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Thursday, March 14, 2013

the blog of koushal tivari

गुस्से की आग पर आश्वासन की बौछार...


आरक्षण कटौति पर आक्रोशित पिछड़े वर्ग ने कांकेर से राजधानी तक का सफर जब पैदल पूरा कर लिया तब सरकार केवल आश्वासन ही दे पाई। आरक्षण को लेकर सतनामी समाज भी नाराज है और सतनामी समाज की नाराजगी के चलते कुतुब मीनार से ऊंचा बने जैतखम्भ का पिछले दो साल से उद्घाटन नहीं हो पा रहा है।
इन दोनों वर्गो की नाराजगी जायज है या नहीं यह सवाल कतई नहीं है। सवाल है कि आखिर लोगों में इतना गुस्सा क्यों है कि वे अपने द्वारा चुने सरकार के आश्वासन पर भी भरोसा नहीं कर रहे हैं। सवाल यह भी नहीं है कि क्या रमन सरकार ने अपनी विश्वसनियता खो दी है। सवाल आश्वासन पर टूटते भरोसे का है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले भी छला जाता रहा है और आज भी छला जा रहा है। सरकार में बैठे लोगों की संम्पति कई गुना बढ़ रही है तो दूसरी तरफ गरीबों की संख्या बढ़ रही है। 9 साल में रमन सिंह की सरकार भले ही विकास का कितना भी ढिढ़ोरा पिट ले लेकिन सच तो यह है कि वह अपने संकल्प तक को पूरा नहीं कर पाई है। हिन्दूत्व की दुहाई देने वाली भाजपा को संकल्प का मतलब समझाना पड़े तो लोगों को गुस्सा आना स्वाभाविक है।
आरक्षण की जटिलता को नजर अंदाज कर भी दे तो सरकार ने 9 सालों में क्या किया? उसने लोगों से किये वादे-संकल्प को पूरा क्यों नहीं किया। शिक्षा कर्मियों के संविलियन से लेकर दाल भात सेंटर चलाने के मामले में रमन सरकार फेल हो चुकी है।
राज्योत्सव और राजिम कुंभ पर अरबों रूपये खर्च करने का मतलब भी जनता जान चुकी है ग्राम सुराज हो या जनदर्शन सब नौटंकी साबित होने लगा है । विकास के नाम पर कोयले की कालिख और उद्योगों के लिए खेती की जमीनों की बरबादी के लिए छत्तीसगढ़ पूरे देश में कलंकित हुआ है तब भला लोग आश्वासन पर क्यों भरोसा करें।
हमारा भी मानना है कि चुनावी साल होने मांग रखने वालों का दबाव है लेकिन इन नौ सालों में सरकार के कामों की समीक्षा होनी चाहिए कि उसने जनता से वे वादे क्यों किये जो पूरे ही नहीं किये जा सकते थे।
राज्योत्सव, राजिम कुंभ, बायो डीजल से लेकर नई राजधानी के नाम पर फिजूल खर्ची सरकार की पहचान बन चुकी है। एक तरफ सरकार शिक्षा-स्वास्थ्य, सिचाई सुविधा को बढ़ाने जैसे खुद के कार्य से मुंह मोड़ रही है तो दूसरी तरफ निजी शिक्षण संस्थानों की लूट पर चुप्पी साध ली है। शाराब बंदी की बात तो वह करती है लेकिन जन विरोध को डंडे के जोर पर दबाने का प्रयास ही नहीं करती बल्कि शराब ठेकेदारों को गोद में बिठाती है।
मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी के इतने उदाहरण है कि उसे गिना पाना संभव नहीं है। हर आवेदन हर शिकायत पर आश्वासन से लोग हैरान है। स्कूल नहीं है खोल दो पर शिक्षक की व्यवस्था नहीं होगी तो ऐसे स्कूल खोलने का क्या मतलब है?
सरकार की बदलती प्राथमिकता की वजह से ही आज लोग गुस्से में है  और चुनावी साल में यह गुस्सा फुटने लगा है।  कहने को तो सरकारों का काम आम लोगों के हितों की ध्यान रखना है और आम लोगों के हित में रोड़ा बनते कानून को बदल देना है लेकिन यहां तो अफसरशाही हावी है, वही योजना बनाई जा रही है जिसमें स्व हित सधे। ऐसे में आखिर कब तक आश्वासन पर लोग भरो
 

अपनी ढपली, अपना राग...


