
इसे भीड़तंत्र या भेड़चाल नहीं कह सकते। ऐसा कहना मध्यवर्ग के साथ उन विशिष्ट प्रतिभाओं को भी भीड़ मान लेना होगा जो अपने लेखों और वक्तृताओं के जरिए चैतरफा चंदन छींट रही हैं। प्रतिष्ठित जनांदोलनकारी और नवउदारवाद विरोध की राजनीति के दावेदार अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की हर चंद कोशिश में लगे हैं। उन्हें शायद लग गया है कि इस नजारे के बाद मीडिया और जमीन दोनों पर पैर टेकने के लिए उन्हें टीम अन्ना का मुंह देखना होगा। एक वरिष्ठ पत्रकार साथी तिलक लेकर ऐसे भाव-विह्नल हुए हैं कि अन्ना और उनकी टीम से रामलीला मैदान से राजनीतिक पार्टी की घोषणा कर देने की गुहार लगाते हैं। साथी को टीम अन्ना को सलाह देनी चाहिए कि रामलीला मैदान से घोषित होने वाली पार्टी के सदस्य वही नागरिक बन सकते हैं जो राजनीति से नफरत करते हों। इसका बिजली के करंट की तरह असर होगा। खड़े-खड़े लाखों सदस्य बन जाएंगे। पदाधिकारी की कसौटी किसी एनजीओ का पदाधिकारी होना बनाई जा सकती है। बड़ी एनजीओ तो बड़ा पदाधिकारी, छोटी एनजीओ छोटा पदाधिकारी। भीड़ से ज्यादा बड़े लोगों के समर्थन का जादू टीम अन्ना के सिर इस कदर चढ़ कर बोला है कि उसने इरोम शर्मीला को भी भ्रष्टाचार के घाट पर आकर तिलक लेने का संदेश भेज दिया। ‘जय हो जय हो!’
स्वामी अग्निवेश टीम अन्ना के प्रमुख नुमाइंदों में से हैं। चुस्ती-पफुर्ती में हनुमान जी की याद दिलाते हैं। भ्रष्टाचार के घाट पर इस बार उनकी कम चल रही है। पिछले अनशन जैसा जलवा नहीं है। इस बार दूत के बतौर अन्ना हजारे ने अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और प्रशांत भूषण को नियुक्त किया है। श्री श्री रविशंकर हैं कि उनकी जगह छेकने में लगे हैं। स्वामी जी निराश होकर अपने सरकारी घाट की तरफ चलते नजर आ रहे हैं। उन्हें निराश होने के बजाय कोई तरकीब निकालनी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि टीम अन्ना का चंदन उन्हें घर का छोड़े न घाट का! एक तरकीब हम बताते हैं – वे नक्सलवादियों से तिलक लेने आने की अपील कर डालें। दूरी और कानूनी मजबूरी की वजह से नक्सली भ्रष्टाचार के घाट पर आने में असमर्थतता जाहिर करें तो स्वामी जी डिबिया में थोड़ा चंदन और पन्नी में एक सलाई लेकर जंगल चले जाएं। पासा तुरंत उनके पक्ष में पलट जाएगा। मीडिया अन्ना को छोड़ कर उन पर टूट पड़ेगा।
मेधा ताई अन्ना जी से कह रही हैं, भ्रष्टाचार पर तो आपने अच्छा चंदन पोत दिया है, थोड़ा दूसरी समस्याओं पर भी हल्का तिलक कर दीजिए। जैसे भूमि अधिग्रहण, किसानों की आत्महत्या वगैरहा। व्यवस्था परिवर्तन में यह सब आएगा ही तो अभी से घोषणा हो जाने में बुराई नहीं है। लेकिन मेधा के अन्ना और मीडिया के अन्ना में उलट का फर्क है। वहां सूई जन लोकपाल बिल को आज और अभी कानून बनाने पर अटकी है। सरकार को भी यही माफिक आ रहा है और विपक्ष को भी। साथी संदीप पांडे और राजेंद्र सिंह ने भी तिलक लिया है। सोचा होगा कि तिलक लेने से भ्रष्टाचार विरोधी जनभावना का अपने आगे के कामों के लिए लाभ लिया जा सकता है। घाट पर जाकर भावनाएं पवित्र हो ही जाती हैं! यह तिलक लेने वाले साथियों की बड़ी मजेदार बात है। राजनीति के तालाब में कांग्रेस, भाजपा और उनके सहयोगी मगरमच्छों के रहते छोटी-छोटी मछलियों को गुमान है कि वे अन्ना के आंदोलन में उमड़े अप्रत्याशित जनसमर्थन को निगल लेंगी!
कुछ बुद्धिजीवियों ने ऐतराज उठाया है कि भ्रष्टाचार के घाट पर दलित, पिछड़े, मुसलमान आदि तिलक नहीं ले रहे हैं। उनमें कुछ कहते हैं सबको शामिल करो, कुछ का मानना है इस सवर्णवादी-हिंदुत्ववादी आंदोलन में शामिल होने की जरूरत नहीं है। बुद्धिजीवियों की यह शिकायत वाजिब नहीं लगती। पिछड़ों में अगड़े तो वहां काफी संख्या में मौजूद हैं। उसी उत्साह से जैसे खालिस अगड़े आरक्षण विरोधी आंदोलन में शामिल हुए थे। कुछ न कुछ मुसलमान जब भाजपा-आरएसएस को मिल जाते हैं तो टीम अन्ना को क्यों न मिलेंगे? ‘जनसत्ता’ ने फ्रंट पर फोटो छाप कर दिखाया ही है कि कुछ (नव)उदारवादी मुसलमान जामा मस्जिद के इमाम की हिदायत के बावजूद तिलक ले रहे हैं। धर्म के खैरख्वाहों को डर है इस हल्ले में उनके मुंह से ‘वंदे मातरम्’ न निकल जाए! खैर, ऐसा भी क्या है? देश में रहने के लिए भले न कहें, भाजपा में तो कहना होता ही है।
रही दलितों की बात, तो संत रैदास ने काफी विनती की कि ‘प्रभु तुम चंदन हम पानी’, लेकिन प्रभु ने ही यह कहते हुए मना कर दिया कि भाई पानी बड़ी पवित्र चीज होती है! कितना ही आध्ुनिक और वैज्ञानिक जमाना आ जाए, प्रभु के आदेश से बड़ा कोई बुद्धिजीवी नहीं हो सकता। तिलकधारियों ने कह दिया है कि बुद्धिजीवी अन्ना और उनके भ्रष्टाचार के घाट पर जुटी संतो की भीड़ से चिढ़ते हैं। असली बुद्धिजीवी उन्हें माना जाए जिन्होंने तिलक लिया है। हमें उनकी बात ठीक जंचती है। बेहतर हो कि ऐसे बुद्धिजीवी अपना ऐतराज सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार बुद्धिजीवियों के सामने उठाएं, जो तिलक लेने में होड़ ले रहे हैं। या नहीं लेने वालों के साथ बैठ कर भजन करें। कौन रोकता है?
