंपने के लिए राज़ी करा लिया.
विश्वनाथ जी की ही तरह अक्षय जी भी पत्रकारिता मेँ पांडित्य प्रदर्शन की बजाए पाठक की सेवा को महत्व देते थे. ऐसा नहीं कि उन्हेँ साहित्य का या समाज शास्त्र का ज्ञान न हो. पर वे उस का बिल्ला लगाए घूमते फिरते नहीं थे. (विश्वनाथ जी के विपरीत वह सामाजिक प्राणी थे. सभाओं गोष्ठियोँ मेँ भाषण करते फिरते थे. बाँके बिहारी भटनागर और वह इस मामले मेँ कभी कभी हम लोगोँ के बीच हास्य का विषय भी बन जाते थे.) संपादक बनने से पहले रामायण पर उन्होँ ने एक लोकप्रिय फ़ीचर भी लिखा था. हर वह विषय जिस मेँ पाठक की रुचि हो, हर वह चीज़ जो पाठक को जाननी चाहिए, उस पर सामग्री प्रकाशित करना उन का मानो धर्म सा था. लेखक छोटा हो या बड़ा – इस की चिंता उन्हेँ नहीं थी. हाँ, वह सामग्री विद्वत्ता के दंभ से हीन होनी चाहिए. यह बात ठेठ साहित्यकारोँ और महाज्ञानी पंडितों के गले नहीं उतरती, लेकिन पाठक को यह दृष्टिकोण सुहाता है. जब भी किसी लोकप्रिय पत्रिका का संपादक इस तथ्य को नज़रअंदाज कर देता है तो वह मुँह की खाता है. इस का एक महान अपवाद भी है – धर्मवीर भारती, और उन के संपादन मेँ धर्मयुग. लेकिन भारती जी और धर्मयुग का विषय एक स्वतंत्र खंड का हक़दार है.
माधुरीऔर मैँ
जब मैँ ने सुचित्रा-माधुरीका समारंभ किया तो मेरे सामने एक स्पष्ट नज़रिया था. मैँ एक ऐसे संस्थान के लिए पत्रिका का आरंभ करने वाला था, जो पहले से ही अंगरेजी की लोकप्रिय पत्रिका फ़िल्मफ़ेअर का प्रकाशन कर रही थी. आरंभ मेँ वहाँ का मैनेजमैँट फ़िल्मफ़ेअरका हिंदी अनुवाद ही प्रकाशित करना चाहता था. इस के लिए मैँ तैयार नहीं था. मेरा कहना था, अनुवाद प्रकाशित करना हो तो आप को संपादक की तलाश नहीं करनी चाहिए, बल्कि किसी ट्रांसलेशन ब्यूरो के पास जाना चाहिए या अपना ही एक ऐसा ब्यूरो खोल लेना चाहिए. फिर तो आप फ़िल्मफ़ेअर क्या, इलस्ट्रेटिड वीकली, फ़ेमिना, टाइम्स आफ़ इंडिया - सभी के हिंदी संस्करण निकाल सकते हैँ! और मैँ ऐसे किसी ब्यूरो का अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं था. अनुवाद वाली योजना मैनेजमैँट की थी, रमा जी को स्वयं क़तई पसंद नहीं थी.
जब उन लोगोँ ने मेरी बात स्वीकार कर ली, तो वेतन आदि पर किसी तरह की सौदेबाज़ी किए बिना, यहाँ तक कि वेतन तय किए बिना ही, मैँ मुंबई पहुँच गया. मेरे सामने कई चुनौतियाँ थीं. मैनेजमैँट हमेँ फ़िल्मफ़ेअरकी कसौटी पर कसेगा. हिंदी पाठक की माँगें कुछ और हैँ. उन दिनों हिंदी मेँ बहुत सारी फ़िल्मी पत्रिकाएँ निकलती थीं. अधिकांश मेँ बड़े घटिया ढंग से लिखी फ़िल्म कहानियाँ प्रकाशित होती थीं. माहौल यह था कि फ़िल्म पत्रिकाओं का घरोँ मेँ प्रवेश बुरा समझा जाता था. फ़िल्म पत्रिका तो दूर, फ़िल्म देखना भी चारित्रिक पतन का लक्षण माना जाता था. और ऐसे मेँ मैँ अपनी पत्रिका को घर घर जाने वाली फ़िल्म पत्रिका बनाना चाहता था, जिसे बाप बेटी और माँ बेटा निस्संकोच साथ साथ पढ़ सकें. इस के साथ साथ मेरी अपनी सीमाएँ भी थीं. मैँ सरिता ,कैरेवान, मुक्ता,उर्दू सरिता जैसी पत्रिकाओं मेँ काम कर चुका था. अपने को कुछ कुछ कवि भी समझता था. कलाचित्रोँ और मूर्तियोँ की, नाटकोँ की समीक्षाएँ किया करता था, फ़िल्मों की भी. लेकिन न फ़िल्मी कलाकारोँ के बारे मेँ बहुत जानता था, न तकनीक के बारे मेँ, न कला के. मुझे पत्रिका निकालते निकालते सब कुछ जानना और सीखना था.
सब से पहले मैँ ने फ़िल्मफ़ेअरके फ़ारमैट को अपना आधार बनाया, क्योंकि हमारी हिंदी पत्रिका का साइज़ भी वही था. फ़िल्मफ़ेअरजैसे ही कुछ स्थायी स्तंभ. यहाँ तक मैनेजमैँट को ख़ुश करने के लिए था. साजसज्जा के लिए मैँ ने कला विभाग से कहा कि उस से मिलती जुलती न हो कर कुछ अलग हो. हमेँ अपनी एक अलग छवि बनानी थी, पुरानी हिंदी फ़िल्म पत्रिकाओं से और फ़िल्मफ़ेअर से. फ़िल्मों के बारे मे जो मैँ जानना चाहता था, वह जानने मेँ पाठकोँ की रुचि भी होगी – यह सोच कर मैँ ने काफ़ी सामग्री वैसी ही बनवाने की कोशिश की – जैसे एक सचित्र फ़ीचर – फ़िल्में कैसे बनती हैँ.फ़िल्मफ़ेअरमेँ संगीत पर विशेष खंड नहीं था. मैँ ने सोचा कि हमारी फ़िल्मों मेँ सब से लोकप्रिय तत्त्व है संगीत. तो उस के बारे मेँ पर्याप्त सामग्री होनी चाहिए. फ़िल्में बनाने मेँ अकेले अभिनेता और निर्देशक और निर्माता ही नहीं होते, अनेक प्रकार के सहयोगी होते हैँ, नृत्य निर्देशक, सैट बनाने वाले, कैमरा चलाने वाले… उन सब के बारे मेँ भी पाठकोँ को बताया जाए.
और इस से भी महत्वपूर्ण यह बात कि उन दिनों जो हिंदी फ़िल्मों का पेड़ों के गिर्द नाचने वाला बचकाने से रोमांस का फ़ारमूला था, उस से दर्शक ऊब चुके थे. मैँ ने सोचा कि ऐसी फ़िल्मों की तीखी आलोचना की जाए और जो भी अच्छी फ़िल्में निर्माणाधीन हों, जिन मेँ कुछ साहित्यिकता होने की संभावना हो, कुछ ऐसा हो जो लोकप्रिय भी हो सके और जिस का स्तर ऊँचा और सुरुचिपूर्ण हो, उसे प्रोत्साहन दिया जाए. साहित्यकारोँ को फ़िल्मों के बारे मेँ गंभीरता से सोचने का अवसर देने के लिए उन से लिखवाया जाए, निर्माता-निर्देशकोँ से साहित्य की, साहित्यकारोँ की चर्चा की जाए. और विश्व मेँ जो श्रेष्ठ सिनेमा बन रहा है, उस के बारे मेँ हिंदी वालोँ को बताया जाए. सब कुछ एक ऐसी शैली औऱ भाषा मेँ जो पाठकोँ की समझ मेँ आ जाए. मेरे लिए यह इस लिए भी सहज था कि मैँ स्वयं अज्ञानी था. जो बात मेरी समझ मेँ नहीं आती थी, मैँ मान लेता था कि पाठकोँ की समझ मेँ भी नहीं आएगी.
इस प्रकार शुरू हुआ सुचित्रा-माधुरीका सफ़र. पहले अंक की प्रतियाँ ले कर हमारे रिपोर्टर जाने माने फ़िल्म वालोँ से मिले. सब ने प्रशंसा की. सब से अच्छी टिप्पणी शांताराम जी ने की थी. वह मुझे अब तक याद है. उन्होँ ने कहा, इस मेँ फ़िल्मफ़ेअरकी झलक है, यह अच्छा नहीं है.मैँ ने उन से तत्काल प्रार्थना की कि भविष्य मेँ भी हम पर नज़र रखें और मार्गदर्शन करते रहें. और उन से हमेँ हमेशा प्रोत्साहन मिलता भी रहा.
माधुरीसफल हिंदी पत्रिकाओं मेँ गिनी जाती है. लेकिन जो बात मुझे माधुरीमेँ रहते समझ मेँ नहीं आई, और अब तक नहीं समझ पाया हूँ, वह यह कि पाठक फ़िल्मी गौसिप क्यों पढ़ना चाहते हैँ. मैँ कभी गौसिप नहीं छाप पाया. यही नहीं, मुझे नहीं लगता कि हिंदी मेँ कोई भी वैसी गौसिप लिख और छाप पाता है जैसी अँगरेजी फ़िल्म पत्रिका स्टारडस्ट ने शुरू की. हिंदी तो क्या, अँगरेजी की फ़िल्मफ़ेअरजैसी पत्रिकाएँ भी इस मामले मेँ पिछड़ रही थीं. जिस तरह फ़िल्मफ़ेअरने अपनी साजसज्जा से फ़िल्मइंडिया (बाद मेँ मदर इंडिया) को पिछाड़ दिया था, उसी तरह स्टारडस्टने अपनी चाशनीदार हिंदी-मिश्रित अँगरेजी से और एक अजीब से ईर्षा-मंडित कैटी (बिल्लीनुमा – उस के गौसिप वाले पन्नों मेँ एक बिल्ली बनी होती थी) रवैये से फ़िल्मफ़ेअर को पिछाड़ दिया. उस मेँ फ़िल्म समीक्षा तक नहीं होती थी. गौसिप वाले फ़ीचरोँ के अतिरिक्त जो भी सामग्री होती थी, वह सिर्फ़ स्टार मैटीरियल होती थी. उस मेँ भी बस गौसिप और गौसिप. मेरी नज़र मेँ यह अच्छा हो या बुरा, लेकिन सच यह है कि यही उस की दिनो दिन बढ़ती बकरी का आधार बना. इस संदर्भ मेँ एक फ़ालतू सा सवाल है कि हमेँ पैसा कमाने के लिए किस हद तक जाना या नहीं जाना चाहिए? आज तो हर हिंदी अँगरेजी दैनिक समाचार पत्र और सभी टीवी न्यूज़ चैनल पर फ़िल्मों और फ़िल्मी गौसिप छाई रहती है. (अच्छा है कि मैँ समांतर कोश बनाने कि लगन मेँ माधुरीछोड़ आया–वरना मेरे लिए माधुरीको गौसिप और अश्लील चित्रोँ वाली पत्रिका बनाना असंभव ही होता.)
धर्मयुग माने भारती
धर्मयुग को एक समय हिंदी की पताका कहा जा सकता था. उसे यह पद दिलाने का काम किया था डाक्टर धर्मवीर भारती ने. मुंबई जाने से पहले मैँ उन्हेँ कालजयी नाटक अंधा युगके लेखक के तौर पर जानता था. उन से सारे हिंदी जगत को ईर्ष्या है, यह भी मैँ जानता था. इस ईर्ष्या का कारण मैँ न तब समझा, न अब तक समझ पाया हूँ. जहाँ तक पाठक-दर्शक वर्ग का संबंध है, या किसी के कृतित्व के आकलन का प्रश्न है, ये सारी बातें संदर्भातीत हो जाती हैँ. पाठक को इस से कोई मतलब नहीं है कि कौन कैसा है. उस ने क्या लिखा है, उस मेँ कितनी गहराई है, मार्मिकता है – यही पाठक के काम की बात होती है. अगर भारती धर्मयुग मेँ नहीं आते, तो उन्होँ ने अंधा युगसे भी महान कोई अन्य रचना रची होती या नहीं – यह प्रश्न अनुत्तरित ही रहेगा. मुझे लगता रहा है कि धर्मयुग का वरण कर के उन्होँ ने अपने को होम दिया. धर्मयुग उन के लिए पत्नी, प्रेमिका, बच्चे, परिवार – सब कुछ था. वही उन का ओढ़ना था, वही बिछौना. पुष्पा जी को धर्मयुग अपनी सौत लगता था. भारती जी का अपना साहित्यिक मत जो भी रहा हो, उन्होँ ने साहित्य के विवादों को धर्मयुग मेँ सर्वोच्च स्थान कभी नहीं लेने दिया. एक एक पन्ने को उपयोगी सामग्री से ढूँसना उन्हीं का काम था. अपने आप को आधुनिक मानने वाले पत्रकार सजावट के पीछे अपने कम पन्नों का क़ीमती स्थान बरबाद कर देते हैँ. भारती जी तो बहुत सारे फ़ोटो भी डाकटिकट जितने आकार के छापते थे, ताकि पाठक को पढ़ने की सामग्री पूरी मिले. उन्होँ ने हिंदी के पाठक की ज्ञान की पिपासा को पूरी तरह समझ लिया था. वह पाठक को छका कर ज्ञानरस पिलाना चाहते थे. धर्मयुग की बिकरी सें सब से तेज़ी से बढ़त तब हुई जब अमरीका चाँद पर आदमी उतारने वाला था, और धर्मयुग ने अपने पन्नों पर उस की हर तरह की जानकारी बिखरा दी. यह एक मोटा सा उदाहरण है. सौर ऊर्जा हो, तो भी धर्मयुग के पन्नों पर उस के लिए जगह थी. रसोई के काम की नई चीज़ हो तो भी, और पाकिस्तान मेँ जीए सिंध आंदोलन हो तो उस के बारे मेँ भी. बांग्ला देश के युद्ध मेँ तो भारती जी ने स्वयं जा कर रिपोर्टिंग की, और पाठकोँ को अपनी लेखनी से सराबोर कर दिया. बिकरी बढ़ी यह उस का परिणाम था, उद्देश्य नहीं. ठीक वैसे ही जैसे हिंदू समाज के कूड़ा करकट को निकाल फेंकना विश्वनाथ जी के लिए बिकरी का नहीं, निजी अभिव्यक्ति का साधन था.
भारती जी का मन जब धर्मयुग से ऊबने लगा (अनेक कारणोँ से, जिन मेँ टाइम्स समूह के बदलते मैनेजमैँट का भी हाथ था), तो धर्मयुग मेँ वह बात नहीं रह गई. तब तक मैँ दिल्ली आ चुका था, इस लिए बहुत कुछ नहीं कह सकता. भारती जी के बाद तो धर्मयुग गिरता ही चला गया. मैँ यही कहूँगा कि मैनेजमैँट की ज़िम्मेदारी तो है ही, उन लोगोँ की भी है, जो उस के संपादकीय कर्ताधर्ता बने. उन्होँ ने पाठक को समझने की कोशिश कम की, और अपनी निजी पसंद या नापसंद को, मैँ तो कहूँगा अपने नासमझ को, अधिक प्रश्रय दिया. एक दो बार मैँ ने बाद का धर्मयुग देखा. मैँ अपने से पूछता कि क्या यह ख़रीदने के लिए मैँ अपना पैसा ख़र्च करूँगा? उत्तर नकारात्मक होता. मैँ उस पर अपना समय भी लगाना उचित नहीं समझता.
पराग और सारिका
मैनेजमैँट किस प्रकार किसी पत्रिका का भला चाहते हुए भी समाप्त कर सकता है, इस का सर्वोत्तम उदाहरण है पराग. (बाद मेँ यही थोड़े बहुत अंतर के साथ अन्य पत्रिकाओं के साथ भी घटा.) उस के संपादक थे सरिता के दिनों से ही मेरे मित्र और सिद्धहस्त कथाकार और कल्पनाशील आनंद प्रकाश जैन. तमाम उन बंधनों और सीमाओं के जो कि प्रकाशकोँ ने परागपर लगा रखी थीं, परागअच्छा ख़ासा चल रहा था. एक बंधन और सीमा यह थी कि उस मेँ परियोँ की कहानियाँ नहीं छापी जाएँगी. प्रकाशकोँ का विचार था कि बच्चों के लिए यह कोई अच्छी चीज़ नहीं होती. मैँ समझता हूँ कि परीकथाएँ बच्चों की कल्पनाशीलता और स्वप्नशीलता को प्रोत्साहित करने का उत्तम साधन होती हैँ. देवी देवताओं की कहानियाँ भी इसी लिए बंद थीं. इस का भरपूर लाभ मिल रहा था हिंदुस्तान टाइम्स के नंदन को, और दक्षिण से प्रकाशित होने वाले चंदा मामा को . फिर भी, परागअच्छा ख़ासा चल रहा था.
उन दिनों अँगरेजी मेँ स्टेट्समैनवाले कलकत्ता से जूनियर स्टेट्समैननिकालने लगे थे. अँगरेजी पढ़े लिखे शहरी तबक़ों मेँ उस का काफ़ी रुआब बन गया था. मैनेजमैँट ने कहा कि पराग को किशोरोँ की पत्रिका बना दिया जाए और जूनियर स्टेट्समैन से प्रेरणा ली जाए. यह तथ्य नज़रअंदाज कर दिया गया कि चंद बड़े शहरोँ के बाहर जूनियर स्टेट्समैन का अस्तित्व ही नहीं था. सवाल यह था और अब भी है कि हिंदी का जो पाठक बड़े शहरोँ मेँ रहता था वह भी उस कृत्रिम और नक़लची संस्कृति को नहीं जानता समझता था जो बचपन से ही अँगरेजी वातावरण मेँ पनपने वाले वर्ग को मिलती है. बड़े शहरोँ से निकलते ही, वह संस्कृति विलीन हो जाती है. हिंदी बाल पत्रिका वहीं बेची जाने वाली है. इस के साथ ही साथ यह समस्या भी है कि जब पत्रकार उस संस्कृति को जानते ही नहीं, तो उस मेँ पले बढ़े पाठक के लिए वे काम की सामग्री कैसे दे सकते हैँ? देंगे तो पाठक कहाँ से आएँगे? दिक़्क़त यह थी कि धनी प्रकाशकोँ के अपने बच्चे उसी संस्कृति मेँ पले बढ़े थे, और वे अपने संपादक से वही चाहते थे. वह नहीं दे पाता था तो उसे मूर्ख, अज्ञानी और अयोग्य समझते थे. सत्तर आदि दशक मेँ मूर्ख, अज्ञानी और अयोग्य कौन था – यह कहना कठिन है.
नया रूप नहीं चला तोपरागको एक बार फिर बच्चों की पत्रिका बनाने के आदेश दिए गए. लेकिन न आनंद प्रकाश जी, न उन के बाद कोई और संपादक परागको पहले जैसा वैभव दे पाया. एक बार वह पाठक के मन से उतरा तो उतरा ही रहा. न ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम! हाँ, बाद मेँ हरिकृष्ण देवसरे कुछ जान पराग मेँ डाल पाए. बहुत दिन वह भी पराग को जीवित नहीं रख सके.
मोहन राकेश के बाद सारिकापर आनंद प्रकाश जैन और चंद्रगुप्त विद्यालंकार हाथ आज़मा चुके थे. कहानियोँ जो विविधता चाहिए, उस की ओर इन दोनों ने ध्यान नहीं दिया. तब कमलेश्वर आए. वह उसे कहानी की बहुचर्चित पत्रिका बना पाए. उस का कारण विविधता नहीं थी. कमलेश्वर का अपना सजीव चेतन व्यक्तित्व था. सभी साहित्यकारोँ के लिए सारिकालेना एक तरह से आवश्यक बन गया. साहित्यकार भी संख्या मेँ कम नहीं हैँ. अतः पत्रिका एक बार फिर विकासोन्मुख हुई. कमलेश्वर ने यह भी ध्यान रखा कि कहानियाँ रोचक हों. फिर उन्होँ ने समांतर कहानी आंदोलन छेड़ दिया. पहले आनंद प्रकाश जैन सचेतन कहानी आंदोलन छेड़ चुके थे. पत्रिका मेँ प्रकाशित होने वाले लेखकोँ की संख्या आंदोलन से जुड़े लोगोँ तक रह गई. फिर भी पत्रिका चलती रह सकती थी, क्योंकि उस आंदोलन के लेखकोँ की रचनाओं मेँ पठनीयता थी, और जब तक सामग्री पठनीय है, पाठक को इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि लेखक यह है या वह. लेकिन तभी कुछ व्यक्तिगत कारणोँ से संचालक परिवार के दो एक सदस्यों को कमलेश्वर अप्रिय हो गए. सन 77-78 के कुछ राजनीतिक कारण भी रहे कहे जाते रहे हैँ. मेरी राय मेँ कमलेश्वर के जाने मेँ राजनीति नहीं ही थी. जो भी हो, कमलेश्वर ने सारिकाछोड़ दी. बाद मेँ वह पनप नहीं पाई. किसी को भी समझ मेँ नहीं आया कि जो कमलेश्वर का अपना पाठक वर्ग था, उस के रूठ जाने के बाद सामान्य पाठक को कैसे आकर्षित किया जाए.
बात कहानी की चल रही है. मैँ स्वयं कहानीकार नहीं कहानी पाठक हूँ.तो मैँ यह भी कहना चाहूँगा कि हिंदी कहानी अपने को पाठक से काटने पर तुली है. कहानीकार अपने को प्रथम श्रेणी का साहित्यकार मानते हैँ, और वे लोग पाठक के लिए नहीं, समालोचकोँ को प्रसन्न करने के लिए लिख रहे हैँ. उन की रचनाएँ पत्रकारिता के नहीं, साहित्यकारिता के दायरे मेँ आती हैँ. हिंदी मेँ साहित्यकारिता मेँ आज सफलतम हैँ – राजेंद्र यादव और उन का मासिक हंस.हंसमेँ कहानियाँ प्रकाशित करने के साथ समाज पर भी महत्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित करते हैँ, और अपने लिए अच्छा ख़ासा सामान्य पाठक वर्ग तैयार कर पाए हैँ. यदि राजेंद्र जी को बुरा न लगे, तो मैँ कहूँगा कि उन्होँ ने विश्वनाथ जी के सुधारवादी आंदोलन पर दलित और नारी विमर्ष का मुलम्मा भर चढ़ाया है. लेख सरिताजैसे सामाजिक और पारिवरारिक विषयोँ पर नहीं होते. उन्हेँ सैद्धांतिकता से मँढा जाता है. पर अंततोगत्वा वे हिंदू धर्म और समाज मेँ परिवर्तन का अलख तो जगाते ही हैँ. विश्वनाथ जी की जब अपनी ऊर्जा चुक सी गई और संपादकीय बाग़डोर उन के पुत्र परेशनाथ के हाथों आई तो नए युग के लिए नई पहचान वाली जो इंग्लिश पत्रिका Womans’ Era शुरू की थी, और विश्वनाथ जी की ही देखरेख मेँ जिस का हिंदी संस्करण गृहशोभा निकाला गया था, उसे परेशनाथ लगातार परिवर्तनशील सामयिक रूप देते रहे हैँ. यहाँ तक कि किसी भी अन्य महिला पत्रिका का इन के मुक़ाबले टिक पाना असंभव हो गया है.
सर्वोत्तम
अस्सी आदि दशक के आरंभ मेँ टेलिविज़न के विस्फोट ने हिंदी पत्रोँ से सामान्य पाठक को और भी दूर कर दिया था. एक तो पहले ही हिंदी पाठक अपनी अकर्मण्यता और रुचिहीनता के लिए सुविख्यात या कुख्यात है, वह कम से कम पढ़ना चाहता है, ख़रीद कर तो और भी कम पढ़ना चाहता है, ऊपर से उस के जीवन मेँ जो थोड़ा बहुत ख़ाली समय था, उसे टीवी ने भर दिया. वहाँ उसे काव्य, गीत, संगीत, कहानी, हास्य – सब मिलता था, सहज पाच्य शैली मेँ. टीवी ने विज्ञापकोँ भी अपनी ओर खींचा. उन के बजट का बड़ा हिस्सा टीवी पर चला गया. प्रिंट मीडिया मेँ केवल कुछ बड़े अख़बारोँ तक, वह भी अधिकतम बिकरी वाले अख़बारोँ तक ही ख़र्च करने के लिए विज्ञापकोँ पर पैसा बचा था. इस चैलेंज से अमरीकी प्रिंट मीडिया भी नहीं बच पाया था. लाइफ़जैसी पत्रिकाएँ धराशायी हो गईं. सामान्य मध्यम वर्गीय पाठक की पत्रिकाओं मेँ केवल रीडर्स डाइजेस्ट ही बच पाया था. इस का कारण यह था कि विज्ञापकोँ ने इस वर्ग के पत्रोँ मेँ से रीडर्स डाइजेस्ट को समर्थन देने के लिए सर्वसम्मति से चुन लिया था. लेकिन अपने आप को बदलते समाज के अनुरूप न ढाल पाने के कारण अमरीका मेँ पिछले कुछ सालोँ से उस की लोकप्रियता दिनोदिन घटती जा रही है. सुधार के अनथक प्रयासोँ के बावजूद कोई बहुत आशाप्रद तस्वीर बन नहीं बन पा रही है. भारत मेँ वैसी हालत नहीं है. उस का भारतीय अँगरेजी संस्करण अब भी बिक पा रहा है. एक कारण है– उस के भारतीय पाठक उस वर्ग के हैँ जिसे हम नक़लची कह सकते हैँ. सर्वोत्तमके पाठक उस कोटि मेँ नहीं आते थे. यहाँ भी कुछ उदाहरण दे कर ही बात स्पष्ट की जा सकती है. कनाडा मेँ आधी से अधिक सामग्री कनाडा की छपती है, भारत मेँ भारत की नहीं. भारत मेँ कुछ भी घटता रहे, यहाँ के डाइजेस्ट मेँ उस के बारे मेँ कुछ नहीं छपता था. लगता था उस का संपादन मंडल किसी अमरीकी ओलिंपस पर्वत पर बैठा है, नैसर्गिक बादलोँ के नीचे जो भारतीय संसार है, वह उसे नहीं दिखाई देता. दूसरा कारण है उस का स्वामित्व टाटा से हट कर इंडिया टुडे के हाथों आ जाना.
