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Monday, February 27, 2012

मामले का हश्र

सामूहिक ज्यादती... अलग-अलग महिलाएं..अलग-अलग जगहें.. तकरीबन तीस दरिंदे.. लेकिन सबकी पाश्विक मानसिकता एक समान-औरत लूटने के लिए है.. कानून ठेंगे पर रखने के लिए है और पुलिस तमाशा देखने के लिए। वरना क्या वजह है कि ऐसे कुकर्मी बेखौफ होकर लगातार अपनी करतूतों को अंजाम दे रहे हैं? समाज को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए कठोर कानूनों की उतनी जरूरत नहीं होती है जितनी काबिल अधिकारियों की.. और अपराधियों का दिमाग ठिकाने रखने के लिए जरूरी होता है पुलिस का खौफ। पर यहां मामला एकदम उलटा है..पुलिस का खौफ है तो, पर अपराधियों को नहीं, सीधे-सादे आम आदमी के बीच।

अपने लुटे हुए जिस्म और टूटे हुए वजूद के साथ पीड़ित महिला को मजबूरीवश मीडिया का सहारा लेना पड़ता है.. तब कहीं जाकर उसकी रिपोर्ट दर्ज हो पाती है। और अपराधियों को सजा दिलाने तक मामले का हश्र क्या होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

ज्यादती के मामलों की सुनवाई के दौरान महिला के साथ होने वाली जलालत भरी पूछताछ.. कानूनी उलझन और अनावश्यक देरी न केवल मामले को उलझाती है बल्कि कानून की खामियों का फायदा उठाकर अपराधी भी बच निकलते हैं। सभ्य समाज बनाने के लिए जरूरत इस बात की है कि न केवल ऐसे अपराधियों के मन में पुलिस का... बल्कि कड़े कानूनों का ऐसा भय पैदा किया जाए, जिससे अपनी करतूत को अंजाम देने से पहले ही उनकी रूह कांप जाए और उनकी अगल हजारों पुश्तें भी ऐसा कुकर्म करने की न सोच पाएं।

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