बुरे को खोजना है, बुरा मिल जाएगा। दुख को खोजना है, दुख मिल जाएगा। पीड़ा खोजनी है, पीड़ा मिल जाएगी। शैतान खोजना है, शैतान मिल जाएगा। परमात्मा खोजना है, तो वह भी मौजूद है, जस्ट बाई दि कार्नर। वहीं, जहां शैतान खड़ा है। शायद इतना भी दूर नहीं है। शायद शैतान भी परमात्मा के चेहरे को गलत रूप से देखने के कारण है।
जिस आदमी को कांटों के बीच फूल खिला हुआ मालूम पड़ता है और जो कहता है, धन्य है! लीला है, रहस्य है प्रभु का! इतने कांटों के बीच फूल खिलता है! उस आदमी को बहुत दिन कांटे दिखाई नहीं पड़ेंगे। जो इतने कांटों के बीच फूल को देख लेता है, वह थोड़े ही दिनों में कांटों को फूल के मित्र की तरह देख ही पाएगा। वह, कांटे फूल की रक्षा के लिए हैं, यह भी देख पाएगा। अंततः वह यह भी देख पाएगा कि कांटों के बिना फूल नहीं हो सकता है, इसलिए कांटे हैं। और आखिर में कांटों का जो कांटापन है, खो जाएगा; और कांटे भी धीरे-धीरे फूल ही मालूम पड़ने लगेंगे।
जिस आदमी को कांटों के बीच फूल खिला हुआ मालूम पड़ता है और जो कहता है, धन्य है! लीला है, रहस्य है प्रभु का! इतने कांटों के बीच फूल खिलता है! उस आदमी को बहुत दिन कांटे दिखाई नहीं पड़ेंगे। जो इतने कांटों के बीच फूल को देख लेता है, वह थोड़े ही दिनों में कांटों को फूल के मित्र की तरह देख ही पाएगा। वह, कांटे फूल की रक्षा के लिए हैं, यह भी देख पाएगा। अंततः वह यह भी देख पाएगा कि कांटों के बिना फूल नहीं हो सकता है, इसलिए कांटे हैं। और आखिर में कांटों का जो कांटापन है, खो जाएगा; और कांटे भी धीरे-धीरे फूल ही मालूम पड़ने लगेंगे।
और जिस आदमी ने देखा कि कांटे ही कांटे हैं; कहीं एकाध फूल खिल जाता है भूल-चूक से, यह एक्सिडेंट मालूम होता है। यह फूल एक्सिडेंट है, कांटे असलियत हैं। बात भी ठीक लगती है। कांटे बहुत, फूल एक। वह आदमी बहुत दिन तक फूल में भी फूल को नहीं देख पाएगा। बहुत जल्दी उसको फूल में भी कांटे दिखाई पड़ने लगेंगे।
हमारी दृष्टि धीरे-धीरे फैलकर निरपेक्षपूर्ण हो जाती है। लेकिन अस्तित्व? अस्तित्व द्वंद्व है; वहां दोनों मौजूद हैं।
हमारी दृष्टि धीरे-धीरे फैलकर निरपेक्षपूर्ण हो जाती है। लेकिन अस्तित्व? अस्तित्व द्वंद्व है; वहां दोनों मौजूद हैं।
योगाभ्यासी का अर्थ है, ऐसा व्यक्ति, जो जीवन में शांति की खूंटियां खोजता है, आनंद की खूंटियां खोजता है। फूल खोजता है। आशा खोजता है। सौंदर्य खोजता है। आनंद खोजता है। जो जीवन में नृत्य खोजता है, उत्सव खोजता है। जीवन में उदासी बटोरने का जिसने ठेका नहीं लिया है। जो जगह-जगह जाकर कांटे और कंकड़ नहीं खोजता रहता है। और जिनको इकट्ठा करके छाती पर रखकर चिल्लाता नहीं है कि जिंदगी बेकार है, अर्थहीन है।
योगाभ्यास का अर्थ है, जीवन को विधायक दृष्टि से देखने का ढंग। योग जीवन की विधायक कीमिया है, पाजिटिव केमेस्ट्री है। और उसका अभ्यास करना पड़ेगा। क्योंकि आपने अभ्यास किया हुआ है। अगर आप पुराने अभ्यास को ऐसे ही, बिना अभ्यास के छोड़ने में समर्थ हों, तो छोड़ दें। तो फिर नए अभ्यास की कोई भी जरूरत नहीं है।
लेकिन वह पुराना अभ्यास जकड़ा हुआ है, भारी है; वह छूटेगा नहीं। उसे इंच-इंच जैसे बनाया, वैसे ही काटना भी पड़ेगा। जैसे घर बनाया, वैसे अब एक-एक ईंट उसकी गिरानी भी पड़ेगी। भला वह ताश का ही घर क्यों न हो, लेकिन ताश के पत्ते भी उतारकर रखने पड़ेंगे। भला ही वह कितनी ही झूठी व्यवस्था क्यों न हो, लेकिन झूठ की भी अपनी व्यवस्था है; उसको भी काटना और मिटाना पड़ेगा।