लेकिन कहना होगा कि डाइजेस्ट के लेख बहुत अच्छी तरह लिखे होते हैँ. उन की शैली से हिंदी वाले बहुत कुछ सीख सकते हैँ. लेकिन पत्रकारिता मात्र शैली नहीं होती. लेखक संसार को कैसे देख रहा है – इस से भी उस का सरोकार होता है. केवल एक उदाहरण – मान लीजिए श्रीलंका के बारे मेँ कोई लेख है. कोई अमरीकी वह लेख लिखता है, तो वह पश्चिम की नज़र से उस के इतिहास को देखेगा, यह बताएगा कि अंगरेजी का सैरेनडिपिटी शब्द उस द्वीप के अरबी नाम सेरेनदीवसे बना है, कि वहाँ आर्थर क्लार्क रहते हैँ…. यदि कोई भारतीय लिखेगा तो वह श्रीलंका से भारत के पुराने संबंधों की बात करेगा, रामायण की बात करेगा, सम्राट अशोक की बेटी संघमित्रा के बारे मेँ बताएगा, आज वहाँ की राजनीति मेँ तमिल और सिंहल टकरावों के पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालेगा. भारतीय पाठक को अँगरेजी के डाइजेस्टमेँ यह सब नहीं मिलता, और उसे इस की परवा भी नहीं है, क्योंकि वह अपने आप को आम भारतीय से कुछ भिन्न, कुछ अलग, कुछ ऊपर समझता है. अब हालत थोड़ी बहुत बदल रही है. संस्थापक वालेस दंपति के लेआउट फ़ारमूले को बदल दिया गया है. स्थानीय सामग्री की मात्रा बढ़ी है.
लेकिन हिंदी पाठक वैसा नहीं है. जब मैँ वहाँ था, तो सर्वोत्तम मेँ हम ने हिंदी पर और भारतीय विषयोँ पर कुछ विशेष लेख लिखवाए थे. मैँ ने पंडित गोपाल प्रसाद की एक पुस्तक मेँ से मथुरा पर एक अद्वितीय लेख छापा था, जिस मेँ वहाँ के त्योहारोँ का, छप्पन भोगोँ का वर्णन था; रामायण पर परिभाषात्मक पुस्तक लिखने वाले डाक्टर कामिल बुल्के पर विशेष लेख छापा था…
इलस्ट्रेटिड वीकली भी
साप्ताहिकोँ की बात करें तो हमेँ देखना होगा कि केवल धर्मयुग और दिनमानही बंद नहीं हुए, इलस्ट्रेटिड वीकलीभी बंद हुआ. क्यों? ख़ुशवंत सिंह जी के जाने के बाद वीकलीफिर रट मेँ पड़ गया. पाठक को हर अंक मेँ जो नवीनता और चुनौती ख़ुशवंत फेंकते थे, वह समाप्त हो गई. उस के जो संपादक आए उन मेँ वह सजग सृजनशीलता और कल्पनाशीनता नहीं थी, जो चाहिए थी. धर्मयुग मेँ भारती जी ने कभी कमाल दिखाया था. लेकिन टीवी विस्फोट के बाद जो चुनौती आई थी, जिस तरह तेजी से पाठक की माँगें बदली थीं, वह उस से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाए तो इस मेँ मैनेजमैँट का भी हाथ था.
इसी प्रकार दिनमान का प्रश्न है. दिनमान को इंडिया टुडे से बड़ी पत्रिका बनाया जा सकता था. लेकिन न तो उस के लिए खुले दिल से संसाधन जुटाए गए, न उस के संपादन विभाग को वैसी जिम्मदारी सँभालने के लिए प्रशिक्षित किया गया, न तैयार. ऊपर से बंद करने की धमकी हमेशा सिर पर सवार रखी जाती थी.
इस संदर्भ मेँ श्री अशोक जैन के पुत्र समीर जैन का नाम बार बार उछाला जाता है. मैँ समीर से एक दो बार तब मिला था, जब वह बहुत कमउम्र थे. उन का दृष्टिकोण बन ही रहा था. वह स्वामीनाथन के चित्रोँ के दीवाने थे. उन मेँ एक नई दृष्टि थी, और वह उतावले थे. वह भारतीय पत्रकारिता को एक दम से आधुनिकतम रोचक अमरीकी स्तर तक ले जाना चाहते थे. ऐसा चाहना पूरी तरह ग़लत नहीं कहा जा सकता. (इक्कीसवीं सदी मेँ उन के विचारोँ ने भारतीय पत्रकारिता के लिए नए पैमाने स्थापित किए हैँ) लेकिन तब उन की उतावली उन्हेँ अच्छा मालिक-संचालक बनने से रोक रही थी. अपने संपादकोँ को अपनी बात न समझा पाना उन की अपनी कमज़ोरी कहा जाएगा. अपने उतावलेपन से संपादकोँ के मन मेँ अपने प्रति अरुचि जगा देना भी उन की अपनी भूल कहा जाएगा. एक दो संपादकोँ से मैँ ने सुना है कि वह सब के सामने किसी भी संपादक का अपमान करने से नहीं चूकते थे. संपादकोँ को श्रीमती रमा जैन के शिष्ट व्यवहार की आदत थी. दूर से जो कुछ मैँ ने सुना है, समझा है, उस के आधार पर मैँ यह कह सकता हूँ कि समीर के मन मेँ अपने पत्रोँ को नए युग के अनुरूप ढालने की सही आकांक्षा रही होगी. लेकिन उन के अपने व्यवहार ने उन के उद्देश्यों को, जहाँ तक हिंदी पत्रोँ का सवाल है, असफल कर दिया.
मैनेजमैँट ने बिना सोचे समझे ऊटपटांग और पूरी तरह अव्यावसायिक आदेश देने शुरू कर दिए. धर्मयुग मेँ इलस्ट्रेटिड वीकलीसे अनूदित रचनाएँ छापने के आदेश दिए जाने की बात मैँ ने सुनी है. पता नहीं कहाँ तक सही है. माधुरीको हिंदी फ़िल्मफ़ेअरबना दिया गया – यह तो सब जानते हैँ. कुछ दिन मैँ ने वामाको नज़दीक से समझने की कोशिश की थी. मैँ जानता हूँ उसे हिंदी फ़ेमिना बनाया जाने वाला था. जैसे हिंदी फ़िल्मफ़ेअर नहीं चल पाया वैसे ही हिंदी फ़ेमिना भी नहीं चल पाती. मैँ ने सुना है पहले इसी तरह की योजना नवभारत टाइम्स को हिंदी टाइम्स आफ़ इंडिया बनाने की थी! हिंदी ब्लिट्ज़के साथ आधी समस्या यह भी थी. कुछ ऐसी ही समस्या हिंदी इंडिया टुडे के साथ भी है. इन सब अँगरेजी पत्रोँ के लेखक संपादक भारतीय हैँ – यहाँ तक तो ग़नीमत है, लेकिन अँगरेजी हिंदी पाठकोँ की रुचियोँ मेँ स्तर मेँ जो अंतर है, पत्रकारिता मेँ उसे भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. अगर पत्रिका माल है, तो हमारा माल अपने ग्राहक की आवश्यकताओं को पूरा करने वाला तो होना चाहिए. मुझे गुलाब जामन पसंद हैँ, तो आप मुझे केक तो नहीं बेच सकते.
यह कहना ग़लत है कि हिंदी पाठक के पास पैसा नहीं है. छोटे से छोटे कस्बे मेँ धनी व्यापारी भरे पड़े हैँ. कितने सरकारी अफ़सर हैँ, पुलिसिए हैँ, आयकर वाले हैँ, पटवारी हैँ, ज़मींदार हैँ, जिन्हों ने बेतहाशा सफ़ेद और धन कमाया गया है. वे सब पैसा ख़र्च करने को उतावले हैँ. ये सब लोग मूलतः हिंदी के पाठक हैँ. यही लोग संगीत की दुनिया को मालामाल कर रहे हैँ. दिक़्क़त सिर्फ़ यह है कि उन्हेँ हिंदी मेँ वह माल नहीं मिल रहा जिस पर वे पैसा ख़र्च करना चाहें.
सांध्य टाइम्स
टाइम्सके ही हिंदी सायंकालीन दैनिक सांध्य टाइम्सका उल्लेख करना आवश्यक है. जब जब मेरे मित्र सत सोनी के हाथ मेँ यह पत्र आया और जब तक रहा, ख़ूब चमका. वर्तमान हिंदी पत्रकारोँ मेँ सत सोनी सब से अधिक आधुनिक और पाठक के नए तेवर को समझने वाले पत्रकार हैँ – यह मैँ उन से पिछले पचास सालोँ के संपर्क के आधार पर कह सकता हूँ. सोनी के जाने के बाद देखने मेँ आया कि सांध्य टाइम्समेँ कुछ पन्ने अँगरेजी मेँ छापे गए. क्यों? मैँ नहीं जानता. हिंदी पाठक अँगरेजी सामग्री के लिए पैसा क्यों ख़र्चे?
बात इतनी ही नहीं है. जब कोरी व्यावसायिकता पत्रकारिता पर हावी हो जाती है, तो मैनेजमेँट बहुत सारी बातें सोचने लगते हैँ. जहाँ कार्यालय है, उस जगह का बाज़ार भाव क्या है? उस भाव के हिसाब से जो मुनाफ़ा समाचार पत्र दे रहे हैँ, क्या वह उस से मिल सकने वाले मासिक सूद से कम है? यदि वहाँ, मान लीजिए, होटल खोल दिया जाए, तो कितना मुनाफ़ा कमाया जा सकता है? जब इस तरह हानि लाभ की गिनती की जाने लगेगी, तो शहर के बीच मेँ बने हर अख़बार के दफ़्तर को या तो बंद करना पड़ेगा, या फिर दूर किसी गाँव मेँ ले जाना पड़ेगा! मैँ ने यह उदाहरण जान बूझ कर दिया है. ऐसा एक बार सोचा गया था – मुंबई मेँ टाइम्स के बोरीबंदर स्थित कार्यालय के बारे मेँ. कार्यालय तो बंद नहीं किया गया, लेकिन पत्रोँ को दूकान बना दिया गया. फ़ेमिना को फ़ैशन शो का व्यापारी बना दिया गया, और फ़िल्मफ़ेअर को पुरस्कार समारोह से मिलने वाली आमदनी की दूकान. इन के प्रायोजित कार्यक्रमों से करोड़ों कमाए जाने लगे. अब ये पत्रिकाएँ हैँ या कुछ और? मुक़ाबले मेँ हम देखते हैँ कि फ़ेमिनाजैसी और दिल्ली प्रैस से विश्वनाथ जी की देखरेख मेँ प्रकाशित होने वाली अँगरजी पत्रिका वूमैन्स ऐरा और हिंदी की गृहशोभा बड़ी शान से पत्रकारिता का झंडा लहरा रही हैँ.
अँगरेजी साप्ताहिक इलस्ट्रेटिड वीकलीके बारे मेँ बात करने के लिए भी यह सही प्रसंग है. जो पत्रिका मर रही थी, उसे ख़ुशवंत सिंह जी ने जीवंत बना दिया और दौड़ा दिया. उन के बाद वह जीवंतता फिर विलीन हो गई. यदि इलस्ट्रेटिड वीकली को भी व्यवसाय बनाने का कोई माक़ूल तरीक़ा मैनेजमैँट को मिल जाता तो वह बंद नहीं होता. यही धर्मयुग के साथ हुआ, सारिकाके साथ भी.
जहाँ तक फ़ेमिनाका प्रश्न है, या फ़िल्मफ़ेअरका, या अँगरेजी मेँ मुंबई से निकलने वाले इन जैसे अन्य पत्रिकाओं का, उन की चमक दमक ही अब सब कुछ है. यह महँगी चमक दमक अपने आप को मौड कहने वाले पाठक को और विज्ञापक को प्रभावित करती है. जितना पैसा इन के एक अंक के मुद्रण पर ख़र्च किया जाता है, उतना किसी हिंदी पत्रिका पर पूरे साल मेँ भी नहीं होता था. यह सही है कि हर व्यवसायी पहले व्यवसायी होता है. तत्काल लाभ कमाना उस के लिए प्राथमिकता है. अन्यथा वह ज़्यादा दिन टिक नहीं सकता. लेकिन भविष्य के बाज़ारोँ को पहले से तैयार करना और साधना भी व्यावसायिकता है, और दूरदर्शी व्यावसायिकता है.
पिछली सदी के अंत के सालोँ मेँ पत्रकारिता के क्षेत्र मेँ निराशाजनक दृश्य दिखाई दे रहा था. अधिकांश पत्रकार अपने आप को नई चुनौतियोँ के लिए तैयार नहीं कर रहे थे. जो बडे व्यवसायी हैँ, वे भविष्य के लिए तैयार नहीं थे.
लेकिन नई सदी के पहले दशक मेँ सारी तस्वीर बदल चुकी है. लगता है एक दम नवजीवन का, नई ऊर्जा का विस्फोट हो चुका है.
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01/21/13--07:15: कितनी बदल गयी पत्रकारिता (chan 7710543)
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August 23, 2011
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सन 1947 के दौरान और उसके बाद की पत्रकारिता का उद्देश्य शुद्ध जानकारीय्यों को समाज तक पहुंचाकर जागरुक करना था। जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया, पत्रकारिता का मतलब काफ़ी हद तक बदलता गया। आजादी से पहले और उसके बाद की पत्रकारिता पर नजर डालें और आज की पत्रकारिता की ओर देखे तो दोनो पत्रकारिता के बीच एक बहुत बडा फ़ासला दिखाई दे जाता है। 21वी सदी की पत्रकारिता का अर्थ “व्यवसाय” होकर रह गया है। कहना अनुचित न होगा कि इसी व्यवसायीकरण ने ही पत्रकारिता को पूरी तरहं बदल डाला है। अब पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सूचनाओं को समाज तक पहुंचाना नही रह गया बल्कि समाज का मनोरंजन कर किसी तरहं जल्द से जल्द शोहरत और पैसा बटोरा जाये यह रह गया है।
प्रोफ़ेसर अनंद कुमार का यह कहना कि आज की मीडिया “ट्रिप्पल-सी” यानी क्राईम,सिनेमा,क्रिकेट के इर्दगिर्द ही घूमती दिखाई देती है आज की मीडिया पर बिलकुल सटीक ठहरता है इसके साथ ही मीडिया कार्यप्रणाली कहां तक सीमित हो गई है, इसको बखूबी बयान करता है। आज अगर देखा जाये तो न्यूज चेनल हो या न्यूज पेपर सभी इन्ही “ट्रिप्पल-सी” के इर्दगिर्द की खबरे बडे चाऊ के साथ प्रकाशित और प्रसारित करते दिखते है। कहना गलत न होगा कि समाज भी बडे ही चाऊ के साथ इसे पढता, देखता और सुनता दिखाई देता है।
इस बात से हम सभी बखूबी वाकिफ़ होगें कि हमारा देश गांवो का देश है। आज भी हमारी जनसंख्या के सत्तर प्रतिशत नागरिक ग्रामीण इलाको में ही निवास करते हैं। इसके अलावा चाहे हम कितना ही क्यों ना इस भ्रम में रहकर ये भले ही सोच लें कि आज हमारे देश में अंधविश्वास खतम हो गया है। लेकिन सच्चाई यही है कि आज भी हमारे भारत में रह रहा एक बडा तबका अंधविश्वास को अपना धर्म मान चुका है। ऐसे में सभी जानते है कि इस अंधविश्वास की इस समस्यां को काफ़ी हद तक खत्म करने में लोकतंत्र के चौथे खम्भे का एक सबसे मजबूत और ताकतवर भाग इलेक्ट्रोनिक मीडिया यानी न्यूज़ चेनल्स बहुत ही कामयाब भूमिका निभा सकते है। पर ऐसा सोचना ठीक है लेकिन शायद ऐसा हो पाना मुशकिल लगता है। क्योंकि आज के समाचार चेनल्स टी० आर० पी० रूपी कैंसर से पूरी तरह पीडित हो गये हैं। अब तो चेनल को क्या चाहिये सिर्फ़ टी० आर० पी०, क्योंकि जितनी टि० आर० पी० सातवे आसमान पे होगी उतनी ही मोटी कमाई होगी यानी जितने ज्यादा लोग चैनल को देखेगें चैनल उतना प्रसिद्धि की सीढीयां चढेगा तो जाहिर सी बात है कि बड़ी-बड़ी और नामी गिरामी कंपनीया अपने उत्पाद को बेचने के लिये उनके पास दौड़ी चली आयेगीं जो समाचार चैनलों के लिये एक ऐसा होगा जैसे किसी जन्मो से प्यासे को पानी मिल गया हो। नोएडा के एक मकान में सात महीने से बंद रहने वाली दोनो बहनो के प्रकरण की कवरेज को लगभग सारे समाचार चैनलों ने इतनी ज्यादा तवज्जो दी कि चैनल पर तीन दिन तक कोई भी दूसरी खबर का खुल कर विवरण दिया ही नही गया और घूम-फ़िर बार-बार बस एक ये ही खबर दिखाई जाती रही। लग तो ऐसा रहा था मानो पता नही कितने दिनो से चैनल बस ऐसी ही अलग खबर का जोर-शोर से इंतजार कर रहे थे। कुछ कवरेज में तो लगभग सभी चनलों ने मनोवैज्ञानिको के थोड़े बहुत विश्लेषणों के माध्यम से दिखाए कि दोनो बहने “डिप्रेशन” रूपी भयंकर बिमारी का शिकार हो गयी थी जिसके चलते उन्होने ऐसा कदम उठाया पर इन वैज्ञानिक सटीक विश्लेषणों से खबर को ज्यादा बढा चढा कर पेश नही किया जा सकता था और चेनलो को अलग खबर जब तक नही मिलनी थी तब तक तो टी० आर० पी० को कायम तो रखना ही था। अब जहां इंडिया टी०वी अपनी भारी भरकम डरावनी आवाज के इस्तेमाल के लिये जाना जाता है वही सभी चेनलो का खबर बताने का तरिका डरावनी भारीभरक आवाज में तबदील तब होता दिखा जब बड़ी बहन की डायरी में काला जादू का जिक्र आया। सभी चेनलो ने एक-एक करके काले जादू के जिक्र को इतना उठाया कि कितनो को तो ऐसा लगने लगा होगा कि शायद दोनो बहनो की ये हालत काले जादू के कारण ही हुई थी। अगर चेनल चाहते तो परिवार की हालत के पीछे काले जादू की प्रभाव होने वाली बात को खण्डित कर सकते थे। पर ऐसा क्यों करेगें वे! क्योंकि आज चेनलो का लक्ष्य लोगो को जागरुक करना नही बल्कि लोगो को भ्रम में रख कर मोटी कमाई करना है। अगर हालिया के किये गये एक सर्वे कि बात की जाये तो करीब 70 प्रतिशत लोगो ने इस बात को मना कि आज भी गांवो में क्या शहरो में अंधविश्वास कम नही हुआ है। चैनलों के ऐसे रवये को देखते हुये तो यही कहा जा सकता है कि अंधविश्वास के प्रति लोग जागरुक होने बजाये इसकी गहरी खाई में लगातार गिरते चले जायेगें और चेनल अपने लालच रूपी तीर को साधते हुये आम जनता के मन में काले जादू जैसे अंधविश्वास के आकार को फ़ेलाने में अपनी भूमिका निभाते जायेगें।
पेड न्यूज:- पेड+न्यूज के बारे में हम सभी परिचित क्योंकि कोई भी जानकारी जब किसी संचार माध्यम से लोगो तक पहुंचती है वही न्यूज कहलाती है और अब बात आयी कि अखिर यह पेड न्यूज क्या है भला? पेड न्यूज को हम इस प्रकार समझ सकते है कि जब किसी घटना स्थल मोजूद व्यक्ति से पैसे लेने के बाद न्यूज को किसी प्रकार तोड-मरोडकर दिखाना है, ये फ़िक्स कर लिया जाता है और जानकारी या न्यूज को पैसे देने वाले के बताये अनुसार चाहे वह गलत हो या सही सीधा लोगो तक संचार माध्यम से पहुंचा दिया जाता है। अब सवाल उठता है कि लोकतंत्र या समाज को अखिर पेडन्यूज से क्या नुकसान है? तो सीधी बात समज आती है कि एक जानकारी ही मानव को उसके आस-पास क्या घटित हो रहा है एक न्यूज के रूप में उस तक पहुंचती है और अगर वही जानकारी गलत न्यूज के रूप में लोगो तक पहुंचेगी तो उसका कोई अच्छा प्रभाव तो पडने वाला है नही! जाहिर सी बात है कि अगर जानकारी लोगो तक पहुंचेगी तो उनका नजरिया भी एक गलत दिशा में जाने लगेगा यानी अगर सीएजी जांच कमेटी की रिपोर्ट में दि गई पडताल को ठीक उलट बताकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की छ्वी को मीडिया पैसे लेने के बाद बिलकुल पाक-साफ़ बता कर प्रसारित और प्रकाशित कर देती तो शायद हमारा नजरिया भी यही कहता कि शीला दीक्षित ने भ्रष्टाचार में कोई भूमिका नही निभाई।अब क्या कहे आज की पत्रकारिता को बस यही कह सकते है कि पत्रकारिता बदल-बदल कर बदल गयी!
