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Saturday, May 21, 2011
फटी कमीज नुची आस्तीन कुछ तो हैं....।
फटी कमीज नुची आस्तीन कुछ तो हैं....।। गरीब शर्मो- हया में हसीन कुछ तो हैं...।।। ‘समझ’ का बड़ा फेर हैं... ‘दुनिया’ ‘दिखती’ क्या है...।। और ‘होती’ क्या है...?? ‘आप’ दिखते क्या हैं...?? ‘दिखाते’ क्या हैं...?? और ‘होते’ क्या हैं...?? ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर पर फिल्माए गाने को जरा याद कीजिए...।।। ‘दुनिया बनाने वाले क्यो तेरे मन में समाई... तूने काहे को दुनिया बनाई...??? हर किसी का ये प्रश्न है कि हम क्यों है... और ये दुनिया क्यों है॥।।। क्या ‘संबंध’ है हमारा और दुनिया का...।।। क्यों आए हैं हम दुनियां में...??? क्या करना हैं हमें दुनिया में ...।। उत्तर और समाधान में भटकन ही भटकन है... क्या देखें...।। क्या समझें... और किसका विश्वास करें...।।। तभी तो बेबाक शायर कहता है। ‘‘ये सफर हर सूरत तय मुझी को करना है, जख्म- जख्म जीना है, सांस- सांस मरना है।’’ ‘परमात्मा’ का भी ‘अजब’ ‘खेल’ है कि उसने तुझे जीवन और शरीर में ‘राम’ और ‘रावण’ एक साथ दिए...।।। ‘राम’ के रुप में उसने तुझे ‘हृदय’ दिया... और ‘रावण’ के रुप में उसने तुझे ‘मस्तिष्क’ दिया।।। हृदय ने सरलता, सहजता, निश्छलता, निस्कपटता, श्रद्धा, प्रेम, दया, करुणा, वात्सला, अपनेपन, सत्य, अहिंसा, भरोसे और विश्वास की फसल बोई....।।। मस्तिष्क ने छल, कपट, चतुराई, चालाकी, बेईमानी, घृणा, स्वार्थ, चालाकी, मक्कारी, हरामखोरी, दोगलाई का व्यापार किया...।।। चालाक बुद्धि ने एक पाठ और पढ़ाया कि कर तो तू छल, कपट, धोखाधड़ी, चतुराई, बेईमान, घृणा, मक्कारी, हरामखोरी और दोगलाई मगर ‘व्यवहार’ कर शराफत का, सरल- सहज होने का, निश्छल होने का, शरीफ और ईमानदार होने का... सियार और लोमड़ी होकर शेर की खाल पहनाने का मुहावरा ऐसी परिस्थियों में ही जन्मता है... तभी तो बयॉं है- ‘‘प्यार रास्ते का वो मोड़ अभी नहीं आया, काफिला उम्मीदो का जिस जगह ठहरता है।’’ ये ‘दुनिया’ तो मनुष्य के ‘व्यवहार’ से संचालित होती है... बहुत ‘सतही’ हिसाब- किताब है इस बाहरी संसार का... मुंह में राम और बगल में छुरी रखने वाले लोग प्रथम श्रेणी के ‘कुशल’ लोग होते हैं... ‘संसार’ भी ‘स्किल्ड’ लोगों को सर्वोपरि स्थान देता है... हमारा ‘व्यवहार’ हमारे ‘मस्तिष्क’ से जन्म लेता है... चतुर सुजान मस्तिष्क हमें जिदंगी की हर ‘अदा’ में ‘निपुण’ कर देता है... वह हमें बखूबी समझा देता है कि दुनिया में ‘दिखना’ कैसा है...।।। ऐसे ‘कुशल’ अभिनेता अपने ‘व्यवहार’ से ‘स्वाभाव’ बनाते हैं... हालाकि वे उस स्वाभाव के होते नहीं हैं... मगर ‘पीपल’ होकर ‘सोने’ जैसे दिखने की कला इन्हे बखूबी आती है... दुनियां में ऐसे ही ‘नकली झाल’ का बोलबाला है... तभी तो बेबाक शायर कहता है- ‘‘सच है कि उनसे हो गए हम बेशकीमती, पर कंगनो में आपके हम कब तक जड़े रहें।’’ आत्मा और परमात्मा का ‘भीतरी जगत’ मनुष्य के ‘स्वाभाव’ से ‘नियंत्रित’ होता है... ‘स्वाभाव’ जिंदगी का ‘मूलश्रोत’ ‘उद्गम’ है... जीवन रुपी गंगा की ‘गंगोत्री’ है... उत्तमश्रेणी के लोग ‘स्वाभाव’ से ‘व्यवहार’ करते हैं... अर्थात उनका ‘व्यवहार’ नैसर्गिक होता है... उसमें ‘मैनुपुलेशन’ की कोई जगह नहीं होती है... उन उत्तम श्रेणी के लोगों की कार्यशैली में ईमानदारी होती है... लोग कहें भले ही न पर ऐसे लोगों की ‘अस्मिता’ और ‘वजूद’ का अहसास हमें हमेशा और सुस्पष्ट होता है.... हम जिदंगी को चमगादड़ की तरह उल्टा लटककर देखने के आदी हैं... इसलिए हम, लोगों के ‘मैनुपुलेटेड’ ‘अरेज्ंड’ ‘स्किल्ड’ ‘व्यवहार’ को ही ‘स्वाभाव’ माल लेते हैं... जबकि उनका नैसर्गिक स्वाभाव ताउम्र हमारे सामने उजागर ही नहीं हो पाता है... और फिर कभी जब उनका ‘धत्करम’ उजागर होता है तो हम आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि वह तो ऐसा नही था... क्योकिं हम उसके ‘व्यवहार’ को ही ‘स्वााव’ समझते की बेवकूफी ताउम्र करते हैं... जो ‘स्वाभाव’ से ‘व्यवहार’ करते हैं उन्हें हम ‘सभ्य’ लोग लगभग असभ्य घोषित कर देते है... उन्हें हम सभ्य लोग अक्खड़, फक्कड़ और भी न जाने क्या- क्या उपमाएं दे देते हैं.... क्योकिं ये ढंका हुआ आचरण नहीं करते... इस प्रकार जो ‘खुला’ और ‘साफ’ आचरण करते हैं उन्हें हम लगभग ‘रिजेक्ट’ करते हैं... और जो व्यवहार से स्वाभाव की झलक दिखाते हैं उस मृगमरीचिका को हम पानी का समृद्ध मानकर स्वीकार करते हैं... और धोखा खाने में ही अपनी खुशनसीबी समझते हैं... इतना ही तो उस ‘उपरवाले’ का ‘खेल है... ‘समझ’ सके तो ‘समझ’ ले... तभी तो बयॉं है- ‘‘जी है कि अब तो रात दिन यों ही पड़े रहें, या फिर किसी ढलान पर घंटो खड़े रहें।’’
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