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Monday, November 26, 2012

जेनेरिक के नाम पर

बिल्ली सफेद हो या काली उससे फर्क नही पड़ता है, यदि वह दूध पीती है तो उसे मार भगाया जाना चाहिये. इस प्रसिद्ध चीनी कहावत को यदि सकारात्मक रुप से भारतीय दवा बाज़ार पर लागू किया जाए तो यह कहावत कुछ यूं बनती है- दवा जेनेरिक नाम से बिके या ब्रांड नाम से, उससे फर्क नही पड़ता, दवा तो सस्ती होना चाहिये. लेकिन यह अजीब दुर्भाग्य है कि इस कहावत के सारे सकारात्मक पहलू धुंधले हैं और जेनेरिक के नाम पर ऐसा भ्रम जाल छाया हुआ है कि उससे आम जनता का निकल पाना मुश्किल है.

जेनेरिक दवा के हाल को जानने-समझने के लिये पिछले कुछ वर्षों की इससे जुड़ी खबरों पर गौर करें. अक्टूबर 2006 में तत्कालीन केन्द्रीय रसायन तथा उर्वरक मंत्री राम विलास पासवान ने एक पत्रकार वार्ता में घोषणा की थी कि भारतीय दवा उद्योग ने 886 दवाओं के दाम कम कर दिये हैं तथा अब यह मरीजों को सस्ते में उपलब्ध होगी.


वास्तव में ये 886 जेनेरिक दवाएं थी, जिनके मूल्य कम करने की घोषणा की गई थी. इन दवाओं का हिस्सा भारतीय दवा बाजार में 5 से 7 प्रतिशत का ही था और यदि कोई इन दवाओं को लेने बाज़ार जाएगा तो इन्हें खोजता ही रह जायेगा. ये 886 जेनेरिक दवाएं खुले बाजार में उपलब्ध नही हैं. हांलाकि रामविलास पासवान जी को यह बात बाद में समझ में आ गई थी.


इस वर्ष के शुरूआत में ही केन्द्रीय सरकार ने घोषणा की थी कि अब ‘सबके लिये मुफ्त दवा‘ की योजना लागू की जायेगी. अक्टूबर-नवम्बर 2012 से इसे लागू करने की बात भी कही गई थी. लेकिन इस योजना पर अब तक अमल नहीं हो सका है. सच तो यह है कि इस योजना पर अमल हो भी नहीं सकता क्योंकि इस योजना की बुनियाद में ही फरेब और भ्रम है.


इसे ठीक-ठीक समझने के लिये इस योजना की प्रेरक योजना को जानना दिलचस्प है. 1995 में तमिलनाडु मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन बनाया गया है. यह कार्पोरेशन जेनेरिक दवा निर्माताओं से मोल भाव कर बहुत ही कम कीमत में दवाएं खरीद कर सरकारी अस्पतालों से मरीजों को मुफ्त में बांटता है. केन्द्रीय सरकार ने इसी तमिलनाडु की योजना को आधार बनाते हुये ‘सबके लिऐ मुफ्त दवा’ की घोषणा की है.


अब ज़रा तमिलनाडु में इस योजना के आंकड़े देखें. तमिलनाडु के आंकड़े बताते हैं कि केवल 32 प्रतिशत मरीज ही सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा करवाने आते हैं. 20 प्रतिशत मरीज अपनी चिकित्सा करवाने या चिकित्सालय तक पहुंचने के लिये तरस जाते हैं. बाकी के बचे 48 प्रतिशत मरीज निजी चिकित्सालयों में जाते हैं तथा खुले बाजार से दवाएं खरीदते हैं.


ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि जब 48 प्रतिशत लोगों को तो बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया है, फिर यह सबसे लिये मुफ्त दवा कैसे हुई?


एक बार के लिये मान भी लिया जाये कि सरकार की नीयत ठीक है तो भी सरकार की अब तक की गतिविधियां बताती हैं कि यह योजना महज लोगों की आंखों में धूल झोंकने जैसी है. आंकड़े बताते हैं कि देश भर में जेनेरिक दवा देने के लिये सरकार को प्रतिवर्ष 5 हजार करोड़ रूपये खर्च करने पड़ेंगे लेकिन अभी तक सरकार ने केवल 100 करोड़ रुपये की रकम ही इस योजना के लिये जारी की है.


पिछले महीने यानी अक्टूबर 12, 2012 को केन्द्रीय स्वास्थ एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने राज्य सरकारों को निर्देशित किया है कि अब से राज्य सरकारें दवा कंपनियों को जब दवा बेचने की इजाजत दें तो केवल जेनेरिक नाम से ही बेचने की अनुमति दें, ब्रांड नाम से नही.