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01/21/13--07:26: पत्रकारिता का अर्थ (chan 7710543)
बेनकाब
आजादी की दरकार
ज्ञान-विज्ञानं
• साक्षात्कार के दौरान जरूरी 6 बातें •RTI: सूचना का अधिकार •अंग्रेजी सीखने के महत्वपूर्ण सूत्र •यु.जी.सी. नेट का ऑनलाइन फॉर्म केसे भरे •इंडियन अत्याचार •साधारणीकरण क्या है? •फिर आजादी की दरकार •पत्रकारिता का इतिहास •टेलीविज़न प्रणाली •फोटोग्राफी Powered By Tech Vyom
पत्रकारिता का अर्थ
देवर्षिनारदघूम-घूमकरसंवाद-वहनकरनेवालोंमेंअग्रणीथे।उन्हेंजनसंचारकाआदिआचार्यकहाजातासकताहै। ``बुद्धिमतांवरिष्ठम्´´ हनुमानजनसंचारकेनायकथे।महाभारतकेकुरूक्षेत्रके 18 दिनोंकेमहायुद्धकाआँखोंदेखाहालकोसुनानेवालेसंजयसंचारमाध्यमकेपुरोधामानेजातेहैं।भारतीयसाहित्यमेंमेघ, हंस, तोता, वायुसंचारकेमाध्यमकेरूपमेंविर्णतहै।
बाईबिलमेंस्वर्गकीपुष्पवाटिकामेंबाबाआदमऔरअम्माहौवाकीजोकथाहै, वहएकप्रकारसेसंचारकाप्रारिम्भकस्वरूपहै।अम्माहौवानेकहा, `` क्योंनहमवहफलखाँएजोज्ञानकेवृद्धपरलगताहै, जिसकोखानेसेहमेंपापऔरपुण्यकाज्ञानहोजायेगा।यहफलहमारेलिएवर्जिततोभीहमेंकोईपरवाहनहींकरनीचाहिए।´´ यहीछोटी-सीवार्ताजनसंचारकीएककड़ीबनगयी।
प्राचीनकालमेंपठन-पाठन, मुद्रणकेसाधनकेअभावमेंजनसंचारकेमाध्यमगुरूयापूर्वजथेजोमौखिकरूपसेसूचनाओंकोएकपीढ़ीसेदूसरीपीढ़ीतकपहुँचातेथे।लेखनकेप्रचलनकेबादभीपत्रोंपरसंदेशलिखेजातेथे।मौर्यकालएवंगुप्ताकालमेंशिलालेखोंद्वाराधार्मिकएवंराजनीतिकसूचनाएँजनसामान्यतकपहुँचायीजातीथीं।उसीसमयवाकयानवीस (संवाददाता), खुफियानवीस (गुप्तसमाचारलेखक), सवानहनवीस (जीवनीलेखक) तथाहरकारा (संदेशवाहक) संचारसम्प्रेषणकेक्षेत्रमेंकार्यरतथे।
इसप्रकारमुट्ठीभरलोगोंकेअध्ययन, चिन्तन-मननऔरआत्माभिव्यक्तिकीप्रवृत्तितथा `सबजनहितायसबजनसुखाय´ केप्रतिव्यग्रतानेपत्रकारिताकोजन्मदिया।
पत्रकारिताकेप्रकारसांस्कृतिकपत्र-पत्रिकाएँ, शिक्षासम्बन्धीपत्रिकाएँ, धार्मिकपत्र-पत्रिकाएँ, कृषिपत्रिकाएँ, स्वास्थ्यसम्बन्धीपत्रिकाएँ, विज्ञानविषयकपत्रिकाएँ, उद्योगसम्बन्धीपत्रिकाएँ, चलचित्रसम्बन्धीपत्रिकाएँ, महिलसम्बन्धीपत्रिकाएँ, खेलसम्बन्धीपत्रिकाएँ, बालसम्बंधीपत्रिकाएँ
प्रेसऔरपत्र
चीनने 175 ई0 मेंठप्पेसेमुद्रितग्रन्थकुछभागआजभीविद्यमानबतायाजाताहै। 972 ई0 मेंएकलाखतीसहजारपृष्ठोंकात्रिपिटकग्रन्थछपा।परन्तुवर्तमानमुद्रण-पद्धतिकीकहानी 500 वर्षोंसेपीछेनहीजाती।अलग-अलगअक्षरोंकेधातुटाईपसर्वप्रथम 1450 ई0 मेंजर्मनीमेंबनी।तत्पश्चात् 1466 मेंफ्रांस, 1477 मेंइंग्लैण्डऔर 1544 मेंपुर्तगालमेंइसकलाकाप्रचारहुआ।पुर्तगालमेंईसाईधर्मप्रचारकोंद्वारा 1550दमेंदक्षिणभारतकेगोवाशहरमेयहकलाआयी।भारतकीसर्वप्रथमपुस्तकरोमनलिपिऔश्रदेशीभाषामें 1560 ई0 मेंछपीथी।परन्तु 1178 ई. मेंकलकत्तामेंप्रेसखुलनेतककोईगण्यंउन्नतिइसक्षेत्रमेंनहींहुई।आधुनिकवैज्ञानिकप्रेसऔरपत्रसेपर्याप्तभिन्नतारखनेवालेरोमनके `एक्टाडिउना´ दैनिकघटनाएँऔरचीनके `पीकिंगगजट´ सेपत्रकारिताकाप्रारम्भमानागयाहै।बाईबिलकेअधिकाधिकप्रसारकीप्रेरणावशगांटेनबुर्गनामकईसाईनेमध्यजर्मनीकेमायन्सनगरमेंसन् 1440 ई0 मेआधुनिकमुद्रणकलासेसाम्यरखनेवालेप्रेसकीस्थापनकीआजकलकेसमाचारपत्रोंकाप्रारिम्भकरूपनीदरलैंडकेन्यूजाइटुंग (1562 ई0) मेंमिलताहै।सन 1615 ईमेंजर्मनीसे `फ्रैंकफटेZरजर्नल, 1631 ई0 मेंफ्रांससे `गजटदफ्रांस´, 1667 ईमेंबेिल्जयमसे `गजटवैनगट´, 1666 ई0 मेंइंग्लैण्डसे `लन्दनगजट´ और 1690 ई0 मेंसंयुक्तराष्ट्रअमेरिकासे `पब्लिकआकरेंसेज´ काप्रकाशनहुआ।दैनिकपत्रकेरूपमे 6डेलीकरेट´ कानामलियाजाताहै।, जो 11 मार्च 1702 ई0 निकला।
मुगलकालमें
मुगलकालमेंसंवाद-लेखकोंकीनियुक्तिहुईजिन्हें `वाकयानवीस´ कहाजाताथा। `वाकयानवीस´ द्वाराप्रेषितखतोंकेसारांशकोबादशाहोंकोसुनायाजाताथा।अखबाराते-ए-दरबारे-झुपल्ला, पैगामेंहिन्द, पुणेअखबारजैसेहस्तलिखितपत्रोंकोपत्रकारिताकापूर्वजकहाजासकताहै।
छापाखानाऔरमिस्टरबोल्ट
भारतकेगोवामें 1550 ई0 मेंप्रेसकीस्थापनाहुई।बम्बईमें 1662 ई0, मद्रासमें 1722 ई0 तथाकलकत्तामेंसन् 1779 ईमेंप्रेसबैठाएगये। 29 जनवरीसन 1780 ई0 वहस्विर्णमदिवसहैजिसदिनएकगैरभारतीयद्वारापत्रप्रकाशितहुआ। `बंगालगजटएण्डकैलकटाएडवटाZइज´ केसर्वस्वजेम्सअगस्टसहिंकीथे।संक्षेपमेंइसपत्रको `हिकीजगजट´ कहाजाताहैजिसकालक्ष्यथां। ``यहराजनीतिकऔरव्यापारिकपत्रखुलातोसबकेलिएहै, परप्रभावितकिसीसेनहीहै।
`इंडियनगजट´ 1780 ई0, `बंगालजर्नल´ 1784 और `इंडियनबल्र्ड´ 1791 कलकत्तासेहीप्रकाशितहुए।भारतीयपत्रकारिताकेजनकाराजाराममोहनराय (1772-1833) केप्रयाससे 1818 ई0 में `बंगालगजट´, 1821 ई0 में `संवादकौमुदी´ और `मिरातुल-अखबार´ निकले।
उन्नीसवींशताब्दीकेतीसरेदशकमेंमद्रासकेगवर्नरसेसरटॉमसमुनरोंनेप्रेसकीआजादीकोआंग्लसत्तासमाप्तिकापर्यायमाना।उनकेहीशब्दोंमें, ``इनकोप्रेसकीआजादीदेनाहमारेलिएखतरनाकहै।विदेशीशासनऔरसमाचारपत्रोंकीस्वतन्त्रतादोनोंएक-साथनहींचलसकते।स्वतंत्रप्रेसकापहलाकर्तव्यक्यास्वतन्तादोनोंएक-साथनहींचलसकते।स्वतंत्रप्रेसकापहलाकर्तव्यक्याहोगा? यहीन, किदेशकोविदेशीचंगुलसेस्वतंत्रकरायाजाए, इसलिएअगरहिन्दुस्तानमेंप्रेसकोस्वतंत्रतादेदीगयीतोइसकाजोपरिणामहोगा, वहदिखायीदेरहाहै।´´
आजादीपूर्वपत्रकारितामेंप्रवेशकरनेकातत्पर्यआंग्लसत्ताकेफौलादीपंजेसेमुकाबलाकरनाथा, आर्थिकसंकटसेजूझनातथासदैवकंटकाकीर्णपथकाअनुगामीबननाथा।
कालविभाजन
30 मईसन् 1826 ई0 कोहिन्दीकेप्रथमसाप्ताहिक `उदन्तमार्तण्ड´ काप्रकाशनहुआजो `पहलेपहलहिन्दुस्तानियोंकेहितहेतुथा।इसी `उदन्तमार्तण्ड´ सेहिन्दीपत्रकारिताकाप्रादुर्भावमानाजाताहै।उदन्तमार्तण्डसेप्रेरणाप्राप्तकर `बंगदूत- (1829), `बनारसअखबार , सुधाकर(1850), बुद्धिप्रकाश (1852), मजहरूलसरूर (1852), पजामेंआजादी (1857) आदिपत्रप्रकाशितहुएजिनकेद्वारा `तोड़ोंगुलामीकीजंजीरे´, `बरसाओंअंगारा´ और `सत्वनिजभारतगहे´ कानाराबुलंदकियागया।सन 1826 से 1884 ई0 कीअवधिमेंप्रकाशितपत्रोंकीआह्वानमयीप्रवृतिकाआकलनकरइसेउद्बोधनकालकेनामसेपुकारनाउपयुक्तहोगाक्योंकिपत्रकारोंकास्पष्टमतथाकिदासतारूपीराष्टरोगकीऔषधीजनताकीमहाशक्तिकाउद्बोधनहै।
सन 1885 ई0 मेंहीहिन्दुस्तानमेंराष्ट्रीयजागरणकेभैरवीमंत्रकोफूँकनेकेलिएराजारामपालसिंहनेप्रथमहिन्दीदैनिक `हिन्दोस्थान´ काप्रकाशनप्रारम्भकिया।अत: 1885 से 1919 अवधिको `जागरणकाल´ केनामसेअभिहितकरनासुसंगतहोगा।
सन 1885 से 1919 ई0 तककीअवधिकेपत्रोंनेराष्ट्रीयचेतनाकोपल्लवितकियातथा `स्वराज्यहमाराजन्मसिद्धअधिकारहै´ इसनारेकोसार्थककरनेकेलिएजन-जनमेंजागरणकासंचारकिया।एकऔर `भारत´ के `अभ्युदय´ हेतु `हिन्दीकेसरी´ स्वराज´ कामंत्रफँूकताथातोदूसरीऔरभावात्मकएकताकेलिए `देवनागर´ सबसेएकसूत्रमेंबंधजानेकीअपीलकरताथा, जैसाकिस्वतंत्रताकेअक्षय-स्रोतवीरसावरकरकालक्ष्यथा-एकदेव, एकदेश, एकभाषा
एकजाति, एकजीव, एकआशा
सन 1920 से 1947 ई0 तकसंघर्षों, अभावों, अभिशापोंऔरप्रताड़नाओंकेबीचदबेरहकरपत्र-पत्रिकाओंनेआगऔरशोलोंसेभरीउत्तेजककथासुनायी।पत्रकारोंकीहुंकारऔरफुँफकारवालीवाणीनेभारतीयोंकोझकझोरदिया।सामूहिकउत्पीड़न, बेबसी, वेदनाकेकरूण-क्रन्दनकोनसुनाकरपत्र-पत्रिकाओंनेफिरंगियोंकेप्रतिघोरगर्जनकिया।होउथल-पुथलअबदेशबीचखौलेखूनजवानोंका।
बलिवेदीपरबलिचढ़नेकोअबचलेझुंडमर्दानोंका।
क्रान्तिकारीपत्रकारपराड़करजीनेभी 1930 ई0 में `रणभेरी´ मेंलिखा:-
`` ऐसाकोईबड़ाशहरनहींरहगयाहैजहाँसेएकभी `रणभेरी´ जैसापरचाननिकलताहो।अकेलेबम्बईमेंइससमयऐसेकईएकदर्जनपरचेनिकलरहेहै।शुरूमेंवहाँसिर्फ `कांग्रेसबुलेटिन´ निकलतीथी।नयेपरचोंकेनामसमयानुकूलहै।जैसे-`रिवाल्ट´ `रिवोल्यूशन´, `बलवों´, `फितूर´ (द्रोह), `गदर´, `बगावत´, आदि।दमनसेद्रोहबढ़ताहै, इसकायहअच्छासबूतहै।परनौकरशाहीकेगोबर-भरेगन्देदिमागमेंइतनीसमझकहाँ? वहतोशासनकाएकहीशस्त्रजानताहै-बंदूक।´´
स्वतंत्रताआंदोलनकोकुचलनेकेलिएप्रेसआर्डिनेंसद्वारापत्रकारितापरप्रहारकियागया।अधिकांशपत्रोंकाप्रकाशनस्थगितहोगया।ऐसीस्थितिमेंक्रान्तिकारीपत्रकारोेंने `रणभेरी´, `शंखनाद´, `चिनगारी´, बवण्डर, `रणडंका, चण्डिकाऔरतुफाननामधारीपत्रोंकागुप्तप्रकाशनकियाजिससेभारतमेंविप्लवमचगया।अंग्रेजोंकेदाँतखट्टेहोगए, उनकेशासनकाअंतहुआ।भारतीयक्षितिजपरअरूणमुस्कानछागयी।हमअपने-भाग्यनिर्माताबनगए।
गांधीजीनेस्वतंत्रताकाअर्थराजनीतिकआजादीहीनहींबतलायाबल्किाउसकसािाआर्थिक, सामाहिक, संास्कृतिनवनिर्माणपरजोरदिया।उन्होनेंकहा-``स्वराज्यकाअर्थहै-विदेशीशासनसेपूर्णस्वतंत्रताऔरपूर्णआर्थिकस्वतंत्रता।इसप्रकारस्वराज्यकेएकसिरेपरराजनीतिकस्वतंत्रताहैतोदूसरेसिरेपरआर्थिकस्वतंत्रता।उसकेदोसिरेऔरहै।तीसरासिराहै- नैतिकयासामाजिकऔरचौथाहैधर्मका।
इसप्रकारसन 1947 से 1974 ई0 कीअवधिकोनवनिर्माणकालकहनाउपयुक्तहोगाक्योंकितप:पूतसमर्पितसम्पादकोंनेअपनीरचनात्मकमेधाकाप्रयोगस्वतंत्रभारतकेसमग्रविकासकेनिमित्तकिया।सन 1975 सेआजतककीअवधिकोवर्तमानकालकेनामसेअभिहितकियागयाहै।
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01/21/13--07:44: पत्रकारिता अब मिशन या मशीन (chan 7710543)
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Submitted by admin on Wed, 2013-01-16 13:11
विवेक त्रिपाठी
समाचार पत्र जन मानस में संदेश पहुँचाने का शसक्त माध्यम है, लेकिन अब पत्रकारिता जगत में कार्पोरेट हावी है। समाचार पत्रों को अपनी जवाबदेही समझनी होगी। पत्रकारिता जगत में कोई छोटा बड़ा नहीं होता चाहे पत्रकार हो या समाचार पत्र। बस उसे अपने धर्म और कर्म को समझना चाहिए। देश व समाज के लिए वह कितना उपयोगी है यह महत्वपूर्ण होता है। मीडिया की आवश्यकता समाज को ही नहीं बल्कि सरकार के लिए भी आवश्यक है। आज समाचार पत्र विश्व के हर देश के लोगों के दैनिक जीवन का आवश्यक अंग बन गया है। समाज में फैली कुरीतियों अन्धविश्वासों रूढियों आदि को पत्रकारिता ने लगभग समाप्त किया है। प्रिन्ट मीडिया में समाचार पत्रों के महत्व को प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार लिप मैन ने इसे इस प्रकार स्पष्ट किया है समाचार पत्र को सर्च लाइट के प्रकाश के उस झोंक की तरह होते हैं जो इधर से उधर घूमता रहता है। कभी एक को कभी दूसरे को अंधकार से प्रकाश की ओर घसीट करा लाया है।
आजादी से पूर्व पत्रकारिता का उद्देश्य आजादी प्राप्त करना था लेकिन आजादी के बाद उद्योग के रूप में विकसित होता गया। बदलते हुए माहौल के साथ मीडिया के राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं भावनात्मक समीकरण भी तेजी से बदल रहे हैं। यह तो सही है कि पहले की अपेक्षा समाज की रूढि़यों को मिटाने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है। वहीं सामाजिक सरोकारों में वह अपने पंख फैला रहा है। पहले की अपेक्षा जनमानस को तेजी से जागृत करने में भी अग्रसर है। कुछ हिस्सों में तो मीडिया का कार्य सराहनीय है। अभी हाल में ही 16 दिसम्बर 2012 को चलती बस में एक 23 वर्षीय छात्रा के साथ चलती बस में बलात्कार हुआ। इस घटना को उजागर करने में मीडिया का बहुत बड़ा सहयोग रहा।छात्रा की मौत के बाद समाज में उमड़ा जनाक्रोश भी मीडिया की ही देन है। उमड़े जनाक्रोश को अनदेखा नहीं किया जा सका न समाज के द्वारा न सरकार द्वारा। इस पूरे मामले को अलख जगाने में सोशल मीडिया का भी भरपूर सहयोग रहा। अगर बात करें प्रिन्ट मीडिया की तो लगभग 225 साल पुराना है। लेकिन आधुनिक सूचना क्रान्ति के इस दौर में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने युवाओं को ज्यादा आकर्षित किया। लेकिन मीडिया जगत के बदलते स्वरूप ने पत्रकारिता को भी लज्जित किया है। इसका उदाहरण एक बड़े ग्रुप के दो संपादकों को धन उगाही के मामले में जेल भी जाना पड़ा। ऐसे और भी कई मामले हांेगे लेकिन संपादकों की गिरफ्तारी को लेकर पत्रकारिता का सबसे गिरा दौर कहा जा सकता है क्योंकि अगर मीडिया को समाज का आइना मानते हैं। तो इस आइने ने समाज में अपने को धुंधला करने का काम किया है। जिससे लोगों का विश्वास कम हुआ है और पत्रकारिता की साख भी गिरी है। अखबारों की संख्या और संस्करण दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे है कभी कोई व्यवसायी अखबार लेकर खड़ा हो जाता है तो कभी कोई ब्यूरोक्रेट्स। क्या उनका लक्ष्य पत्रकारिता हो सकता है। एक तरह से यह भी कह सकते हैं कि पत्रकारिता मिशन नहीं मशीन है पैसा कमाने की। अगर बड़े अखबारों को देखा जाय तो उन्होंने अपने पैर इतने पसार लिये हैं कि उनको छूना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। क्योंकि बड़े- बड़े मीडिया हाउस बन गये हैं और विज्ञापन से लेकर सर्कुलेशन इतना ज्यादा है कि छोटे समाचार पत्रों को पनपने की जगह नहीं मिल पा रही है। इसी कारण छोटे अखबार और पीछे होते जा रहे हैं। और वह बड़े अखबारों की बराबरी करने के चक्कर में अपना सब कुछ गंवा बैठते हैं। उनके पास पहले भी पूंजी कम होती है। कुछ लोग बड़े ग्रुप से निराश होकर अपना अखबार निकालते हैं।
पहले उन्हें पूंजी के लिए बड़ी मशक्कत करनी होती है लेकिन उनको हासिल कुछ भी नहीं होता। उनका हाल वही पुराना का पुराना फिर उनके सामने एक ही रास्ता है ब्लेकमेलिंग और उगाही का। और जो व्यवसायी हैं वे इसे आत्मरक्षक और सुरक्षात्मक मानते हैं। क्या पत्रकारिता महज एक प्रोटक्शन है। संपादक और लेखक से अधिक महत्वपूर्ण मालिक और विज्ञापन व्यवस्थापक हो गये हैं। कुछ सजग पत्रकारों की जागरूकता की वजह से ही सरकारों को जनहित के फैसले लेने पड़ते हैं। हलांकि अब आजादी की लड़ाई नहीं रह गई हैं लेकिन आजाद भारत में अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और कृषि जैसे ज्वलंद मुद्दे आज भी हैं। जिसके लिए जनमानस को आज भी जागृत करने की आवश्यकता है। लेकिन दुर्भाग्य कि जमीनी स्तर से इसके लिए प्रयास नहीं हो पा रहा है। मीडिया का स्वरूप तो वृहद होता जा रहा है लेकिन मूल उद्देश्य पीछे छूटते जा रहे हैं।
01/21/13--07:49: विश्व पत्रकारिता दिवस (chan 7710543)
हर-पल के विषय में Read more
आप यहाँ हैं विश्व पत्रकारिता दिवस एवं पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन
विश्व पत्रकारिता दिवस एवं पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन
By NILIAM - Posted on 08 मई 2012
लखनऊ, देवर्षि नारद के चौरासी सूत्र वस्तुतः पत्रकारिता के शाश्वत सिद्धान्त हैं। इनसे प्रेरणा लेकर मीडिया जगत समाज के समक्ष आदर्श प्रस्तुत कर सकता है। उक्त बातें प्रख्यात पत्रकार एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के. विक्रम राव ने कही। उन्होंने फ्रांस और उत्तर प्रदेश के चुनावी सन्दर्भ में नारद जयन्ती की चर्चा की। उन्होंने कहा कि लोक कल्याण के अनुरूप काम करने वालोें को ही सत्ता में वापसी संभव होती है। नारद जी ने लोककल्यााण को ही सर्वाधिक महत्व दिया। नारद जी आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कर्तव्यपरायणता का सन्देश दिया। यह आज के पत्रकारों के लिए भी उपयोगी है। सृजन ही समाचार का आधार होना चाहिए। उन्हें निराकरण भी देना चाहिए। नारद जी ने ईमानदार पत्रकारिता का संदेश दिया। वह घटनास्थल पर उपस्थित रहते हैं। घटना क्या है, केवल यह नहीं बताया। घटना क्या हुई इसको उजागर किया।समाधान दिया। इसके बाद भी वह आसक्त नहीं। वह ज्योतिष विज्ञान का भी जनहित में प्रयोग करते हैं।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि राष्ट्रधर्म पत्रिका के संपादक आनन्द मिश्र अभय ने कहा कि नारद जी सदैव भ्रमण करते हैं उनका उद्देश्य जनहित है। वह सभी के विश्वास पात्र हैं। लोककल्याण में निःस्वार्थ समर्पित व्यक्ति ही अपनी विश्वसनीयता कायम कर सकता है। नारद जी का जीवन इसकी प्रेरणा देता है। पत्रकारों को अपनी विश्वसनीयता बनाने का सतत प्रयास करना चाहिए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य अशोक बेरी ने कहा कि पत्रकार समाज को दिशा देने वाले हैं। इसके लिए उनका चिन्तन सकारात्मक होना चाहिए। राष्ट्र और समाज के हित को सर्वोच्च मानना होगा। भावी पीढी को भारतीय संस्कृति के अनुरूप संस्कारवान बनाना पत्रकारों का दायित्व है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कैनविज टाइम्स के संपादक प्रभात रंजन दीन ने कहा कि नारद जी जिज्ञाषु हैं। उनकी जिज्ञासा सार्थक परिणाम की ओर ले जाती है। वह अनुभूतियों से प्रेरित पत्रकार हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों की खबर को हाशिए पर रखना अपराध है। नारद से प्रेरणा लेने वाला पत्रकार कायर नहीं हो सकता। उन्होंने हिन्दुओं से संबंधित मामलों पर सरकार और पत्रकारिता के दोहरे मापदण्डों को अनुचित बताया। मजहबी भावना से ऊपर उठकर सच्चाई को कहने का साहस होना चाहिए।
समारोह में पत्रकारों को श्रीफल, शाल एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वाले पत्रकारों में हिन्दुस्तान रायबरेली के अखिलेेश ठाकुर, कन्तराज यादव दैनिक जनमोर्चा अम्बेडकरनगर, कमलाकान्त सुंदरम हिन्दुस्तान फैजाबाद, अरुण कुमार मिश्र दैनिक जागरण गोण्डा, अरुण कुमार दीक्षित डीएनए उन्नाव, बृजेश कुमार गुप्ता निष्पक्ष प्रतिदिन श्रावस्ती, अनुराग अस्थाना, दैनिक आज कानपुर, अशोक मिश्रा लोकमत लखनऊ को सम्मानित किया गया। शिशु मन्दिर इन्दिरा नगर की बालिकाओं ने सरस्वती वन्दना वन्देमातरम् प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर विश्व हिन्दू परिषद के केन्द्रीय मंत्री पुरुषोत्तम नारायण सिंह, हिन्दू जागरण मंच के क्षेत्रीय संगठन मंत्री शिव कुमार, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड के प्रचार प्रमुख कृपाशंकर, प्रान्त प्रचारक संजय , क्षेत्र सेवा प्रमुख नवल किशोर, लखनऊ जनसंचार संस्थान के निदेशक अशोक सिन्हा, डा. दिलीप अग्निहोत्री, नन्द किशोर श्रीवास्तव, मृत्यंजय दीक्षित, बृजनन्दन यादव सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
कार्यक्रम के संयोजक भारत सिंह व धीरज त्रिपाठी थे। विश्व संवाद केन्द्र के प्रमुख राजेन्द्र ने विश्व संवाद केन्द्र की गतिविधियों का उल्लेख किया।कार्यक्रम का संचालन राष्ट्रधर्म पत्रिका के प्रबन्धक पवन पुत्र बादल ने किया।
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विविध
01/21/13--07:53: पत्रकार बनने का आत्मसंघर्ष (chan 7710543)
अंजना बख्शी
विपरीत परिस्थितियों में भी मैंने हिन्दी से एम.ए करने के बाद सागर वि.वि. से जनसंचार एवं पत्राकारिता में बी.ए., एम.ए किया और वहाँ सपना जागा मीडिया में जाने का, क्लास में मुझे भरपूर प्रोत्साहन मिलता था, तब तक मेरी कई कविताएँ और लेख म.प्र. के प्रतिष्ठित पत्रा-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके थे, और लगातार आकाशवाणी छतरपुर, जबलपुर, सागर (म.प्र.) के केन्द्रों से मेरे कार्यक्रम प्रसारित हो रहे थे, और इसी बीच दमोह के स्थानीय अखबार में युवा एवं महिला मुद्दों पर लिखने के लिए एक ‘काॅलम’ दे दिया गया, लेकिन मुझे अपनी क्षमताओं से अपना आकाश कम लगा. और मैं 14 अक्टूबर 2002 को दमोह से राजधानी दिल्ली चली आई अकेले. आँखों में एक खूबसूरत सपना लिए ‘आज-तक’ में समाचार-वाचिका बनने का. और फिर सफर शुरू हुआ राजधानी से जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय तक का. इतना जुनून सवार था, इतना पागलपन था कि दिल्ली आने के बाद ‘आज-तक’ के आॅफिस में झंडेवालान रोज अपना सी.वी. लेकर चली जाती, और हर बार वहाँ से निराश ही लौटती, अबकी बार तो गार्ड ने गेट से ही भगा दिया. अब हैरान-परेशान सी वहीं बगल में ईटीवी में पहुँची अपना सी.वी. दिया और और चली आई, आज जिंदगी थकी-थकी सी लग रही थी, उदास तो थी पर टूटी नहीं. एक रोज, आज-तक में काम करने वाले मेरे अपने सहपाठियों से नाम और नं. लेकर फिर पहुँच गई, इस बार अच्छा स्वागत हुआ अंदर भी जाने दिया गया और लोगों ने अदब से बात भी की, पहली बार मैंने किसी चैनल के दफ्तर को इतने करीब से देखा था, आँखें चोधियाँ रही थीं. गाँव में देखा सपना पूरा होने की उम्मीद जाग गई थी. पर लम्बे इंतजार के बाद उन सभी ने कुछ-ना-कुछ बहाना बनाकर मिलने से मना कर दिया और मैं नम आँखों से लौटने लगी तो एक सज्जन ने मेरा सीं.वी. ले लिया और कहा हम जल्द ही थ्डण् शुरू करने जा रहे हैं, आपकी आवाज अच्छी है आपसे संपर्क करेगे., तब सोचा चलो ठीक है, कम से कम यहाँ पैर रखने को जगह तो मिलेगी फिर धीरे-धीरे अपने अच्छे काम से, चेनल में आ जाऊँगी, पर दिन बीतते गए कोई खबर नहीं. इसके बाद जैने टी.वी, सहारा न्यूज चेनल एवं जी न्यूज पर निशाना साधा, वहाँ भी कई-कई दफा गई. दो-तीन दिनों के अंतराल में नोएडा चली जाती पर हर बार निराशा लेकर ही लौटती. लेकिन हर बार एक नई उम्मीद के साथ, वहाँ के लोगों के नाम, पते, और नम्बर इकट्ठे करती, और फिर रेंफरेस लेकर जाती. उससे बस इतनी सहूलियत होती थी., एक तो गेट पास मिल जाता और दूसरा अंदर वे लोग बायोडाटा रख लेते और सम्मान से पानी पिला देते. खैर... अब मन और सपनों का क्या करूँ. वे तो नहीं मानते थे, फिर एक रोज पहुँच गई ‘आज-तक’. अबकी बार बड़े और प्रतिष्ठित पत्राकार का नाम, पता व फोन न. (एक्सटेशन सहित) ले र्गइं थी, कईं घंटों इंतजार करने के बाद वे तो नहीं मिले, पर वहाँ मिल गया एक फ्रेशर जो अकसर मेरी इस जद्दोजहद को वहाँ देखता था. उसने बताया आपका यहाँ दिल्ली में न तो कोई गाॅडफादर है ना आपके पास कोई बड़ी एप्रोच और न ही पैसा तो आप सोच भी कैसे सकती हैं यहाँ जाॅब पाने की. आपको ट्रेनिंग या इनटरनेशिप पर भी नहीं लिया जायेगा, यहाँ आकर वक्त बरबाद ना किया करें, देखिए बेहतर होगा आप अपने शहर ही लौटकर वहाँ छोटे-मोटे चेनल्स में ट्राय करें... मेरी बातों का बुरा न मानना, यही जिंदगी की वास्तविकता है अंजना जी.“ और फिर चाय पिलाकर उस भले मानुष ने मुझे विदाकर दिया. भीगी-भीगी आँखों से अपने पहाड़ से सपने को अंदर दफ्न कर लौट आई... और कई दिनों तक तबियत कुछ नासाज रही... लगा ठीक ही तो कहा है उसने... कुछ भी तो नहीं मेरे पास... बस सिवाय एक सपने के... खैर अब इलेक्ट्रानिक मीडिया का भूत उतर चुका था. और जो रुपये लाई थी दमोह छोटी बहन के ससुराल द्वारा दी गई सोने की अँगूठी बेचकर व ट्यूशन पढ़ाकर वो भी खत्म हो चुके थे, पर हौसले अभी भी बुलंद थे. अब सोचा प्रिंट में ही किस्मत आजमा ली जाये, फिर शुरू हुआ सिलसिला दिल्ली के अखबारों और पत्रा-पत्रिकाओं के दफ्तरों में नौकरी तलाशने का... अपने प्रमाण-पत्रों की मोटी-मोटी फाइलों के साथ अपना बायोडाटा लिये दिन भर घूमती अखबारों के दफ्तरों में, कहाँ-कहाँ नहीं गयी, दै. जागरण (नोएडा), अमर उजाला, लोग नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, हिन्दुस्तान, सभी जगह बायोडाटा ले लिया जाता और आने को कहा जाता, कई-कई दिन लगातार पहुँच जाती थी अपनी शकल दिखाने, उन्हें याद दिलाने, शायद आज बात बन जाये, पर नहीं कोई उम्मीद नहीं थी. म.प्र. के छोटे शहर से आई लड़की को कोई किस बेस पर ले, और क्यों लें? कई बार तो ऐसे सवालों से भी दो-चार होना पड़ता था कि आप क्या-क्या कर सकती हैं? कितना वक्त अधिक-से अधिक दफ्तर के बाहर दे पायेंगी?