सामंती मध्यकाल में मीडिया तो था नहीं, चित्रकूट पर जो भी जमावड़ा हुआ होगा, रामजी की कृपा से हुआ होगा। रामजी की कृपा के गाने आज तक चलते हैं। लेकिन आधुनिक काल में असली महिमा मीडिया की है। जो अन्ना हजारे और उनकी टीम कल तक विश्व बैंक से लेकर भारत सरकार के पुरस्कारों और अनुदानों के लिए जुगत करती घूमती थी, आज मीडिया की मार्फत व्यवस्था परिवर्तन और दूसरी आजादी की पुरोध बन चुकी है। नवउदारवाद और संप्रदायवाद विरोधी ज्यादातर साथी मीडिया के जिन मालिकों, एंकरों और रिपोर्टरों को बाजारवादी और सांप्रदायिक होने या हो जाने के लिए कोसते थे, उनके साथ घी-शक्कर हो रहे हैं। कह रहे हैं यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, नवउदारवाद के खिलाफ देश की जनता विद्रोह है। बस वे जनता के साथ ‘मेहनतकश’ नहीं लगा रहे हैं। पता नहीं क्या दुविधा बाकी है? नवउदारवादियों को उनकी मान्यता से कोई ऐतराज नहीं है। वे (नवउदारवादी) देख रहे हैं, प्रछन्न नवउदारवादी प्रकट रूप में सामने आ रहे हैं। टीम बढ़ रही है। और क्या चाहिए? ‘जय हो जय हो!’
यह भी मीडिया की ही महिमा है कि सप्ताह भर में टीम अन्ना का आंदोलन महज भ्रष्टाचार विरोध का न रह कर, व्यवस्था परिवर्तन और उससे भी आगे आजादी की दूसरी लड़ाई का आंदोलन बन चुका है। सब आलोचनाएं ऐसे डूब गई हैं जैसे चुनाव प्रचार में नेताओं की डूब जाती हैं। टीम अन्ना का प्रचार भी कम नहीं है। मुख्यधारा राजनीति के प्रचार की तरह है। जेपी के लोग कहे जाने वाले लोगों ने खुद कह दिया है, इस आंदोलन के सामने जेपी छोटे पड़ चुके हैं। गांधीवादियों ने अन्ना हजारे को, जाहिर है, उनकी टीम को भी, पूरा गांधीवादी मान लिया है। भले ही अपने जीवन काल में कभी तिलक न लिया हो, इस बार भ्रष्टाचार के घाट पर केवल गांधी की तस्वीर लगी है। गांधीवादियों का अन्ना को गांधीवादी मानना ठीक भी है। जब मीडिया ने मान लिया तो मानो सबने मान लिया। सरकार ने भी। कांग्रेसी सरकारें वैसे भी हमेशा गांधीवादी होती हैं। मठ सरकार से बाहर जाकर तो चलाया नहीं जा सकता?
मीडिया जब अपने बैस्ट पर आता है तो जो चाहे करा लेता है। कुजात होने का दावा करने वाले समाजवादी भी तिलक ले रहे हैं। इस उम्मीद में कि टीम अन्ना की नजर में उनकी भी कैफियत बन जाए। समाजवादी जन परिषद (सपज) के उपाध्यक्ष साथी सुनील ने प्रशांत भूषण को चिठ्ठी लिखी है। नैट पर जारी की गई चिठ्ठी में उन्होंने प्रशांत भूषण से प्रार्थना की है कि जब उन्हें ‘‘महान संघर्ष’’ से कुछ फुरसत मिले तो चिठ्ठी पढ़ लें और अपना जवाब देने का कष्ट करें। सुनील ने शिकायत की है कि रामलीला मैदान में उनकी, किशन पटनायक व सच्चिदानंद सिन्हा की भ्रष्टाचार पर लिखी पुस्तिकाएं/सामग्री बेचने से इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) के कार्यकर्ताओं ने सजप कार्यकर्ताओं को यह कह कर रोक दिया कि यहां केवल आईएसी का साहित्य ही वितरित किया जा सकता है। उन्होंने प्रशांत भूषण को याद दिलाया है कि उनकी पुस्तिक ‘भ्रष्टाचार को कैसे समझें’ का लोकार्पण उन्होंने ही किया था। इसके पहले सजप ने एक चिठ्ठी अन्ना हजारे को यह अपील करते हुए लिखी थी कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-जागृति का काम कर दिया है, इस बार केवल तीन दिन का सांकेतिक अनशन करके समाप्त करें और गांवों में चेतना जगाने के लिए निकलें।
माक्र्सवादी नास्तिक होते हैं। तिलक लेने में विश्वास नहीं करते। वे कान को दूसरी तरफ से पकड़ रहे हैं। सभी माक्र्सवादी कठोर लोकपाल के पक्ष में, यानी टीम अन्ना के पक्ष में हैं। सीपीएम ने शुरू से ही अपना अखबार टीम अन्ना के आंदोलन के समर्थन में लगाया हुआ है। वह अन्य माक्र्सवादी पार्टियों के साथ संसद में कठोर लोकपाल विधेयक लाने के लिए अड़ी है। प्रकाश करात ने लेख लिख कर कड़क लोकपाल की मांग की है। कतिपय छोटी माक्र्सवादी पार्टियां ने भी कुछ न कुछ कार्यक्रम करके, मसलन आइसा का कपिल सिब्बल को काले झंडे दिखाना, भ्रष्टाचार के घाट पर अपनी परोक्ष उपस्थिति दर्ज कराई है।
भ्रष्टाचार के घाट पर जुटी भीड़ में कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता। पीछे हैं तो बस संघी। तिलक पर उनका पेटैंट है, लेकिन सब्र देखिए! सबके लेने के बाद ही तिलक लेते हैं। गांविंदाचार्य ने कहा है कि घाट पर उनके केवल 10 प्रतिशत स्वयंसेवक हैं। ज्योति बसु जीवित होते तो देखते संघी कितने शालीन और विनम्र होते हैं। हालांकि विरोधियों को चैन नहीं है। कहते हैं, भ्रष्टाचार के घाट की व्यवस्था के पीछे संघी हैं और चंदन भी उन्हीं का चल रहा है। ‘भ्रमरगीत’ की गोपियों की तरह तर्क करते हैं, ‘बताओ यहां नहीं हैं तो कहां हैं?’ अब आप इन्हें बताइए गोविंदाचार्य, राममाधव और न जाने किस-किस का पता।
इस पूरे मसमले में कांग्रेस को सब बुरी ही नहीं, बेवकूफ भी समझ रहे हैं। आगे-आगे साफ होता चलेगा कि भ्रष्टाचार के घाट पर तिलक न लेकर उसने अल्संख्यकों, दलितों, आदिवासियों की ठेकेदारी ले ली है। और उस संविधान की भी, जिसे वित्तमंत्री बनने से लेकर अब तक मनमोहन सिंह मंडली ने एक निरर्थक दस्तावेज बना कर रख दिया है। संविधान-निर्माता की दुहाई देने वाले तब नहीं बोलते जब सरकारें नवउदारवादी कानून बना कर संविधन की समाजवादी संकल्पना को नष्ट करती हैं। संसद की ठेकेदारी भी कांग्रेस के पास रहनी है। संसद में अमेरिका में लिखा गया भारत अमेरिका परमाणु करार जिस तरह से पारित कराया गया, उसके विरोध में न तो संसद और सरकार को जनभावनाओं के आगे झुकाने वाले सड़कों पर आए, न ही झुकाने वालों को फासीवादी बता कर संसद की सांस्थानिक महत्ता और गरिमा के बचावनहार। चैतरफा भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी कांग्रेसी सरकार के लिए इससे सस्ता सौदा क्या हो सकता है? जय हो जय हो!
