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Thursday, May 30, 2013
स्वयं ही पहल करना होगा।
दुनिया की दूसरी बड़ी महाशक्ति बनने का सपना देखने वाले देश पर सुकमा का नक्सली हमला किसी तमाचे से कम नहीं। जंगल से निकल कर दो-चार सौ सशस्त्र नक्सली सड़क पर आते हैं और बड़े नेताओं का सामुहिक नरसंहार कर आराम से निकल जाते हैं और सरकारी व्यवस्था लकीर पिटते रह जाती है। इस भयावह नक्सली घटना को सीधे-सीधे लोकतंत्र पर हमला ठहराते हुए प्रमुख नेताओं ने राजनीति से ऊठकर देखने की जरूरत बताई थी। मगर कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल इस मसले को भरपूर राजनीतिक रंग दे रहे हैं। जबकि, प्रदेश की जनता इस समस्या का वास्तविक समाधान चाहती है। नेताओं के सियासी दांव-पेचों से आजिज आ चुकी जनता इस मसले पर किसी राजनीतिक घमासान में उलझ कर मुर्ख बनना नहीं चाहती। वक्त की दरकार है ठोस समाधान। राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का प्रभाव लगातार बढ़ता गया है। जिस पश्चिम बंगाल में नक्सलवाद का जन्म हुआ था, वहंा अभी सिर्फ चार जिले ही नक्सली उत्पात से पीडि़त रह गए है। 2011 में देश के 84 जिले नक्सलियों के प्रभाव में थे, जो बढ़कर अब 103 पहुंच गया है। कहना गलत न होगा कि अन्य राज्यों को छोड़कर छत्तीसगढ़ जैसे कमजोर राज्य को नक्सलियों ने सुरक्षित मांद बना लिया है। यद्यपि अभी भी बिहार के 29, झारखंड के 21, आधं्रा के 16 जिले और महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश के कुछ जिले भी नक्सल प्रभावित हैं, मगर औसत आंकड़े बताते हैं कि हाल के कुछ सालों के दौरान नक्सलियों ने जितना छत्तीसगढ़ में पांव पसारे है, उतना दूसरे राज्यों में नहीं। पश्चिम बंगाल व आंध्राप्रदेश से खदेड़े गए नक्सलियों के लिए बस्तर मनमाफिक ठिकाना इसलिए बना, क्योकि नक्सली मोर्चे पर राज्य सरकार का रवैय्या ढीला-ढाला रहा। आतंकवाद पर काबू पाने वाले सुपरकाप केपीएस गिल ने रमन सरकार पर सीधा आरोप लगाया है कि नक्सली समस्या से निजात पाने की न इनकी इच्छा है और न ही मानसिकता। अब प्रदेश का आम आदमी भी जानना चाहता है कि आखिर नक्सलियों की मांगे क्या है? सुनना और समझना जरूरी है। हिंसा के जवाब में हिंसा से कभी शांति नहीं आ सकती। नक्सली मुठभेड़ में जान गंवाने वाले सुरक्षा बलों को जैसे हम शहीद मानते हैं, ठीक उसी तरह मरने वाले अपने लड़ाकों को नक्सली भी शहीद कहते हैं। मरने-मारने से किसी सिलसिले का अंत नहीं होता, यह सब जानते हैं। सुरक्षा बलों की बटालियन बढ़ाने या सेना उतारने का विकल्प इस समस्या का समग्र हल नहीं हो सकता। प्रदेश के लोग जानना चाहते हैं कि निहत्थे नेताओं पर हमले को नक्सली प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी बस्तर के शोषित और मारे गए निर्दोष आदिवासियों के प्रति श्रद्धाजंली क्यों कहते हैं? वर्तमान स्थितियों में जानकारों का कहना है कि नक्सली मुद्दे पर छत्तीसगढ़ की जनता को बेवकूफ बनाया जा रहा है। प्रभावी व दूरदर्शी नेतृत्व के अभाव में छत्तीसगढ़ की नक्सल समस्या जटिल होते जा रही है, जबकि आसपास के कुछ राज्य उन्मूलन के स्तर तक पहुंच चुके हैं। प्रादेशिक नेताओं की राजनीतिक समक्षमता, ईमानदार मंशा का अभाव यदि ऐसा ही बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब राज्य में नक्सलियों की समानांतर सत्ता आमजनों का जीना दूभर कर देगी। नक्सली हमले के बाद अभी भी आरोप-प्रत्यारोप का ही ठिकरा फूट रहा है। आज भी हमारे नेता निंदा से ऊपर उठकर गंभीरता से समाधान नहीं तलाश रहे है। जबकि यह निंदा का समय नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े राज्यों में होने वाली घटनाओं के प्रति राष्ट्रीय भावनाएं दोयम दर्जे का प्रतीत होता है। 25 मई को छत्तीसगढ़ में सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ, लेकिन इलेक्ट्रिानिक मीडिया आईपीएल में उलझा रहा। देश में बाजारवाद की प्रवृत्ति इतनी सघन हो गई है, कि बस्तर में होने वाली मौतें व्यवस्था की मुख्य धारा का ध्यान नहीं खिंच पाती। देश की मुख्य राष्ट्रीय धारा द्वारा उपेक्षात्मक रवैय्या के चलते छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े राज्य की मूलभूत समस्याएं समाधान के स्तर पर नहीं पहुंच पाती। अब वक्त आ चुका है कि राजनीतिक मतभेदों से परे होकर समस्या की जड़ तक पहुंचा जाए। छत्तीसगढ़ की जनता समझ चुकी है कि अपनी समस्या सुलझाने के लिए स्वयं ही पहल करना होगा। बस्तर में आज जो नक्सली संगठन सक्रिय हैं, अधिकांश बाहर से आए हुए हैं। तेलगु भाषा में बात करने वाले नक्सली भला बस्तर के आदिवासियों का कितना दर्द समझ सकेंगे। सरकारी व्यवस्था यदि जनोन्मुखी होती, तो आदिवासियों के बीच नक्सली क्या पैर पसार पाते? इतना सब होने के बाद आज भी यदि हमारे नेतृत्व राजनीतिक धींगामुश्ती में उलझे रहते हैं तो इस प्रदेश का भगवान ही मालिक होगा।
सुकमा,,, दरभा घाटी,,, नक्सली आतंक,,, स्पॉट फिक्सिंग,,, श्रीसंथ, अजित चान्दिला, अंकित चौहान,,, विन्दु दारासिंग, बुकीज, डी कंपनी,,, गुरुनाथ मायाप्पन,,, एन श्रीनिवासन का इस्तीफा,,
किसी को याद भी है,,,,, करोड़ों करोड़ का कोयला घोटाला,,, बंसल और सिंगला का घूस काण्ड,,, अश्विनी कुमार और केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट की फटकार,,, सी बी आय को तोते की उपमा,,, भ्रष्ट मंत्रियों का इस्तीफा न लेने की सरकार की जिद,,, कोर्ट की फटकार के बाद इस्तीफे की मजबूरी
सचमुच,,, आम आदमी की याददाश्त बहुत ही कमज़ोर है!!!!!
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