एक रोज नटरंग प्रतिष्ठान गई. वहाँ काम था एक रु. की क्लिपिंग करने के 1 दिन के 30/-रु. मिलने थे, पर वहाँ तक आने-जाने का खर्च ही दिन के 60 रु था क्योंकि मैं हरियाणा के बार्डर पर रह रही थी. इसलिए फिर निराशा. खैर वहाँ से एक उम्मीद जरूर लेकर लौटी थी. ‘शिव खन्ना’ जी ने मुझे पत्रिकाओं में समीक्षाएँ लिखने का सजेशन दिया. तो अब मैंने हर पत्रिका के दफ्तर में चक्कर लगाना शुरू कर दिया, हंस, कादम्बिनी, आज-कल, आउटलुक, इंडियाटुडे, भाषा, इन्द्रप्रस्थ भारती, सभी जगह गई पर कई जगह, कल आना, परसों आना लगा रहा और एक-दो-जगह किताब मिली तो महीनों समीक्षा के छपने का इंतजार करती रही. फिर सोचा शायद मुझे ही लिखना नहीं आता खैर... वक्त में घाव भरने की असीम ताकत होती है और वहाँ मेरे कई सहपाठी विभिन्न चेनलों में अपना पैर जमा चुके थे, जिनके गाॅड फादर व मदर थे. उनके सपनों को पंख मिल गए थे, जब कभी बात होती तो वे हैरान-परेशान व दुखी ही दिखे. मीडिया में जाने के उनके सपने तो पूरे हो गए थे. पर उनका अपना अस्तित्व उनसे कोसांे दूर था. मेरी एक मित्रा ने बताया उसे दिन-रात समझौते करने पड़ते हैं. वह सिर्फ एक कठपुतली बनकर रह गई है. अब तो वह धीरे-धीरे पूरी प्रोफेशनल हो गई थी. पर उन सबकी अपनी पहचान खो चुकी थी... एक प्रतिष्ठित चैनल के संवाददाता आशीष का कहना हैµ ”सपना देखना आसान है. लेकिन उन्हें साकार करना बेहद मुश्किल सपनों को पूरा करने के लिए कैसे सुख-आराम भूल जाना पड़ता है और किस तरह लगन से काम किया जाता है इसकी मिसाल है बड़े-बड़े पत्राकार जो आज एक-एक लाख सेलरी पा रहे हैं, भले ही उनके गाॅड फादर हैं पर उनकी अपनी क्षमता भी तो होती है.“ एफ.एम. में कार्यरत दिव्या बताती हैंµ ”बहुत मुश्किल है अपने सपनों को हकीकत में बदलना, पर अगर हमनें उन्हें पा भी लिया तो क्या हुआ. आज कितने लोग हमें जानते हंै? हमारे अपनी क्या पहचान है? हम तो नौकर हैं इस चैनल के. और आये दिन कई समझोते करने पड़ते हैं, मैं प्रड्यूसर बनना चाहती थी, बनकर रह गई मात्रा एक प्रोग्रामर.“
मैं आज फिर सोचती हूँ, मेरा मीडिया में जाने का सपना पूरा नहीं हुआ तो क्या हुआ, आज मेरा अपना एक मुकाम है, मेरा अस्तित्व है, अपनी एक अलग पहचान है, जो पहचान मैंने स्वयं अपने बुलंद हौसलों और अदम्य साहस से बनाई है.
जब उन दिनों की कशमकश के बारे में सोचती हूँ तो लगता है कि कितने मानसिक दबाव और जद्दोजहाद के बीच मैंने अपने सपनों को जिंदा रखा. दोस्तों और परिचितों के कितने उलाहने सुने पर अपना जुनून नहीं छोड़ा, अपना दृढ़ विश्वास नहीं टूटने दिया, लगन, कड़ी मेहनत, धैर्य, लक्ष्य पर नजर, काम के प्र्रति ईमानदारी, और आत्मविश्वास के सहारे संघर्षरत रही. अकेली अपने ही दम पर ना भावनात्मक सहयोग न आर्थिक सहयोग. लेकिन हाँ ताने व उलाहने जरूर सभी लोगों के साथ रहे. खैर ‘मेरे लिए तो हर सजा वरदान है. उसमें भी मैं कुदरत का शुक्र ही मनाती रही. उसने मुझे जिंदगी के हर रंग से नवाजा है. जब दिल्ली में इतना स्ट्रगल करने के बाद भी कोई बात नहीं बनी तो इसके बाद में चली गई रोहतक (हरियाणा) दीदी के पास. फिर वहाँ जाकर शुरू किया तलाशना और बहुत मेहनत के बाद एचटी मीडिया में एक सर्वे करने और पाठकों को लेने के लिए उत्साहित करने की नौकरी मिल गई जो कि महज 45 दिनों का प्रोजेक्ट था., रोहतक से दूर बहादुर गढ़ एरिया दिया गया था मुझे. मैं रोज अप-डाउन करती. ट्रेन का पास भी बनवा लिया था और सारे बहादुरगढ़ में दिन भर घूम-घूमकर लोगों को क्रन्विस करती उस अखबार को लेने के लिए. मैं म.प्र. से आई थी बुंदेलखण्डी तो जानती थी. पर हरियाणा की बोली... से पूरी तरह अनभिज्ञ थी. वहाँ कई अन्य तरह की दिक्कतों से भी दो-चार होना पड़ा. खैर... पहले तो वहाँ की बोली सीखी और लोगों की मानसिकता को पढ़ना जिंदगी ने सिखा दिया था. काम के दौरान कई खट्टे-मीठे अनुभव बटोर चुकी थी. और प्रोजेक्ट की मियाद पूरी हो गयी थी. रिपोर्ट समिट करने दिल्ली आना होता था. इसी बहाने नंदन, कादम्बिनी और हिन्दुस्तान में लगातार आपना बायोडाटा देती रही और नौकरी एवं समीक्षा के लिए गुहार लगाती रही... खैर... वहाँ कभी कोई बहाना, कभी कोई बहाना बताकर भगा दी जाती. उसके बाद ‘हरिभूमि’ हरियाणा (अखबार) में एक माह के लिए ट्रेनी जर्नलिस्ट (सेंट्रल डेस्क पर) रखा गया पर काम तीन माह तक किया और सीखा. कम्प्युटर से अखबार की सेंटिग व अखबार कैसे बनता व छपता है. वैसे तो पत्राकारिता की पढ़ाई के दौरान सभी कुछ सीखा ही था... पर ब्वउचनजमत पर डमी बनाकर सेंटिग करने में बड़ा अच्छा लगता था. रात को 9.10 बजा करते घर लौटते. कहा गया था एक माह बाद सेलरी दी जाएगी. पर काम करते दो- तीन माह हो गए थे. कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी... कि सेलरी मिलेगी.
मेरे सपनों ने मुझे फिर कुरेदना शुरू कर दिया. लगा हरियाणा में बैठकर तो कुछ हासिल नहीं होने वाला और वैसे भी कितना और सेलरी का इंतजार करती और कितना भागती हरियाणा से दिल्ली. रेल-पास खत्म हो चुका था जो 4000/µ कमाये थे एचटी से उसमें से कुछ जैसा माँ को दमोह भेज चुकी थी, इसी बीच कादम्बिनी के स्तंभ ‘नए पत्ते’ के लिए मेरी रचना एक बार फिर स्वकृत हुई जो कि रोहतक से भेजी गयी थी. सोचा चलो कादम्बिनी ही चलती हूँ शायद अब काम बन जाये, अगर एक किताब की समीक्षा छप जाये तो 150/µरु का इंतजाम हो जाएँगा. जिससे कुछ रोज और गुजर जायेंगे... खैर इसी बीच फिर से समीक्षा के लिए दौड़-भाग शुरू की. अबकी बार तीन माह के अनुभव का हवाला भी देती-फिरती. इसी तारतम्य में मैं पुनः पहुँची नोएडा एक प्रतिष्ठित अखबार के दफ्तर में इस. बार बहुत उम्मीदें लेकर गई थी. एक संघर्ष युवा उपसंपादक के पास और महिलाओं व लड़कियों के बारे में लिखने वाली व एक जोश भरा माहोल तैयार करने वाली युवा पत्राकार से मिलने. सोचा अपनी बात भी कहूँगी और कुछ लिखने के लिए स्वीकृति माँग लूँगी, पर वहाँ जाकर तो जैसे पाँव तले जमीन ही खिसक गई, वहाँ एक व्यक्ति को मिलकर अपना बायोडाटा जमा कराने के लिए कहा गया. जब मैंने अपना बायोडाटा देते हुए उन्हें बताया कि मैं अंजना हूँ दमोह (म.प्र.) से. मेरी योग्यता ये... है मेरा काम लेखों की कंटिंग्स और अपनी-मोटी-मोटी प्रमाण-पत्रों व सम्मान पत्रों से भरी चारों फाइलें उनके आगे कर दीं तो... उस सज्जन ने पहले तो ऊपर से नीचे तक मुझे निहारा. फिर मेरा बायोडाटा लेकर उसकी पुड़िया बनाकर कचरे की टोकरी में डाल दी. और मुस्कुराते हुए मुझसे कहा दमोह से यहाँ आने की आपको क्या जरूरत थी अपना सी.वी. वहीं से पोस्ट कर देती. आये-दिन ऐसे कई लोग गाँव-देहात से चले आते हैं. उन्होंने मेरा बायोडाटा ना देखा था ना पढ़ा बस देखते ही पुड़िया बनाकर कचड़े की टोकरी में डाल दिया था. बस फिर क्या था, मेरे आँसू वहीं खड़े-खड़े बह निकले और अपनी दोनांे चोटियों को संभालते हुए एक हाथ से आँसू पोंछती और एक हाथ से अपनी मोटी-मोटी फाइलों को संभालती फिर जब वहीं सामने थोड़ी दूर पर लगे सोफे पर बैठकर उस युवा पत्राकार का इंतजार करने लगी तो देखा उसी सज्जन के पास दो नवयुवक आये, बाल व दाढ़ी बढ़ी हुई, कुर्ता और जींस पहने थे तब सीट पर बैठे महोदय उठकर खड़े हो गए. उन दोनों से हाथ मिलाया उन्हें चाय पिलाई और कुछ वक्त बाद वे दोनांे लड़के भी मेरे बगल में सोफे पर आकर बैठ गए, किसी और के इंतजार में. मेरे मन में कौतुहल तो था ही कि इनमें ऐसा क्या खास है जो इनका ऐसा स्वागत? खैर... उनसे मैंने वक्त पूछा तो हमारे बातचीत हुई, उन दोनों ने बताया’ वी आर रिर्सच स्कालर इन जेएनयू और काम के सिलसिले में एडिटर से मिलने आए हैं. पर सी.वी इन महोदय को ही जमा करने को कहा गया था. अब कुछ देर बाद एडीटर से मिलना है. तब मेरे मन में प्रश्न यह उठा सिर्फ जेएनयू में पढ़ने से इतनी तबज्जो मिलती है तो फिर मुझे जेएनयू के बारे में और जानना होगा. और उसी वक्त मैंने ठान लिया था. मेरा अब सिर्फ एक ही सपना होगा वह है जेएनयू का ऐंट्रन्स पास करना. कुछ न कुछ डिफरेंस तो है यहाँ के छात्रों में तभी तो उठकर सम्मान दिया जाता है. चाय भी पिलाई जाती है इन्हें. खैर राह बहुत कठिन थी. मैं छोटे शहर से आई थी. अंग्रे्रजी भी अच्छी नहीं थी. कंप्टीशन भी जेएनयू में बहुत तगड़ा था, खैर इस अद्भुत सपने को अंजाम तो देना ही था, अब एक नया जोश व पागलपन सवार हो गया था किसी भी कीमत पर जेएनयू का ऐंटरेन्स पास करके यहीं एम. फिल और पी- एच. डी. करनी है. मित्रों और रिश्तेदारों ने खूब मजाक बनाया. तू देहातन कैसे पास करेगी जेएनयू का टेस्ट. यहाँ कठिन है तेरे लिए परीक्षा देना. कैसे तैयारी होगी, कौन मार्गदर्शन करेगा? जेएनयू में ही उस वक्त पी-एच.डी. कर रहे मेरे एक तथाकथित मित्रा ने तो यह तक कह दिया कि ‘क्यों मेरी भद् पिटवाने पर तुली हो. जेएनयू में सलेक्शन बच्चों का खेल नहीं. और फिर सीटें भी उस वक्त कुल सात थीं एम. फिल हिन्दी अनुवाद में. खैर... निशाना साधकर कड़ी मेहनत व लगन के साथ मैं तमाम छोटी-मोटी नौकरियों के लिए इंटरव्यू व टेस्ट देती रही और रिजेल्ट की प्रतीक्षा करने लगी... और देखने लगी साथ ही जेएनयू में पढ़ने के सपने, और जवानी में देखा पीएच.डी करने का, किसी बड़े व प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़ने का सपना भी पूरा होता नजर आने लगा था.
01/21/13--07:59: भारतीय-अमेरिकी ओबामा के शपथ ग्रहण पर जश्न मनाएंगे नाइजीरिया में भारतीयों को हिंसा से बचने की चेतावनी अमेरिकी सिखों ने किया सख्त बंदूक कानूनों का समर्थन भारतीय चिकित्सकों ने दी हैती में पीड़ितों को सेवाएं सुस्ती के बाद भारत का विकास निश्चित : विश्व बैंक पत्रकारिता में भी चोर दरवाजा ? – डॉ. वेदप्रताप वैदिक रॉबिन जेफरी नामक एक विदेशी प्रोफेसर ने दिल्ली के पत्रकारों के सामने एक अजीब-सा उपदेश झाड़ दिया। उस उपदेश को उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार में भी छपवा दिया। अंग्रेजी अखबारों और उनके पत्रकारों को बुद्धू बनाकर बच निकलना आसान होता है, क्योंकि उनकी जानकारी विदेशी विद्वानों की तरह काफी सीमित होती है। जेफरी की इस बात का किसी ने विरोध नहीं किया कि ‘भारतीय मीडिया में अनुसूचित जातियों और जन-जातियों का एक भी आदमी क्यों नहीं है?’ क्या अंग्रेजी मीडिया ही भारतीय मीडिया है? अंग्रेजी मीडिया तो उसका दस प्रतिशत भी नहीं है। अंग्रेजी मीडिया में भी कई स्तरों पर वंचित श्रेणियों के लोग हैं और जहां तक भारतीय भाषाओं का सवाल है, इस मीडिया में तो उन श्रेणियों के कई लोग हैं और वे अपनी योग्यता के आधार पर हैं। किसी की दया या कृपा या आरक्षण के आधार पर नहीं है। क्या जेफरी यह कहना चाहते हैं कि ‘अनुसूचितों’ के लिए भारतीय मीडिया के द्वार जान-बूझकर बंद हैं? वे उनकी तुलना अपने देश के अश्वेत लोगों से करते हैं। यह तुलना गलत है। अखबारों और टीवी चैनलों में उम्मीदवारों की योग्यता देखी जाती है। उनकी जात, मज़हब, हैसियत आदि को नहीं देखा जाता। घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या? करोड़ों-अरबों रू. की लागत से चलनेवाले अखबार और चैनल डूब जाएंगे। यह सरकारी नौकरी नहीं है कि अपनी जात, प्रांत, पार्टी या जान-पहचान के लोगों को आंख मींचकर भर लें। यदि अनुसूचित उम्मीदवार सामने ही नहीं आएंगे तो क्या आप उन्हें पकड़-पकड़कर जबर्दस्ती पत्रकार बना देंगे? बिना योग्यता के आप सांसद, मंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तो बन सकते हैं लेकिन किसी अखबार में रिपोर्टर भी नहीं बन सकते। जेफरी क्या चाहते हैं कि पत्रकारिता जैसा निष्पक्ष और पवित्र व्यवसाय भी राजनीति की तरह पक्षधरता और अपवित्रता का अड्डा बन जाए? ब्राह्ममण पत्रकार ब्राह्मण पत्रकारिता करे और दलित पत्रकार दलित पत्रकारिता करे तो पत्रकारिता और वेश्यावृत्ति में क्या अंतर रह जाएगा? पत्रकारिता के धर्म का क्या होगा? दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को पत्रकारिता में जरूर लाया जाए और बड़ी संख्या में लाया जाए लेकिन चोर दरवाजे से नहीं। उन्हें शिक्षा में आरक्ष्ज्ञण देकर इस योग्य बनाया जाए कि भर्ती-परीक्षा में वे अन्य सबको मात कर दें। तभी पत्रकार बनकर वे संपूर्ण समाज के साथ न्याय कर सकेंगे। dr.vaidik@gmail.com (लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं) ए-19, प्रेस एनक्लेव, नई दिल्ली-17, फोन घरः 2651-7295, मो. 98-9171-1947 (chan 7710543)
भारतीय-अमेरिकी ओबामा के शपथ ग्रहण पर जश्न मनाएंगेनाइजीरिया में भारतीयों को हिंसा से बचने की चेतावनीअमेरिकी सिखों ने किया सख्त बंदूक कानूनों का समर्थनभारतीय चिकित्सकों ने दी हैती में पीड़ितों को सेवाएंसुस्ती के बाद भारत का विकास निश्चित : विश्व बैंक
पत्रकारिता में भी चोर दरवाजा ? – डॉ. वेदप्रताप वैदिक
रॉबिन जेफरी नामक एक विदेशी प्रोफेसर ने दिल्ली के पत्रकारों के सामने एक अजीब-सा उपदेश झाड़ दिया। उस उपदेश को उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार में भी छपवा दिया। अंग्रेजी अखबारों और उनके पत्रकारों को बुद्धू बनाकर बच निकलना आसान होता है, क्योंकि उनकी जानकारी विदेशी विद्वानों की तरह काफी सीमित होती है। जेफरी की इस बात का किसी ने विरोध नहीं किया कि ‘भारतीय मीडिया में अनुसूचित जातियों और जन-जातियों का एक भी आदमी क्यों नहीं है?’ क्या अंग्रेजी मीडिया ही भारतीय मीडिया है? अंग्रेजी मीडिया तो उसका दस प्रतिशत भी नहीं है। अंग्रेजी मीडिया में भी कई स्तरों पर वंचित श्रेणियों के लोग हैं और जहां तक भारतीय भाषाओं का सवाल है, इस मीडिया में तो उन श्रेणियों के कई लोग हैं और वे अपनी योग्यता के आधार पर हैं। किसी की दया या कृपा या आरक्षण के आधार पर नहीं है।
क्या जेफरी यह कहना चाहते हैं कि ‘अनुसूचितों’ के लिए भारतीय मीडिया के द्वार जान-बूझकर बंद हैं? वे उनकी तुलना अपने देश के अश्वेत लोगों से करते हैं। यह तुलना गलत है। अखबारों और टीवी चैनलों में उम्मीदवारों की योग्यता देखी जाती है। उनकी जात, मज़हब, हैसियत आदि को नहीं देखा जाता। घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या? करोड़ों-अरबों रू. की लागत से चलनेवाले अखबार और चैनल डूब जाएंगे। यह सरकारी नौकरी नहीं है कि अपनी जात, प्रांत, पार्टी या जान-पहचान के लोगों को आंख मींचकर भर लें। यदि अनुसूचित उम्मीदवार सामने ही नहीं आएंगे तो क्या आप उन्हें पकड़-पकड़कर जबर्दस्ती पत्रकार बना देंगे? बिना योग्यता के आप सांसद, मंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तो बन सकते हैं लेकिन किसी अखबार में रिपोर्टर भी नहीं बन सकते।
जेफरी क्या चाहते हैं कि पत्रकारिता जैसा निष्पक्ष और पवित्र व्यवसाय भी राजनीति की तरह पक्षधरता और अपवित्रता का अड्डा बन जाए? ब्राह्ममण पत्रकार ब्राह्मण पत्रकारिता करे और दलित पत्रकार दलित पत्रकारिता करे तो पत्रकारिता और वेश्यावृत्ति में क्या अंतर रह जाएगा? पत्रकारिता के धर्म का क्या होगा?
दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को पत्रकारिता में जरूर लाया जाए और बड़ी संख्या में लाया जाए लेकिन चोर दरवाजे से नहीं। उन्हें शिक्षा में आरक्ष्ज्ञण देकर इस योग्य बनाया जाए कि भर्ती-परीक्षा में वे अन्य सबको मात कर दें। तभी पत्रकार बनकर वे संपूर्ण समाज के साथ न्याय कर सकेंगे।
dr.vaidik@gmail.com
(लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)
ए-19, प्रेस एनक्लेव, नई दिल्ली-17, फोन घरः 2651-7295,
मो. 98-9171-1947
01/22/13--23:03: समाचार क्या है? (chan 7710543)
Monday, May 24, 2010
मजाक में किसी ने कहा, अगर कुत्ता आदमी को काटता है तो वो समाचार नहीं है, मगर अगर आदमी कुत्ता को काट ले तो ये समाचार कहलाएगा.
सरल शब्दों में कहें तो जो कुछ नया है, रोमांचक है, आकर्षक है, अलग है, अनुपम है, उत्सुकता बढ़ाने वाला है, चर्चा के योग्य है, वो समाचार है.
मगर, आजकल समाचार के मायने बदल गए हैं. आज के संपादक कहने लगे हैं कि पाठक या दर्शक जो कुछ पढ़ना या देखना चाहता है, वही समाचार है. पाठकों या दर्शकों की रुचि जानने के लिए अखबार या टेलीविजन सर्वेक्षण कराते है, प्रतिक्रिया मंगवाते हैं, फिर दर्शक या पाठक की मर्जी से समाचार परोसते हैं.
फिर, समाचार वही है जिसकी दर्शकों को जरूरत है, जो दर्शक जानना चाहता है, जिसमें उसकी रुचि है.
समाचार की कसौटी-समाचार में इनमें से एक या एक से ज्यादा तत्व होने चाहिए. समाचार को निम्नलिखित तथ्यों की कसौटी पर कसकर देखें कि वो समाचार के लायक है नहीं-
प्रभाव- किसी भी समाचार का प्रभाव इस बात से जाना जाता है कि वह कितने व्यक्ति को प्रभावित कर रहा है यानी समाचार का प्रभाव कितने लोगों पर हो रहा है. जितने ज्यादा लोगों पर समाचार प्रभावी है वह उतना बड़ा समाचार है.
निकटता- कोई घटना जितनी निकट में घटती है वो उतना ही बड़ा समाचार होता है. बिहार के लोगों के लिए पटना में मुख्यमंत्री क्या बोलते हैं वो ज्यादा बड़ा समाचार है, अमेरिकी राष्ट्रपति के अमेरिका में दिए बयान के मुकाबले.
तत्क्षणता- नयापन समाचार की आत्मा होता है. कोई समाचार एक सप्ताह बाद समाचार के लायक नहीं रह जाता है. तुरंत या तत्क्षण घटने वाली घटना बड़ी खबर है. समाचार मछली की तरह होती है, जो ताजा की अच्छी होती है. बासी कोई नहीं पसंद करता है.
बड़प्पन- खबर जितने बड़े लोगों की होती है, खबर उतनी बड़ी होती है. अभिषेक बच्चन के बेटे की शादी की खबर बड़ी खबर है. प्रधानमंत्री अगर सबेरे उठकर टहल रहे हों तो भी बड़ी खबर है. लालू की हरेक बयान बड़ी खबर है.
नयापन- खबर में नयापन, अनुपमता और रोमांच होना चाहिए यही इसका गुण होता है.
संघर्ष- हिंसा, युद्ध, हमला और अपराध अपने आप में बड़ी खबर है.
प्रासंगिकता- अगर घटना प्रासंगिक है तो समाचार है वर्ना उसे कौन पूछता है. महात्मा गांधी को हर कोई जानता है. मगर जब जेम्स ओटिस उनके कुछ सामानों की नीलामी करता है तो अखबार समाचारपत्र-टीवी महात्मा गांधी के जीवन दर्शन के बारे में बताने लगते हैं. यहां इस खबर की प्रासंगिकता है.
उपयोगिता- उपयोगिता भी समाचार का बड़ा गुण है. हम जो सूचना दे रहे हैं वो लोगों के लिए कितनी उपयोगी है, लोगों का जीवन उससे कितना संवरता है, उनका काम कितना आसान होता है.
रूचिपरकता- समाचार रुचिकर होना चाहिए. यह समाचार का सबसे बड़ा गुण है.
Posted by Satyajeetprakashat 8:31 AM
Labels: समाचार लेखन
1 comments:
Pravin Yadavsaid...
आपने बहुत अच्छे तरीके से लिखा है। और आज के समय में बहुत से लोगों को इस ज्ञान की आवश्यकता है जो भी पत्रकारिता कर रहा है। उसके लिये आपका यह प्रयास सफल साबित होगा।
01/22/13--23:07: फेसबुक (chan 7710543)
फेसबुक
http://hi.wikipedia.org/s/hih
.Facebook.svg
प्रकार निजी कंपनी
स्थापना कैम्ब्रिज, मासाचुसेट्स, संयुक्त राज्य[1]
संस्थापक मार्क ज़कर्बर्ग
एदुआर्दो सॅवेरिन
डस्टिन मॉस्कोविट्ज़
क्रिस ह्यूएस
मुख्यालय पालो ऑल्टो, कैलीफोर्निया
डबलिन, आयरलैंड (यूरोप, अफ़्रीका एवं मध्य-पूर्व के लिये अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय)
सिओल, दक्षिण कोरिया (एशिया का अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय)
सेवित क्षेत्र विश्वव्यापी
गणमान्य व्यक्ति मार्क ज़कर्बर्ग (सी.ई.ओ]])
डस्टिन मॉस्कोविट्ज़ (सह-संस्थापक)
शेराइल सैंडबर्ग (मुख्य प्रचा.अधि.)