कुछ लोगों को अचंभा होने का रोग होता है। भ्रष्टाचार के घाट पर जुटी भीड़ पर वे अचंभा करते हैं। कहते हैं अगर ये सब भ्रष्टाचार विरोधी हैं तो क्या भारत में भ्रष्टाचार पाकिस्तान आकर कर जाता है! दिन-रात जन लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार मिटाने की रट लगाने वालों को क्या एक क्षण के लिए भी नहीं लगता कि जिस तरह से सरकारी बिल से बनने वाले लोकपाल कानून से भ्रष्टाचार नहीं समाप्त होना है, उसी तरह से टीम अन्ना के बिल पर आधरित जन लोकपाल कानून से भी नहीं? अलबत्ता मेहनतकश जनता की पीठ पर नौकरशाही का एक और भारीभरकम बोझ लद जाएगा। इंसान कोई बात दावे से और बार-बार कहता है तो उसे कल की जवाबदेही का भी खयाल करना होता है। कुछ लोगों को अचंभा है कि टीम अन्ना के नुमांइदों ने बरगलाने के मामले में नेताओं को भी पीछे छोड़ दिया है। कुछ लोग इतनी बड़ी संख्या में बरगलाने में आ जाने वालों पर भी अचंभा करते हैं। कुछ कहते हैं हमारे पास अंदर की खबर है कि खुद अन्ना और टीम को भ्रष्टाचार के घाट पर जुटी भीड़ को लेकर गहरा अचंभा है। अचंभे की बात जाने दें। इस दुनिया में कबीर जैसे अचंभा खा गए, हमारी-आपकी क्या बिसात है!
विचारों की विदाई
शुरू में थोड़ा व्यंग्यात्मक होने के लिए माफी। आइए भ्रष्टाचार विरोध की इस विशिष्ट परिघटना पर आलंकारिकता छोड़ कर सीधी चर्चा करें। इसके पहले हम इस पर दो विस्तृत समीक्षाएं लिख चुके हैं। लिहाजा, इस बार के लेख में कुछ दोहराव हो सकता है। हम स्पष्ट कर दें कि इस तीसरे लेख में भी आंदोलन की समीक्षा का हमारा परिप्रेक्ष्य नवउदारवाद और उसके प्रतिरोध का है। आंदोलन के विचारधारात्मक चरित्र के बारे में हमारी पहले वाली समझ है कि यह आंदोलन, भारत की मुख्यधारा राजनीति की तरह और उसके साथ मिल कर, नवउदारवाद को मजबूत करने वाला और विरोध को कमजोर करने वाला है। मनमोहन सिंह का काम तमाम करने में लगी टीम अन्ना, असलियत में मनमोहन सिंह का ही काम कर रही है।
समझदारी थी कि नवउदारवादी नीतियों से बदहाल देश की अधिकांश आबादी उठ खड़ी होगी और सरकारों को नीतियां बदलने पर मजबूर कर देगी। इसके लिए पूरे देश में अनेक गैर-राजनीतिक जनांदोलन और उनके समानांतर मुख्यधारा राजनीति के बरक्स नई राजनीति के निर्माण का काम शुरू हुआ। उस दिशा में कोई खास जमीन नहीं टूट पाई लेकिन देखते-देखते बदहाल आबादी को पीछे धकेल कर नवउदारवादी व्यवस्था से लाभान्वित हुए मध्यवर्ग ने अपनी ‘क्रांति’ कर डाली है। वैश्विक आर्थिक संस्थाओं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गुलामी से देश की आजादी बचाने के पिछले बीस सालों से कई आंदोलन चल रहे हैं। मध्यवर्ग उनसे नहीं जुड़ा और कहता रहा कि गुलाम नहीं, महाशक्ति बन रहे हैं। अचानक दूसरी आजादी का बिगुल बजता है और बताया जाता है कि वह दरवाजे पर खड़ी है। दूसरी आजादी दरअसल नवसाम्राज्यवादी गुलामी के खिलापफ चलने वाले वास्तविक संघर्ष से आजादी है।
टीम अन्ना के आंदोलन से देश से भ्रष्टाचार मिटने जा रहा है, व्यवस्था परिवर्तन होने जा रहा है और दूसरी आजादी मिलने जा रही है तो उसके कर्ताओं और समर्थकों को थोड़ी-बहुत आलोचना पर ध्यान नहीं देना चाहिए। वे बड़े काम में लगे हैं, आलोचकों को वे बाद में निपटा दे सकते हैं। उफान उतरने पर अगर उन्हें लगे कि काम नहीं हो पाया, या पूरा नहीं हो पाया, या कुछ गलत हो गया, तो वे आगे के आंदोलन के लिए आलोचनाओं से, कुछ काम की लगे तो सीख ले सकते हैं। कबीर ने निंदक को नियरे राखने की नसीहत दी है। गांधी ने एक बार लोहिया को दूसरों के मत अथवा विचार के प्रति सहिष्णुता न रखने के लिए झिड़का था। अगर ये उदाहरण उन्हें हल्के या राजनीतिक किस्म के लगें तो वे ब्राजील में हुए विश्व स्तरीय वल्र्ड सोशल पफोरम (डब्ल्यूएसएफ) के जलसे को याद कर सकते हैं। उसमें बिना राजनीति के ‘दूसरी दुनिया संभव है’ का नारा दिया गया था। भारत में भी उसका एक बड़ा जलसा हुआ था। एनजीओ की एक से एक हस्ती वहां पहुंची थी। संघियों को छोड़ कर सभी वादी उसमें शामिल हुए थे। सीताराम येचुरी ने कहा था, इतने लोग जुट रहे हैं, हम कैसे उसके बाहर रह सकते हैं? मीडिया तो मतवाला था ही। अब शायद ही किसी को पता हो कि दूसरी दुनिया और उसके दावेदार कहां है?
