वो जी रहा है
कड़क धूप, उड़ती धूल नीम का पेड़
उसके नीचे कपडे सी रहा है
आँखों के कंचे हर वर्ग पर फेरता हूँ,
रह के बंद अँधेरी कोठरी में कलम की आँख से सब देखता हूँ
गर्म गर्म चपाती कविता की सेकता ही तो हूँ,
मत कहो क्या देखा, जनाब देखता ही तो हूँ
निर्धन की बेटी की शादी,
कही से पूरी कही से आंधी,
दो पूड़ी दो सब्जी सजती,
उसपर भी आ जाती आंधी,
उस निर्धन के अश्को-मोती समेटता ही तो हूँ
मत कहो क्या देखा, जनाब देखता ही तो हूँ
गरीबो के अमीरी चोचले
संगमरमर के देखो घोसले
झूठी शान दिखने को ये
करते है नए नए ढकोसले
दो टूक कहो या व्यंग कहो फेकता ही तो हूँ
मत कहो क्या देखा, जनाब देखता ही तो हूँ
वो चलता है कारों में,
रात बिताता बारो में,
नोटों को हड्डी जहा फेकता
आ जाता सरकारों में
ऐसी गन्दी गलिया प्यारे, छेकता ही तो हूँ
मत कहो क्या देखा, जनाब देखता ही तो हूँ
देखता ही तो हूँ देखता ही तो हूँ
निर्धन की बेटी की शादी,
कही से पूरी कही से आंधी,
दो पूड़ी दो सब्जी सजती,
उसपर भी आ जाती आंधी,
उस निर्धन के अश्को-मोती समेटता ही तो हूँ
मत कहो क्या देखा, जनाब देखता ही तो हूँ
गरीबो के अमीरी चोचले
संगमरमर के देखो घोसले
झूठी शान दिखने को ये
करते है नए नए ढकोसले
दो टूक कहो या व्यंग कहो फेकता ही तो हूँ
मत कहो क्या देखा, जनाब देखता ही तो हूँ
वो चलता है कारों में,
रात बिताता बारो में,
नोटों को हड्डी जहा फेकता
आ जाता सरकारों में
ऐसी गन्दी गलिया प्यारे, छेकता ही तो हूँ
मत कहो क्या देखा, जनाब देखता ही तो हूँ
देखता ही तो हूँ देखता ही तो हूँ
No comments:
Post a Comment
http://rktikariha.blogspot.com/