मैट कोह्लर (प्रोड. मैनेजमेंट के उपाध्यक्ष)
क्रिस ह्यूइस (सह-संस्थापक)
रेवेन्यु Green Arrow Up Darker.svg३० करोड़ अमेरिकी डॉलर (२००८ अनुमान)[2]
कर्मचारी १४००+[3]
जालस्थल www.facebook.com
ऐलेक्साश्रेणी २ (मई, २०१० अनुसार)[4]
जालस्थल का प्रकार सामाजिक नेटवर्किंग सेवा
विज्ञापन बैनर ऍड्स, रेफ़रल मार्केटिंग, कैज़ुअल गेम्स
पंजीकरण वांछित
उपलब्ध बहुभाषी
चालू हुई ४ फ़रवरी, २००४
वर्तमान स्थिति सक्रिय
स्क्रीनशॉट[दिखाएँ]
फेसबुक (अंग्रेज़ी:Facebook) इंटरनेटपर स्थित एक निःशुल्क सामाजिक नेटवर्किंग सेवाहै, जिसके माध्यम से इसके सदस्य अपने मित्रों, परिवार और परिचितों के साथ संपर्क रख सकते हैं। यह फेसबुक इंकॉ. नामक निजी कंपनी द्वारा संचालित है। इसके प्रयोक्ता नगर, विद्यालय, कार्यस्थल या क्षेत्र के अनुसार गठित किये हुए नेटवर्कों में शामिल हो सकते हैं और आपस में विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं।[5]इसका आरंभ २००४में हार्वर्ड के एक छात्र मार्क ज़ुकरबर्ग ने की थी। तब इसका नाम द फेसबुकथा। कॉलेज नेटवर्किग जालस्थल के रूप में आरंभ के बाद शीघ्र ही यह कॉलेज परिसर में लोकप्रिय होती चली गई। कुछ ही महीनों में यह नेटवर्क पूरे यूरोप में पहचाना जाने लगा। अगस्त२००५में इसका नाम फेसबुककर दिया गया। फेसबुक में अन्य भाषाओं के साथ हिन्दीमें भी काम करने की सुविधा है।
फेसबुक ने भारतसहित ४० देशों के मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों से समझौता किया है। इस करार के तहत फेसबुक की एक नई साइट का उपयोग मोबाइलपर निःशुल्क किया जा सकेगा। यह जालस्थल फेसबुक का पाठ्य संस्करण है। भारत में रिलायंस कम्युनिकेशंसऔर वीडियोकॉन मोबाइलपर यह सेवा प्रदान करेंगे। इसके बाद शीघ्र ही टाटा डोकोमोपर भी यह सेवा शुरू हो जाएगी। इसमें फोटो व वीडियो के अलावा फेसबुक की अन्य सभी संदेश सेवाएं मिलेंगी।[6]
अनुक्रम
1प्रोफाइल
2स्टेटस अद्यतन
3सार्वजनिक खाते
4प्रतिबंध
5खतरा
6फेसबुक छोड़ो अभियान
7फेसबुक पर बुक
8संदर्भ
9बाहरी कड़ियाँ
प्रोफाइल
चित्र:Facebook open account page hindi.PNG
फेसबुक पर खाता खोलने का हिन्दी में प्रारूप पृष्ठ
फेसबुक का उपयोग करने वाले अपना एक प्रोफाइल पृष्ठ तैयार कर उस पर अपने बारे में जानकारी देते हैं। इसमें उनका नाम, छायाचित्र, जन्मतिथि और कार्यस्थल, विद्यालय और कॉलेज आदि का ब्यौरा दिया होता है। इस पृष्ठ के माध्यम से लोग अपने मित्रों और परिचितों का नाम, ईमेल आदि डालकर उन्हें ढूंढ़ सकते हैं। इसके साथ ही वे अपने मित्रों और परिचितों की एक अंतहीन श्रृंखला से भी जुड़ सकते हैं। फेसबुक के उपयोक्ता सदस्य यहां पर अपना समूह भी बना सकते हैं।[5]यह समूह उनके विद्यालय, कॉलेज या उनकी रुचि, शहर, किसी आदत और जाति का भी हो सकता है। समूह कुछ लोगों का भी हो सकता है और इसमें और लोगों को शामिल होने के लिए भी आमंत्रित किया जा सकता है। इसके माध्यम से किसी कार्यक्रम, संगोष्ठी या अन्य किसी अवसर के लिए सभी जानने वालों को एक साथ आमंत्रित भी किया जा सकता है।
चित्र:Facebookprofilein hindi.PNG
फेसबुक पर एक खाता प्रोफाइल पृष्ठ (हिन्दी)
लोग इस जालस्थल पर अपनी रुचि, राजनीतिक और धार्मिक अभिरुचि व्यक्त कर समान विचारों वाले सदस्यों को मित्र भी बना सकते हैं। इसके अलावा भी कई तरह के संपर्क आदि जोड़ सकते हैं। साइट के विकासकर्त्ता भी ऐसे कई कार्यक्रम तैयार करते रहते हैं, जिनके माध्यम से उपयोक्ता अपनी रुचियों को परिष्कृत कर सकें। फेसबुक में अपने या अपनी रुचि के चित्र फोटो लोड कर उन्हें एक दूसरे के साथ बांट भी कर सकते हैं। ये चित्र मात्र उन्हीं लोगों को दिखेंगे, जिन्हें उपयोक्ता दिखाना चाहते हैं। इसके लिये चित्रों को देखनेका अनुमति स्तर निश्चित करना होता है। चित्रों का संग्रह सुरक्षित रखने के लिए इसमें पर्याप्त जगह होती है। फेसबुक के माध्यम से समाचार, वीडियो और दूसरी संचिकाएं भी बांट सकते हैं। फेसबुक ने २००८ में अपना आवरण रूप बदला था।[5]
स्टेटस अद्यतन
फेसबुक का मुख्यालय, पालो ऑल्टो, कैलीफोर्निया
फेसबुक पर उपयोक्ताओं को अपने मित्रों को यह बताने की सुविधा है कि किसी विशेष समय वे क्या कर रहे हैं या क्या सोच रहे हैं और इसे 'स्टेट्स अपडेट' करना कहा जाता है। फेसबुक और ट्विटरके आपसी सहयोग के द्वारा निकट भविष्य में फेसबुक एक ऐसा सॉफ्टवेयर जारी करेगा, जिसके माध्यम से फेसबुक पर होने वाले 'स्टेट्स अपडेट' सीधे ट्विटर पर अद्यतित हो सकेंगे। अब लोग अपने मित्रों को बहुत लघु संदेशों द्वारा यह बता सकेंगे कि वे कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं या क्या सोच रहे हैं।[7]
ट्विटर पर १४० कैरेक्टर के 'स्टेट्स मैसेज अपडेट' को अनगिनत सदस्यों के मोबाइल और कंप्यूटरों तक भेजने की सुविधा थी, जबकि फेसबुक पर उपयोक्ताओं के लिये ये सीमा मात्र ५००० लोगों तक ही सीमित है। सदस्य ५००० लोगो तक ही अपने प्रोफाइल के साथ जोड़ सकते हैं या मित्र बना सकते हैं। फेसबुक पर किसी विशेष प्रोफाइल से लोगों के जुड़ने की संख्या सीमित होने के कारण 'स्टेट्स अपडेट' भी सीमित लोगों को ही पहुँच सकता है।
सार्वजनिक खाते
चित्र:Facebook mobile.png
फेसबुक की मोबाइल पर वेबसाइट
सार्वजनिक खाते (पब्लिक पेज) यानी ऐसे पेज जिन्हें हर कोई देख सकता है और लोग जान सकते हैं कि उनके आदर्श नेता, प्यारे पॉप स्टार या सामाजिक संगठन की क्या गतिविधियाँ हैं। फेसबुक के ट्विटरसे जुड़ जाने के बाद अब कंपनियाँ, संगठन, सेलिब्रिटी अपने प्रशंसकों और समर्थकों से सीधे संवाद कर पाएँगे, उन्हें बता पाएँगे कि वे क्या कर रहे हैं, उनके साथ फोटो शेयर कर पाएँगे। फिलहाल यह सुविधा पब्लिक पेज प्रोफाइल वालों को ही उपलब्ध है। फेसबुक के सार्वजनिक पृष्ठ (पब्लिक पेज) बनाना हाल के दिनों में काफी लोकप्रिय होता जा रहा है। पब्लिक पेज बनाने वालों में अमेरिकी राष्ट्रपतिबराक ओबामा, फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोला सारकोजीऔर रॉक बैंड यू-२ शामिल हैं। इनके अलावा भी कई बड़ी हस्तियों, संगीतकारों, सामाजिक संगठनों, कंपनियों ने अपने खाते फेसबुक पर खोले हैं।[7]ये हस्तियां या संगठन अपने से जुड़ी बातों को अपने प्रशंसकों या समर्थकों के साथ बाँटना चाहते हैं तो आपसी संवाद के लिए फेसबुक का प्रयोग करते हैं।
प्रतिबंध
फेसबुक पर आयोजित पैगंबर मोहम्मदके आपत्तिजनक कार्टून बनाने की प्रतियोगितामें मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोप के कारण पाकिस्तानके एक न्यायालय ने फेसबुक पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। फेसबुक पर चल रही इस कार्टून प्रतियोगिता को ईशनिंदा के कारण पाक में ३१ मई, २०१० तक प्रतिबंधित किया गया है। इसके साथ ही न्यायालय ने पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय को निर्देश जारी किया कि वह ईशनिंदा में बनाए गए कार्टून के मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठाए।[8][9]
बाद में जिस फेसबुक उपयोक्ता ने 'एवरीवन ड्रॉ मोहम्मद डे' प्रतियोगिता आयोजित की थी, उसने यह पृष्ठ हटा लिया है। इसके साथ ही उसने इस अभियान से जुड़ा ब्लॉग भी हटा लिया था। [10]
खतरा
सोश्यल नेटवर्किंग साइट फेसबुक इंटरनेट के माध्यम से जुड़े लोगों के जीवन का अभिन्न अंग बनती जा रही है।परंतु कुछ साइबर विशेषज्ञ फेसबुक से उत्पन्न खतरों के बारे में समय समय पर आगाह करते रहते हैं। चीफ सैक्यूरिटी ऑफिसर ऑनलाइन नामक सामयिक के वरिष्ठ सम्पादक जॉन गूडचाइल्ड के अनुसार कई कम्पनियाँ अपने प्रचार के लिए फेसबुक जैसे नेटवर्किंग माध्यम का उपयोग करना चाहती है परंतु ये कम्पनियाँ ध्यान नहीं देती कि उनकी गोपनियता अभि भि अनिश्चित है। सीबीसी न्यूज़ के 'द अर्ली शॉ ऑन सैटर्डे मॉर्निंग' कार्यक्रम में गूडचाइल्ड ने फेसबुक से उत्पन्न पाँच ऐसे खतरों के बारे में बताया जिससे निजी और गोपनीय जानकारियों की गोपनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।[11]ये इस प्रकार से हैं:
डाटा बांटना: यहां दी गई जानकारी केवल घोषित मित्रों तक ही सीमित नहीं रहती है, बल्कि वह तृतीय पार्टी अनुप्रयोग विकासकर्त्ताओं (थर्ड पार्टी अप्लिकेशन डेवलपर) तक भी पहुँच रही हैं।
बदलती नीतियां: फेसबुक के हर नये संस्करण रिलीज़ होने के बाद उसकी प्राइवेसी सेटिंग बदल जाती है और वह स्वत: डिफाल्ट पर आ जाती है। प्रयोक्ता उसमें बदलाव कर सकते हैं परंतु काफी कम प्रयोक्ता इस ओर ध्यान दे पाते हैं।
मैलावेयर: फेसबुक पर प्रदर्शित विज्ञापनों की प्रामाणिकता का कोई वादा नहीं है। ये मैलावेयर हो सकते हैं और उनपर क्लिक करने से पहले उपयोक्ताओं को विवेक से काम लेना चाहिये।
पहचान उजागर: उपयोक्ताओं के मित्र जाने अनजाने उनकी पहचान और उनकी कोई गोपनीय जानकारी दूसरों से साझा कर सकते हैं।
जाली प्रोफाइल: फेसबुक पर सेलिब्रिटियों को मित्र बनाने से पूर्व उपयोक्ताओं को ये चाहिये कि पहले उनकी प्रोफाइल की अच्छी तरह से जाँच अवश्य कर लें। स्कैमरों के द्वारा जाली प्रोफाइल बनाकर लोगों तक पहुँच बनाना काफी सरल है।
फेसबुक छोड़ो अभियान
चित्र:Quitfacebookdotcom.PNG
क्विटफेसबुकडे डॉट कामजालस्थल का स्क्रीनशॉट
हाल ही में फेसबुक ने अपने सुरक्षा नियमों को पहले से कुछ कड़ा कर दिया है जिसके कारण इसके उपयोक्ताओं में काफी रोष दिखा है। इसके कड़े सुरक्षा नियमों से नाराज उपयोक्ताओं ने एक समूह बनाकर फेसबुक पर फेसबुक के विरुद्ध ही अभियान चला दिया है।[12]उन्होंने ने एक साइट बनाई है क्विटफेसबुकडे डॉट कामजिसपर फेसबुक उपयोक्ताओं से ३१ मई को फेसबुक छोड़ो दिवस के रूप में मनाने का आहवान किया है। इस वेबसाइट पर संदेश है कि यदि आप को लगता है कि फेसबुक आपकी स्वतंत्रता, आपके निजी डाटा और वेब के भविष्य का सम्मान नहीं करता तो आप फेसबुक छो़ड़ो अभियान में हमारा साथ दे सकते हैं। फेसबुक छोड़ना आसान नहीं है, यह इतना ही मुश्किल है जितना की धूम्रपान छोड़ना लेकिन फिर भी उपयोक्ताओं को अपने अधिकारों के लिए यह करना ही पड़ेगा।[13]क्विटफेसबुकडे डॉट काम पर अब तक एक हजार से अधिक लोग ३१ मईको अपना फेसबुक खाता समाप्त करने की शपथ ले चुके हैं।
फेसबुक पर बुक
उत्तर प्रदेशके एक आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने फेसबुक पर अपने अनुभवों तथा अपने कार्यों को पृष्ठभूमि बनाते हुए हिंदीतथा अंग्रेजीभाषा में एक-एक पुस्तक लिखने का कार्य प्रारम्भ किया है जो बहुत शीघ्र ही प्रकाशित हो जायेंगे. अमिताभ ठाकुर द्वारा ये पुस्तकें फेसबुक संस्थापक मार्क जकरबर्ग तथा अपने फेसबुक के साथियों को समर्पित किया गया है.
संदर्भ
↑एल्डन, एरिक. (१८ दिसंबर, २००८). "२००८ ग्रोथ पुट्स फ़ेसबुक इन बैटर पोज़ीशन टू मेक मनी". वेन्चरबीट. अभिगमन तिथि: 2008-12-19.
↑"बाय द नंबर्स: बिलियनेर बैचेलर्स". फोर्ब्स. अभिगमन तिथि: २० सितंबर, २००८.
↑"प्रेस इन्फ़ो", फ़ेसबुक। अभिगमन तिथि: २७ मई, २०१०
↑फ़ेसबुक जालस्थल - ट्रैफ़िक डीटेल्स फ़्रॉम ऍलेक्सा, ऍलेक्सा इंटरनेट, इंका., अभिगमन तिथि: २२ मई, २०१०
↑ 5.05.15.2फेसबुक।लाइव हिन्दुस्तान। २७ मई, २०१०
↑मोबाइल पर फेसबुक फ्री में।दैनिक भास्कर।२० मई, २०१०
↑ 7.07.1फेसबुक ने ट्विटर के लिए खोला गलियारा।वेबदुनिया।डॉयचे वेले, जर्मन रेडियो
↑पैगंबर के कार्टून के कारण पाक में फेसबुक बैन।दैनिक भास्कर। २० मई, २०१०
↑पाकिस्तान में फेसबुक पर प्रतिबंध।वेबदुनिया।१९ मई, २०१०।लाहौर
↑फेसबुक से विवादित पेज को हटाया।नवभारत टाइम्स।२२ मई, २०१०
↑फेसबुक के 5 खतरे|तरकश।१४ मई, २०१०
↑फेसबुक अकाउंट डिलीट करो दिवस।दैनिक भास्कर। १६ मई, २०१०
↑क्विटफेसबुकडे डॉट काम
बाहरी कड़ियाँ
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एक मुक्त शब्दकोष में देखें।
विकिविश्वविद्यालय में Facebook improvements पर पाठ्य सामग्री उपलब्ध है:
फेसबुक का आधिकारिक जालस्थल
२००९ फेसबुक जनसांख्यिकी एवं अन्य आंकड़े
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सामाजिक नेटवर्किंग
01/22/13--23:14: पत्रकारिताः एक परिचय (chan 7710543)
Patrakarita- Ek Parichay
पत्रकारिताः एक परिचय
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संदीप कुमार श्रीवास्तव << आपका कार्ट
पृष्ठ : 184 << अपने मित्रों को बताएँ
मूल्य : $ 11.95
प्रकाशक : जय भारतीय प्रकाशन
आईएसबीएन : 81-85957-14-2
प्रकाशित : जनवरी ०१, २००६
पुस्तक क्रं : 4860
मुखपृष्ठ : सजिल्द
सारांश:
प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश
पत्रकारिता समाज में ऊर्जा भरने का एक आक्रामक साधन है। खतरनाक भी, उस्तरे की तरह- बंदर के हाथ में पड़ गया तो खैर नहीं। इसीलिए कोशिश यही होनी चाहिए कि हाथ सही हों। कुशल और सधे हुए। पत्रकारिता सूचना देती है और दिशा भी परन्तु आज स्थिति कुछ जटिल सी हो गयी है। यह समझना आसान नहीं रह गया है कि पत्रकारिता की भूमिका क्या है ? विज्ञान और प्रोद्योगिकी का प्रभाव इस विधा पर भी बहुत पड़ा है। मशीनों ने जहाँ इसकी धार तेज की है, वहीं भाषा को बेढंगा किया है।
गोपाल रंजन
संदीप श्रीवास्तव जी ने पत्रकारिता के लिए यह संक्रमण का काल है। दिशाएँ तलाशी जा रही है। रोबोट की दुनिया में दक्ष हाथों की अनदेखी हो रही है। मुनाफाखोरी ने भी उलझाव पैदा किये हैं, वायुमण्डल में जहर फैलाने का भी काम हो रहा है। श्रीवास्तव जी ने पत्रकारिता के सभी पक्षों को ध्यान में रखकर पत्रकारिता एक परिचय की रचना की। यह पुस्तक विद्यार्थियों और पत्रकारों के लिए विशेष उपयोगी होगी।
अशोक कुमार
पत्रकारिता: एक परिचय
प्रस्तावना
हमारे देश में पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में माना जाता है। क्योंकि यह जन-जन की अभिव्यक्ति को मुखर रूप से व्यक्त करने का जनतांत्रिक तरीका है। पत्रकारिता के उस रूप को हम सभी जानते हैं, जब स्वतंत्रता का संघर्ष मिशन की भावना से कलम के योद्धाओं ने लड़ा था। स्वतंत्रता संघर्ष के इस दौर में पत्रकारिता का एकमात्र लक्ष्य आजादी हासिल करना और जनता में चेतना जागृत करना रहा। सभी देशों में पत्रकारिता को अभिव्यक्ति की स्वतांत्र्य भावना के परिप्रेक्ष्य में लिया जाता है। भारत में यद्यपि आजादी के पाँच दशक ही हुए हैं, फिर भी पत्रकारिता का क्षेत्र उत्तरोत्तर नए अवसरों और नई तकनीकी चुनौतियों से भरा क्षेत्र मानते हैं। पत्रकारिता में प्रवेश करने वाले विद्यार्थियों के लिए इसके परिचय, सिद्धांतों तथा संवैधानिक पहलुओं से अवश्य परिचय होना चाहिए।
शुरूआत में पत्रकारिता का अर्थ, क्षेत्र, इतिहास और उसके विकास पर चर्चा की गई है। इकाई दो में स्वतंत्रता से पूर्व भारत की पत्रकारिता मध्य प्रदेश का विशेष संदर्भ लेते हुए की गई है।
स्वतंत्रता के बाद प्रेस की भूमिका और स्वातंत्र्य पर विवरण भी है। इस में प्रेस से संबंधित कानूनों पर सिलसिलेवार प्रकाश डाला गया है। विद्यार्थियों से अपेक्षा है कि वे इन सामग्रियों का अध्ययन ठीक ढंग से करते हुए पत्रकारिता के मानदण्डों को समझने का प्रयास करें।
पत्रकारिता और रिपोर्टिंग
समाचार परिभाषा
समाचार के संबंध में अनेक प्रकार के मत प्रचलित हैं। उसकी परिभाषा विभिन्न व्यक्तियों तथा स्थानों की दृष्टि पर आधारित है।
पश्चिमी देशों की दृष्टि में केवल माध्यम ही महत्त्वपूर्ण है। उसी को सबसे अधिक महत्त्व दिया जाता है।
15वीं शताब्दी में समाचार की परिभाषा का स्वभाव संबंधित व्यक्तियों के कारण बदलता रहा है। 17वीं शताब्दी में सबसे पहले एक आधुनिक समाचार पत्र निकला। इस समाचार में छपने वाली संसद की कार्यवाही के संबंध में उत्तेजक रिपोर्टिंग के कारण उस युग के लोगों के जीवन पर गहरी छाप पड़ी। इसका परिणाम यह हुआ कि उस दौर के प्रसिद्ध संसद सदस्य ‘एडमंड बर्क’ को यह टिप्पणी देने पर उत्साहित होना पड़ा कि ‘यह लोगों को मनचाहे’ कहने और देश की जनता को आजाद कराने का अधिकार किसने दिया ? क्या यह ‘चौथा शासन’ है ? (उस समय तक केवल तीन प्रशासकों को मान्यता मिली थी-दि हाऊस ऑफ क़ॉमन्स, दि हाऊस ऑफ लॉर्डस् और न्यायाधीश वर्ग) इस टिप्पणी की अनेक प्रकार के व्यक्तियों ने अनेक प्रकार की दृष्टि से अर्थ लगाने की कोशिश की है। पत्रकार वर्ग इसको जनता का चौथा शासन का नाम देता है।
हमारे देश में सम्राट अशोक के युग से पत्थरों पर समाचार छापे जाते थे तथा वे मुगल शासक अकबर के युग में ‘वाकिया नवीस’ के माध्यम से प्राप्त समाचार, सभी यही कहते हैं कि समाचार जनता के लिए उनकी आवश्यकतानुसार सूचना देना वाला होना चाहिए और प्राचीन काल में समाचारों का जो उद्देश्य था कुछ ऐसा ही था। किन्तु आज के आधुनिक युग में समाचार जनता के बीच एक से दूसरे मुख तक बड़ी तीव्र गति से प्रसारित होते हैं। हालांकि आज के युग में ‘जन संचार’ के क्षेत्र में बहुत ज्यादा प्रगति हो गयी है। प्रिन्ट माध्यम में भी और इलेक्ट्रानिक माध्यम में भी। इस प्रगति के बावजूद हमारे देश की जनता में आज भी उसी प्राचीन प्रथा का चलन है। जनसंख्या में समाचार का प्रसार व्यक्ति-व्यक्ति के माध्यम से ही होता है।
समाचार पत्रों के अधिकतर संपादक पाठकों की इच्छा के अनुसार समाचार की परिभाषा को निश्चित करने का प्रयास करते हैं। दूसरे में पाठक जिस चीज की माँग करता है, वहीं कुछ देने की संपादक वर्ग कोशिश करता है। चाहे वह स्थानीय समाचार हो, फीचर्स हों, क्रिकेट समाचार हों या और कोई समाचार। कुछ संपादक समाचार की परिभाषा इसी प्रकार करते हैं कि पाठकों को क्या ज्ञात होना चाहिए आज के जटिल आश्चर्यचकित करने वाले युग में पाठक के जीवन की सुखरूपता के लिए कौन-कौन-सी जानकारियां आवश्यक है, वे सब समाचार हैं।