आंदोलन के कर्ता और समर्थक सरकार और संसद से टक्कर ले रहे हैं, गांधी से लेकर भगत सिंह तक उनके पास हैं, तिरंगा ऐसे लेकर चलते हैं कि सेना भी क्या लेकर चलेगी। समर्थन के सैलाब के सामने आलोचना के स्वर इक्का-दुक्का हैं और काफी बाद में उठे हैं। शायद हमने ही सबसे पहले इस आंदोलन की समीक्षा लिखी थी। आलोचना के जो स्वर आए हैं, उनमें कर्ताओं और समर्थकों जैसी एकजुटता और एकरूपता भी नहीं है। फिर किस बात का डर है? कहीं अंदर विश्वास की कमी तो नहीं है, जिसे भरने के लिए आलोचकों को लताड़ा जा रहा है और एक ही खाते में डाला जा रहा है – कि आलोचक भ्रष्टाचार, सरकार और मनमोहन सिंह के समर्थक हैं।
आईएसी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने अभी तक के सारे विचारधारात्मक/विमर्शात्मक परिप्रक्ष्यों को गड्ड-मड्ड कर दिया है। ऐसा नतीजा होगा, यह आईएसी के बनने के समय ही स्पष्ट हो गया था। उसमें अलग-अलग और परस्पर विरोधी विचारों/मान्यताओं और कार्यक्षेत्र के लोग शामिल किए गए थे। मूलतः यह प्रयास खालिस एनजीओ चलाने वालों का था, जिसमें उन्होंने एनजीओ आधारित जनांदोलन चलाने वालों और ध्र्म से लेकर दलाली के क्षेत्र तक नाम पाने वालों को शामिल किया। ऐसे में जो भी आंदोलन होना था, उसमें वैचारिक परिप्रेक्ष्यों का घालमेल होना ही था। और उससे नवउदारवादी व्यवस्था के लिए जरखेज जमीन भी तैयार होनी ही थी। यह जमीन दो-फसली है। इसमें एक पैदावार नवउदारवाद की गुलाम राजनीति की होती है और दूसरी एनजीओबाजों और एनजीओ आधारित जनांदोलनकारियों की।
पिछले दो-तीन दशकों से पक रही नवउदारवाद की जमीन पर नई राजनीति खड़ी करने के एक के बाद एक प्रयास विफल होते रहे हैं। चंद्रशेखर और वीपी सिंह ने मुख्यधारा राजनीति के तहत भी कुछ नवउदारवाद विरोधी प्रयास किए। लेकिन नवउदारवादियों के सामने किसी की पेश नहीं पड़ी। अलबत्ता ‘विकल्प के साधक’ किशन पटनायक तक को नवउदारवाद के घाट पर लगाने की हिमाकतें की गईं। ऐसे में एनजीओबाजों की नई खेप और नए नायक फलीभूत होने ही थे। अरविंद केजरीवाल उन्हीं में से एक हैं। उन्हें एनजीओ क्षेत्र का हर्षद मेहता कहा जा सकता है।
राजनीतिक कार्यकर्ताओं के स्थान पर एनजीओ और एनजीओ आधारित जनांदोलन चलाने वालों की प्रतिष्ठा के नवउदारवादी लक्ष्य का एक चक्र पूरा हो गया है। अहिंसक आंदोलन का हथियार भी उन्होंने अपने कब्जे में कर लिया है। आजादी के संघर्ष की विरासत पर भी उनका दावा है जिसमें गांधी और गोलवलकर साथ-साथ रहते हैं। क्रांति और आजादी के कर्ता अब वे ही हैं।
यह सही है कि आर्थिक सुधारों के एक के बाद एक कानून पारित करने वाले नवउदारवादी नेता और पार्टियां संसद की गरिमा की बात करने के हकदार नहीं हैं। लेकिन टीम अन्ना के नुमांइदे नेताओं और पार्टियों से ज्यादा खतरनाक खेल खेल रहे हैं। वे नवउदारवाद को जनभावना की इच्छा सिद्ध कर रहे हैं। इस पर कोई विवाद नहीं है कि आंदोलन के साथ जुड़ी ‘जनभावना’ का दायरा मध्यवर्ग तक सीमित है। वास्तव में यह आंदोलन मध्यवर्ग के बाहर छूटी जनता को देश से बेदखल करने की मौजूदा राजनीति का ही विस्तार है।
मनमोहन सिंह ने अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप से आहत होकर देश की उस समय सहायता करने का वास्ता दिया है जब विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो चुका था और उन्होंने अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोल कर देश का उद्धार किया था। विदेशी मुद्रा भंडार खाली होने से देश की आबादी के किस तबके पर संकट आना था? आंदोलन की आलोचना करने वालों को मनमोहन सिंह के पाले में खड़ा करने वाले उनके संसद में दिए इस बयान की निंदा करें। कहें कि उन्होंने देश का नहीं, मध्यवर्ग, उच्चवर्ग और भ्रष्टाचारियों का उद्धार किया था। वे कहें कि जन लोकपाल विधेयक के कानून बनते ही मनमोहन सिंह द्वारा लादी गई नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ सत्याग्रह होगा। तब तक, जब तक इन नीतियों की जगह संविधान की प्रस्तावना और नीति-निर्देशक तत्वों के आधार पर एक विकेंद्रित, कृषि आधरित, स्वावलंबी और थोड़े में गुजारा करने वाली अर्थव्यवस्था लागू नहीं की जाती। वे कहें कि भारत जैसे विशाल आबादी वाले श्रमप्रधन देश में थोड़े में गुजारा करने से ही सबका गुजारा ठीक से हो सकता है।
टीम अन्ना और उसके समर्थन में पूंछ में आग लगा कर भ्रष्टाचार के रावण को फूंकने के लिए मतवाली हुई सिविल सोसायटी, विशेषकर नौजवान, यह कहें कि गैट से लेकर परमाणु करार तक देश की संप्रभुता को गिरवीं रखने वाले सारे कानून निरस्त किए जाएं, देश का कोई संसाधन किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को नहीं बेचा जाए, किसानों की जमीन अधिग्रहित नहीं की जाए, किसी भी क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति न दी जाए, भारत डब्ल्यूटीओ से बाहर आए, निजी और विदेशी विश्वविद्यालयों की अनुमति के कानून खारिज किए जाएं, देश के सभी बच्चों को निशुल्क समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, शिक्षा केवल भारतीय भाषाओं में दी जाए और उन्हीं में प्रशासन भी चलाया जाए, आज के बाद संसद और सरकारें अगले 50 साल तक देश की अभी तक वंचित रही आबादी के लिए काम करेंगी और उसके अलावा कुछ नहीं करेंगी, इसके चलते सिविल सोसायटी को जो कष्ट उठाना होगा, उठाएगी। दो मिनट में सबका रंग खुल जाएगा।
