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Monday, July 11, 2011
"इमोशनल अत्याचार" की आग
गौरतलब है कि इन दिनों अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड तेल के दाम कुछ घट रहे हैं और इस वक्त सरकार का सोचना शायद यह है कि अगर अभी दाम बढ़ा दिए जाएं तो सब्सिडी का बोझ कम हो सकता है, वरना क्रूड के दाम वापस बढ़ने पर घरेलू बाजार में दाम बढाने का सरकार व तेल कंपनियों को कोई फायदा नहीं होगा। जानकार लोगों का मानना है कि क्रूड के दामों में कितनी ही कमी आए,ये 100 डॉलर के आसपास तो रहेंगे।
सरकार दावे भले ही कर ले, लेकिन वह पेट्रोलियम पदार्थो पर सब्सिडी खत्म नहीं कर सकती,क्योंकि इससे वोटों का गणित बिगडता है,अर्थव्यवस्था भी बेकाबू हो जाती है। अब दाम बढाने का निर्णय इसलिए भी फटाफट कर लिया गया क्योंकि अभी एक साल तक देश में कहीं भी चुनाव नहीं होने वाले। वाहनों के ईंधन और घरेलू गैस के अलावा केरोसिन एक ऎसा ईंधन है जिसके दामों को छूने की हिम्मत कोई सरकार नहीं करती। एक पेट्रोल ही ऎसा है जिसके दाम सरकार आसानी से बढ़ा लेती है क्योंकि यह माना जाता है कि पेट्रोल से चलने वाली गाडियां उच्च मध्यम व ऊंचे वर्ग के पास होती हैं ओर फिर पेट्रोल के दाम वैसे भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त किए जा चुके हैं। जहां तक डीजल के दाम बढ़ाने का सवाल है, सरकार भी मानती है कि डीजल महंगा होने से परिवहन खर्च बढ़ेगा और उससे अन्य सभी वस्तुओं के दाम प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। केरोसिन कहने को तो गरीब जनता का ईंधन है लेकिन इसका इस्तेमाल ब़डे पैमाने पर डीजल में मिलावट के लिए किया जाता है।
अगर सरकार यह तय कर ले कि केरोसिन इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर परिवारों को वह घरेलू गैस के कनेक्शन देगी तो केरोसिन पर> सब्सिडी घटाई जा सकती है। डीजल से ट्रेक्टर-ट्रक चलते हैं, लेकिन लग्जरी कारें भी तो चलती हैं। डीजल के दामों में बढ़ोतरी का ढुलाई की लागत पर बहुत कम असर होता है लेकिन ट्रक ऑपरेटर और व्यापारी इसके बहाने कीमतें तत्काल बढ़ा देते हैं।
डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ने अनिवार्य से हैं क्योंकि सरकार ने पेट्रो पदाथोंü पर सब्सिडी खत्म करने की ठान ली है। ऎसे में आम और खास जनता इससे कब तक बची रह सकती है। आमजन को तो अब कमर कस ही लेनी चाहिए। और खास यानी संपन्न आदमी को चिंता है ही नहीं क्योंकि वह खूब कमाता है व अपनी एसयूवी या अन्य डीजल पीने वाली गाडी पहले की तरह दौडाता रहेगा।
हां, सरकार को अब पेट्रोलियम पदार्थों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने के समस्त उपायों में तेजी लानी चाहिए। एलपीजी सिलिंडरों की बजाय पीएनजी का ज्यादा इस्तेमाल शुरू किया जाना चाहिए ताकि घरेलू गैस पर सब्सिडी कम करने में मदद मिले। भारतीय रेलवे अगर माल ढुलाई के काम को प्राथमिकता दे तो इससे कई फायदे होंगे। रेलवे से ढुलाई सस्ती और तेजी से हो सकती है और तब ट्रकों पर निर्भरता कम हो जाएगी। डीजल से कार चलाने वालों से ज्यादा दाम वसूली की योजना पर भी त्वरित रूप से अमल करना जरूरी हो चला है।
सबसे अहम बात ये है कि सरकार पेट्रो पदार्थो पर कर को युक्तिसंगत बनाए और इसी रास्ते राजस्व वसूली का मोह त्यागे। सरकार को पेट्रोलियम पदाथोंü के मामले में स्पष्ट नीति बनानी चाहिए अन्यथा हम विकास दर को तो अवरूद्ध करेंगे ही,अर्थव्यवस्था का भी बुरा हाल कर बैठेंगे। सरकार को पेट्रोल में मोलासेज निर्मित एल्कोहल के मिश्रण, बायो डीजल उत्पादन के क्षेत्र में अनुसंधानों में तेजी लाने पर भी सोचना चाहिए।
जहां तक विपक्षी दलों के विरोध प्रदर्शन का सवाल है,भाजपानीत राजग सरकार ने ही पेट्रो पदार्थो के दामों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मुहिम शुरू की थी और अपने शासन में करीब तीन दर्जन दफे पेट्रो पदार्थो के दामों में बढोतरी की थी लेकिन विपक्ष में आते ही उसका नजरिया बदल जाता है जबकि दाम वृद्धि के पीछे तर्क तब भी वही थे जो आज हैं। ऎसे में विपक्ष को जिम्मेदारी भरा रवैया अपनाना चाहिए। जनता को "इमोशनल अत्याचार" की आग में नहीं झोंकना चाहिए।
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well
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