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Thursday, October 11, 2012

संवाद

हमारी दुनिया पहले कभी एक-दूसरे पर इतनी निर्भर नहीं रही। हर जगह धन,
संपदा,आइडिया, सूचनाओं और प्रतिभा की आसान आवाजाही संभव है। फिर भी विश्व
के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं- असमानता, अस्थिरता और जलवायु परिवर्तन।
दुनिया की आधी आबादी लगभग 110 रुपए रोजाना पर गुजर कर रही है। अस्थिरता का
असर आर्थिक मंदी और मध्य पूर्व सहित कई इलाकों में राजनीतिक संघर्षों पर
दिखाई पड़ता है। हम जिस तरीके से एनर्जी पैदा कर रहे हैं, उससे जलवायु बदल
रही है। 
मुझे यकीन है, तरक्की से लोगों के सोच-विचार का तरीका बदलता है। इसलिए
मैं हर साल क्लिंटन ग्लोबल इनीशिएटिव (सीजीआई) के तहत विश्व के जाने-माने
लोगों को चर्चा के लिए एक मंच पर लाने का प्रयास करता हूं। (इस साल २५
सितंबर को न्यूयॉर्क में सीजीआई की बैठक हुई।) मैं यहां उन पांच क्षेत्रों
का जिक्र कर रहा हूं जिनमें नए आइडिया के कारण बीते वर्षों में ठोस नतीजे
सामने आए हैं। 
 
टेक्नोलॉजी 
 
मोबाइल फोन का करिश्मा 
 
टेक्नोलॉजी लोगों के बीच गैर बराबरी खत्म करती है। संयुक्त राष्ट्र के
एक अध्ययन में पाया गया है, लोगों को गरीबी के अंधेरे से निकालने में सैल
फोन सबसे अधिक प्रभावशाली साबित हुए हैं। हैती में फोन ने आम लोगों के जीवन
में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। वहां 70 फीसदी से अधिक लोगों की आय रोजाना
110 रुपए है। केवल 10 फीसदी लोगों के बैंकों में खाते हैं। लेकिन 80
प्रतिशत घरों में मोबाइल फोन हैं। डिजिसैल के चेयरमैन डेनिस ओ ब्रायन ने
कनाडा के स्कोटिया बैंक को हैती के लोगों को एक सेवा देने के लिए राजी कर
लिया। इसके तहत बैंक खाता खोले बगैर लोगों को फोन के जरिए पैसा निकालने,
जमा करने और ट्रांसफर करने की सुविधा दी गई है। 2011 के अंत तक इस सर्विस
के मार्फत 60 लाख से अधिक ट्रांजेक्शन हो चुके थे। 
 
अफ्रीका में भी ऐसा हो रहा है। महाद्वीप में सिर्फ चार फीसदी घरों की
पहुंच इंटरनेट तक है। 50 फीसदी लोगों के पास मोबाइल फोन हैं। वहां कई
क्षेत्रों में नकली दवाओं की गंभीर समस्या है। सीजीआई के एक सदस्य ने
स्प्रोक्सिल नामक कंपनी बनाई है। कंपनी अफ्रीका और अब भारत में सैल फोन पर
लोगों को नकली दवाइयों की जानकारी देती है। एरिक्सन, इनवेस्टमेंट फर्म
डेल्टा पार्टनर्स और एनजीओ रिफ्यूजी यूनाईटेड - संयुक्त राष्ट्र के साथ
मिलकर संघर्षों के कारण बिछुड़े परिवारों को सैल फोन के जरिए मिला रहे हैं।
2010 में हैती के भूकंप पीडि़तों को अमेरिकियों ने टेक्स्ट मैसेज से मदद
दी थी। 
 
स्वास्थ्य सेवाएं 
 
पार्टनर शिप से तस्वीर बदली 
 
सरकार, प्राइवेट सेक्टर और संस्थाओं की पार्टनर शिप के बूते कई गरीब
देशों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना संभव हो सका है। मेरे
फाउंडेशन ने 2002 में जानलेवा बीमारी एड्स पर काम शुरू किया था। उस वक्त
विकासशील देशों में केवल दो लाख 30 हजार लोगों का महंगी दवाइयों से इलाज चल
रहा था। अब अपेक्षाकृत सस्ती दवाओं से 80 लाख लोगों का इलाज हो रहा है।
यूएन एड्स, राष्ट्रपति इमर्जेंसी प्लान, बिल- मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और
कोका कोला जैसी कंपनियों के एकजुट अभियान से एड््स का खात्मा अब सपना नहीं
रहा। 
 
सरकार, प्राइवेट सेक्टर और फाउंडेशनों के बीच सहयोग के आइडिया ने
रवांडा में चिकित्सा कर्मियों की कमी दूर करने का अभियान चलाया है। सीजीआई
के सदस्यों के सहयोग से कई देशों में कैंसर के खिलाफ मुहिम छेड़ी गई है।
हैती, मेक्सिको, जोर्डन और रवांडा में डाना-फारबर/ब्रिघम, महिला कैंसर
सेंटर ने कैंसर के इलाज के सेंटर खोले हैं। 
 
अमेरिका में बच्चों में मोटापे की समस्या पर काबू पाने के लिए स्कूलों
में कम कैलोरी के सॉफ्ट ड्रिंक्स भेजने की मुहिम के अच्छे नतीजे सामने आए
हैं। इसके लिए सॉफ्ट ड्रिंक बनाने वाली कंपनियों का भी सहयोग लिया गया है। 
 
