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Monday, August 15, 2011

‘आरक्षण’ के बहाने ‘राजनीति’

अपनी फिल्में रिलीज़ होने से पहले ही विवादों के घेरे में रहने वाले फिल्मकार प्रकाश झा की नई फिल्म ‘आरक्षण’ भी विवादों में घिर गई है। सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर फिल्म बनाना और फिर उन्हें विवादों में लाना और इन विवादों के जरिए फिल्म से कमाना झा का पुराना शगल रहा है। दामुल मृत्युदंड, गंगाजल, अपहरण और राजनीति उनकी ऐसी ही फिल्में रही हैं जो एक औसत फिल्म के मुकाबले कहीं भी नहीं ठहरती हैं लेकिन झा के कौशल से इन फिल्मों ने अच्छा कारोबार किया है। फिलहाल ‘आरक्षण’ पर ‘राजनीति’ जारी है और भाई लोग फिल्म बिना देखे ही उस पर रोक लगाने पर आमादा हैं। फिल्म के खिलाफ जहां प्रकाश झा के घर पर हमले हो रहे हैं वहीं तथाकथित बुद्धिजीवी भी इस फिल्म का प्रदर्शन रोकने की मांग कर रहे हैं। फिलहाल ‘आरक्षण’ पर ‘राजनीति’ जारी है और दलित राजनीति के पहरूए फिल्म बिना देखे ही उस पर रोक लगाने पर आमादा हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब और आंध्र में फिल्म पर रोक लग चुकी है।
बात उस समय की है जब अयातुल्ला खुमैनी ने ‘दि सैनेटिक वर्सेस के लेखक सलमान रश्दी का सर कलम करने का फतवा दे दिया था। उस समय किसी पत्रिका में डॉ. राही मासूम रजा ने लिखा था कि लगता है रश्दी ने भारतीय अधिकारियों को रिश्वत देकर किताब पर प्रतिबन्ध लगवाया, क्योंकि किताब बकवास है और न रश्दी इस काबिल लेखक हैं। याद रहे कि भारत पहला देश था जिसने रश्दी की किताब पर प्रतिबंध लगाया था और उसके बाद किताब सारी दुनिया में चर्चा में आई। उसी लेख में सवाल था कि जब खुमैनी से पूछा गया कि क्या आपने सैनेटिक वर्सेस पढ़ी है तो उनका जवाब था कि ऐसी वाहियात किताब वो क्यों पढ़ेंगे जिसमें खुदा की शान में गुस्ताखी की गयी है। यानी बिना पढ़ेे ही सर कलम करने का फतवा जारी कर दिया गया।
राही मासूम रज़ा ने जो बात ‘दि सैनेटिक वर्सेस’ के विषय में लिखी थीं वे सब ‘आरक्षण’ के विषय में भी सच होती दिख रही हैं। दरअसल अतिवादिता हर तरफ काम कर रही है चाहे ‘आरक्षण’ के समर्थक हों या विरोधी। मुद्दा यह है कि अगर आपको आरक्षण मांगने और लेने का हक़ हासिल है तो दूसरे को उस पर सवाल उठाने का भी तो हक़ है? किस तरह आप तालिबानी फरमान जारी कर सकते हैं कि ये फिल्म दिखाओ और ये मत दिखाओ। इसलिए फिल्म पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग जो लोग भी कर रहे हैं असल में वे प्रकाश झा की दुकानदारी ही बढ़ा रहे हैं, फिल्म वैसी ही बकवास होगी जैसी अब तक होती रही हैं लेकिन जब सियासत अंधा बना देती है तो दूसरे की बात सुनने की क्षमता समाप्त हो जाती है। हमें दूसरों को सुनने की भी आदत डालनी चाहिए भले ही दूसरा गलत क्यों न हो। अगर फिल्म गलत भी है तो आप उसकी आलोचना करें, विरोध करें अपने समर्थकों से कहें कि वे फिल्मकार पर मुकदमा करें। वैसे भी फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड नाम की संवैधानिक संस्था है और उसने फिल्म को यू/ए प्रमाणपत्र दे दिया है। क्या फिल्म का प्रदर्शन रोकने की मांग करने वाले कोई सुपर पाॅवर हैं जिनके आदेश पर सेंसर बोर्ड कार्य करे? इतना ही नहीं मुबई उच्च न्यायालय भी फिल्म के रिलीज़ करने को मंजूरी दे चुका है। अदालत ने तो यहां तक कहा कि फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसा करने का कोई आधार नहीं है।
