हर लम्हा मेरे चंचल मन के अरमान बदलते रहते हैं,
किस्सा तो वही फरसूदा है उनवान बदलते रहते हैं
कायम हैं जहां में दो चीजें इक हुस्न तेरा इक इश्क मेरा
पूजा के मगर ऐ बुत तेरी सामान बदलते रहते हैं।
जब जीस्त का अपना मकसद ही तेरी खिदमत करना ठहरा
फिर इसकी शिकायत क्या तेरे फरमान बदलते रहते हैं।
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