दरअसल, इस आंदोलन से विचारधारात्मक अथवा विमर्शात्मक परिप्रेक्ष्य गड्डमड्ड ही नहीं हुए हैं, कर्ताओं का आग्रह है कि किसी वैचारिक परिप्रेक्ष्य की जरूरत ही नहीं है। जो संगठित होगा, ताकतवर होगा, अपना काम करा लेगा। यह पूछने पर कि जो संगठित नहीं हैं, जिनका कुछ भी सशक्तिकरण नहीं हुआ है, उनका क्या होगा तो जवाब स्पष्ट है, वे किसी न किसी एनजीओ में शामिल होकर काम करें। सरकारों को चाहिए कि वे सभी योजनाएं एनजीओ से चलवाएं। जो काम बचे वह निजी क्षेत्र के हवाले हो। लेकिन मामला इतना भर और सीधा नहीं है।
गांधी की बलि: प्राधिकारवाद की प्रतिष्ठा
अन्ना हजारे ने पहले अनशन में भ्रष्टाचारियों का मांस गिद्धों और कुत्तों को खिलाने की घोषणा और सबसे पहले नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की थी। उनके समर्थन में जो जोश आया और भीड़ उमड़ी उसके पीछे इन दो घोषणाओं का बड़ा हाथ है। टीम अन्ना के जस्टिस संतोष हेगड़े और प्रशांत भूषण जैसे नुमाइंदों और प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष हस्तियों ने इसी भीड़ के तर्क के आगे सिर झुका कर अन्ना को गांधीवादी स्वीकार कर लिया। वरना वे जानते हैं, रातों-रात कोई संत नहीं हो जाता। वे स्याणे लोग हैं और उड़ती चिडि़या के पर पहचान लेते हैं। किसी साधारण नागरिक से चूक से कोई बात निकल जाए, उसे तुरंत सांप्रदायिक और फासिस्ट करार दे देते हैं। इन लोगों ने अन्ना को गांधीवादी होने का प्रमाणपत्र अपनी खाल बचाने के लिए दिया है। अपनी गलती सही सिद्ध करने के लिए वे आगे भी अन्ना को बचाएंगे। यही स्थिति अन्ना के समर्थक जनांदोलनकारियों की है। वे आगे होने वाले सिविल सोसायटी एक्टिविज्म में अपनी जगह सुनिश्चित करने के लिए अन्ना का पल्ला पकड़े हैैं। वरना भ्रष्टाचारियों का मांस गिद्धों और कुत्तों को खिलाने, नरेंद्र मोदी को शाबासी देने और इस बार आरएसएस का हाथ बताने वालों को पागलखाने भेजने की हुंकार ही अन्ना की असलियत है।
हमने कुछ साल पहले लिखा था कि इक्कीसवीं सदी का एक प्रमुख एजेंडा गांधी-विनाश का है। वह गांधी नहीं जिसकी आजादी के आंदोलन में भली-बुरी भूमिका थी और आजादी के बाद जिसे एक कट्टर हिंदू ने गोली मार दी थी। बल्कि वह गांधी जो बाजार और हथियार यानी भोग और हिंसा पर टिकी उद्योगवादी-पूंजीवादी सभ्यता का ध्ुर विरोधी था। जिसने राजनीति और विकास का एक विकल्प दिया था। जिसने कहा कि श्रम मनुष्य को परिभाषित करता है और धरती के पास सबके भरण-पोषण के लिए पर्याप्त है लेकिन एक भी व्यक्ति के लालच के लिए उसके संसाधन कम पड़ जाएंगे।
गांध्ी-विनाश के कई तरीके निकाले गए हैं। उनमें से एक, जो नेताओं और एनजीओबाजों को एक-सा प्रिय है, गांधी को नवउदारवादी एजेंडे की पूर्ति के लिए इस्तेमाल करना है। इस मामले में भारत के पहले प्रधानमंत्री ईमानदार थे। उन्होंने साफ कह दिया था कि बापू हम आपके सपनों का भारत नहीं बनाने जा रहे हैं। आईएसी के सदस्यों में वह ईमानदारी नहीं है। उसमें शामिल अहिंसक जनांदोलनकारियों में भी नहीं है। होती तो वे एक बार कहते कि नवउदारवादी व्यवस्था, जिसके सुधार के लिए यह आंदोलन है, और जन लोकपाल, जिसे बनाने और बनने वालों का गांधी के आखिरी आदमी से रिश्ता नहीं है। गांधी को नवउदारवाद के हमाम में न घसीटा जाए। दरअसल नवउदारवादी व्यवस्था और उसे चलाने वालों के भीतर बैठी हिंसा को छिपाने के लिए गांधी की तस्वीर रामलीला मैदान में लगाई गई है।
आंदोलन के आलोचक भी नवउदारवाद के विकल्प के हामी नहीं है। कांचा इलाया एक टीवी चैनल पर आंदोलन की विचारधारा पर सवाल उठा रहे थे। वह निश्चित ही नवउदारवादी है, जिसमें आरक्षण और विशेष अनुदानों/योजनाओं/कार्यक्रमों के जरिए दलितों/आदिवासियों/पिछड़ों के चुनींदा लोगों को शामिल किया जाता है। कम से कम तब तक, जब तक टूटा-फूटा लोकतंत्र देश में चल रहा है। कांचा इलाया से उनकी खुद की विचारधारा पूछी जाए तो वह नवउदारवादी ही निकलेगी। बल्कि वे नवउदारवाद के पुरखे उपनिवेशवाद को, कम से कम दलितों के लिए, ‘वरदान’ बताएंगे। उदितराज ने सही सवाल पूछा है कि जब गुजरात में मुसलमानों को मारा गया और महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों को प्रताडि़त किया गया तब अन्ना हजारे क्यों चुप रहे। ‘गांधीवादी अन्ना’ के समर्थकों को उदितराज को जवाब देना चाहिए।
कुछ सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों के साथ उदितराज बहुजन लोकपाल बिल लेकर आए हैं। बहुजन समाज के नुमाइंदों को शामिल करने की पेशकश स्वागत योग्य है। बिल में सुझाए गए प्रावधानों पर टीम अन्ना और सरकार दोनों को विचार करना चाहिए। लेकिन सवाल यही है कि ये सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट नवउदारवाद के खिलाफ हैं या पक्ष में? खिलाफ हैं तो मुख्यधरा या उसके बरक्स राजनीति की भूमिका स्वीकार करते हैं या नहीं? उदितराज काफी लंबे समय से एक राजनीतिक पार्टी चलाते हैं। लेकिन अपनी पार्टी के वे अकेले ‘लोकपाल’ हैं।
