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Monday, August 29, 2011

क्या कानून बनाने मात्र से ही नियंत्रित हो सकेगा भ्रष्टाचार?

                                            
                               भ्रष्टाचार तथा भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने के लिए अन्ना हज़ारे व उनके साथियों द्वारा तैयार किए गए जनलोकपाल विधेयक को संसद में पेश किए जाने तथा इसे पारित किए जाने की मांग को लेकर इस समय लगभग पूरा देश वरिष्ठ गांधीवादी अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में आंदोलित हो उठा है। आशा की जानी चाहिए कि अन्ना हज़ारे व उनके चंद देशभक्त,समर्पित व ईमानदार साथियों की भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठाई गई यह आवाज़ कुछ न कुछ रंग ज़रूर लाएगी।
भ्रष्टाचार विरोधी इस आंदोलन को लेकर इस समय देश के कोने-कोने में तरह-तरह की सकारात्मक व नकारात्मक बहसें होती दिखाई दे रही हैं। जनलोकपाल,लोकपाल अथवा लोकायुक्त जैसे कानून बनने के बाद क्या भ्रष्टाचार समाप्त या फिर पहले से कुछ कम हो जाएगा? यदि हां, तो प्रश्र यह है कि वर्तमान समय में जिन अपराधों को नियंत्रित करने के लिए सख्त  कानून व सख्त सज़ाओं का प्रावधान है क्या उन अपराधों में कोई कमी या गिरावट आ सकी है? मिसाल के तौर पर कत्ल, डकैती, चोरी, बलात्कार, राहज़नी, फिरौती वसूलना जैसे तमाम अपराध ऐसे हैं जिनमें अपराधी को अदालतें कठोर से कठोर सज़ा देती हैं। यहां तक कि अपराध की परिस्थितियों व अपराध की शैली के अनुसार अपराधी को फांसी की सज़ा तक हमारे देश में दी जाती है। क्या ऐसी सख्त व भयावह सज़ा  के भय के बावजूद अपराधी अपनी इन हरकतों से बाज़ आते हैं? देखा जा सकता है कि तमाम कानूनों के बावजूद आज हमारे देश के तमाम राज्यों में उपरोक्त किस्म  के संगीन अपराधों का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है।
ऐसे में भ्रष्टाचार अथवा अवैध धन का संग्रह,रिश्वतखोरी आदि को क्या नए तथा और सख्त कानून बनाने मात्र से कम किया जा सकता है? धन अथवा पैसों को लेकर हमारे भारतीय समाज की एक और हकीकत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हम भारतवासियों का सबसे प्रमुख त्यौहार दीपावली है। कहने को तो यह पर्व भगवान श्री राम की 14 वर्षों के वनवास के बाद हुई अयोध्या वापसी के प्रतीकस्वरूप मनाया जाता है। परंतु आमतौर पर देखा यही जाता है कि दीपावली के दिन ही व्यवसायी वर्ग अपने नए बहीखाते शुरु करते हैं तथा अपने कारोबार की नववर्ष की हैसियत से शुरुआत करते हैं। उसी दिन पूरी श्रद्धा व उत्साह के साथ लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है। धन को ‘धन लक्ष्मी का नाम भी हमारे ही देश में दिया गया है। खासतौर पर दीपावली की रात में ही धन का आगमन शुरु हो इसके लिए इसे लोग अपने भाग्य से जोड़कर भी आज़माते है। गोया जो व्यक्ति अपने जीवन में कभी भी जुआ व ताश के पत्तों के करीब भी नहीं जाता वह भी दीपावली की रात  ‘शगुन के रूप में जुआ खेलने की कोशिश करता है तथा प्रयास करता है कि कम से कम आज की शुभ रात्रि में तो कुछ न कुछ ‘धन लक्ष्मी अवश्य जीत ली जाए। और इसी लालच में वह  ‘लक्ष्मी का उपासक  दीपावली की रात में जुआ खेलने बैठ जाता है। इसके अतिरिक्त रिश्तेदार-नातेदार भी अपनी हैसियत के अनुसार दीवाली पर सोने व चांदी के सिक्के उपहार स्वरूप अपने संबंधियों को भेंट करते हैं। संक्षेप में यह कहा जा सकता है देश का सबसे बड़ा प्रमुख त्यौहार दीपावली ‘धन लक्ष्मी  की पूजा के रूप में मनाया जाता है।