भविष्य में जिन पुरानी दवाओं का नवीनीकरण किया जाए, वह भी जेनेरिक नाम से ही हो. लेकिन बिल्ली अभी झोले से पूरी तरह बाहर नही निकली है. उसकी केवल पूंछ ही दिखायी दे रही है. हमें झोले को उल्टा करना पड़ेगा तभी बिल्ली बाहर आयेगी.


यह सब कुछ तो इस आदेश के परिशिष्ट ए में लिखा गया है. परिशिष्ट बी के अनुसार अब से राज्य सरकार नयी आने वाली दवाएं तथा उनके सम्मिश्रण के लिये इजाजत नही दे सकेगी. इसका अधिकार होगा केन्द्र सरकार के दवा नियंत्रक के पास. अब नई दवाओं का तात्पर्य क्या है? इसका भी स्पष्टीकरण परिशिष्ट बी में दिया गया है- जो दवा अब तक भारत में उपलब्ध नही है या किसी उपलब्ध दवा को नये रोगों के लक्षणों में उपयोग में लाना है या जिसके खुराक को बदलना है या जिसे मानव शरीर में प्रविष्ठ कराने का तरीका बदलना है जैसे गोली के बजाय सुई द्वारा आदि.


यहां नई दवाओं का अर्थ नये आविष्कार से है. ज्यादतर या करीब-करीब सभी नई दवाएं विदेशी कंपनियों की प्रयोगशालाओं से ही निकलकर आती हैं. ये सभी दवाएं विदेशों में पेटेंटेड होती हैं. विश्व-व्यापार-संगठन का सदस्य होने के नाते भारत को इन्हें अपने यहां भी पेटेंट या एकाधिकार देना अनिवार्य है. इस प्रकार नयी दवायें जो पेटेंटेड होंगी, उन्हें भारत में व्यापार करने की अनुमति केन्द्रीय दवा नियंत्रक देगा. ऐसे में निश्चित तौर पर पेटेंटेड दवा ब्रांड नाम से हो बेची जायेंगी, न कि जेनेरिक नाम से.


इस प्रकार वर्तमान में उपलब्ध दवाएं, जो कुछ ही वर्षो में पुरानी तथा अल्प उपयोगी हो जायेंगी, उन्हें जेनेरिक नाम से बेचा जायेगा तथा नई पेटेंटेड दवाएं केन्द्र सरकार की अनुमति से ब्राडेंड के बतौर बेची जायेंगी. लीजिये अब बिल्ली बाहर आ गई. यानी कि भारत को भी अमरीका बनाया जा रहा है. अमरीका में केवल आविष्कारकर्ता दवा कंपनी ही अपनी दवा को ब्रांड नाम से बेचती है, जबकि बाकी सभी कंपनियां जेनेरिक नाम से. इस प्रकार अब तो आपको स्पष्ट हो गया होगा कि इस आदेश का मूल उद्देश्य विदेशी व्यापारियों को उर्वर भूमि उपलब्ध कराना है.


ब्रांडेड एवं जेनेरिक के बीच का फर्क आपको एक उदाहरण से समझ में आ जायेगा. विश्व की सबसे बड़ी जेनेरिक दवा निर्माता तेवा एक इजराइली कंपनी है, इस कंपनी की कुल वार्षिक बिक्री से ज्यादा दिग्गज अमरीकी फार्मा कंपनी फायज़र की कोलेस्ट्राल की एक दवा बिकती है.


जेनेरिक दवाओं के नाम पर जनता को भरमाने के बजाय केन्द्र सरकार सभी दवाओं पर कड़े मूल्य नियंत्रण का आदेश लाये ताकि जनता को सस्ते में जीवन रक्षक तथा आवश्यक दवाएं मिल सकें. 27 सितम्बर 2012 को माननीय सर्वोच्चय न्यायालय ने भी अपने टिप्पणी में कहा है कि मंत्रियों के समूह द्वारा दिये गये दवाओं के मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया सही नहीं है तथा दवाओं के मूल्यों का निर्धारण उनके लागत के आधार पर हो, न कि इसे बाजार के भरोसे छोड़ा जाए.


कुल जमा ये कि मूल प्रश्न सस्ती दवाओं की उपलब्धता का है न कि जेनेरिक बनाम ब्रांडेड का. जनता को किश्तों में न काटा जाए. उसे सस्ती दवाएं उपलब्ध करवाने के लिए ठोस कदम उठाया जाये.

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