अन्ना हजारे और उनके समर्थन में सड़कों पर आए नागरिकों को गिरफ्तार करने के सरकार के असंवैधानिक कदम का हमने विरोध किया था। हालांकि अन्ना के समर्थन में बड़ी संख्या में घरों से बाहर आए शहरी मध्यवर्ग की शिकायत शांतिपूर्ण प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार छीनने को लेकर नहीं थी। वह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आंदोलित था। भारत में व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार है। ज्यादातर महकमों में रिश्वत ली और दी जाती है। जो नागरिक एक जगह रिश्वत लेता है, दूसरी जगह देता है। छोटे कर्मचारी से आला अपफसर तक यह होता है। जिसे रिश्वत देनी पड़ती है लेकिन लेने का मौका नहीं मिलता, वह आक्रोश में रहता है। छोटे से लेकर बड़े व्यापारी तक भी भ्रष्टाचार करते और सहते हैं। कोटा-परमिट राज में भी भ्रष्टाचार था जो नवउदारवादी व्यवस्था में आसमान पर जा पहुंचा है। यह आंदोलन लोगों के अंदर जमा आक्रोश और बलवती इच्छा, कि एक दिन कोई आएगा और सब बेईमानों को ठीक कर देगा, को सहलाने वाला है। अन्ना की प्राधिकारवादी और सांप्रदायिक घोषणाओं के बाद भीड़ जुटने का यह दूसरा कारण है।
भीड़ जुटने का तीसरा कारण हमारी देशभक्ति की समस्या है। हम अपने देश को प्यार नहीं करते इसलिए देशभक्ति की ज्यादा पुकार मचाते हैं। आजादी के संघर्ष में देशभक्ति का जज्बा प्रेरणादायी भूमिका निभाता था। आज वह शोशा बन कर रह गया है, अपने भ्रष्टाचारी और निकम्मे चरित्र को उदात्त दिखाने का। तिरंगा लहराने और शरीरों पर तिरंगा आंकने वाले लोगों में शायद ही कोई जानते अथवा मानते हों कि देश की संप्रभुता और आजादी पिछले बीस सालों में लगातार छीजती गई है और उसकी रक्षा के कई आंदोलन देश भर में चल रहे हैं। अगर वे जानते अथवा मानते तो इस तमाशे में शामिल न होकर उन आंदोलनों से जुड़ते। यह आंदोलन, दरअसल, जिस तरह से भ्रष्टाचार मिटाने का प्रहसन है, उसी तरह देशभक्ति का भी प्रहसन है।
सभ्य समाज में किसी भी मान्यता के लिए भीड़ का तर्क वाजिब नहीं होता। भीड़ ने विभाजन से लेकर अब तक कई बार संवैधानिक मूल्यों, नागरिक अधिकारों और मनुष्यता की हत्या की है। यह मानना कि यह वह भीड़ नहीं है, या वह यह भीड़ नहीं थी, बहुत आश्वश्त करने वाला नहीं है। सभी भीड़ें कभी अनुशासित और कभी बिगड़े रूप में एक ही समाज से निकल कर आती हैं। कभी अनुशासित भीड़ बिगड़ी हुई से ज्यादा हिंसक हो सकती है।
आंदोलन के पक्ष में दूसरा मजबूत तर्क युवाओं की बड़ी संख्या में हिस्सेदारी करने का है। यह सही है, हालांकि हर उम्र के लोग आंदोलन में शरीक हैं। गरीब तबकों को खींच कर लाने की आयोजकों की कोशिशें अलबत्ता कामयाब नहीं हो पाईं। भारत में निम्न वर्गों को हटा कर भी युवा वर्ग बहुत बड़ा है। जवानी हमेशा सपनों, जिंदादिली और जोश से भरी होती है। लेकिन भारत के युवा वर्ग के पास करने को कुछ खास नहीं रहता है। काॅलेजों में एनएसएस, एनसीसी, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पिकनिक, खेल-कूद, कोर्स के बाहर लायब्रेरी की पढ़ाई लगभग समाप्त हो गए हैं। घरों में छोटी-मोटी लायब्रेरी रखने का रिवाज लगभग समाप्त हो गया है। बड़े शहरों में दुनिया भर के खानों से भरी कैंटीनों में छात्र-छात्राएं क्लास रूम से ज्यादा बैठते हैं। छात्र संगठनों में भी कोई जान नहीं बची है। चुनाव लड़ने और साल में एक-दो बार डीजे कराने तक उनकी गतिविधियां सीमित हैं। पिफर भी, जो छात्र किसी छात्र संगठन में शामिल होते हैं, चुनाव लड़ते हैं या चुनाव प्रचार करते हैं, सामाजिक-राजनीतिक मामनों में अलग-थलग रहने वालों से ज्यादा जानकार और संवेदनशील होते हैं।
पढ़ाई पूरा करने के बावजूद ज्यादातर युवक-युवतियां बेरोजगार रहते हैं। ऐसे में अपनी रुचि का काम करने का अवसर बहुत कम युवाओं को मिल पाता है। व्यवस्था पर उन्हें गुस्सा आता है, जो स्वाभाविक और वाजिब होता है। मध्यवर्ग की तरह उसका युवा वर्ग भी अधिकांशतः अगड़ी सवर्ण जातियों का होता है। संवैधानिक प्रावधानों के तहत जब दलित और आदिवासी छात्रों को वजीफा, नौकरी आदि मिलते हैं तो उन्हें कुढ़न होती है। जिन इक्का-दुक्का युवाओं का राजनीतिक मानस बन पाता है वे ही समाज और समस्याओं के प्रति उदार नजरिया बना पाते हैं। बाकी ज्यादातर अपने को अन्याय का शिकार मान कर धरना-प्रदर्शनों में हिस्सा नहीं लेते। देश में अपनी संख्या के लिहाज से बहुत कम युवा होंगे जो नवउदारवाद, सांप्रदायिकता, जातिवाद और लिंग-भेद के वाकई खिलाफ हों।
जो नौजवान अपना काम करते हैं, उन्हें तरह-तरह की दिक्कतें कोटा-परमिट राज में भी होती थीं और नवउदारवादी राज में भी होती हैं। बाकी युवाओं के मुकाबले, खास कर उनके जो सेवा क्षेत्र में जाते हैं, उन्हें जल्दी ही पता चल जाता है कि जो सब्जबाग दिखाए जा रहे हैं, उनकी हकीकत कुछ और है। लेकिन वे अपने व्यवसाय में इतना व्यस्त रहते हैं कि उनसे किसी सामाजिक-राजनीतिक भूमिका की उम्मीद नहीं की जा सकती। उनका वैचारिक दायरा अक्सर संकुचित हो जाता है और वे भी गरीब और वंचित तबकों के विरोधी हो जाते हैं। टीवी और फिल्मों के अलावा सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीति कार्यक्रमों से वे अनजान रहते हैं।