अब प्रश्न यह है कि जब हमारे ही समाज में ‘लक्ष्मी पूजा तथा ‘धन लक्ष्मी  जैसे संस्कार मौजूद हों तथा लक्ष्मी को घर में लाने हेतु जुआ खेलने जैसे अपराध तक  से परेहज़ न किया जाए, फिर आखिर  ‘लक्ष्मी प्रेम की इस परंपरा को आगे चलकर कैसे भुलाया अथवा मिटाया जा सकता है? एक बार मेरे एक परिचित ने मेरे पास बैठकर अपनी जेब से एक हज़ार के नोट की एक गड्डी निकाली और वह उसे गिनने लगा। लगभग एक लाख रुपये की वह रकम किसी की अमानत थी और वह उसे देने जा रहा था। उसे पैसे गिनता देख वहीं बैठा मेरा एक दूसरा परिचित व्यक्ति उन पैसों को अपने हाथ में लेकर उसे अपने सिर-माथे से लगाने लगा। मैंने इसका कारण पूछा तो उसने कहा कि  यह लक्ष्मी है इसका सम्मान  करना चाहिए। इस पर मैंने उसे जवाब दिया कि यह लक्ष्मी तो जिसकी अमानत है उसी की है। तुम्हारे सम्मान  करने से यह लक्ष्मी तुमपर कृपा तो करने से रही। मैंने यह भी देखा कि उस मात्र एक लाख रुपये के पैकेट को देखकर उस व्यक्ति के चेहरे पर लालच का भाव साफ नज़र आ रहा था। कह सकते हैं कि शायद ठीक उसी प्रकार जैसे किसी पराई आकर्षक महिला को देखकर किसी मनचले युवक के मन में तरह-तरह के आपराधिक विचार पलने लगें। मैंने उससे पूछा कि तूने इन पैसों को अपने माथे से क्या इसलिए लगाया कि तू लक्ष्मी को सम्मान दे रहा है या इसलिए कि इस धनलक्ष्मी को देखकर तेरे मन में इसे हासिल करने का पाप पलने लगा? गोया लक्ष्मी तो जिसकी है उसी के लिए पूजनीय हैै और जिसकी नहीं है उसके लिए वही धन मिट्टी या कागज़ के टुकड़े के समान है। परंतु जब एक ही लक्ष्मी को प्रत्येक व्यक्ति समान नज़रों से देखने लगता है फिर शुरु होती है समाज में उसे किसी प्रकार से भी अपना लेने की होड़। और लक्ष्मी के पीछे भागने,उसे हासिल करने, उसे पूजनीय समझने जैसी यही होड़ ही किसी भी व्यक्ति को भ्रष्ट व रिश्वतखोर बना देती है।
कहने का तात्पर्य यह है कि धन के प्रति किसी भी व्यक्ति के लगाव का मुख्य  कारण जहां उसकी सांसारिक ज़रूरतें हैं वहीं उसे बचपन से मिलने वाले संस्कार भी हैं इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता। लिहाज़ा हम कह सकते हैं कि आर्थिक अपराध को नियंत्रित करने के लिए जहां सख्त कानून बनाए जाने की ज़रूरत महसूस की जा रही है वहीं इसके लिए धार्मिक व सामाजिक स्तर पर चेतना व जागृति का लाना भी  अत्यंत आवश्यक है। इसके अतिरिक्त समाज में इस प्रकार की जागरुकता लाने की भी सख्त ज़रूरत है कि लोग अपनी अवैध व काली कमाई से किसी प्रकार के धार्मिक, कल्याणकारी तथा पारिवारिक खर्च कतई न करें। यानी समाज में धर्मगुरुओं विशेषकर पारिवारिक गुरुजनों को तथा धर्मोपदेशकों को सार्वजनिक रूप से अपने उपदेशों व कथाओं में बार-बार ज़ोर देकर समाज को यह निर्देश देना चाहिए कि वे भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी के द्वारा अर्जित किए गए धन का प्रयोग न तो किसी धार्मिक कार्यकलापों में करें, न उन पैसों से कोई दान करें,न ही उन्हें किसी धर्मस्थान के निर्माण अथवा लंगर-भंडारे  या गरीबों की सहायता में खर्च करें। लोगों को यह समझाना होगा कि उनकी अवैध कमाई से किए गए कार्य अथवा कल्याणकारी खर्चों का पुण्य उसे कतई नहीं मिलने वाला। बजाए इसके ऐसा व्यक्ति पाप का भागीदार ज़रूर हो सकता है। परंतु हकीकत में क्या हो रहा है यह यहां पर विस्तार से लिखने की ज़रूरत नहीं क्योंकि पूरा देश सबकुछ भलीभांति जानता व समझता है। बस यही समझिए कि ठीक इनके विपरीत हो रहा है।