इस प्रकार से ‘समाचार’ की कई प्रकार की परिभाषाएं प्रचलित हैं। ‘समाचार उसको भी कहते हैं, जो समाचार अधिक से अधिक जनसंख्या के लिए रूचिकारक तथा महत्वपूर्ण हों।’ दूसरे शब्दों में ‘समाचार’ घटना-तथ्य, तथा भिन्न-भिन्न प्रकार की सामाजिक गतिविधियों के संबंध में समय पर अधिक से अधिक जनसंख्या के लिए रूचिकारक हो। समाचार किसी भी ताजा घटना की ताजा जानकारी का अंश होता है, जो जनता पर अपना प्रभाव डालता है तथा उनके लिए रूचि पैदा करता है।
रूचिकारक समाचारों पर पाठक वर्ग अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त जरूर करते हैं विशेषतः अनोखी तथा आश्चर्यजनक घटनाओं के संबंध में वे बहुत रूचि लेते हैं।
आपको समाचार की यह परिभाषा की जानकारी तो अवश्य याद होगी-
यदि कुत्ता मनुष्य को काट खाए तो यह समाचार नहीं है, किंतु मनुष्य कुत्ते को काट खाए तो यह समाचार कहलाता है।
एक प्रसिद्ध संपादक ने ‘‘समाचार’’ की परिभाषा इस प्रकार की है, ‘‘जो कुछ घटित होता है, वह या उसका कोई भाग जनता का ध्यान आकर्षित करता है, वह ‘‘समाचार’’ है।
आप जोसेफ पुलिट्जर के नाम से अच्छी तरह परिचित होंगे। इन्हीं के नाम से अन्तरराष्ट्रीय ‘‘पुलिट्जर अवार्ड’’ संस्थापित किया गया है। उन्होंने समाचार की यह परिभाषा की है-‘‘समाचार वह है, जिसे-‘‘असली, अनोखी, विशेष, नाटकीय, रोमांचकारी, जिज्ञासा- जनक, चातुरीपूर्ण, विनोदी, विषम और योग्य कहा जाता है।’’
समाचार मूल्यांकन
समाचार की परिभाषा उसकी विशेषताओं के अनुसार की जाती है। समयबद्धता, निकटता, रूचिकर, मनोरंजक, परिणामगर्भिता, अनोखापन आदि विशेषताओं के आधार पर परिभाषा होती है।
‘‘समाचार’’ का विषय एक समयबद्धता का विषय है। जर्नलिज्म (पत्रकारिता) यह शब्द लैटिन से आया है, जिसका अर्थ ‘‘दैनिक और पत्रकारिता’’ किसी भी घटना की ताजी और समय पर की जाने वाली रिपोर्टिंग को पत्रकारिता समझा जाता है।
निकटता का बहुत अधिक महत्व है। क्योंकि जनता को दूर-दूर के अंतरराष्ट्रीय घटनाओं से ज्यादा आसपास की घटी घटनाओं में अधिक रूचि होती है साधारण व्यक्तियों से अधिक प्रसिद्ध और विशेष व्यक्तियों तथा घटनाओं में भी रूचि रहती है। पाठक वर्ग हर दिन होने वाली छोटी-छोटी घटनाओं के बारे में ध्यान नहीं देता, जिसका कोई निर्णय न निकलता हो और इन घटनाओं के कारण हमारे जीवन पर कोई विशेष प्रभाव पड़ता हो। समाचार अगर निराला, अनोखा तथा आश्चर्यजनक हो तो वह पाठकों के लिए बहुत ही मनोरंजक होता है। इसके अतिरिक्त मनोरंजक घटनाएं समाचार का महत्वपूर्ण भाग होती हैं। मानव जाति की मनोवृत्ति है कि दूसरे लोगों के संबंध में उसे अधिक रूचि होती है। दूसरे व्यक्तियों के बारे में जानकारियां प्राप्त करने में सभी बहुत उत्साहित होते हैं। समाचार के इन गुणों के अलावा कुछ दूसरे गुण भी हैं, जिसे तात्कालिक लाभ और दीर्घकालिक लाभ कहा जाता है। तात्कालिक लाभ वाले समाचार वे होते हैं, जो पाठको पर तुरन्त अपना प्रभाव डालते हैं।
उदाहरण के तौर पर क्रिकेट मैच के परिणाम अथवा किसी दुःखदायक घटना का समाचार तात्कालिक प्रभाव वाला होता है। दीर्घकालिक लाभ वाले समाचार वे होते हैं, जैसे कर सुधार या कानूनी निर्णय तथा संसदीय संशोधन के समाचार जो कि दीर्घ समय तक पाठकों के जीवन को प्रभावित करते हैं।
समाचार के आवश्यक तत्व
यहाँ हम समाचारों के कुछ आवश्यक तत्त्वों की चर्चा करेंगे।
1.स्पष्टता-
आपके समाचार लेखन के लिए वाक्य छोटे-छोटे होने चाहिए। हर एक अनुच्छेद के भीतर तीन या चार पंक्तियों का अंतर देना चाहिए। लेखन शुद्ध और स्पष्ट करने से पाठकों में समाचार पत्र पढ़ने की रूचि पैदा हो सकती है।
2.उद्देश्य-
आप अपने लेखन में अपने विचारों को मत मिलाइए, दूसरे व्यक्तियों के विचारों का और घटनाओं का लेखन उद्देश्यबद्धता के साथ लिखें, जितनी घटना हो उतना ही लेखन। किसी पक्ष के लिए लेखन करना पाठकों से विश्वासघात करने के समान है।
3.समानता-
रिपोर्टिंग करते समय समानता का पालन करना बहुत आवश्यक है। यदि आप किसी विवादास्पद विषय अथवा घटना की रिपोर्टिंग करने जा रहे हैं, तो आपका कर्तव्य है कि दोनों पहलुओं की रिपोर्टिंग करें। यदि कोई हड़ताल मनाई गई तो संवाददाता उस जगह पर जाते हुए हड़ताल कितनी सफल हुई, इसका लेखन यथार्थ के साथ करें। यदि किसी एक ही पक्ष का लेखन आप करेंगे तो आपके समाचार लेख में निष्पक्षता नहीं होगी। पाठकों का विश्वास इस प्रकार आप खो देंगे।
4.यथार्थ-
किसी भी समाचार में यथार्थता की बुनियादी जरूरत है। यदि आप यथार्थता को नजरअंदाज करेंगे तो आप पाठकों का विश्वास ग्रहण नहीं कर पाएंगे। इसलिए अपने लेख की जानकारियों तथा तथ्यों की बार-बार जांच करना आवश्यक है। नामों को, आंकड़ों तथा तथ्यों को शुद्धता के साथ लिखें। छोटी-छोटी गलतियों से बचे रहिए।
समाचार के स्रोत
संवाददाता को अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए विश्वसनीय संपर्क स्थापित करना चाहिए। जितना अधिक से अधिक संपर्क हो उतना ही उसके लिए लाभदायक होता है। क्योंकि यही संपर्क उसके लिए जानकारियों के साधन हो सकते हैं। समाचार साधन मुख्यतः सार्वजनिक सभाएं, रेडियो के समाचार, दूरदर्शन के प्रोग्राम, पत्रकार-सम्मेलन, समाचार संक्षिप्त विवरण, इसके अतिरिक्त संवाददाता के अपने निजी संपर्क ही महत्वपूर्ण होते हैं। ये निजी संपर्क सरकारी अथवा गैर सरकारी अधिकारियों, व्यावसायिक वर्ग, मंत्रियों के सचिव, जनसंपर्क कार्यालय की सतह तक सीमित हो सकते हैं। इस तरह दो प्रकार के समाचार साधन होते हैं, एक तो वही सर्वसाधारण साधन जो सभी जनता के लिए उपलब्ध रहते हैं, दूसरे निजी संपर्क साधन जो व्यक्ति विशेष तक सीमित होते हैं।
कभी-कभी अपने व्यक्तिगत साधनों का उल्लेख अपनी रिपोर्टिंग में करना आवश्यक होता है और कभी-कभी उन्हें छुपाना भी पड़ता है। विवादास्पद समाचार लेखन में निजी समाचार साधनों को छुपाना ही उपयुक्त होता है। संवाददाता का यह कर्तव्य है कि समाचार लेख तथ्यों पर निर्धारित होना चाहिए। यदि आवश्यक पड़े तो अपने पास टेपरिकार्डर रखिए और दस्तावेज इकट्ठा कीजिए।
अपराध और खोजी रिपोर्टिंग करते समय साधनों की सुरक्षा करना पहला कर्तव्य है। खोजी पत्रकारिता में राजनीतिक व्यक्तियों से मुठभेड़ भी हो सकती है। क्योंकि जो जानकारियां वे छुपाना चाहते हैं, संवाददाता उनको पाठकों के सामने रखना चाहता है। इसलिए संवाददाता को अपने ‘‘साधनों’’ को पवित्र समझकर उनकी रक्षा करनी चाहिए। कानूनी व्यवस्था तथा सरकारी अधिकारियों की ओर से साधनों का पता बताने का पत्रकार पर दबाव भी आ सकता है, किन्तु पत्रकारिता का यह पहला उसूल है कि अपने साधनों ‘स्रोत’ को छुपाएं और उसकी रक्षा करें।
संवाददाता
संवाददाता के आवश्यक गुण
कभी भी कामयाब पत्रकार अथवा संवाददाता अपने आप जन्म नहीं लेता। वह पैदा नहीं होता, बल्कि पैदा किया जाता है, बनाया जाता है। पत्रकारिता में सफलता प्राप्त करने के लिए कुछ आवश्यक गुणों की आवश्यकता होती है, जिसके कारण वह किसी भी क्षेत्र में सफलताओं की सीढ़ियां चढ़ता रहता है। ये आवश्यक गुण कुछ इस प्रकार हैं- ईमानदारी, साहस, धैर्य, सावधानी, बुद्धिमत्ता, विद्वता, मित्रता, दया, भरोसा, सामाजिक दर्द, जिज्ञासु होना उसके लिए जरूरी है। निरीक्षक, समीक्षक, आलोचक दृष्टि, कल्पना शक्ति, दूरदृष्टि, चतुरता, मुस्तैदी, प्रसन्नता, चालाकी, आशावादिता, विनोदीवृत्ति, सुरक्षात्मक दृष्टि आदि उसके व्यक्तित्व के लिए बेहद जरूरी हैं।
बहुत सारे विद्यार्थी सोचते होंगे कि पत्रकारिता के प्रशिक्षण में ‘‘समाचार कैसे लिखे जाते हैं ?’’ केवल यही बताया जाता है। कुछ विद्यार्थी ऐसे भी होते हैं, जो साहित्यिक आकांक्षा से उत्प्रेरित होकर पत्रकारिता के क्षेत्र में पधारते हैं। किन्तु दुर्भाग्य से पत्रकारिता में केवल ‘‘लेखन’’ ही नहीं होता। इस क्षेत्र में अतिसुन्दर भाषा, शैली, मुहावरे और साहित्य संबंधी जानकारियों से अधिक कल्पना शक्ति, दूरदृष्टि ओर सोच-विचार करने की क्षमता महत्वपूर्ण होती है। पत्रकारिता से इस धरती पर जितने भी विषय है, उदाहरण के तौर पर अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, विज्ञान, रसायन विज्ञान, इतिहास, भूगोल शास्त्र आदि असंख्य विषयों का विषय होता है। जिन विद्यार्थियों का इन विषयों से परिचय नहीं हैं, उनको पत्रकारिता क्षेत्र में कदम बढ़ाने से पहले इन विषयों से अच्छी तरह परिचित होना चाहिए।
संवाददाता बहुत प्रभावशाली व्यक्ति होता है। समाचार पत्र में समाचार कैसे छापें, इसे निश्चित करने वाला कोई और नहीं होता, बल्कि संवाददाता ही इस बात को तय करता है। वैसे समाचार संगठन के दूसरे व्यक्ति भी होते हैं, परन्तु संवाददाता ही वह पहला व्यक्ति होता है, जो निर्णय लेता है कि किस घटना तथा समाचार को किस प्रकार रिपोर्ट करें ? दूसरे शब्दों में संवाददाता ही समाचार इकट्ठा करने और उसका सही ढंग से संगठन करने का कार्य करता है। यह भी सत्य है कि एक संवाददाता संपादक भी अच्छा होता है। एक अच्छा संवाददाता हर समय एक अच्छे संपादक के गुणों को धारण करने की कोशिश करता है।
पत्रकारिता के इस पेशे का सबसे बड़ा रोग है-‘सर्वद्वेषी’। एक पत्रकार को इस रोग से सतर्क रहना बहुत जरूरी है। लेकिन आलोचक की दृष्टि एक पत्रकार की सबसे बड़ी पूँजी है। पत्रकार की यह कोशिश होती है कि वह परिपक्व बने। उसका हर काम निर्दोष हो, यही उसकी आकांक्षा होती है।
समाचार संगठन में श्रेणियां और कार्य
कोई भी संवाददाता समाचार पत्र का महत्वपूर्ण सदस्य होता है। वह सबसे पहले संवाददाता है। वह समाचारों को इकट्ठा करता है और उसको शुद्ध तथा सुन्दर बनाता है। समाचार पत्र संस्था के दूसरे सदस्य संवाददाता की भेजी हुई रिपोर्ट को सही ढंग से छापने तथा पढ़ने को आतुर पाठकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह तो सब ठीक है, किन्तु इसका अर्थ यही नहीं कि संवाददाता ही समाचार पत्र संगठन में सब कुछ है। दूसरे सदस्यों के बिना संवाददाता क्या अपने समाचारों को पाठकों तक पहुँचा सकता है, भला क्या यह संभव है ? किसी भी समाचार पत्र संगठन में संपादक का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। समाचारों का संपादन करना, समाचारों को संतुलन के साथ छापना यह कार्य संपादक करता है। एक ही प्रकार के समाचार छापने से पत्र में आकर्षण नहीं रहता, इसलिए हर किस्म के समाचारों को पत्र में जगह देनी होती है।
कोई भी पाठक वर्ग समाचार पत्र को जिस मूल्य पर भी खरीदता है, इससे समाचार की लागत से बहुत कम लाभ होता है। इस घाटे के लिए संगठन में कुछ सदस्य ऐसे भी होते हैं, जो विज्ञापन लाते हैं। इन विज्ञापनों से सभी सदस्यों का मासिक वेतन निकल आता है।
संगठन में कुछ सदस्य पाठकों तथा समाचार पत्र को समय पर पहुँचाने का कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्त समाचार पत्र छापने वाले सदस्य भी संगठन के महत्वपूर्ण भाग होते हैं। इस प्रकार इन तीन श्रेणियों में काम होता है।
1.लिखाई। 2.छपाई। 3.बिक्री।
समाचार पत्र का यह कार्य यानी लिखाई, छपाई और बिक्री संगठन के सभी सदस्य संपादकीय विभाग, तकनीकी विभाग और व्यापार विभाग तीनों मिलकर करते हैं।
संपादकीय विभाग
कोई भी समाचार इकट्ठा होने के बाद संपादन का कार्य आरंभ होता है। संपादक समाचारों की भाषा की त्रुटियाँ दूर करते हुए, रूचिकारक और पठनीय बनाता है। संपादक विभाग का दूसरा कार्य मनोरंजक संपादकीय लेख और विशेष लेख लिखकर पाठकों का मनोरंजन करना होता है।
तकनीकी विभाग
जब संपादन की प्रक्रिया समाप्त होती है उसके बाद छपाई का तकनीकी कार्य आरंभ होता है। यह कार्य तकनीकी विभाग करता है। कम्प्यूटर पर समाचार पत्र का ब्लू प्रिन्ट बन जाने के बाद उसकी प्लेट बनायी जाती है, फिर आफसेट तथा रोटोग्रेव्होर छपाई मशीनों पर छपाई का काम आरंभ होता है।
व्यापार विभाग
इस भाग में विज्ञापन लेना और पाठक वर्ग निर्माण करना इसके अलावा सभी प्रकार का वित्तीय कार्य होता है। इस विभाग से सभी कर्मचारियों के वेतन भी दिये जाते हैं। छोटे-छोटे समाचार पत्रों में अलग-अलग विभाग नहीं होते। किन्तु बड़े समाचार पत्र संगठनों में हर विभाग स्वतंत्र रूप से कार्य करता है। विज्ञापन विभाग, तकनीकी विभाग, सम्पादकीय विभागों के अतिरिक्त सर्क्युलेशन विभाग और प्रबन्धक विभाग भी होते हैं, जो क्रमशः समाचार पत्र के सर्क्युलेशन और सभी विभागों का प्रबन्धन का कार्य किया जाता है।
समाचार पत्र संगठन के सब से ऊपर मालिक प्रशासक होता है। मालिक तथा प्रशासक कोई भी व्यक्ति, संघ, साझेदारी में या संयुक्त पूँजी पर निर्धारित हो सकता है। भारत में 90 प्रतिशत समाचार संस्थाओं में मालिक ही प्रशासक और संपादक बना रहता है। बड़े और मध्यम प्रकार के समाचार पत्रों में संपादन, वितरण वगैरह सभी कार्यों को संपादक ही करता है। मुख्य संपादक को सहायता देने के लिए कभी कभार सहायक तथा प्रबंधकीय संपादक भी होते हैं। मुख्य संपादक संपादकीय विभाग, व्यवसाय विभाग और तकनीकी विभाग इन तीनों विभागों पर नियन्त्रण करता है। किन्तु संपादकीय विभाग पूर्णतः मुख्य संपादक के नियोजन में ही कार्य करता है। इसको सहायता देने के लिए समाचार संपादक या सहायक समाचार संपादक होते है। संपादकीय विभाग दो विभागों में बँटा हुआ है- (1) रिपोर्टिंग विभाग। (2) संपादकीय विभाग। रिपोर्टिंग विभाग में अनेक प्रकार के संवाददाता काम करते हैं।
राष्ट्रीय संवाददाता
अब आइये यह देखें, राष्ट्रीय संवाददाता बनने के लिए किन गुणों की आवश्यकता होती है ? यह राष्ट्रीय स्तर के संवाददाता में सबसे महत्वपूर्ण गुण तो यह होना चाहिए कि वह खोजी वृत्ति का हो, इसके अतिरिक्त समीक्षा, निरीक्षण, आलोचना करने की क्षमता के साथ-साथ राष्ट्र के महत्वपूर्ण विषयों पर गहरी नजर रखने की क्षमता राष्ट्रीय संवाददाता में अवश्य होनी चाहिए।
विदेशी संवाददाता
यह संवाददाता बहुत ही वरिष्ठ होते हैं। भारत के 20,000 संवाददाताओं में सिर्फ 2 प्रतिशत संवाददाताओं को विदेशी राष्ट्रों में नियुक्त किया जाता है। संवाददाता के जीवन की सबसे बड़ी आकांक्षा विदेशों में नियुक्त विशेष संवाददाता बनना होता है। यह सबसे बड़ा सौभाग्य तथा इनाम है।
समाचार-लेखन
किसी भी प्रकार का लेखन विशेष शैली में लिखा जाता है। उपन्यास हो, आत्मचरित्र हो, निबंध हो या नाटक हो, कविता हो, हर प्रकार के लेखन की पद्धति तथा शैली का एक विशेष ढंग होता है।
समाचार का संगठन
समाचार लेखन विविध प्रकार से लिखे जाते हैं, संगठित किये जाते हैं। लेकिन समाचार लेखन के साधारणतः तीन भाग होते हैं-पहला भागः समाचार प्रवेश अथवा प्रारम्भिक कहलाता है। अंग्रेजी में इसे इन्ट्रो तथा लीड कहते हैं। मध्य भाग को कलेवर (बॉडी) और अंतिम भाग को निर्णय कहते हैं।
समाचार प्रवेश (इन्ट्रो) अनेक प्रकार से लिखा जाता है। साधारणतः इस भाग में समाचार सारांश होता है, जोकि छः प्रश्नों के उत्तर पर निर्भर होता है।
‘‘क्या ? कहाँ ? कब ? क्यों ? किसको ? और कैसे ?
इन छः ककारों को अंग्रेजी में 5 W+ 1 H कहा जाता है।
कलेवर (बॉडी) में समाचार लेख के सारांश का विस्तार दिया जाता है। कलेवर संक्षिप्त भी हो सकता है और विस्तृत भी। एक ही अनुच्छेद में लेखन में समाचार प्रवेश तथा कलेवर दोनों एकसाथ लिखे जाते हैं, अलग-अलग नहीं।
समाचार लेखन के अंतिम भाग में समाचार निर्णय लिखना आवश्यक नहीं होता। जो कुछ भी विचार प्रकट करना है, वह पहले ही अनुच्छेदों में यानी समाचार प्रवेश में ही कहा जाता है। लेकिन कुछ लेखों में निर्णय भी लिखा जाता है।
समाचार की रचना
एक ही समाचार का लेखन जो कि जटिल भी नहीं है, यदि लिखना हो, जिसमें केवल एक ही विषय तथा विचार का लोन करना हो, ऐसी घटनाओं अथवा समाचारों को ‘‘उल्टा त्रिकोण’’ पद्धति से लिखा जाता है। इस पद्धति में सबसे महत्वपूर्ण विषय या मुद्दे को पहली पंक्तियों में या वाक्यों में लिखा जाता है। कम महत्व वाले मुद्दों को कलेवर (बॉडी) में लिखा जाता है। उल्टी त्रिकोणी रचना में निर्णय का उल्लेख नहीं किया जाता। इस प्रकार की रचना में यह लाभ होता है कि आवश्यकतानुसार समाचार पत्र में जगह की तंगी को देखते हुए नीचे की ओर कांटा छांटा जा सकता है। कटाई-छटाई से समाचार का मुख्य अंग छूट नहीं जाता। दूसरा लाभ यह होता है कि पाठक यदि गड़बड़ी में पहले अनुच्छेद के कुछ ही वाक्य पढ़ लेता है तो वह समाचार के मुख्य अर्थ से वंचित नहीं रहता।
1. समाचार प्रवेश (इंट्रो)
2. कलेवर (बॉडी)
3. निर्णय
समान-तथ्य-लेखन
कुछ समाचार लेख ऐसे भी होते हैं, जो ‘‘उल्टे त्रिकोण’’ पद्धति तक सीमित नहीं रहते। कुछ लेखों में सभी मुद्दे महत्वपूर्ण होते हैं। किसी एक अनुच्छेद को काटना हानिकारक होता है। महत्व के अनुसार सविस्तार जानकारी लिखना आवश्यक होता है। इस प्रकार के लेख साधारणतः विशेष पद्धति से लिखे जाते हैं।
उदाहरण
इलाहाबाद। अगस्त 27 इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने विश्वविद्यालय में इस वर्ष से नौकरी दिलाने वाले तीन व्यावसायिक पाठ्यक्रम खोले जाएंगे। विश्वविद्यालय के प्रेस नोट में यह बात बतायी गयी है।
विश्वविद्यालय ने दो साल के पर्सनल मैनेजमेंट कोर्स के लिए 40 सीटों की अनुमति दी है, जिसे बिजनेस मैनेजमेंट के विभाग में चलाया जाएगा। प्रवेश की सूचना पहले हिस्से में जारी की गयी है।
मास्टर्स इन विजुअल के एक और कोर्स के लिए 25 सीटों की अनुमति दी गयी है। यह दो वर्षीय व्यावसायिक कोर्स आर्ट कॉलेज में चलाया जाएगा। प्रवेश संबंधी सूचना कल जारी की जाएगी।
तीन वर्षीय मास्टर्स इन कम्प्यूटर एप्लीकेशन के लिए 80 सीटों की व्यवस्था की गई है, अगले सप्ताह प्रवेश संबंधी सूचना जारी की जाएगी।
इन पाठ्यक्रमों में रूचि रखने वाले विद्यार्थी संबंधित विभागों से तुरन्त संपर्क करें।
इस समाचार लेखन पद्धति में पहले अनुच्छेद में तीन पाठ्यक्रमों का उल्लेख है। कलेवर में तीन पाठ्यक्रमों के संबंध में विस्तार पूर्वक जानकारी का उल्लेख जरूरी है। नहीं तो पाठक यह प्रश्न पूछेगा कि दूसरे कोर्स का क्या हुआ ? शेष कोर्सों की जानकारी कहाँ है ?
