DURGWALA
अधूरे-पूरे सपनो का शहर
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Thursday, November 3, 2011
कहीं ये मैं तो नहीं
मद्धिम आभा से
पहरो चुपचाप हीं निहारते हुये
आस-पास
कोई संध्या अजनबी सा वजूद
डोलता है मेरे आस-पास
कहीं ये मैं तो नहीं
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