यामाहा
द्वारा अपनी बाइक्स के निर्माण के लिए हाल ही में तकरीबन 200 महिला
इंजीनियरों की नियुक्ति करना तथा मारुति सुजुकी व महिंद्रा एंड महिंद्रा
जैसी कंपनियों द्वारा अपने कारखानों की एसेंबली लाइंस में क्रमश: ४५ व ३०
महिला मैकेनिकल इंजीनियरों की सेवाएं लेने का फैसला इस बात का संकेत है कि
शॉप फ्लोर पर महिला कर्मियों का दखल बढ़ रहा है।
फैक्ट्री मालिक शॉप फ्लोर्स पर महिला कर्मियों को नियुक्त करने को लेकर उत्साहित हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि महिलाएं ऐसी जगहों पर ज्यादा अनुशासन व उत्पादकता लेकर आएंगी। दूसरी ओर महिलाएं भी शॉप फ्लोर पर अपने हाथ ग्रीस व स्पानर्स इत्यादि से गंदे करने तथा भारी काम करने की चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं।
महिला कर्मियों की मांग बढ़ते देख आज बड़ी संख्या में लड़कियां/महिलाएं इस क्षेत्र से जुड़ी शिक्षा प्राप्त करने लगी हैं। देश में स्थित विभिन्न शासकीय/निजी कॉलेजों व विश्वविद्यालयों से हर साल कम से कम ५४० महिला मैकेनिकल इंजीनियर पढ़कर निकलती हैं। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा संस्थान द्वारा हाल ही में पेश एक रिपोर्ट के मुताबिक ५.८८ लाख लड़कियों ने इंजीनियरिंग विधा को चुना और इनमें से ८२०९ छात्राओं ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग शाखा का चयन किया।
कुछ समय पहले तक ऑटोमोबाइल कंपनियां सिर्फ नाम के लिए शॉप फ्लोर पर तीन-चार महिला कर्मियों को रखती आई हैं, लेकिन महिलाओं के काम के प्रति समर्पित व अनुशासित रवैये को देख अब इन कंपनियों का महिला इंजीनियरों के प्रति रुझान बढ़ रहा है। पिछले साल तक एमएंडएम हर साल महज पांच लोगों को काम पर रखती थी, लेकिन इस साल उसने अपनी ५० फीसदी रिक्तियां महिलाओं के लिए आरक्षित कर दीं और जल्द ही ३० महिलाओं को शॉप फ्लोर पर नियुक्त करते हुए इन रिक्तियों को भर भी दिया।
पहले ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के अंतर्गत निर्माण प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी महज दिखावे की होती थी और शायद ही कभी इनकी संख्या दो अंकों में पहुंच पाती थी। इस इंडस्ट्री में मैनुफैक्चरिंग प्लेटफॉर्म पर कर्मचारियों की तादाद तकरीबन १ करोड़ ३० लाख है, जिनमें महिलाओं की संख्या नगण्य थी।
लेकिन अब नियोक्ता व कर्मचारी दोनों के नजरियों में फर्क आने के साथ यह परिदृश्य तेजी से बदल रहा है।
महिलाओं का इस तरह के सख्त कामों के प्रति इसलिए भी रुझान बढ़ रहा है क्योंकि बतौर मैकेनिकल इंजीनियर काम करने का मतलब यह नहीं है कि आपके हाथ गंदे ही होंगे। कंप्यूटेशनल फ्लूड डायनामिक्स के अलावा कंप्यूटरजनित डिजाइन व मैनुफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में भी उनके लिए अवसर उपलब्ध हैं। साथ ही साथ वे रिसर्च के क्षेत्र में भी जा सकती हैं। इसके अलावा आज पहले के मुकाबले ज्यादा महिलाएं मैकेनिकल इंजीनियरिंग विधा को चुन रही हैं क्योंकि वैश्विक तौर पर आईटी इंडस्ट्री में काफी अस्थिरता नजर आ रही है।
देश में चंडीगढ़, पंजाब, आंध्र प्रदेश और दिल्ली जैसी कुछ जगहों पर महिलाएं मैकेनिकल इंजीनियरिंग को आईटी से पहले चुन रही हैं। नई दिल्ली के कमिंस कॉलेज में यदि कुछ साल पहले तक आईटी पहली पसंद थी, तो अब इसकी जगह मैकेनिकल इंजीनियरिंग ने ले ली है। इन ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के टैलेंट पूल में आगामी दो वर्षों में काफी बदलाव नजर आएगा, जहां शॉप फ्लोर पर महिलाएं ज्यादा काम कर रही होंगी।
ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री अनेक जगहों पर वुमन डे केयर सेंटर व के्रच इत्यादि निर्मित करते हुए पहले ही इसकी तैयारियों में जुट गई है।
फैक्ट्री मालिक शॉप फ्लोर्स पर महिला कर्मियों को नियुक्त करने को लेकर उत्साहित हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि महिलाएं ऐसी जगहों पर ज्यादा अनुशासन व उत्पादकता लेकर आएंगी। दूसरी ओर महिलाएं भी शॉप फ्लोर पर अपने हाथ ग्रीस व स्पानर्स इत्यादि से गंदे करने तथा भारी काम करने की चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं।
महिला कर्मियों की मांग बढ़ते देख आज बड़ी संख्या में लड़कियां/महिलाएं इस क्षेत्र से जुड़ी शिक्षा प्राप्त करने लगी हैं। देश में स्थित विभिन्न शासकीय/निजी कॉलेजों व विश्वविद्यालयों से हर साल कम से कम ५४० महिला मैकेनिकल इंजीनियर पढ़कर निकलती हैं। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा संस्थान द्वारा हाल ही में पेश एक रिपोर्ट के मुताबिक ५.८८ लाख लड़कियों ने इंजीनियरिंग विधा को चुना और इनमें से ८२०९ छात्राओं ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग शाखा का चयन किया।
कुछ समय पहले तक ऑटोमोबाइल कंपनियां सिर्फ नाम के लिए शॉप फ्लोर पर तीन-चार महिला कर्मियों को रखती आई हैं, लेकिन महिलाओं के काम के प्रति समर्पित व अनुशासित रवैये को देख अब इन कंपनियों का महिला इंजीनियरों के प्रति रुझान बढ़ रहा है। पिछले साल तक एमएंडएम हर साल महज पांच लोगों को काम पर रखती थी, लेकिन इस साल उसने अपनी ५० फीसदी रिक्तियां महिलाओं के लिए आरक्षित कर दीं और जल्द ही ३० महिलाओं को शॉप फ्लोर पर नियुक्त करते हुए इन रिक्तियों को भर भी दिया।
पहले ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के अंतर्गत निर्माण प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी महज दिखावे की होती थी और शायद ही कभी इनकी संख्या दो अंकों में पहुंच पाती थी। इस इंडस्ट्री में मैनुफैक्चरिंग प्लेटफॉर्म पर कर्मचारियों की तादाद तकरीबन १ करोड़ ३० लाख है, जिनमें महिलाओं की संख्या नगण्य थी।
लेकिन अब नियोक्ता व कर्मचारी दोनों के नजरियों में फर्क आने के साथ यह परिदृश्य तेजी से बदल रहा है।
महिलाओं का इस तरह के सख्त कामों के प्रति इसलिए भी रुझान बढ़ रहा है क्योंकि बतौर मैकेनिकल इंजीनियर काम करने का मतलब यह नहीं है कि आपके हाथ गंदे ही होंगे। कंप्यूटेशनल फ्लूड डायनामिक्स के अलावा कंप्यूटरजनित डिजाइन व मैनुफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में भी उनके लिए अवसर उपलब्ध हैं। साथ ही साथ वे रिसर्च के क्षेत्र में भी जा सकती हैं। इसके अलावा आज पहले के मुकाबले ज्यादा महिलाएं मैकेनिकल इंजीनियरिंग विधा को चुन रही हैं क्योंकि वैश्विक तौर पर आईटी इंडस्ट्री में काफी अस्थिरता नजर आ रही है।
देश में चंडीगढ़, पंजाब, आंध्र प्रदेश और दिल्ली जैसी कुछ जगहों पर महिलाएं मैकेनिकल इंजीनियरिंग को आईटी से पहले चुन रही हैं। नई दिल्ली के कमिंस कॉलेज में यदि कुछ साल पहले तक आईटी पहली पसंद थी, तो अब इसकी जगह मैकेनिकल इंजीनियरिंग ने ले ली है। इन ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के टैलेंट पूल में आगामी दो वर्षों में काफी बदलाव नजर आएगा, जहां शॉप फ्लोर पर महिलाएं ज्यादा काम कर रही होंगी।
ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री अनेक जगहों पर वुमन डे केयर सेंटर व के्रच इत्यादि निर्मित करते हुए पहले ही इसकी तैयारियों में जुट गई है।
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