इकोनॉमी 
 
अच्छा कारोबार है ग्रीन एनर्जी 
 
तमाम आलोचना के बावजूद मुक्त व्यापार और खुले बाजार ने बीते 25 वर्षों
में गरीबी दूर की है। दुनिया भर में सरकारें, प्राइवेट सेक्टर और अन्य
संस्थान अपने संसाधनों और कौशल का इस्तेमाल गरीबी व जलवायु परिवर्तन जैसी
समस्याओं से निपटने में कर रहे हैं। अफ्रीका में छोटे किसान पेड़ लगाकर
लकड़ी एवं फल पैदा करने के साथ कार्बन क्रेडिट की शक्ल में मुनाफा कमा रहे
हैं। 
 
जर्मनी ने एक दिन में सूर्य से 22 गिगा वाट बिजली पैदा कर विश्व
कीर्तिमान बनाया है। 20 परमाणु बिजलीघर एक दिन में इतनी बिजली पैदा करते
हैं। क्लीन एनर्जी सेक्टर को लंबे अरसे से खर्चीला और कठिन माना जाता रहा
है। फिर भी, अमेरिका में आर्थिक मदी से पहले यह सेक्टर 8.3 प्रतिशत की दर
से बढ़ रहा था। ग्रीन एनर्जी के मामले में क्योटो प्रोटोकाल का पालन करने
वाले जर्मनी, डेनमार्क, स्वीडन जैसे यूरोपीय देशों पर आर्थिक मंदी का असर
कम पड़ा है। ग्रीन एनर्जी का आइडिया कई जगह तस्वीर बदल रहा है। कोस्टारिका
की अर्थव्यवस्था विश्व की सर्वाधिक ग्रीन इकोनॉमी है। वहां बार-बार
इस्तेमाल किए जाने वाले संसाधनों से सबसे अधिक बिजली पैदा की जाती है। वहां
वन क्षेत्र 51 प्रतिशत है। ब्राजील ने भी बीते दशक में आशा जगाई है। उसने
तेल के नए स्रोत खोजे हैं। पनबिजली उत्पादन को बढ़ाया है। 
 
समानता 
 
महिलाओं को अधिकार 
 
प्रसन्नता का विषय है कि दुनिया भर में महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक
ताकत हासिल हो रही है। रवांडा इसकी बड़ी मिसाल है। वहां आधे से अधिक संसद
सदस्य महिलाएं हैं। मेरे फाउंडेशन की मदद से एक सोयाबीन प्रोसेसिंग फैक्टरी
का निर्माण शुरू हुआ है। फैक्टरी से पूर्व रवांडा के 30000 किसानों को काम
मिलने की संभावना है। इन किसानों में 55 फीसदी महिलाएं हैं। गैप
इनकारपोरेटेड द्वारा गारमेंट बनाने वाली महिला कारीगरों का कौशल निखारने के
मकसद से टेक्निकल ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाया जा रहा है। पेस नामक यह
कार्यक्रम भारत, चीन, कंबोडिया, विएतनाम, बांग्लादेश और श्रीलंका में चल
रहा है। इससे महिलाओं की स्थिति सुधरेगी।

उजले भविष्य की आस 

विभिन्न समुदायों के बीच असमानता से अस्थिरता और संघर्षों का जन्म
होता है। लेकिन, विश्व में कई स्थानों पर कामयाबी की कहानियां भी लिखी जा
रही हैं। बाल्कन देशों और रवांडा में एक- दूसरे के खिलाफ संघर्ष करने वाले
लोग अब मिल- जुलकर समस्याएं सुलझा रहे हैं। मैंने 2011 में मनास, ब्राजील
में ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी सम्मेलन में हिस्सा लिया था। सम्मेलन में तेल
कंपनियों,पर्यावरण समूहों, व्यवसायियों और वर्षा वनों के मूल निवासियों के
प्रतिनिधि मौजूद थे। वर्षा वन क्षेत्र में विकास पर सभी लोगों ने अपना
नजरिया पेश किया। उन्हें भरोसा था कि संवाद से कोई हल निकल आएगा।
मेरा अंतिम उदाहरण हल्ट इंटरनेशनल बिजनेस स्कूल के सालाना चैलेंज
कार्यक्रम से संबंधित है। विश्व की सामाजिक चुनौतियों को चार-पांच छात्रों
की यूनिवर्र्सिटी टीमों के सामने हल खोजने के लिए रखा जाता है। इसमें एनजीओ
की भी भागीदारी होती है। विजेता आइडिया पर अमल करने के लिए पार्टनर एनजीओ
को ५.२० करोड़ रुपए दिए जाते हैं। इस साल न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के अबू
धाबी कैंपस की टीम विजेता रही। टीम में भारत, चीन, पाक और ताईवान का एक-एक
छात्र था। मैंने मंच पर अवार्ड लेने आए छात्रों से पूछा क्या आप लोग
चाहेंगे कि यह तस्वीर लोकल अखबारों में छपे। उन्होंने जवाब दिया हमें कोई
फर्क नहीं पड़ता है। भारत-पाकिस्तान और चीन-ताईवान के मतभेद जगजाहिर हैं।
लेकिन छात्रों की नजर भविष्य पर है। वे अतीत की कटुता भुलाकर सुनहरे कल का
सपना जो देख रहे हैं।

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