सब देखता हूँ, सब जानता हूँ, फिर भी अपनी आँखे मै मूँद रहा हूँ |
इन शब्दों में थोड़ी है शर्म, और ज्यादा लाचारी है |
क्यूँ की इन शब्दों की ताकत कुछ शब्दों से ही हारी है |
उन "कुछ शब्दों" की अपनी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं है |
उन "कुछ शब्दों" को, किताब की पीड़ा का कोई भान नहीं है |
मै भी ये सब होते देख रहा हूँ, हार कर अपने घुटने टेक रहा हूँ |
मेरी भी लाचारी पर मै बस सूखी मिट्टी को तलवो से गूंध रहा हूँ|
सब देखता हूँ, सब जानता हूँ फिर भी अपनी आँखे मै मूँद रहा हूँ
शब्दों की खोई गठरी से ....
शर्मिन्दा शब्दों के मुखिया को ही, इन शब्दों से जैसे कोई बैर है
मानो वो कुछ शब्द ही है उनके अपने, बाकी हर शब्द जैसे गैर है |
उन "कुछ शब्दों" को बचाने को, उनका हर अपराध छुपाने को
ये "शर्मिन्दा शब्दों का मुखिया" हर आक्षेप खुद पर ही लेता हैं |
मै भी ये सच जान रहा हूँ, दोषी दोनों को ही मै मान रहा हूँ |
कैसे किसी को निर्दोष कहूँ, खुद से ही मै ये पूँछ रहा हूँ |
सब देखता हूँ, सब जानता हूँ, फिर भी अपनी आँखे मै मूँद रहा हूँ|
शब्दों की खोई गठरी से ....
"कुछ शब्दों" की मक्कारी से, मासूम शब्दों की गरिमा घटती है|
उन मासूमों की छाती भी, शायद इस मक्कारी से फटती है !
"कुछ शब्दों" की इस मक्कारी को, मासूम कहाँ समझ पाते हैं ?
और यही बात है जिसका फायदा, ये सारे मक्कार उठाते हैं |
मै भी इस मक्कारी को समझ रहा हूँ, दर्द में मै भी तडप रहा हूँ |
पर आक्रोश की आंधी मे, मै अब परिवर्तन की महक सूंघ रहा हूँ |
सब देखता हूँ, सब जानता हूँ फिर भी अपनी आँखे मै मूँद रहा हूँ |
शब्दों की खोई गठरी से ....
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