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Wednesday, June 1, 2011

नक्सली हमला होने की सूरत में बचाव के मार्गदर्शक सिद्धांत (गाइडिंग प्रिंसिपल) तय होते ही सेना ने बस्तर के तीनों जिलों में जवानों को ट्रेनिंग के लिए भेजना शुरू कर दिया है। सेना ने साफ कर दिया था कि जवानों की सुरक्षा के बारे में नियम तय होने तक वह बस्तर में ट्रेनिंग शुरू नहीं करेगी। मध्य कमान के हेडक्वार्टर लखनऊ से निकली जवानों की पहली टुकड़ी मंगलवार को रायपुर पहुंच गई। इसमें पांच सौ से ज्यादा जवान हैं। नारायणपुर के अलावा बस्तर और कांकेर जिले में भी सेना की ट्रेनिंग होगी।
और जमीन देगी सरकार
छत्तीसगढ़ सरकार ने सेना को नारायणपुर जिले में अबूझमाड़ के पास घने जंगल और पहाड़ियों वाला करीब 750 वर्ग किमी का हिस्सा उपलब्ध कराया है। इस ट्रेनिंग सेंटर में पूरे देश से जवानों को भेजा जाएगा। राज्य सरकार सेना को अतिरिक्त जमीन उपलब्ध कराने पर भी राजी हो गई है। इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी गई।ट्रेनिंग सेंटर चालू करने के पहले पूरे इलाके की जांच के लिए कुछ महीने पहले सेना की रेकी टीम बस्तर आई थी। टीम की रिपोर्ट में घने जंगल में ट्रेनिंग के दौरान नक्सलियों द्वारा हमला करने के खतरे का साफ तौर पर जिक्र था। नक्सली इलाके में सेना की मौजूदगी का शुरू से विरोध कर रहे हैं। इसे देखते हुए सेना ने साफ कर दिया कि बिना कानूनी सुरक्षा के अपने जवान और अफसरों को बस्तर नहीं भेजेगी।
कानूनी प्रावधानों के सेना के प्रस्ताव को आंशिक संशोधनों के साथ रक्षा मंत्रालय और विधि मंत्रालय से हाल में मंजूरी मिल गई। इसके बाद सेना ने अपने जवानों को जंगल वॉरफेयर की ट्रेनिंग की दिशा में तैयारी शुरू कर दी।सेना के छत्तीसगढ़-उड़ीसा सब एरिया हेडक्वार्टर के कमांडिंग आफिसर ब्रिगेडियर अमरीक सिंह ने मंगलवार को पत्रकारों से चर्चा में गाइडिंग प्रिंसिपल तय होने की पुष्टि तो कर दी, लेकिन इसके प्रावधानों का खुलासा नहीं किया।सेना पहले ही साफ कर चुकी है कि वह अपने जवानों और संसाधनों की सुरक्षा में कोई जोखिम नहीं लेगी। संकेत साफ है कि अगर नक्सलियों ने हमला किया, तो सेना जबर्दस्त पलटवार करेगी।
सेना का पहली यूनिट (कॉलम) लखनऊ से आज रायपुर पहुंच गया। सेना ने यह खुलासा नहीं किया है कि ये जवान कहां हैं और कांकेर, बस्तर या नारायणपुर जिलों में से कहां उनकी ट्रेनिंग होगी।

बस्तर है सेना के लिए अहम
जवानों के लिए बेहद जरूरी जंगल वॉरफेयर ट्रेनिंग के लिहाज से बस्तर सेना के लिए बहुत अहम है। नागालैंड में वारंगटी के अलावा उसके पास ऐसा एक भी सेंटर नहीं है, जहां नैचुरल फारेस्ट और पहाड़ियां हों।
इस सेंटर में कई देशों के सैनिक जंगलवार की ट्रेनिंग लेने आते हैं। कर्नाटक के बेलगाम में भी सेनाका ट्रेनिंग सेंटर था, लेकिन तेजी से हुए शहरीकरण की वजह से वहां का जंगल खत्म होने की स्थिति में है।
अबूझमाड़ से लगे जंगल के रूप में सेना को ऐसी मनचाही जगह मिल गई है, जहां आने वाले कई दशकों तक आबादी का दबाव नहीं पड़ने वाला। सेना यहां अपने नियमित सैनिकों को ट्रेनिंग देगी। इसमें ऐसे बड़े अभियानों का सेना अभ्यास करेगी, जिसमें पांच सौ से हजार जवान अधिकारियों के साथ शामिल होंगे।
ऐसा एक अभ्यास हफ्ते भर चलता है। अगर उसमें कोई खामी रह जाए तो उसे दो से तीन बार दोहराया जाता है। माना जा रहा है कि एक समय पर इन ट्रेनिंग सेंटरों में दो से तीन हजार तक जवान होंगे। राज्य शासन की शर्तो की वजह से यहां का सारा अभ्यास बिना फायरिंग के होगा। यहां सेना शूटिंग रेंज भी नहीं बना पाएगी।
सेना कर सकेगी जवाबी कार्रवाई
सेना ने साफ कर दिया था कि बिना कानूनी सुरक्षा के वह बस्तर में काम नहीं करेगी। कश्मीर, नागालैंड जैसे अशांत क्षेत्रों में सेना को आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट के तहत कानूनी अधिकार मिल जाते हैं। बस्तर में ऐसे हालत नहीं हैं। हमला होने पर अगर सेना की गोली से कोई मर गया, तो उसे आईपीसी के तहत आरोपी बनाया जा सकता है। सेना यही नहीं चाहती। रक्षा और विधि मंत्रालय ने मार्गदर्शी सिद्धांत तय किए हैं, उसमें सेना को जवाबी कार्रवाई समेत अन्य अधिकार भी मिल गए हैं।
बारूदी सुरंग और आईईडी को लेकर सतर्क
घात लगाकर होने वाले हमलों के अलावा नक्सलियों के सबसे मारक हथियार बारूदी सुरंग और इंप्रोवाइस्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) को लेकर सेना सतर्क है। नक्सलियों ने बस्तर में जगह-जगह बारूदी सुरंगें लगा रखी हैं। इन इलाकों में अपने वाहनों की एंट्री करने के पहले सारे रास्ते की डीमाइनिंग करेगी। नारायणपुर में जो इलाका सेना को मिला है, वहां सड़क तक नहीं है। कच्चे रास्ते से अपने वाहनों को लेकर जाने के पहले सेना को पूरे इलाके से बारूदी सुरंगें हटानी होंगी। और ज्यादा जवानों के आने के बाद इस दिशा में काम शुरू किया जाएगा। माना जा रहा है कि जवानों को शुरुआत में बस्तर और कांकेर जिले में ट्रेनिंग दी जाएगी। सीआरपीएफ के कुछ कैंपों को भी सेना की रेकी टीम ने देखा था।
नक्सलियों से नहीं आ रहे लड़ने
"पहली टुकड़ी मंगलवार को पहुंच चुकी है। जवान कांकेर, बस्तर और नारायणपुर जिलों में राज्य शासन द्वारा निर्धारित स्थानों पर पहुंचकर ट्रेनिंग शुरू कर देंगे। सेना बस्तर में ट्रेनिंग के लिए आ रही है, नक्सलियों के खिलाफ लड़ने नहीं।ट्रेनिंग की जगह व समय की स्थानीय पुलिस को भी लगातार जानकारी दी जाएगी।"
ब्रिगेडियर अमरीक सिंह, कमांडिंग आफिसर, छत्तीसगढ़-उड़ीसा सब एरिया हेडक्वार्टर

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