इसी प्रकार पारिवारिक स्तर पर भी गृह स्वामी को जागरूक व चेतन करने की ज़रूरत है। परिवार के सदस्य अर्थात् बीवी,बच्चे तथा अन्य आश्रित सदस्य अपने परिवार के कमाऊ सदस्य से यह बात सख्ती से कहें कि उन्हें अपने घर में भ्रष्टाचार अथवा रिश्वत की काली कमाई नहीं चाहिए। दूसरों के दिलों को दुखा कर ली गई रिश्वत की अवैध कमाई से न तो घर में खाद्य सामग्री व राशन आदि आना चाहिए, न कपड़ा-लत्ता, न ही दवा इलाज, न ही धर्म व संसार संबंधी कोई खर्च इन पैसों से किया जाएगा। परिवार के आश्रित सदस्य जब अपने मुखिया से ज़ोर देकर यह कहेंगे कि उनका खर्च वह जैसे भी हो केवल अपनी मासिक अथवा निर्धारित आय से ही चलाया करें तो निश्चित रूप से एक न एक दिन उस व्यक्ति की आंखें ज़रूर खुलेंगी और वह अपनी काली कमाई से बाज़ आ जाएगा। कहने का तात्पर्य यह कि कानून बनाने से अधिक प्रभावी कदम के रूप में इस प्रकार की सामाजिक जनचेतना मुहिम को आज़माया जा सकता है। बशर्ते कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने वाला तथा स्वयं को ही देशभक्त,सबसे बड़ा ईमानदार समझने वाला व्यक्ति इन सच्चाईयों को अपने दिल की गहराईयों से स्वीकार करने की कोशिश करे।
इसमें कोई शक नहीं कि अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में प्रत्येक वर्ग के लाखों लोगों को शरीक होते देखकर निश्चित रूप से ऐसा प्रतीत होता है कि देश के शायद कुछ ही लोग भ्रष्ट हैं बाकी पूरा का पूरा देश ईमानदारी के रास्ते पर चलने वाला है या चलना चाह रहा है। परंतु यदि इनमें से एक-एक व्यक्ति का अलग-अलग ‘क्लोज़अप देखने की कोशिश करें तो हकीकत अपने आप सामने आ जाएगी। अब ज़्यादा इस विषय पर क्या लिखा जाए बस यूं समझ लीजिए कि अन्ना हज़ारे के समर्थन में महाराष्ट्र पुलिस कर्मियों की धर्मपत्नियां व उनके परिजन मुंबई में धरना देते नज़र आए। यह अपने आप में ही एक व्यंग्य प्रतीत होता है कि पुलिस कर्मियों का परिवार और भ्रष्टाचार के विरुद्ध धरना? लेकिन बहरहाल, उनकी भावनाओं का तिरस्कार तो नहीं किया जा सकता। हां ऐसी खबरों के बाद ज़ेहन में यह बात तो ज़रूर उठती है कि आखिर  भ्रष्टाचार विरोधी स्वर बुलंद करने का हक किसे होना चाहिए और किसे नहीं। आज जिसे देखिए वही अपने घरों व दुकानों के आगे सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा कर यातायात व्यवस्था को बाधित करने पर तुला हुआ है। बिजली चोरी,कम तौलना, सामानों में मिलावट करना,नकली सामान बेचना, नकली दवाईयां, ज़हरीला दूध,खोया,मक्खन, घी आदि बाज़ार में त्यौहारों पर बेचकर लोगों की जान से खेलना जैसी हज़ारों विसंगतियां देश के ही तमाम लोगों में समा चुकी हैं। यह कोई विदेशी घुसपैठअथवा प्रायोजित आतंकवाद का हिस्सा नहीं। मुझे नहीं लगता कि कानून बनाने मात्र से इनसे छुटकारा मिल सकेगा। लिहाज़ा ज़रूरत है समाज को धार्मिक,पारिवारिक व सामाजिक स्तर पर चेतन व जागरुक करने की तथा अपनी मेहनत व ईमानदारी से कमाए गए धन को ही ‘धन लक्ष्मी समझने की। अन्यथा पराई जेब पर बुरी नज़र रखना भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी जैसी काले धन की कमाई को दावत देने के अतिरिक्त और कुछ नहीं।

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