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Monday, February 27, 2012

सत्य तो अंधकार भी है

मेरी तो अपनी समझ यह है कि जहां आनंद होगा, वहां दुख के भी बड़े नये आयाम होंगे, होने भी चाहिए। अभी जिस दुख को हम जानते हैं, वह बड़ा छिछला है। जिस सुख को जानते हैं, वह भी बड़ा छिछला है। असल में, इनकी मात्रा बराबर होती है। जिस दिन आनंद इतना गहरा होगा कि रोआं-रोआं कंप जाये, इस भूल में मत पड़ना कि उस दिन दुख भी इतना गहरा नहीं होगा। उस दिन दुख भी इतना ही गहरा होगा कि रोआं-रोआं कंप जायेगा। हमारी संवेदनशीलता बराबर बढ़ती है।

एक आदमी को अगर सौंदर्य का बहुत बोध है, तो उसको कुरूपता का भी उतना ही बोध हो जाता है। यह असंभव है कि एक आदमी को सौंदर्य का ही सिर्फ बोध हो और कुरूपता का बोध न हो। यह तो असंभव है, यह तो एक साथ बढ़ेगा। एक साथ ही अगर एक आदमी को स्वच्छ रहने का बड़ा आनंद है, तो उसे अस्वच्छ होने की पीड़ा बढ़ जायेगी उसी मात्रा में। लेकिन हमारी आकांक्षाएं चाहती हैं कि ऐसी दुनिया हो, जहां अंधेरा न हो और रोशनी ही रोशनी हो। हालांकि, भगवान हमारी आकांक्षाएं पूरी नहीं करता, नहीं तो हम बड़ी मुश्किल में पड़ जायें। और रोशनी ही रोशनी हो, तो रोशनी बहुत घबड़ानेवाली हो जाये। रोशनी में भी, सुबह जो हमें सुख मालूम पड़ता है, उस सुख को पाने का अर्जन भी रात के अंधेरे में ही हमने किया है। और सुबह जब किसी के प्रेम में आनंद आता है, तो वह कल किसी की घृणा में झेले गये दुख का भी उसमें हाथ है। यह अकेला नहीं है।


सत्य तो इतना बड़ा है कि उसमें दुख भी होगा और आनंद भी होगा और प्रकाश भी होगा। और उसमें परमात्मा भी होगा और शैतान भी होगा। सत्य तो टोटैलिटी से होगा, पूरे को घेरेगा। उसमें अमरता भी होगी, तो उसमें मृत्यु भी होगी, उसमें पूर्ण मृत्यु भी होगी। सत्य तो सब घेर लेगा, जो है। और हम जो हैं, पूरे को नहीं देखना चाहते हैं क्योंकि हम खुद ही घबड़ाते हैं कि पूरा न दिखायी पड़े। क्योंकि पूरा दिखायी पड़ने का बड़ा और ही मतलब होगा।


अभी मैं बात कर रहा था, कोई आया, तो मैंने उससे कहा कि "आ जाओ'। किसी ने पूछा, "आप दोनों बातें एक साथ कह रहे हैं, आ--जाओ। आओ भी और जाओ भी!' तो मैंने उनको कहा कि जिंदगी में दोनों साथ ही हैं। जहां आना है, वहां जाना जुड़ा हुआ है। आने का मतलब ही है, जाने की शुरुआत। और जवान होने का मतलब है बूढ़ा होना। और जन्म लेने का मतलब है मरने की तैयारी।


पूरे सत्य को अगर हम देखने जायेंगे, तो उसमें सब है अपनी पूर्णता में, लेकिन हमारी न तो हिम्मत है कि उतनी पूर्णता को देख सकें। हम तो काटकर च्वाइस करेंगे। तो वे जो परिभाषाएं हैं, वे तो हमारे चुनाव हैं, हमारी आकांक्षाएं हैं। अब ऋषि कहता है, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चल। इसमें ऋषि भगवान के खिलाफ बड़ी शिकायत कर रहा है। वह यह कह रहा है, अंधकार क्यों है? प्रकाश ही चाहिए। वह यह कह रहा है कि तुमने बड़ी भूल की जो अंधकार दिया; सिर्फ प्रकाश चाहिए। मुझे तो प्रकाश की तरफ ले चल।


सत्य तो अंधकार भी है और प्रकाश भी; वह जीवन भी है, मृत्यु भी। जब हम ऐसा देखेंगे--ये दोनों, जो हमें विरोधी लगते हैं, जब हमें एक ही चीज के छोर दिखायी पड़ेंगे, तभी हम जान पायेंगे कि क्या है। और जब हम ऐसे विरोध को एक साथ जान पायेंगे, तो हमारे चित्त के सब खंड विदा हो जायेंगे, तब हमारी कोई आकांक्षा न रह जायेगी, क्योंकि आकांक्षा का फिर कोई मतलब नहीं है। फिर अंधेरा होगा, तो हम जानेंगे कि प्रकाश के आने की तैयारी है। प्रकाश होगा, तो यह अंधेरे की तैयारी है। और दुख होगा तो जानेंगे, आसपास कहीं सुख है। और सुख होगा, तो हम जानेंगे कि तैयार रहो, दुख आता है। दुख के लिए हमारी तैयारी होगी। हम जानेंगे कि यह हमारा जीवन है। लेकिन अभिलाषाएं सुख देती हैं बहुत। और धर्म के नाम पर तो बहुत कुछ हमारी मनोकांक्षाएं हैं, इच्छाएं हैं जो चलती हैं। जो दुखी हैं, पीड़ित हैं।.........

                                                                      ....OSHO.

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