लेकिन एक दलितप्रेमी बुद्धिजीवी ने तो बाकायदा फरमान ही जारी कर दिया कि-”ज्यादातर सांसद अभी दिल्ली निवास पर मिलेंगे। उठाएं मोबाइल। फोन करके बताएं कि आरक्षण फिल्म पर आप बैन चाहते हैं। विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अमर्यादित नहीं हो सकती। आरक्षण का प्रावधान संविधान के मौलिक अधिकार के खंड में है। यह देश की एकता अखंडता से कम महत्वपूर्ण बात नहीं है।“
ऐसा ही माहौल इससे पहले भी इस देश में बनता रहा है। भीष्म साहनी के ‘तमस‘ को लेकर देश का माहौल बहुत विषाक्त रहा और दीपा मेहता की फिल्म ‘वाटर’ की तो शूटिंग ही बजरंगियों ने नहीं होने दी। हाल ही में आई फिल्म खाप पर भी खाप पंचायतों को आपत्ति रही। हबीब तनवीर का नाटक ‘चरणदास चोर’ पर भी इसी तरह के बवाल हो चुके हैं। ऐसे उपद्रव हमें सोचने पर मजबूर करते है कि आखिर हम सांस्कृतिक और सामाजिक तौर पर बालिग कब होंगे?


यहां वरिष्ठ साहित्यकार वीरेन्द्र यादव के मत से सहमत हुआ जा सकता है, ” भारतीय संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया है। इस अधिकार की रक्षा के लिए ‘आरक्षण’ फिल्म का दिखाया जाना उचित है, भले ही वह आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों को भी प्रश्नांकित करती हो। लेकिन यही अभिव्यक्ति की आजादी अरून्धती राय से क्यों छीन ली जाती है, जब वे कश्मीर पर मुखर होती है ???“
वैसे भी फिल्में कोई बड़ा सामाजिक बदलाव नहीं लाती हैं सिर्फ एक मैसेज भर देती हैं। अगर फिल्मों से ही क्रांतियां होने लगें तब तो हर शुक्रवार को हिन्दुस्तान में नई क्रांति होने लग जाए। जहां तक ‘आरक्षण’ का सवाल है तो पहले तो यही देखने वाली बात है कि अमिताभ बच्चन, सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण को लेकर क्या किसी कालजयी सामाजिक फिल्म की आशा की जा सकती है? आरक्षण के सभी कलाकारों में अमिताभ ही सबसे बड़ा नाम हैं लेकिन उनके पूरे कैरियर में क्या एक भी ऐसी फिल्म का नाम गिनाया जा सकता है जिसे उच्च दर्जे की सामाजिक फिल्म कहा जा सके। अमिताभ, बलराज साहनी या उत्पल दत्त नहीं हैं जो कालजयी किरदार जी सकें।
दूसरे न इस फिल्म के प्रदर्शन से आरक्षण समाप्त हो जाएगा और न इसके प्रदर्शन पर रोक से समाज में समरसता आ जाएगी। जाति व्यवस्था भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई है इसे न आरक्षण दूर कर सकता है और न कोई कानून। वस्तुतः फिल्म पर प्रतिबंध की मांग एक फासीवादी मांग है। फासिज्म के अपने अलग-अलग रूप हैं। जातिवादी राजनीति भी उसी का एक मोर्चा है।