इस युवा वर्ग को कभी मनमोहन सिंह, कभी एपीजे अब्दुल कलाम और कभी राहुल गांधी उपदेश देते रहते हैं कि वे बहुत बड़ी शक्ति हैं और उनके कारण देश आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा है। लेकिन उपदेश से हकीकत नहीं बदलती। युवाओं को पता चल जाता है कि किसी एक के संसद में ‘युवा तुर्क’ बन जाने से बाकी का भला नहीं होता। सरकारी नौकरियां सीमित हैं और निजी क्षेत्र में नौकरी बड़ी हो या छोटी, काम बहुत ज्यादा करना पड़ता है। ऐसे में युवाओं को अपनी पैर टेकने की जमीन बनानी होती है। यह आसान नहीं होता। नौकरियों में रिश्वत चलती है, चमचागीरी चलती है, भाई-भतीजावाद चलता है।
यह परेशान युवा वर्ग जब मीडिया में ‘भ्रष्टाचार के रावण’ के समूल विनाश का आह्नान देखता है तो उसमें शामिल हो जाता है। मीडिया जो-जो कहता है, आदर्शवादी भाव से वह-वह मानता चलता है। तिरंगा हाथ में आ जाए तो उसका आदर्शवादी मन लहराने लगता है। अपनी परेशानियों में अकेला पड़ा वह भीड़ में जुड़ाव महसूस करता है। आयोजक और मीडिया उसे बताते हैं कि सारी समस्याओं की जड़ भ्रष्ट नेता और राजनीति है। उसमें और जोश आ जाता है। जो जोश वह माता-पिता-अभिभावक या अपने कैरियर के डर से कई जरूरी मौकों पर नहीं दिखा पाता, हुजूम में उसे भी निकाल लेता है। इसे स्पर्श क्रांतिकारिता कहते हैं। अन्ना के आंदोलन के विचारातीत चरित्र को समझ सकने वाले बड़े-बड़े महारथी जब उसमें शामिल हो गए तो युवाओं को उसमें शामिल होना ही था।
जिन युवाओं में आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी की है, उनका मोहभंग भी होगा। हालांकि यह आंदोलन नवउदारवादी व्यवस्था को बचाने और उसमें मध्यवर्ग के लिए और ज्यादा जगह बनाने के लिए है। लेकिन उतनी जगह नहीं बन सकती कि अभी तैयार पूरी मध्यवर्गीय युवा पीढ़ी को समायोजित कर ले। बाहर छूटी आबादी का हिस्सा मार कर जितनी जगह बनेगी सो बनेगी। युवाओं के साथ यह सुविध है कि उनमें ज्यादातर बेरोजगार होने के नाते भ्रष्टाचार नहीं करते हैं। जब वे देखेंगे कि भ्रष्टाचार रुक नहीं रहा है तो उससे भी उनका मोहभंग होगा। मोहभंग सकारात्मक प्रवृत्ति भी है और नकारात्मक भी हो सकती है। सकारात्मक इस रूप में कि युवा सोचें कि यह व्यवस्था, जो भ्रष्टाचार पैदा करती है, गलत है। यह बदलनी चाहिए। नकारात्मक इस रूप में कि युवा सिनिसिज्म का शिकार हो जाएं। सिनिसिज्म का एक रूप भारत में मौका मिलने पर खूब रिश्वत लेने में भी देखने को मिलता है। आशा करनी चाहिए कि आंदोलन में शरीक होने वाले युवा उसका और उसमें अपनी भूमिका का कुछ विश्लेषण-मूल्यांकन करेंगे।
आगे का रास्ता
इस आंदोलन से मुख्य सबक यह निकलता है कि आगे के आंदोलन मौजूदा राजनीति और एनजीओ की सम्मिलित संस्कृति के चलते नवउदारवादी व्यवस्था में सुधर के लिए होंगे। कम से कम नवउदारवादी और उनका समर्थक मीडिया यही चाहेगा। हर व्यवस्था अपना सुधार चाहती है और कुछ न कुछ करती भी चलती है। हर मजबूत व्यवस्था की अपनी गत्यात्मकता होती है, जिसके तहत वह अपने कुछ सेफ्टी वाॅल्व बनाती है। नवउदारवादी व्यवस्था ने भी अपनी मजबूती बढ़ाते जाने के लिए पूरी दुनिया में एनजीओ का जाल बिछाया है। एनजीओ जनता का ‘कल्याण’ भी करते हैं और व्यवस्था के प्रति उसके आक्रोश को मंच भी देते हैं। शर्त यही होती है कि उसमें राजनीति नहीं आनी चाहिए। क्योंकि नवउदारवादी वैश्विक प्रतिष्ठान को जो राजनीति चाहिए होती है, वह हर देश में खड़ी कर लेता है। नवउदारवाद के वास्तविक विरोध् और विकल्प की राजनीति का रास्ता और कठिन हो जाएगा।
आपने गौर किया होगा कि आंदोलन के व्यापक होने के साथ मेधा पाटकर की टीम अन्ना के पक्ष में सक्रियता बढ़ती गई है। उनकी भाषा भी बदली हुई है और ज्यादातर अंग्रेजी हो गई है। स्वामी अग्निवेश भी अंग्रेजी बोल रहे हैं। हजारे और उनके सिपहसालारों ने कभी किसानों-आदिवासियों की बात नहीं की। उनका इस विषय पर कोई अध्ययन और परसेप्सन भी नहीं है। फिर भी मेधा पाटकर उन्हें किसानों-आदिवासियों का भी मसीहा बनाने पर जोर देती हैं। वल्र्ड बैंक, फोर्ड फाउंडेशन, राॅकफैलर से लेकर भारत के सत्ता प्रतिष्ठान तक नाभिनालबद्ध इस टीम के नुमांइदे कृपा करके किसान, मजदूर, आदिवासी शब्दों का अपने मुखारविंद से उच्चारण कर भी देंगे तो क्या हो जाएगा? वे मध्यवर्ग के मसीहा हैं, वही रहने दीजिए।
हमें वाकई लगता था, और इसलिए हमारे दिल में बड़ा सम्मान था कि प्रशांत भूषण गरीबों और उनके लिए काम करने वालों के हमदर्द वकील हैं। वे अभिषेक मनु सिंघवी, कपिल सिब्बल, रामजेठमलानी और अरुण जेटली जैसे कंपनियों के वकील नहीं हैं। लेकिन वे केजरीवाल के वकील निकले! हमें नहीं लगता कि किसी जनांदोलनकारी या सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट को उनके नए अवतार पर आश्चर्य या ऐतराज हुआ हो। लगता है ये सभी महानुभाव नवउदारवाद के खिलाफ संघर्ष को छोड़ कर मैगसेसे पुरस्कार पाने के संघर्ष में लग गए हैं?