योगाभ्यास गलत अभ्यासों को काटने का अभ्यास है। ठीक विपरीत यात्रा करनी पड़ेगी। जिस व्यक्ति में कल तक देखा था बुरा आदमी, उसमें देखना पड़ेगा भला आदमी। जिसमें देखा था शत्रु, उसमें खोजना पड़ेगा मित्र। जहां देखा था जहर, वहां अमृत की भी तलाश करनी पड़ेगी। यह तो हुई एक बहिर्व्यवस्था।
और फिर अपने में भी यही करना पड़ेगा। अपने भीतर भी जिन-जिन चीजों को बुरा देखा था, उन-उन में शुभ को खोजना पड़ेगा। कामवासना में देखा था नरक का मार्ग, अब कामवासना में स्वर्ग का मार्ग भी देखना पड़ेगा। स्वर्ग का मार्ग कामवासना में देखते से ही, काम की वासना ऊर्ध्वगामी होकर स्वर्ग के मार्ग को भी लगा देती है। कल तक क्रोध में देखा था सिर्फ क्रोध, अब क्रोध में उस शक्ति को भी देखना पड़ेगा, जो क्षमा बन जाती है। क्रोध की शक्ति ही क्षमा बनती है। काम की शक्ति ही ब्रह्मचर्य बनती है। लोभ की शक्ति ही दान बन जाती है।
देखना पड़ेगा; खोजना पड़ेगा। अब तक एक तरह से देखा था जीवन को, अब ठीक विपरीत तरह से देखना पड़ेगा। उस विपरीत तरह के देखने की क्या विधियां हैं, उनकी बात मैं संध्या करूंगा। इस सूत्र पर भी पूरी बात संध्या करेंगे। अभी इतना ही खयाल में लें कि अगर गलत का अभ्यास किया है, तो गलत को काटने का भी अभ्यास करना पड़ेगा।
... निश्चित ही, जब गलत कट जाता है, तो जो शेष रह जाता है वह शुभ है।
योगाभ्यास का अर्थ है, जीवन को विधायक दृष्टि से देखने का ढंग। योग जीवन की विधायक कीमिया है, पाजिटिव केमेस्ट्री है। और उसका अभ्यास करना पड़ेगा। क्योंकि आपने अभ्यास किया हुआ है। अगर आप पुराने अभ्यास को ऐसे ही, बिना अभ्यास के छोड़ने में समर्थ हों, तो छोड़ दें। तो फिर नए अभ्यास की कोई भी जरूरत नहीं है।
लेकिन वह पुराना अभ्यास जकड़ा हुआ है, भारी है; वह छूटेगा नहीं। उसे इंच-इंच जैसे बनाया, वैसे ही काटना भी पड़ेगा। जैसे घर बनाया, वैसे अब एक-एक ईंट उसकी गिरानी भी पड़ेगी। भला वह ताश का ही घर क्यों न हो, लेकिन ताश के पत्ते भी उतारकर रखने पड़ेंगे। भला ही वह कितनी ही झूठी व्यवस्था क्यों न हो, लेकिन झूठ की भी अपनी व्यवस्था है; उसको भी काटना और मिटाना पड़ेगा।
योगाभ्यास गलत अभ्यासों को काटने का अभ्यास है। ठीक विपरीत यात्रा करनी पड़ेगी। जिस व्यक्ति में कल तक देखा था बुरा आदमी, उसमें देखना पड़ेगा भला आदमी। जिसमें देखा था शत्रु, उसमें खोजना पड़ेगा मित्र। जहां देखा था जहर, वहां अमृत की भी तलाश करनी पड़ेगी। यह तो हुई एक बहिर्व्यवस्था।
और फिर अपने में भी यही करना पड़ेगा। अपने भीतर भी जिन-जिन चीजों को बुरा देखा था, उन-उन में शुभ को खोजना पड़ेगा। कामवासना में देखा था नरक का मार्ग, अब कामवासना में स्वर्ग का मार्ग भी देखना पड़ेगा। स्वर्ग का मार्ग कामवासना में देखते से ही, काम की वासना ऊर्ध्वगामी होकर स्वर्ग के मार्ग को भी लगा देती है। कल तक क्रोध में देखा था सिर्फ क्रोध, अब क्रोध में उस शक्ति को भी देखना पड़ेगा, जो क्षमा बन जाती है। क्रोध की शक्ति ही क्षमा बनती है। काम की शक्ति ही ब्रह्मचर्य बनती है। लोभ की शक्ति ही दान बन जाती है।
देखना पड़ेगा; खोजना पड़ेगा। अब तक एक तरह से देखा था जीवन को, अब ठीक विपरीत तरह से देखना पड़ेगा। उस विपरीत तरह के देखने की क्या विधियां हैं, उनकी बात मैं संध्या करूंगा। इस सूत्र पर भी पूरी बात संध्या करेंगे। अभी इतना ही खयाल में लें कि अगर गलत का अभ्यास किया है, तो गलत को काटने का भी अभ्यास करना पड़ेगा।
... निश्चित ही, जब गलत कट जाता है, तो जो शेष रह जाता है वह शुभ है।
ओशो
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