जैसे जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आने लगा है अखबार मालिकों ने अपना खेल शुरू कर दिया है। प्रसार बढ़ाने कुर्सी बांटने वाले भास्कर अब भी अपने को नंबर वन बता रहा है तो नवभारत, हरिभूमि और पत्रिका भी अपने को नम्बर वन बताते नहीं थकते ऐसे में पाठक किसे नम्बर वन माने? अब तो प्रसार बढ़ाने की होड़ में हर अखबार इनामी योजना से लेकर कुर्मी टेबल, हाट-पॉट टिफीन बांट रहे है। इस दौड़ में नई दुनिया भी शामिल है। हालांकि नई दुनिया का मालिक से लेकर संपादक तक बदल चुका है। दूसरी तरफ पत्रकारों की स्थिति भी यही है। अब उनकी पहचान कलम की बजाय बैनर से होती है। और अधिकारी से लेकर नेता भी बड़े बैनर माने जाने वाले अखबार के पत्रकारों को ही ज्यादा पूछ परख करते हैं।
ऐसे में जब चुनाव नजदीक हो तो विज्ञापन और पेड न्यूज की मारा मारी के चलते बड़े बैनरों के इन पत्रकारों पर दबाव भी बहुत है। और अब तो पत्रकारों की किमत भी बढऩे लगी है। बैनर बदलने के एवज में वेतन भी बढ़ रहा है।  मुसिबत छोटे बैनर की बढ़ गई है क्योंकि छोटे बैनर के अच्छे पत्रकारों को बड़े बैनर वाले ज्यादा तनख्वाह देकर अपने यहां ले जाने लगे हैं।
इन सबके बीच छोटे बैनरों खासकर साप्ताहिक और मासिक पत्रिका निकाल रहे पत्रकारों की दिक्कतें भी इस चुनावी साल में बढऩे लगी है। क्योंकि बड़े बैनरों की अपनी सीमा हे और उन पर सरकार व जनसंपर्क विभाग का दबाव भी है जबकि इसके उलट छोटे बैनर वालों की पूछ तभी बढ़ती है जब वे दमदार खबर परोसते हैं।
हालांकि पत्रिका के आने के बाद बड़े अखबारों का तेवर भी बदला है लेकिन चुनाव तक यह तेवर बरकरार रहेगा इसे लेकर संशय जरूर कायम है। नंबर वन की दौड़ में शामिल पत्रिका को विधानसभा का पास नहीं दिये जाने को लेकर चर्चा भी खूब हो रही है और इसे सरकार के बदले की कार्रवाई का भौंडा प्रदर्शन माना जा रहा है।  अब तक पत्रकारों को धमकाने का आरोप पुलिस और माफिया पर ही लगता रहा है लेकिन नंबर वन की दौड़
में शामिल पत्रिका को विधानसभा का पास नहीं दिये जाने को लेकर चर्चा भी खूब हो रही है और इसे सरकार के बदले की कार्रवाई  माना जा रहा है।
अब तक पत्रकारों को धमकाने का आरोप पुलिस और माफिया पर ही लगता रहा है लेकिन इस बार एक मासिक पत्रिका से जुड़े अनिल श्रीवास्तव नायक पत्रकार ने जनसंपर्क के अधिकारी के खिलाफ सिटी कोतवाली में शिकायत की है। शिकायत किये एक माह हो गये लेकिन अभी तक जुर्म दर्ज भी नहीं हुआ है। यानी सरकारी दबाव जारी है।
और अंत में ...
मंत्रालय दूर होने से अफसरों को राहत तो मिली है लेकिन पत्रकारों की दिक्कत बड़ गई है। मंत्रालय के नाम पर समय व रूतबा झाडऩे वालों को अब अन्य सीटों पर मेहनत करनी