इस प्रकार से अनेक अवसरों पर समाचार प्रवेश के पहले अनुच्छेद के साथ-साथ समान महत्व वाले तथ्यों का विवरण देना अनिवार्य हो जाता है।
काल-क्रम के अनुसार समाचार की रचना
जब कभी समाचार लेखों के क्रमानुसार लिखित घटनाओं का विवरण दिया जाता है, तो इस प्रकार की घटनाओं के संगठन की समस्या केवल ‘‘कालक्रम’’ से ही दूर हो सकती है। कालक्रमानुसार समाचार का लेखन किस प्रकार किया जाता है। आइए देखें-
उदाहरण
इलाहाबाद। अगस्त 5 इलाहाबाद पुलिस ने बन्दूक की नोक पर बैंक लूट कर फरार होने वाले एक खतरनाक लुटेरे की तलाशी के लिए बड़े पैमाने की मुहिम शुरू की है, जो करीब 55 लाख रुपये लेकर फरार हुआ।
शहर से दूर फाफामऊ पर स्थित एस.बी.आई. की शाखा में एक घनी दाढ़ी वाला खतरनाक लुटेरा घुस गया। दोपहर के 1 बजकर 40 मिनट पर कैशियर मिस्टर आर. सिंह अपना हिसाब किताब बन्द कर रहे थे कि यकायक लुटेरे ने अन्दर घुसकर कैशियर पर बन्दूक तान दी। कैशियर की ओर एक थैला फेंकते हुए उसमें रुपये भरने को कहा।
घबराते हुए मिस्टर सिंह ने रुपये भरने के बाद लुटेरे को लौटा दिया। रुपये हथिया लेने के बाद कैशियर को चुप चुप कहते हुए नीचे बैठने का हुक्म देते हुये लुटेरा भाग खड़ा हुआ। थोडी़ देर के बाद कैशियर ने वाचमैन को चिल्लाते हुए आवाज दी, तब तक लुटेरा भाग चुका था।
1. समाचार प्रवेश इन्ट्रो
2. क्रमवार घटनाएं
3. अधिक जानकारी
01/22/13--23:21: मास कम्युनिकेशन:/ जिम्मेदारी// से भरपूर है पत्रकारिता (chan 7710543)
शिवसेना के अध्यक्ष बने उद्धव ठाकरे
फजले गुफरान
First Published:16-10-12 02:53 PM
ई-मेल Image Loadingप्रिंट टिप्पणियॉ: (1) अ+ अ-
पत्रकारिता जगत में रोजगार के अनेक नए अवसर सामने आए हैं। यह क्षेत्र चुनौतियों से भरपूर है और इसमें काम करने वाले व्यक्ति की पहचान भी भीड़ से हट कर बनती है। पत्रकारिता जगत के मौजूदा परिदृश्य और इसमें शिक्षा व रोजगार के अवसरों पर नजर डाल रहे हैं फजले गुफरान
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाला पत्रकारिता जगत एक बेहतर करियर विकल्प हो सकता है, बशर्ते उसके साथ जुड़ी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाने का संकल्प लेने का साहस हो। समाचार पत्र या पत्रिकाओं की दुनिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का संसार, रेडियो की आवाज का जादू हो या फिर वेब पत्रकारिता का जाल, सभी उत्साही व सजग कर्मयोगियों को अपने-अपने तरीके से एक मंच दे रहे हैं। यहां ग्लैमर तो है, लेकिन वह दूसरे पायदान पर है। सबसे पहले जनता की आवाज बनने का समर्पण है, जो इस पेशे में आने की पहली शर्त है। जो चाहते हैं पत्रकार बनना, उन्हें कार्यकर्ता की आत्मा के साथ इस पेशे की लक्ष्मण रेखा का भी ध्यान रखना होगा, वरना खतरा हमेशा रहेगा। एक कदम आगे रहने या सच कहने या सबसे पहले सच के होने की सूक्तियों का सार यही है कि पत्रकारिता थोड़ा अलग पेशा है। साहस, जागरूकता, जानकारी, विश्लेषण इत्यादि का विलक्षण मिश्रण है इसमें। जागे रहना है और जगाना है तो इस पेशे में आपका स्वागत है। कार्य का स्वरूपएक पत्रकार डेस्क और फील्ड, दोनों क्षेत्रों में काम कर सकता है। डेस्क वर्क में कॉपी राइटिंग और संपादन का काम किया जाता है। डेस्क के काम में उपलब्ध कराई गई सामग्री को भाषाई रूप से सशक्त करने का काम इन लोगों के ही कंधों पर होता है। यह काम वही कर सकते हैं, जो भाषा ज्ञान के साथ-साथ देश-विदेश में हो रही हलचलों पर नजर रखते हैं। फील्ड वर्क उन लोगों के लिए सही है, जो खबरों के अंदर छिपे सच को सामने लाने की काबिलियत रखते हैं। इस काम में ऐसे व्यक्ति ज्यादा सफल होते हैं, जिनके संपर्क सूत्र बेहतर होते हैं। इसके तहत रिपोर्टर आते हैं। रिपोर्टर को पत्र-पत्रिका, चैनल्स व वेब मीडिया का ‘आंख और कान’ कहा जाता है। इनका प्रमुख काम होता है प्रेस कॉन्फ्रेंस में जाना, इंटरव्यू लेना, किसी घटना की विस्तृत जानकारी इकट्ठी करना आदि। इसके अलावा, फोटोग्राफर या कैमरामैन प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व वेब मीडिया का एक अहम हिस्सा होता है। रिपोर्टर की टीम के साथ फोटोग्राफर या कैमरामैन होता है, जो परिस्थितियों के हिसाब से तस्वीर उतारता है ताकि खबर स्पष्ट और रोचक लगे। खबरों के अलावा प्रिंट/इलेक्ट्रॉनिक व वेब मीडिया में फीचर राइटिंग का खासा अवसर है। फीचर में विभिन्न विषयों पर लेख तैयार किए जाते हैं। पत्रकारिता का वर्गीकरण
पत्रकारिता का संबंध प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं वेब मीडिया से है। प्रिंट पत्रकारिता में समाचार पत्र, पत्रिकाएं और जर्नल्स आते हैं। इलेक्ट्रॉनिक में (ऑडियो/विजुअल) जैसे रेडियो व टेलीविजन। वहीं इंटरनेट के आगमन के बाद अखबारों के रुतबे और टीवी चैनलों की चकाचौंध के मध्य पत्रकारिता की एक नई विधा वेब जर्नलिज्म ने जन्म लिया है, जो काफी प्रभावकारी तरीके से आगे बढ़ रही है। यह इतनी असरकारी हो चुकी है कि इसके मोहपाश में प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी आ चुके हैं। यही वजह है कि आज सभी प्रमुख समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, चैनल्स का वेब एडिशन उपलब्ध है। अवसर
पत्रकारिता से जुड़ने वाले लोग समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, प्रेस सूचना ब्यूरो, वेबसाइटों, प्रोडक्शन हाउस, न्यूज एजेंसीज, दूरदर्शन से लेकर राष्ट्रीय व क्षेत्रीय प्राइवेट चैनलों में रोजगार पा सकते हैं। रिपोर्टर, स्तंभकार, फोटोग्राफर, प्रूफरीडर, रिसर्चर, ऑनलाइन कम्युनिकेशन, पब्लिकेशन डिजाइन, फिल्म मेकिंग, स्क्रिप्ट राइटिंग, एंकरिंग, फ्रीलॉन्सिंग के अलावा बतौर समाचार विश्लेषक करियर बना सकते हैं। व्यक्तिगत योग्यता
अगर आप पत्रकारिता में करियर बनाना चाहते हैं तो आप में कुछ व्यक्तिगत गुणों का होना भी आवश्यक है, जैसे कम्युनिकेशन स्किल्स के साथ करंट अफेयर्स की जानकारी का होना। विचारों में निष्पक्षता, परिपक्वता व तार्किकता होना बहुत आवश्यक है। न्यूज और समसामयिक विषयों की अच्छी समझ होनी चाहिए। सूचनाओं को समझ कर उसे फौरन अपनी सटीक भाषा में लिखने व बोलने की कला आनी चाहिए। दूसरों की बातों को गंभीरतापूर्वक सुनें, क्योंकि अधूरी जानकारी की वजह से आपको आलोचना भी झेलनी पड़ सकती है। शैक्षणिक योग्यता
पत्रकारिता में बैचलर डिग्री के लिए न्यूनतम योग्यता 12वीं अथवा पोस्ट ग्रेजुएट पाठय़क्रम के लिए पत्रकारिता में स्नातक होना चाहिए। कुछ संस्थानों में पत्रकारिता में एक वर्षीय प्रमाण-पत्र पाठय़क्रम संचालित किए जाते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में बैचलर डिग्री और पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री जरूरी है। इसके बावजूद विशेष प्रशिक्षण अथवा फील्डवर्क और इंटर्नशिप से इस क्षेत्र में बेहतर अवसर बनाए जा सकते हैं। कौन-कौन से हैं कोर्स
मास कम्युनिकेशन में कई तरह के कोर्स उपलब्ध हैं। आप चाहें तो डिग्री या फिर डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स कर सकते हैं। कोर्सों के हिसाब से शैक्षिक योग्यता भी अलग-अलग निर्धारित है, लेकिन अधिकतर संस्थान न्यूनतम शैक्षिक योग्यता स्नातक ही मांगते हैं। इनमें मुख्य रूप से बैचलर डिग्री इन मास कम्युनिकेशन, पीजी डिप्लोमा इन ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म, एमए इन जर्नलिज्म, डिप्लोमा इन डेवलपमेंट जर्नलिज्म, डिप्लोमा इन कम्युनिकेशन, जर्नलिज्म एंड पब्लिक रिलेशन, पीजी डिप्लोमा इन मास मीडिया के अलावा डिप्लोमा व सर्टिफिकेट कोर्स भी उपलब्ध हैं। यहां इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि अध्ययन के लिए उस संस्थान का चयन करें, जहां आधुनिक तरीकों से प्रशिक्षण दिया जाता है। यह प्रशिक्षण ही इस क्षेत्र में सफलता का मार्ग तय करता है। कुछ संस्थान ऑनलाइन जर्नलिज्म के कोर्स अलग से भी कराते हैं। वेतन
जर्नलिज्म का क्षेत्र वेतन के लिहाज से भले ही बेहतर नहीं माना जाता हो, लेकिन प्रतिष्ठा के हिसाब से जरूर बेहतर माना जाता है। फिर भी प्रारंभिक चरण में अमूमन 10 हजार रुपए वेतन के रूप में मिलते हैं, जो तीन-चार साल का अनुभव और अच्छा काम होने पर बढ़ता जाता है। मामला प्रतिष्ठा का
पत्रकारिता के पेशे में जितनी प्रतिष्ठा है, उतनी जिम्मेदारी भी है। एक मायने में पत्रकार राष्ट्रीय विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। उसी के जरिए उसे समाज में घटने वाली रोजाना की घटनाओं की जानकारी मिलती है। पत्रकारिता का उद्देश्य लोगों को सूचना प्रदान कर शिक्षित करना तथा उन्हें आनंद बांटना है। इस क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा विशेष और पेशेवर तरीके से रिपोर्टिग जरूरी है। आमतौर पर पत्रकार विभिन्न क्षेत्रों, जैसे राजनीति, अपराध, वित्त, आर्थिक, खोज, सांस्कृतिक तथा खेल और मनोरंजन की दुनिया से संबंधित होते हैं। सकारात्मक व नकारात्मक पहलू
दूसरे क्षेत्रों की तरह ही पत्रकारिता के भी सकारात्मक व नकारात्मक पहलू हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में आपकी क्रिएटिविटी व मेहनत हमेशा दांव पर होती है, हर समय खुद को काम पर फोकस रखना होता है, वह भी निजी जिम्मेदारियों से ऊपर उठ कर। खबरों को ब्रेक देने में एक पत्रकार को दिन-रात की फिक्र नहीं करनी चाहिए। प्रोफेशन के लिए जोश के साथ काम करना होता है। फिलवक्त जन संचार को न्यू बिजनेस के तौर पर देखा जा रहा है, ऐसे में इस क्षेत्र में जॉब सेटिस्फैक्शन, नाम व प्रसिद्धि के साथ यह चुनौतीपूर्ण क्षेत्र बन गया है। एक्सपर्ट व्यू
आनंद प्रधान
(एसोसिएट प्रोफेसर-आईआईएमसी)बढ़ती साक्षरता एवं आय के साथ मीडिया प्रोडक्ट्स की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। पाठकों की संख्या बढ़ रही है। अखबारों के नये एडिशन लॉन्च हो रहे हैं। चैनल्स आ रहे हैं। एफएम रेडियो का विस्तार हो रहा है। निकट भविष्य में 850 से ज्यादा नये एफएम रेडियो चैनल्स खुलेंगे। सरकार जल्द ही एफएम रेडियो को समाचारों के प्रसारण की अनुमति दे सकती है। इसके अलावा, आज अलग-अलग विषयों पर पत्रिकाएं और समाचार पत्र लॉन्च हो रहे हैं, जैसे गार्डनिंग, होम मेकिंग, इंटीरियर डिजाइनिंग, स्पोर्ट्स वगैरह। अभी इनके एडिशन अंग्रेजी में ज्यादा हैं, जल्द ही हिन्दी और दूसरी भाषाओं में इनके एडिशन लॉन्च होंगे। वेब पोर्टल भी तेजी से उभर रहे हैं, यहां भी रोजगार की संभावनाएं बढ़ रही हैं यानी न्यू मीडिया के विस्तार से पत्रकारिता के क्षेत्र में अवसर निश्चित रूप से बढ़ रहे हैं। प्रमुख संस्थान
इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ मास कम्युनिकेशन,
नई दिल्ली
वेबसाइट:www.iimc.nic.inएजेके मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
वेबसाइट:www.ajkmcrc.org दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
वेबसाइट: www.du.ac.inमाखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल, मध्यप्रदेश
वेबसाइट: www.mcu.ac.inगुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा
वेबसाइट:www.gjust.ac.inएडिटवर्क्स स्कूल ऑफ मास कम्युनिकेशन, नोएडा
वेबसाइट:www.editworksindia.comएनआरएआई स्कूल ऑफ मास कम्युनिकेशन,
नई दिल्ली
वेबसाइट:www.nraismc.com नैम इंस्टीटय़ूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज, नई दिल्ली
वेबसाइट:www.namedu.net
01/22/13--23:27: मीडिया एथिक्स vs अजीत अंजुम (chan 7710543)
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मीडिया एथिक्स की परिभाषा के बारे में सोंचे जाने की जरूरत – अजीत अंजुम
Tuesday, 18 December 2012 11:01
Written by आनंद दत्त
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ajeet anjum managing editor bag films
अजीत अंजुम, मैनेजिंग एडिटर, न्यूज़24
अजित अंजुम देश के जाने-माने पत्रकारों में एक हैं। अपनी स्पष्टता और खामियों को खुले तौर पर स्वीकार करते हैं। सनसनी, पोल खोल, रेड अलर्ट और रोज़ाना जैसे चर्चित कार्यक्रमों के लिए वे जाने जाते हैं। फ़िलहाल न्यूज़ 24 चैनल के मैनेजिंग एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। प्रस्तुत हैं आनंद दत्त से मीडिया के मुद्दों पर उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश. (यह बातचीत मूलतः मॉस कॉम बज के लिए ली गयी थी)
क्या मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है?
बिल्कुल चौथा स्तम्भ है। लेकिन जैसे बाँकी तीन स्तंभों में कुछ खामियां पैदा हुई हैं, वैसे ही यहाँ भी हुई हैं। समाज के हर तबके में पतन हुआ है। चौथे खम्भे को आप देखेंगे की यह ऐसे लोगों के कन्धों पर टिका हुआ है जो तमाम तरह की खामियों से दूर होंगे, तो मुझे लगता है की ऐसा सोचना गलत होगा।
तो क्या सोचना सही होगा?
कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। हाँ, कई बार यह मुद्दों से भटकता हुआ दिखता है, लेकिन मीडिया बहुत कुछ ऐसे काम भी करता है जो वक्त की जरुरत है। सबसे ताजा मामला फेसबुक पर कमेन्ट को लेकर जिस तरह पालघर में दो लड़कियों की गिरफ़्तारी हुई और मीडिया ने उसके खिलाफ कैम्पेन चलाया, सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा।
बाकी तीन स्तंभों को उद्दयोग का दर्जा नहीं दिया गया है, जबकि मीडिया को ये मान्यता प्राप्त है|
वो इसलिए कि बाकी तीन सरकार के पैसे से चलते हैं, लेकिन मीडिया नहीं । उन तीनों स्तंभों के संचालन में सरकार का फंड है, लेकिन जवाबदेही नहीं है। मीडिया में अगर सरकार का पैसा है तो दूरदर्शन, लोकसभा और राज्यसभा टीवी आपके सामने है। लेकिन क्या वो आपके सारे पैमाने — काम करने का तरीका, पारदर्शिता, सरकार, सिस्टम, तमाम तरह की जो सामाजिक बुराईयाँ है उनपर चोट करना — पर यदि मीडिया की भूमिका देखते हैं तो क्या आपको लगता है की सरकार के ये चैनल वहाँ खरे उतरते हैं? एक न्यूज़ चैनल चलता है तो उसमे 500 से 600 करोड़ की पूंजी लगती है। 150 से 200 करोड़ साल भर का रनिंग कॉस्ट होता है। जब इतना पैसा आ रहा है तो पूंजी कॉरपोरेट से ही आएगा। तो उसके कुछ खतरे भी हैं। और अगर उन खतरों पर चलते हुए कुछ बेहतरी का रास्ता नहीं अख्तियार करेंगे तो फिर बंद कर देना चाहिए।
क्या यही एकमात्र रास्ता है?
क्योंकि कोई उपाय नहीं है। आप और हम चैनल शुरू नहीं कर सकते हैं। न ही ये सवाल उठाने वाले लोग 200 करोड़ का चैनल शुरू कर सकते हैं। ज़ाहिर है जहाँ पूंजी लगती है वहां कुछ खतरे भी होते हैं। लेकिन उन आशंकाओं के बावजूद यहाँ बहुत सवाल ऐसे भी उठते हैं जिससे जनता का भला भी होता है।
आज के माहौल में मीडिया एथिक्स की बात करना कहाँ तक उचित है?
एथिक्स की बात तो हमेशा होनी चाहिए। अगर हम सवाल खड़े नही करेंगे, ऐसे में यदि कोई गलती कर रहा है या गलती हो रही है, तो वह सही रास्ते पर नहीं आ सकता। लेकिन मुझे लगता है कि एथिक्स की परिभाषा के बारे में सोचे जाने की जरुरत है। जब कॉरपोरेट की पूंजी लग रही है तो अगर आप सौ फीसदी सुचिता की बात करेंगे तो मुझे नहीं लगता की वह लागू हो सकता है।
यानि कि इसका कोई उपाय नहीं है?
इसका कोई उपाय नहीं है। उसके लिए पूंजी, कॉरपोरेट और इतने बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर में जो पैसा लग रहा है वह जिम्मेवार है। आधे भरे ग्लास में यह आप पे निर्भर करता है कि आप उसे आधा भरा हुआ कहते है या आधा खाली।
कार्यपालिका, विधायिका और कभी कभी न्यायपालिका यदि गलती करती है तो मीडिया उसकी धज्जियाँ उड़ाने से बाज़ नहीं आता। मीडिया भी इसी रफ़्तार से गलतियाँ कर रहा है। कहाँ जाएँ लोग समाधान के लिए?
उसके लिए लीगल सिस्टम है, अदालत है, मानहानि का केस है। हर जगह मीडिया के खिलाफ केस चलते रहते हैं। ऐसा तो नहीं है की कोई किसी के खिलाफ कुछ भी छाप देगा, दिखा देगा, और उसके खिलाफ़ कार्रवाई नहीं होगी। कार्रवाई तो सिस्टम से ही होगी न।
बाल ठाकरे की मृत्यु मर मीडिया कवरेज की आलोचना करने वालों को आशुतोष ने कहा की वे टीवी के नेचर को नहीं समझ पा रहे हैं। आप कितना सहमत हैं?
बहुत हद तक। किसी चैनल, प्रोग्राम, टाइम स्लॉट का अध्ययन करने की परंपरा हमारे देश में नहीं है। ऐसे में मीडिया की जो आलोचना है वो बहुत ही साधारण किस्म की है। उस साधारण कमेन्ट में कई बार आपके पूर्वाग्रह भी होते हैं। और यह जरूरी नहीं कि आपका पूर्वाग्रह देश के तमाम दर्शकों का सच हो। अगर किसी आदमी की डेथ हुई है और उसमे बीस लाख लोग सड़क पर हैं, तो आप अपने नजरिये से बाल ठाकरे को ख़ारिज कर सकते हैं, लेकिन बीस लाख लोग सड़क पर हैं इस तथ्य को ख़ारिज नहीं कर सकते हैं। दूसरी बात, हमने कंट्रोवर्सिअल कवरेज भी किया। हमने तमाम तरह के सवाल उठाए कि शिवाजी पार्क में क्यों जगह दी गई दाह-संस्कार करने को? हमने उनके विवादित पहलु — हिटलर और इंदिरा की तारीफ़ पर सवाल उठाये। जिसने 40 साल अपने ढंग से राजनीति की उसपे तो बात होनी ही चाहिए।
अभी का जेनरेशन जो पत्रकार बन रही है और आप जिस समय बन रहे थे, उसमें फर्क कहाँ है?
अभी के जेनरेशन को एक्सपोजर ज्यादा मिल रहा है। फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग और ये गूगल ग्रैंडफादर तो हैं ही।
और क्वालिटी के तौर पर?
आज मीडिया करियर ऑप्शन है। बीस साल पहले नहीं था, ना मीडिया का विस्तार था। आज बहुत सारे मीडिया संस्थान हैं । पहले ये पता नहीं होता था कि हम किस रास्ते जाएंगे। लोग इसे रोजगार के लायक ही नहीं समझते थे। अब ऐसा नहीं है। नए लोगों में कुछ अच्छे हैं तो कुछ में जल्दबाजी है, जिसे मैं ठीक नहीं मानता हूँ।
01/22/13--23:31: 1990 के बाद ख़बरों का मिजाज बदला है (chan 7710543)
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Sunday, 16 November 2008 05:30
Written by पुष्कर पुष्प
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मीडिया ख़बर के संपादक पुष्कर पुष्प की आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष सेटेलीविज़न न्यूज़ चैनलों के वर्तमान स्वरूप और उससे जुड़े तमाम मुद्दों पर खास बातचीत ......
Ashutosh , Managing Editor , IBN 7
आशुतोष,मैनेजिंग एडिटर,आईबीएन-7
हिंदी न्यूज़ चैनलों के बारे में यह कहा जा रहा है किकंटेंट के नाम पर बहुत कुछ कूड़ा-कबाड़ा परोसा जा रहा है और कंटेंट का स्तर लगातारगिर रहा है। क्या आप कंटेंट के स्तर से संतुष्ट हैं ?
यह सही है कि हिंदी न्यूज़ चैनल्स पर बहुत कुछ ऐसा नहीं जाना चाहिए जो चला जाता है। लेकिन मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ कि हिंदी न्यूज़ चैनल्स एक तरह से रसातल में चला गया है। वहाँ पर कूड़ा-कबाड़ा दिखाया जा रहा है और कंटेंट पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मैं तो ऐसे तमाम लोगों को बताना चाहता हूँ कि टीवी चैनल्स में जो लोग हैं वो अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से वाकिफ हैं और अपना काम बखूबी कर रहे हैं। और ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जो टेलीविज़न और समाचार के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। टेलीविज़न चैनल्स ने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मुहिम चलायी। जिसके कारण बड़े-बड़े भ्रष्ट नेता, ब्यूरोक्रेट और पुलिसवाले रंगे हाथों घूस लेते पकड़े गए। ‘कोख के कातिल’ नाम से भ्रूण हत्या के खिलाफ भी टीवी चैनलों ने मुहिम चलाई जो अपने आप में बेमिसाल है।
न्यूज़ चैनल में से न्यूज़ का कंटेट कम होता जा रहा है औरइंटरटेनमेंट का हिस्सा बढ़ता जा रहा है। आप क्या इससे सहमत हैं?
जो लोग ऐसी बातें करते हैं मैं सिर्फ उनपर हँस सकता हूँ और यह कह सकता हूँ कि उनको न तो ख़बर की समझ है और न तमीज। ऐसी बातें करने वाले बदलते ख़बरों का मिजाज, उसका तेवर नहीं समझ रहे हैं। उनकी नज़र में आज भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या अटल बिहारी वाजपेयी का दिया बयान ख़बर है। अगर वो यह समझते हैं कि ख़बर है तो मुझे उनसे कोई तर्क नहीं करना है।
लेकिन कुछ हद तक यह आरोप सही भी है जो प्राईमचैनल हैं उनपर प्राईम टाईम में नेट जियो के फूटेज़ दिखाए जाते हैं। ब्रेकिंग न्यूज़के नाम पर रजत शर्मा जैसे बड़े पत्रकार श्मशान लाईव पर ले जाते हैं और राखी-मीका काप्रकरण छाया रहता है।
नहीं, ऐसा नहीं है। इक्का-दुक्का ऐसा होता है पर पुरी तरह से ऐसा नहीं है। इसके आधार पर आप यह नहीं कह सकते है कि ख़बरें दिखायी ही नहीं जाती। रही बात राखी-मीका प्रकरण की तो क्या यह ख़बर नहीं है। एक लड़की के साथ जर्बदस्ती कोई पूरी मीडिया के सामने ‘किस’ करेगा तो वह ख़बर नहीं है क्या ? चर्चा का विषय नहीं है क्या ? मैं फिर कह रहा हूँ कि इस देश में कुछ ऐसे कुंठित लोग है जिनको राखी और मीका के मामले में भी समस्या है। ऐसे लोग कुछ चीजों को केवल सेक्स और भोग की ही दृष्टि से देखते हैं। यह हमारी दृष्टि में दोष है कि हमको राखी में केवल एक सेक्स आईटम गर्ल का रूप नज़र आता है और मीका के प्रकरण को टेलीविजन में हम बेचने की चीज़ समझते हैं।
स्टार न्यूज़ और आजतक जैसे बड़े न्यूज़ चैनलों परपिछले दिनों प्राईम टाईम में नेट जियो के पुराने फूटेज़ दिखाए गए और फिर बार-बारउनको लगातार दुहराया गया।
मैं आपसे पूछता हूँ कि नेट जियो ख़बर नहीं है क्या ? ख़बरों का मिजाज बदल गया है और ख़बरों के मायने भी। ये चीजें टीवी के उन तमाम आलोचकों को समझनी पड़ेगी।
तब फिर दर्शक न्यूज़ चैनल क्यों देखे।वह नेट जियो ही क्यों न देखें।
पिछले कुछ समय मे खासकर 1990 के आर्थिक सुधारों के बाद ख़बरों का मिजाज तेजी से बदला है। लोग अब मनमोहन सिंह को नहीं देखना चाहते। यह बात वो पत्रकार नहीं समझते जो नैतिकता का लबादा ओढ़ कर जी रहे है और जिनको टेलीविज़न न्यू जर्नलिज्म ने रिजेक्ट कर दिया है। यही लोग टेलीविज़न चैनलों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। पर वास्तविकता में इनको ख़बर की समझ नहीं है। उनको यह समझ में नहीं आता कि ख़बरों की दुनिया में बीपीओ, सॉफ्टवेयर एक नयी इंडस्ट्री है। बिज़नेस जर्नलिज्म बिल्कुल बदल गया है। अजीम प्रेमजी आज एक बहुत बड़ी ख़बर है। उनको समझ में नही आता कि मुकेश अंबानी जब कुछ कहते हैं तो उससे करोड़ो इंवेस्टर का फायदा-नुकसान होता है और उनके कुछ कहने का बहुत बड़ा मतलब होता है। अभी आपने भागलपुर वाली घटना देखी होगी जिसमें एक लड़के को पीटा जा रहा था। कल ये ख़बरे नहीं हुआ करती थी पर आज यह ख़बर है। आपके लिए यह ख़बर लोकल लग सकती है पर हमारे लिए यह राष्ट्रीय ख़बर है क्योंकि हमारा दर्शक वहाँ बैठा है। आईबीएन-7 की पहुँच कश्मीर से कन्याकुमारी तक है। इसलिए हमारे लिए लोकल और नेशनल दोनों तरह की ख़बरें दिखाना जरूरी है।
मेगसेसे सम्मान प्राप्त पत्रकार पी साईनाथ ने अपने एक बयान मेंकहा कि भारतीय मीडिया सिर्फ उपर के पाँच प्रतिशत हाई प्रोफाईल लोगों को ही कवरेजदेती है ? क्या आप इससे सहमत हैं ?
पी. साईनाथ बहुत बड़े पत्रकार हैं पर उनकी यह बात प्रेस के संदर्भ में ठीक है। टाईम्स ऑफ़ इंडिया और अंग्रेजी के दूसरे अख़बारों के बारे में उन्होंने कहा होगा। आज की तारीख में टेलीविज़न पांच प्रतिशत के बारे में बात नहीं करता बल्कि वह 95 प्रतिशत के बारे में बात करती है। इसीलिए यह पांच प्रतिशत वाले लोग टेलीविज़न से नाराज रहते हैं। यदि कल अपने टीवी चैनल पर हम न्युक्लियर पॉलिसी पर तीन घंटे का प्रोग्राम कर दे और तमाम विद्वानों को बिठा दें तो लोगों को लगेगा कि यह बहुत बड़ा चैनल हो गया है। पर हकीकत यह है कि उसको दक्षिण दिल्ली के छोटे-मोटे अपने आप को प्रबुद्ध समझने वाले कुछ लोग देखेंगे। इंदौर के दर्शकों की भारत की न्युक्लियर पॉलिसी के बारे में जानने की उतनी अधिक अभिरूची नहीं होगी। हाँ यह जरूर हो सकता है कि वह इसपर छोटी जानकारी चाहता हो। उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण अपने मोहल्ले, शहर की ख़बर है।
पर यदि बीबीसीरेडियो के न्यूज़ बुलेटिन को देखें तो उसमें राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय और गंभीरमुद्दों वाले समाचार होते हैं फिर भी वह इतना लोकप्रियहै.
पिछले दिनों में बीबीसी को लोकप्रियता काफी घटी है। सर्वेक्षण से यह बात सामने आयी है। पहले मैं भी बीबीसी सुनता था अब नहीं सुनता हूँ। वैसे भी बीबीसी एक ब्रांड है। हमारे टेलीविज़न न्यूज़ चैनलों की उम्र सिर्फ 6-7 साल की है, फिर भी टीवी चैनलों ने काफी काम किया है और कुछ ऐसे ब्रांड भी बन गए हैं जो घर-घर में डालडा की तरह बिक रहे हैं।
अंग्रेजी और हिंदी न्यूजचैनलों के कंटेट और उसके प्रस्तुतीकरण के तरीके में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलताहै? क्या यह जायज है कि सीएनएन . आईबीएन कुछ और दिखाए और आई बीएन-7 कुछ और ?
यही तो हमे समझना होगा कि सीएनएन-आईबीएन अंग्रेजी का न्यूज़ चैनल है और आईबीएन - 7 हिंदी का। हिंदी और अंग्रेजी बोलने वालों की सोच, समझ और उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग होती है। यह दो बिल्कुल अलग-अलग दुनिया है। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि आईबीएन-7 की जो हेडलाईन हो वह सीएनएन-आईबीएन की भी हो।
अभी बहुत सारे नए न्यूज़ चैनल आ रहे हैं या आनेवाले हैं।ऐसे में अगले पांच वर्षों में टीवी इंडस्ट्री और उसमें भी ख़ासकर हिंदी न्यूज़इंडस्ट्री को आप कहाँ देखते हैं?
देखिए, दो चीजें बिल्कुल साफ होगी। पहले तो कुकुरमुत्ते की तरह से खुल रहे न्यूज़ चैनलों मे से कुछ बंद हो जाएंगे और वही चैनल बचे रहेगे जिनका अपना नेटवर्क होगा और जिनको यह पता होगा कि खबरों को किस दिशा में ले जाना है। दूसरी चीज यह होगी कि टीवी चैनल राष्ट्रीय से होकर बहुत लोकल हो जाएँगें।
आपने सुरेन्द्र प्रताप सिंह के साथ काम किया है। उनकीटेलीविज़न न्यूज़ चैनलों और उसकी ख़बरों को लेकर एक सोच थी। उस सोच के साथ आज कान्यूज़ चैनल कहीं मिलता है?
एसपी बदलाव के पक्षधर थे और बदलाव को जीवन का हिस्सा मानते थे। यदि आज वे होते तो टेलीविज़न आज जिस मुकाम पर खड़ा है उसे देखकर बहुत खुश होते । जब वे आजतक में आए तो उन्होंने ख़बरों का कलेवर ही बदल दिया और उसे बिल्कुल ही नए अंदाज में पेश किया। यह नएपन की तलाश ही उनकी छटपटाहट थी और असल में उनका विज़न भी यही था। जैसा कि आज का न्यूज़ चैनल कर रहा है।
कुछ समयपहले ‘हंस’ ने टेलीविज़न न्यूज़ चैनल पर आधरित अपना विशेषांक निकाला था और उसमेंप्रकाशित कहानियाँ इसी इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने लिखी थीं। सारी कहानियों का सारदेखें तो ऐसा लगता है कि न्यूज़ चैनलों की दुनिया बेहद खराब, गंदी और क्रूर है औरयहाँ पर बहुत अध्कि शोषण होता है?