इस आंदोलन का सांप्रदायिक, सामाजिक परिवर्तन विरोधी और नवउदारवाद समर्थक चरित्र जंतर-मंतर पर ही स्पष्ट हो गया था। होना तो यह चाहिए था कि परिवर्तनकारी साथी नवउदारवाद विरोध का काम तेज करते, लेकिन वे अन्ना के आंदोलन को सफल बनाने में जुटे हुए हैं। नवउदारवाद के जन-विरोधी खेल में शामिल जनांदोलनकारी ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। नक्सलवादियों से अक्सर यह स्पष्ट करने को कहा जाता है कि उनकी हिंसक क्रांति होने के बाद वे विकास का कौन-सा माॅडल लागू करेंगे? यह अंदेशा प्रकट किया जाता है कि कम्युनिस्ट होने के नाते वे विकास के उद्योगवादी माॅडल को मानने वाले हैं, जिसके तहत आदिवासियों और किसानों का उजड़ना तय है। पूछने वालों के दिमाग में गांधीवादी माॅडल की परिकल्पना होती है। अब यह सवाल गांधीवादी माॅडल की बात करने वालों से भी पूछा जाएगा। और इस पूरक प्रश्न के साथ कि क्या आपको अन्ना हजारे का प्राधिकारवाद और संप्रदायवाद भी मंजूर है? क्योंकि उनके समर्थन में जुटी भीड़ को, जैसा कि हमने ऊपर कहा है, उनके इसी रूप ने सर्वाधिक आकर्षित किया है।
पहले अनशन के वक्त टीम अन्ना ने मनमोहन सिंह को आॅफर दिया था कि जन लोकपाल विधेयक लाओ और वोट पाओ। मनमोहन सिंह नहीं लाते हैं तो अडवाणी ले आएंगे। या दोनों मिल कर ले आएंगे। एक ही अखाड़े की इस नूरा कुश्ती में समय से रास्ता निकल आएगा। इस गारंटी के साथ कि लोकपाल के दायरे में एनजीओ, मठ, कोरपोरेट घराने, मीडिया घराने शामिल नहीं किए जाएंगे। लेकिन उससे कुछ नहीं बदलेगा।
यह व्यवस्था तो बदलनी होगी। बदलाव चाहने वाले लोगों की कमी नहीं है। ऐसे लोगों की तो बहुसंख्या है जो बदलाव से ही बचेंगे। वरना पूंजीवादी साम्राज्यवाद के पिछले 400 सालों से चल रहे सफाया अभियान में उनकी बलि चढ़नी है। दुनिया इसी सवाल से जूझ रही है कि इस व्यवस्था का विकल्प क्या हो और इसे बदलने का तरीका क्या हो? पूंजीवादी साम्राज्यवाद के खंभे पाताल लोक तक गड़े हैं। न कम्युनिस्ट क्रांतियों से उसका कुछ बिगड़ पाया है, न आर्थिक मंदियों से। वह दोनों पर पार पा लेता है, क्योंकि दोनों उसी के पेट से पैदा होते हैं। राजनीतिक प्रतिरोध का जमाना अब नहीं बचा है, अलबत्ता इधर आतंकवाद ने उसे परेशान किया हुआ है। लेकिन वह पूंजीवाद के ही बगल का बच्चा है। आतंकवाद के रहने से उसकी संसाधनों की लूट बढ़ती है और हथियारों की बिक्री। इसके लिए अपने कुछ नागरिकों की कीमती जान को खतरे में डालना उसे मंजूर है।
पिछले बीस सालों में नक्सलवाद का प्रभाव बढ़ता गया है। यह माना जाता है कि ऐसा नवउदारवादी नीतियों के परिणामस्वरूप हुआ है। देश के एक राजनैतिक समूह ने संविधान से परे जाकर नवउदारवादी व्यवस्था के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति यानी एक्सट्रीम वायलेंस का रास्ता अपनाया है। उस रास्ते को ज्यादातर राजनीतिक और नागरिक समाज में सही नहीं माना जाता। कहा जाता है वह कभी कामयाब भी नहीं हो सकता। प्रधनमंत्री जब कहते हैं कि देश को पहले नंबर पर नक्सलवाद से खतरा है तो उनका आशय यही होता है कि नवउदारवाद को नक्सलवाद से पहला खतरा है। पिछले बीस सालों में नवउदारवाद के विरोध में पूरे देश के स्तर पर अनेक अहिंसक जनांदोलन और कतिपय राजनैतिक संगठन सामने आए हैं। अहिंसक आंदोलनों को भारत का नवउदारवादी राज्य अपने लिए पहला क्या कोई बड़ा खतरा भी नहीं मानता। इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन सबसे सबसे बड़ा कारण है कि अहिंसक विरोधी अपने रास्ते यानी अहिंसा के एक्सट्रीम पर नहीं जाते। एक बिंदु के बाद वे अक्सर लौट आते हैं और नवउदारवादी व्यवस्था के साथ मिल-जुल जाते हैं। उनमें कई तो प्रच्छन्न नवउदारवादी होते हैं।
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर अपने पहले लेख ‘भ्रष्टाचार विरोध: विभ्रम और यथार्थ’ (युवा संवाद, मई 2011) की शुरुआत हमने लोहिया के एक कथन, कि भारत में राजनीतिक मानस का निर्माण नहीं हो पाया है, से की थी। टीम अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और टीम व सरकार के बीच हुए गतिरोध पर देश के नागरिक समाज, बुद्धिजीवियों और राजनेताओं का जो व्यवहार देखने को मिला है उससे पता चलता है लोहिया पूरी तरह सही थे।
27 अगस्त 2011
पुनश्चः स्तंभ के प्रैस में जाते-जाते सूचना मिली कि सरकार और अन्ना हजारे के बीच सहमति बन गई है और वे जल्द अपना अनशन समाप्त करेंगे।
पुनश्चः स्तंभ के प्रैस में जाते-जाते सूचना मिली कि सरकार और अन्ना हजारे के बीच सहमति बन गई है और वे जल्द अपना अनशन समाप्त करेंगे।
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