बढ़ता असंतोष खिसकता जनाधार



रायपुर को अपना गढ़ मानने वाली भाजपा का जनाधार जिस तेजी से घटने लगा हे उसे नजर अंदाज किया गया तो आने वाले दिनों में राजधानी में परचम लहराना सपना बन कर रह जायेगा । दो-दो मंत्रियों के रहते भी राजधानी में भाजपा को लगातार क्यों मान मिल रही है ? ेयह हैट्रिक में जुटी भाजपा के लिए कितना विचारणीय है यह तो वही जाने लेकिन निष्ठावान भाजपाई बेचैन हैं ।
इन दिनों रमन सरकार हैट्रिक की तैयारी में लगी है । ऐसे में उसके सामने सबसे बड़ी समस्ेया अपने गढ़ की रक्षा करना है । भाजपा का सर्वाधिक गढ़ रायपुर को मान जाता है । और यहां से दो-मंत्री भी बनाये गए है और दोनों ही मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत को दमदार माना जाता है ।
भाजपा के इस अभेद माने जाने वाले गढ़ में सेंध तो पिछले चुनाव में ही लग गया था जब यहां की चार में से एक सीट पर कांग्रेस विधायक कुलदीप जुनेजा ने अपनी जीत का परचम लहराया था । लेकिन भाजपा ने इसे गंभीरमा से नहीं लिया और मामूली अंतर की जीत की भरपाई को लेकर मुगालते में रही ।
हालांकि दमदार मंत्री और मजबूत संगठन के बल पर भाजपा अब भी राजधानी में कांग्रेस के मुकाबलेे मजबूत दिख रही है लेकिन महापौर चुनाव में मिली करारी हार के बाद भी यदि भाजपाई या रमन सरकार मुगालते में है तो फिर इसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ सकता है ।
राजधानी के चारों सीट के महापौर चुनाव में न केवल किरणमयी नायक की जीत हुई बल्कि भाजपा पार्षद तीस की संख्या पर सिमट गई है । इसके बाद भी मंत्रियों की मनमानी, संगठन की निरकुंशता और भाई भतीजा वाद के चलते भाजपा में जबरदस्त असंतोष दिखने लगा है । असंतोष लोगों के परचा कांड को नजर अंदाज करना सभापति चुनाव में भी भारी पड़ा है । और राज्य की सत्ता में होने के बाद भी भाजपाई पार्षदरों ने बगावत का जो खले खेला वह अनुशासन का दंभ भरने वाली पार्टी के लिए नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा ।
भले ही संगठन खेमा का सरकार में बैठे मंत्री अविश्वास प्रस्ताव के क्रॉस वोटिंग को सभापति के खिलाफ मान ले लेकिन सच तो यह है कि कोयले की कालिख और चेहरा देखकर लालबत्ती बांटने की सरकारी कारगुजारियों से निष्टावान भाजपाई न केवल नाराज हैं बल्कि मौका मिलने पर वे पार्टी के खिलाफ भी जा सकते हैं ।
बताया जाता है कि दमदार मंत्रियों की आपसी लड़ाई का असर भी संगठन में पड़ा है और यही वजह है कि संगठन में बिखराव स्पष्ट दिखने लगा है ।
बहरहाल भाजपा के इस गढ़ में बढ़ते असंतोष को नहीं रोका गया और अपने को पार्टी का सर्वेसर्वा मानने वालों पर लगाम नहीं कसा गया तो आने वाले दिनों में भाजपा को इसका जबरदस्त खामियाजा भुगतना पड़ा सकता है ।

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