यह एक ऐसी इंडस्ट्री है जो खुद अपने अंदर झांकने का बूता रखती है और उसके अंदर क्या कमजोरियाँ है उसको वो बेबाकी से लिखती है। कितने अख़बार के दफ्रतरों में काम करने वाले पत्रकारों ने या अन्य तबके के लोगों ने अपने अंदर झांक कर लिखी है ऐसी कहानियाँ। कम से कम टीवी के लोगों में इतना साहस तो है। इस साहस का तो सम्मान होना चाहिए। अन्य माध्यमों की तुलना में टीवी में सबसे ज्यादा खुलापन, सबसे ज्यादा लोकतंत्र और सबसे ज्यादा आजादी है।
आप ‘आजतक’ छोड़कर आईबीएन-7 में एक नयी सोच के साथ आए थे। अब जबकिकाफी समय बीत चुका है और जिस सफर पर आप आईबीएन के साथ निकले थे उसमें कितने कामयाबहुए।
मैं यह नहीं कह सकता कि मैं सौ प्रतिशत कामयाब हुआ। हाँ लेकिन इतना जरूर है कि एक नए तेवर का चैनल आज लोगों के बीच है। एक ऐसे तेवर का चैनल जो किसी से नहीं डरता और जो अपनी बात रखने के लिए दोबार नहीं सोचता है। यही कारण है कि आईबीएन 7 पर सबसे ज्यादा लीगल केस हैं।
पर आपको यह नही लगता किआईबीएन 7 भी उसी रास्ते पर चल पड़ा है जिसपर बाकी के न्यूज़ चैनल चल रहे हैं। यानिटीआरपी के लिए अँधाधुंध दौड़..
नही , ऐसा नही है। यह किसी की व्यक्तिगत राय हो सकती है। इसमें मैं कुछ नहीं कर सकता।
तो क्या आपइस बात से इंकार करते हैं कि टीआरपी आपके लिए मायने नहीं रखता।
टीआरपी बिल्कुल मायने रखता है जो यह कहता है कि टीआरपी मायने नहीं रखता मैं उसकी सोच पर हँसता हूँ।
तो फिर आखिर यह टीआरपी चीज क्या है ?
यह तो मैं भी नहीं समझ पाया (हँसते हुए), मैं आपको क्या बताऊँ? कह सकते हैं कि टीआरपी आपकी लोकप्रियता का एक पैमाना है। आखिर इसमें बुराई क्या है ?
परयह लोकप्रियता का पैमाना कैसे हो सकता है? जबकि इसके पैमाने का आधार ही बहुत छोटाहै।
है यह एक पैमाना। फिलहाल इसका कोई विकल्प नहीं। कोई दूसरा आ जाएगा तो इसकी जगह ले लेगा। और फिर उसके हिसाब से चीजें तय होंगी।
तो आपटीआरपी के इस पैमाने से पूरी तरह सहमत नहीं है ?
मैं बिलकुल आपकी बात से सहमत हूँ। पर अभी के समय में टीआरपी एक पैमाना है और इसे झुठलाया नहीं जा सकता। आप उससे सहमत होइये या नहीं होइये। यह एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है।
01/22/13--23:35: RNI / भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का कार्यालय (chan 7710543)
सिटीजन चार्टर
आदर्शोक्ति
आर.एन.आई. की आदर्शोक्ति ‘हमारी वचनबद्धता, बेहतर सेवा’है, तथा आर.एन.आई अपने दावा धारकों को सर्वोत्तम उपलब्ध सेवा मुहैया कराने में सतत प्रयासरत है ।
हमारा लक्ष्य
हमारा लक्ष्य प्रत्येक समाचारपत्र अथवा कोई अन्य आवधिक प्रकाशित करने वाले प्रकाशक या भावी प्रकाशक को तत्पर तथा कार्यकुशल सेवा मुहैया कराना है । सेवा मुहैया कराते समय हमारा उद्देश्य पूर्ण पारदर्शिता के वातावरण में शिष्टाचार तथा विवेक के साथ तत्परता एवं कुशलता का संयोजन है ।
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हमारा दृष्टिकोण, दिन-प्रतिदिन के कार्यों में आईसीटी के प्रयोग के माध्यम से आर.एन.आई. को पूर्णतया आधुनिक कार्यालय बनाने का है जहां दावा धारक कार्यालय का दौरा किए बिना सभी सेवाएं ऑन लाइन प्राप्त कर सकें । हमारा दृष्टिकोण पीआरबी ऐक्ट के ढाँचे के अंतर्गत दावा धारकों को पूर्ण संतुष्टि के साथ समय पर सेवाएं उपलब्ध कराना है ।
हमारी गतिविधियां
आर.एन.आई. द्वारा निम्न सेवाएं प्रदान की जाती हैं:
1 शीर्षक सत्यापन
2 समाचारपत्रों का पंजीयन
3 संशोधित/दोहरा प्रमाणपत्र जारी करना
4 समाचारपत्रों तथा आवधिकों के प्रसार दावों की जांच
5 अखबारी कागज के आयात के लिए पंजीयन प्रमाणपत्र का अधिप्रमाणन
6 प्रिंटिंग मशीनरी/सामग्री के आयात के लिए अनिवार्यता प्रमाणपत्र जारी करना
7 एफसीआरए लाभ के लिए “समाचारपत्र नहीं संबंधी प्रमाणपत्र ”जारी
करना ।
समाचारपत्र शुरू करना
प्रथम चरण: शीर्षक सत्यापन
भावी आवेदक को उस क्षेत्र के जिला मजिस्ट्रेट के पास अपना आवेदन जमा करना होगा जहाँ से वह समाचारपत्र का प्रकाशन करना चाहता है जिसमें वह प्रस्तावित शीर्षक अथवा शीर्षकों सहित प्रस्तावित समाचारपत्र का विवरण देते हुए जिला मजिस्ट्रेट आर.एन.आई. से शीर्षक सत्यापित करवाने का अनुरोध करेगा । आवेदन का आरूप आर.एन.आई. की वेबसाइट www.rni.nic.inसे डॉउनलोड कर सकते हैं ।
दूसरा चरण: घोषणापत्र
आर.एन.आई. से शीर्षक सत्यापन पत्र (यह पत्र आर.एन.आई. की वेबसाइट से भी डॉउनलोड किया जा सकता है) प्राप्त करने के बाद मुद्रक/प्रकाशक को अधिप्रमाणन के लिए जिला मजिस्ट्रेट के पास घोषणा पत्र दाखिल करना होगा । घोषणा फार्म-1 में (समाचारपत्रों का पंजीयन (केन्द्रीय) नियम,1956 की अनुसूची में नियम 3 देखें) की जानी अपेक्षित है । फार्म की प्रतियॉं जिला मजिस्ट्रेट के पास उपलब्ध हैं तथा इसे आर.एन.आई. की वेबसाइट से भी डॉउनलोड किया जा सकता है ।
तीसरा चरण: प्रथम अंक
समाचारपत्र का प्रथम अंक जिला मजिस्ट्रेट के पास अधिप्रमाणन के लिए दाखिल किए गए घोषणापत्र की तारीख से छह सप्ताह के भीतर प्रकाशित करना होगा यदि प्रकाशन साप्ताहिक या इससे अधिक है । किसी अन्य आवधिकता के मामले में प्रथम अंक का प्रकाशन घोषणा पत्र के अधिप्रमाणन के तीन महीने के भीतर किया जाना है ।
चौथा चरण: पंजीयन के लिए आवेदन
पंजीयन के लिए आवेदन आर.एन.आई. की वेबसाइट में उपलब्ध आरूप में किया जाना है जिसके साथ (i) शीर्षक सत्यापन पत्र (ii) अधिप्रमाणित घोषणापत्र (iii) यथा नोटरीकृत 10रू0 के गैर-अदालती स्टाम्प पेपर पर “विदेशी गठबंधन नहीं ”संबंधी शतथपत्र (आर एन आई की वेबसाइट पर नमूना उपलब्ध है) (iv) घोषणापत्र के अधिप्रमाणन के बाद प्रकाशित प्रथम अंक तथा आवेदन करते समय का नवीनतम अंक (v) निर्धारित फार्म (आर.एन.आई.की वेबसाइट में उपलब्ध) में विषयवस्तु की जानकारी/पुष्टि (vi) यदि स्वामी, प्रकाशक और मुद्रक से भिन्न है तो प्रकाशन के पत्र-शीर्ष पर प्रकाशक/मुद्रक की नियुक्ति का उल्लेख करते हुए एक प्रमाण पत्र ।
पंजीयन प्रमाणपत्र का गुम होना- डुप्लिकेट प्रमाणपत्र
जब मूल पंजीयन प्रमाण पत्र गुम, खराब अथवा चोरी हो जाता है तथा यदि उपरोक्त कोई भी परिस्थिति विद्यमान नहीं होने पर (प्रकाशक/मुद्रक इत्यादि में बदलाव के कारण) जहां एक नया घोषणापत्र आवश्यक हो, डुप्लिकेट पंजीयन प्रमाण पत्र जारी करने के लिए प्रेस पंजीयक के पास आवेदन करना होगा । इस संबंध में पुलिस अधिकारी के स्टाम्प/सील सहित प्राथमिकी अथवा शिकायत पत्र की प्रति जैसा पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य अनिवार्य है, जिससे यह साबित हो कि मामले की रिपोर्ट संबंधित पुलिस प्राधिकारी को कर दी गई है । इस उद्देश्य के लिए आवश्यक दस्तावेज निम्न हैं :
(क) नोटरी अथवा संबंधित मजिस्ट्रेट द्वारा यथा अधिप्रमाणित एक शपथ पत्र उनके हस्ताक्षर तथा कार्यालयी सील सहित
(ख) संबंधित मजिस्ट्रेट द्वारा अधिप्रमाणित नवीनतम घोषणापत्र की सत्यापित फोटोकॉपी ।
(ग) सही इंप्रिंट लाइन वाले प्रकाशन के नवीनतम अंक की एक प्रति ।
(घ) डी.डी.ओ, आर.एन.आई. के पक्ष में 5रू0 का पोस्टल आर्डर ।
(ङ) यथा नोटरीकृत 10रू0 के गैर-अदालती स्टाम्प पेपर पर निर्धारित आरूप (आर.एन.आई.वेबसाइट पर उपलब्ध ) में “विदेशी गठबंधन नहीं ”संबंधी शपथपत्र ।
समापन? बंद करने संबंधी घोषणापत्र दाखिल करना
यदि घोषणा मजिस्ट्रेट द्वारा अधिप्रमाणित किए जाने के बाद, जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, कोई व्यक्ति समाचारपत्र का मुद्रक अथवा प्रकाशक नहीं रहता है तो उसे मजिस्ट्रेट (जिला, प्रेसिडेंसी अथवा उप-मंडल) के समक्ष उपस्थित होना होगा और निम्न विवरण दोहरी प्रति में देना होगा :
मैं,...................घोषणा करता हूँ कि मैने................शीर्षक के समाचारपत्र के मुद्रक अथवा प्रकाशक (अथवा मुद्रक तथा प्रकाशक) का पद छोड़ दिया है ।
प्रसार दावों का सत्यापन
प्रसार दावों का सत्यापन आर.एन.आई. द्वारा चैनलबद्ध चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्मों के माध्यम से करवाया जाता है । यह जांच केवल उन समाचारपत्रों/आवधिकों के लिए की जाती है जिन्होंने प्रतिदिन 75,000 प्रतियों से अधिक के प्रसार दावे किए हों । यह स्कीम आर.एन.आई. की वेबसाइट पर उपलब्ध है ।
अखबारी कागज के आयात के लिए पात्रता प्रमाणपत्र
भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक के साथ पंजीकृत समाचारपत्र/आवधिक के प्रकाशक/स्वामी को अखबारी कागज (स्टैंडर्ड/ग्लेजड) के आयात के लिए पात्रता प्रमाणपत्र प्राप्त करने हेतु निम्न दस्तावेज जमा करने होंगे :-
(क) प्रकाशक/स्वामी द्वारा आवेदन विधिवत् रूप से भरा तथा हस्ताक्षरित हो।
(आर एन आई की वेबसाइट www.rni.nic.in पर नमूना उपलब्ध)
(ख) चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा यथा प्रमाणित तथा नोटरी पब्लिक द्वारा सत्यापित पिछले वित्तीय वर्ष की वार्षिक विवरणी की फोटोप्रति ।
(ग) मूल में प्रकाशक/स्वामी द्वारा यथा हस्ताक्षरित तथा चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा प्रमाणित पिछले वित्तीय वर्ष के लिए अखबारी कागज के आयात तथा खपत संबंधी वार्षिक विवरणी।
(घ) भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का कार्यालय द्वारा जारी पंजीयन प्रमाणपत्र की दो फोटोप्रतियां ।
(ङ) प्रकाशन की 12 प्रतियां अर्थात् प्रकाशन के नवीनतम अंक के साथ पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान प्रत्येक माह की प्रकाशित प्रति ।
(च) गत दो वर्षों के दौरान अखबारी कागज की खपत संबंधी शपथपत्र ।
(आर.एन.आई. की वेबसाइट www.rni.nic.in पर नमूना उपलब्ध)
मुद्रण मशीनरी के आयात के लिए अनिवार्यता प्रमाणपत्र
(क) विधिवत् रूप से भरा आवेदन पत्र (नमूना आर.एन.आई. की वेबसाइट
www.rni.nic.inपर उपलब्ध है) ।
(ख) मूल में आपूर्तिकर्त्ता द्वारा सील के साथ यथा हस्ताक्षरित अथवा राजपत्रित अधिकारी/नोटरी द्वारा यथा सत्यापित मशीनरी तथा मूल्य के
विवरण दर्शाने वाले बीजक ।
(ग) मशीनरी या उपस्कर के आयात संबंधी औचित्य।
(घ) प्रत्येक प्रकाशन की एक प्रति जहां मशीनरी या उपस्कर स्थापित किया
जाना है ।
(ड) मूल में आपूर्तिकर्त्ता द्वारा जारी संस्थापन प्रमाणपत्र यदि उसे भारत के
समाचारपत्रों के पंजीयक का कार्यालय द्वारा जारी प्रमाण पत्र के आधार
पर आयात किया गया हो ।
‘समाचारपत्र नहीं’संबंधी प्रमाणपत्र
भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक द्वारा पंजीकृत प्रकाशन के प्रकाशक/स्वामी को गृह मंत्रालय के साथ एफ सी आर ए पंजीकरण के लिए
“समाचारपत्र नहीं”संबंधी प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए निम्न दस्तावेज जमा करवाने होंगे :-
(क) प्रकाशक/स्वामी द्वारा हस्ताक्षरित तथा विधिवत् रूप से भरा आवेदन प्रपत्र (नमूना आर.एन.आई. की वेबसाइट www.rni.nic.inपर उपलब्ध है) ।
(ख) प्रकाशन की विषय वस्तु से संबंधित शपथपत्र जो प्रकाशक/स्वामी द्वारा विधिवत् रूप से हस्ताक्षरित तथा संबंधित प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित हो ।
(ग) गृह-मंत्रालय द्वारा जारी उस पत्र की फोटोप्रति जिसमें भाषा, आवधिकता तथा प्रकाशन स्थल के साथ प्रकाशन का नाम समाविष्ट हो तथा उसमें यह भी उल्लेख हो कि प्रेस एवं पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1867 की धारा 1(1) के अंतर्गत भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक का कार्यालय से प्रमाणपत्र प्राप्त किया जाए ।
(घ) प्रकाशन के चार नवीनतम अंक ।
वार्षिक रिपोर्ट- प्रेस इन इंडिया
पी आर बी ऐक्ट की धारा 19 जी के अंतर्गत आर.एन.आई. एक रिपोर्ट तैयार कर उसे सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार को जमा करे। “प्रेस इन इंडिया ”नामक रिपोर्ट प्रत्येक वर्ष 31 दिसम्बर तक जमा की जाए । रिपोर्ट पी आर बी ऐक्ट की धारा 19 ई के अंतर्गत प्रकाशकों द्वारा जमा करवाई गई वार्षिक विवरणियों के आधार पर तैयार की जाती है । यह रिपोर्ट देश में राज्य-वार,भाषा-वार तथा आवधिकता-वार प्रिंट मीडिया की स्थिति को दर्शाती है । रिपोर्ट में स्वामित्व पैटर्न भी दर्शाया जाता है ।
शिकायत निवारण तंत्र
आर.एन.आई. कार्यालय के शिकायत अधिकारी का पता है:
श्री नरेन्द्र कौशल
उप प्रेस पंजीयक
आर.एन.आई कार्यालय, पश्चिमी खंड-8,
स्कंध-2, रामकृष्णपुरम,
नई दिल्ली-110066
दूरभाष: 011-26106251
यदि कोई व्यक्ति आर.एन.आई. कार्यालय की किसी सेवा से संतुष्ट नहीं है या कार्यालय की किसी कार्रवाई या चूक से दु:खी है तो वह अपनी शिकायतों का निवारण शिकायत अधिकारी के माध्यम से पा सकता/सकती है । ऐसा प्रत्येक व्यक्ति शिकायत अधिकारी द्वारा प्राप्त शिकायत के 30 दिनों के भीतर उसकी शिकायत पर की गई कार्रवाई के बारे में सूचना पाने का/की हकदार है ।
यदि जन साधारण/प्रकाशक अपनी शिकायतों के संबंध में शिकायत अधिकारी से मिलना चाहते हैं तो वे इस कार्यालय में प्रत्येक बुधवार (कार्य दिवस) को अपराह्न 03.00 बजे से 05.00 बजे के बीच बिना कोई पूर्व नियुक्ति समय लिए मिल सकते हैं ।
अपनी शिकायतों के संबंध में वे प्रेस पंजीयक से भी मिल सकते हैं ।
यदि शिकायतकर्ता आर.एन.आई. के शिकायत अधिकारी/प्रेस पंजीयक के जवाब से संतुष्ट नहीं है तो वह इस मामले को सूचना और प्रसारण मंत्रालय के शिकायत अधिकारी,जिनका विवरण नीचे दिया गया है,को भेज सकता/सकती है ।
श्री वी.बी.प्यारेलाल,
संयुक्त सचिव (नीति एवं लोक शिकायत)
सूचना और प्रसारण मंत्रालय,
शास्त्री भवन, नई दिल्ली,
पिन कोड 110001
यदि कोई व्यक्ति आर.एन.आई. द्वारा मुहैया कराई गई सेवाओं की बेहतरी के लिए कोई सुझाव देना चाहे तो वह उपरोक्त पते पर शिकायत अधिकारी को भेज सकता/सकती है या स्वागत कक्ष में रखी सुझाव पेटी में डाल सकता/सकती है या (1) prrni@nic.in(2)dprrni@nic.inपर ई-मेल कर सकता/सकती है ।
इलैक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध सूचना
आर.एन.आई की वेबसाइट में शीर्षक सत्यापन, पंजीयन इत्यादि संबंधी मूल जानकारी दी गई है । प्रक्रिया संबंधी औपचारिकताएं तथा प्रपत्र भी उपलब्ध
हैं । भावी प्रकाशक वेबसाइट के माध्यम से प्रस्तावित समाचारपत्र के नाम (शीर्षक) की उपलब्धता की जॉंच कर सकते हैं । शीर्षक सत्यापन हेतु आवेदन जमा करने के उपरान्त वह इस साइट से अपने आवेदन की स्थिति-जॉच कर सकता/सकती है। इस साइट पर पंजीकृत शीर्षक भी दर्शाए गए हैं ।
सूचना प्राप्त करने हेतु नागरिकों के लिए उपलब्ध सुविधा
वेबसाइट : www.rni.nic.in
निम्न सूचना उपलब्ध है:
(क) सत्यापित शीर्षकों की सूची
(ख) पंजीकृत समाचारपत्रों की सूची
(ग) प्रेस इन इंडिया की विशेषताएं
(घ) पी आर बी ऐक्ट, 1867
(ङ) केन्द्रीय नियम
(च) फॉर्म/प्रपत्र
(छ) शीर्षक सत्यापन हेतु आवेदन की स्थिति
(ज) प्रकाशकों को दिशा-निर्देश
(झ) विज्ञप्तियां
(ञ) वार्षिक विवरणी जमा करने हेतु पता सूची
(ट) सिटीजन चार्टर
(ठ) प्रकाशक के कर्त्तव्य
(ड) शिकायत निवारण
(ढ) पंजीयन हेतु जांच सूची
(ण) शीर्षक/पंजीयन संबंधी विसंगति पत्र
(त) डी-ब्लॉक किए गए शीर्षकों की सूची
(थ) प्रसार जांच के लिए योजना
(द) आर टी आई ऐक्ट,2005
बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न (एफ ए क्यू ) तथा उनके उत्तर
आर एन आई में किन प्रकाशनों को पंजीकृत करवाया जाना आवश्यक है?
पी आर बी ऐक्ट,1867 के नियम 5 के अनुसार भारत में प्रकाशित किसी भी समाचार पत्र का प्रकाशन अधिनियम में दिए गए नियमों के इतर नहीं किया जाएगा । एक समाचारपत्र से अभिप्राय है- “कोई भी मुद्रित आवधिक कार्य जिसमें जन समाचार या जन समाचारों पर टिप्पणी समाविष्ट हो । ” अत: समाचार पत्र की इस श्रेणी में आने वाला कोई भी प्रकाशन आर.एन.आई. में पंजीकृत करवाया जाना आवश्यक है ।
समाचारपत्र कैसे शुरू करें ?
समाचार पत्र शुरू करने के पहले चरण में आर.एन.आई. से शीर्षक (प्रस्तावित समाचारपत्र का नाम) सत्यापित करवाया जाना अपेक्षित है । इसके लिए प्रकाशक शीर्षक सत्यापन के लिए आवेदन ( आरूप आर.एन.आई. की वेबसाइट पर उपलब्ध ) करेगा जिसमें प्रस्तावित समाचारपत्र का नाम, भाषा, आवधिकता, स्वामी का नाम तथा प्रकाशन स्थल दिए गए हों एवं इस आवेदन को संबंधित जिला मजिस्ट्रेट के पास जमा करेगा । जिला मजिस्ट्रेट आवेदक की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के उपरान्त आवेदन आर.एन.आई. को प्रेषित करेगा जो शीर्षक की उपलब्धता की जांच करता है । आर.एन.आई.शीर्षक सत्यापन/शीर्षक अस्वीकृति पत्र के द्वारा जिला मजिस्ट्रेट तथा प्रकाशक को शीर्षक की उपलब्धता/अनुपलब्धता के बारे में सूचित
करेगा । शीर्षक आवेदन पर निर्णय आर.एन.आई. में शीर्षक आवेदन प्राप्ति के 15 दिनों के भीतर लिया जाता है । तदोपरान्त, प्रकाशक जिला मजिस्ट्रेट के पास निर्धारित आरूप (www.rni.nic.inपर उपलब्ध) में घोषणापत्र दाखिल करेगा और फिर प्रकाशन शुरू कर सकता है । यदि समाचारपत्र दैनिक या साप्ताहिक है तो घोषणा के प्रमाणीकरण के 42 दिनों के भीतर समाचारपत्र का प्रथम अंक मुद्रित किया जाना चाहिए तथा अन्य आवधिकों के मामले में 90 दिनों के भीतर । आर.एन.आई. को पंजीयन के लिए आवेदन (www.rni.nic.inपर उपलब्ध आरूप ) घोषणापत्र की अनुप्रमाणित प्रति, शीर्षक सत्यापन की प्रति, समाचारपत्र के प्रथम अंक और नोटरी द्वारा विधिवत् रूप से अनुप्रमाणित ‘विदेशी गठबंधन नहीं ’संबंधी शपथपत्र के साथ जमा किया जा सकता है । समाचारपत्र में अंक संख्या, वर्ष संख्या तथा शीर्षक आवरण पृष्ठ एवं सभी पृष्ठों पर स्पष्ट अक्षरों में प्रदर्शित होना चाहिए । शीर्षक आर.एन.आई.द्वारा अनुमोदन किए अनुसार ही मुद्रित किया जाना चाहिए, डेट लाइन तथा पृष्ठ संख्या सभी पृष्ठों पर हो, इंप्रिट लाइन में मुद्रक का नाम, प्रकाशक, स्वामी तथा संपादक, प्रकाशन स्थल का पूरा पता एवं मुद्रण प्रेस का नाम व पता दर्शाया गया हो । शीर्षक सत्यापन के उपरान्त पंजीयन हेतु घोषणापत्र दाखिल करने के बाद निकाला गया अंक, अंक-1 वर्ष-1 होगा । प्रत्येक वर्ष पूरा होने पर वर्ष बदल जाएगा । यदि मुद्रक और प्रकाशक भिन्न व्यक्ति हैं तो जिला मजिस्ट्रेट के पास अलग-अलग घोषणापत्र दाखिल किया जाना आवश्यक है । यदि स्वामी एवं प्रकाशक भिन्न हैं तो स्वामी द्वारा संबंधित व्यक्ति को प्रकाशक प्राधिकृत करते हुए समाचारपत्र के पत्र शीर्ष पर एक प्रमाणपत्र देना आवश्यक है । पंजीयन हेतु सभी प्रकार से पूर्ण आवेदन की आर.एन.आई. में प्राप्ति के 30 दिनों के भीतर निर्णय लिया जाता है तथा प्रकाशक को पंजीयन प्रमाणपत्र जारी किया जाता है ।
पंजीयन उपरान्त क्या-क्या औपचारिकताएं आवश्यक हैं?जब भी समाचारपत्र प्रकाशित किया जाता है उसकी एक प्रति आर.एन.आई. को भेजी जानी चाहिए । फरवरी माह के अन्तिम दिन के बाद के अंक में विधिवत् रूप से भरा हुआ प्रपत्र संख्या-IV होना चाहिए (समाचारपत्र के स्वामित्व तथा अन्य विवरण संबंधी विवरणी। आर.एन.आई. की वेबसाइट पर नमूना उपलब्ध है) । प्रपत्र-II (www.rni.nic.in पर उपलब्ध आरूप ) में वार्षिक विवरणी (वित्तीय वर्ष के आधार पर 01 अप्रैल से 31 मार्च तक) जमा करना भी आवश्यक है । वार्षिक विवरणी आर.एन.आई. में प्रत्येक वर्ष 01 अप्रैल से 30 मई के दौरान जमा की जानी चाहिए । दैनिक समाचारपत्रों के मामले में एक अतिरिक्त प्रपत्र एआर-4 (संलग्नक-X) भी जमा किया जाए ।
नया घोषणापत्र कब दाखिल करें?
जब भी प्रकाशक, मुद्रक, स्वामी, आवधिकता एवं मुद्रण प्रेस में कोई परिवर्तन हो तो प्रकाशक/मुद्रक संबंधित जिला मजिस्ट्रेट के पास एक नया घोषणापत्र दाखिल करेगा तथा उसे परिवर्तन समाविष्ट करने एवं संशोधित पंजीयन प्रमाणपत्र जारी करने हेतु आर.एन.आई. को भेजना होगा । तथापि, यदि संपादक अथवा समाचारपत्र का मूल्य बदल गया है तो नया घोषणापत्र दाखिल करने की जरूरत नहीं है । केवल आर.एन.आई. को सूचित करना
होगा ।
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