वैसे भी भावनाओं में बहकर अंध विरोध से विमर्श नहीं हो सकता। आप दूसरे का पक्ष सुनने का धैर्य भी अपने अंदर पैदा करिए। आरक्षण एक तबके के उत्थान के साधन हो सकता है लेकिन यह भी तो कड़वी सच्चाई है कि जिनके लिए आरक्षण दिया गया उस शोषित और वंचित तबके तक उसका लाभ सही तरीके से पहुंचा ही नहीं। आज भी आरक्षण का लाभ वह तबका उठा रहा है जो साधन संपन्न है। आप सहमत हों या न हों लेकिन प्रकाश झा की एक बात में तो दम है कि आरक्षण तो बढ़ा लेकिन सरकारी संस्थानों में सीटें नहीं बढ़ीं जिसके चलते निजी पूंजी शिक्षा के क्षेत्र में उतरी। इस तर्क को अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के अध्यक्ष पी एल पुनिया ने भी अप्रत्यक्ष तौर पर स्वीकार किया। उन्होंने कहा, ‘‘यह फिल्म शिक्षा के व्यवसायीकरण के खिलाफ है, अनुसूचित जाति को अधिकार दिलाने को लेकर जो भूमिका है उसे अमिताभ बच्चन ने निभाया है लेकिन जो संवाद है वह अनुसूचित जाति के लिए अपमानजनक है जो पूरे समाज की समरसता के लिए घातक है।’’ प्रकाश झा ने एक साक्षात्कार में कहा था-” भारत का समाज जातिगत समाज है। हमारे यहाँ आरक्षण की व्यवस्था है। ये बातें सच हैं और इन्हें मानना पड़ेगा। अब सवाल ये है कि अगर आरक्षण एक सच्चाई है तो आगे क्या करें? हमें सबका दर्द समझना होगा और इस पर भी गौर करना होगा कि इस वजह से कैसे हमारी शिक्षा प्रणाली का व्यावसायीकरण हो गया है। रिजर्वेशन हुआ तो कॉलेजों में सीटें कम हो गईं, प्रतियोगिता बढ़ी, कोंचिंग संस्थान खुले। पैसे वालों को नजर आया कि ये तो अच्छा अवसर है। अब तो ये करोड़ों रुपए का उद्योग बन चुका है। सरकार भी केवल जीडीपी का दो या तीन फीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च करती है।“ अब अगर प्रकाश झा की इस बात में दम नहीं है तो आप अपने तर्क पेश कीजिए।
इसी तरह फिल्म के निर्माण के दौरान ही विवाद खड़ा हुआ कि सैफ अली खान क्यों दलित का रोल अदा कर रहे है? यह बेहद बचकाना और फूहड़ तर्क था। अगर एक कलाकार भिन्न-भिन्न रोल अदा नहीं कर सकता तो वह संपूर्ण कलाकार नहीं है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह दलित साहित्य और दलित राजनीति में आक्रामकता और हिंसा का पुट आया है उसने इस समूह का अहित ही किया है। दलित साहित्य के पहरूए तो मुंशी प्रेमचंद और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला पर भी प्रश्न उठाते रहे हैं फिर सैफ की तो हैसियत ही क्या है।
मौजूदा प्रकरण में आग में घी डालने का काम अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के अध्यक्ष के अध्यक्ष पी एल पुनिया ने किया है। उसका कारण साफ है। उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव सिर पर हैं। पुनिया जी को गलतफहमी हो गई है कि वह दलितों के मायावती से बड़े नेता हैं और दूसरे बाबू जगजीवन राम बनने जा रहे हैं। इसलिए उन्हें ‘आरक्षण’ के बहाने ‘प्रकाश’ में आने का सुअवसर मिल गया। अब पुनिया जी ने पहल की तो बहन जी कैसे पीछे रहतीं सो उन्होंने भी बिना फिल्म देखे ही उसके प्रदर्शन पर रोक लगा दी। यहां सैफ अली खान की बात में दम है कि लोगों की अपनी-अपनी राजनीति है और इसी वजह से इस फिल्म पर विवाद हो रहा है। ‘आरक्षण’ पर असल ‘राजनीति’ का मकसद तो उत्तर प्रदेश का आगामी चुनाव है, फिल्म तो बहाना है। लिहाजा ‘आरक्षण’ पर ‘राजनीति’ देखते रहिए और प्रकाश झा के गुण गाते रहिए। अगले हफ्ते सूचना का इंतजार है ‘आरक्षण’ ने एक हजार करोड़ रूपए का कारोबार किया।  

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