जो कुछ मीडिया में कहा जा रहा है, यदि वह सही है तो श्री मधु कोडा ने दो वर्ष तक झारखंड के मुख्यमंत्री पद पर काम करने के दौरान 4000 करोड रुपए की विपुल धनराशि गैरकानूनी ढंग से एकत्रित की और उसे दुनिया भर में अलग-अलग परिसंपत्तियों में निविष्ट किया, जिनमें जहाजरानी कंपनियां, होटल और स्विस बैंक खाते शामिल हैं।
जैसा कि बताया जाता है, इसमें से अधिकतर राशि झारखंड में, जो कि भारत के खनिज समृध्द तीन राज्यों में से एक है, खनन परियोजनाओं को मंजूरी देने के एवज में ली गई रिश्वत के जरिए इकट्ठी की गई। इनमें से अधिकतर परियोजनाएं गैरकानूनी थीं और जितनी अवधि और जितने क्षेत्र के लिए अनुमति दी गई थी वह भी कानूनी सीमा के बाहर थी। आदिवासी झारखंड का सबसे बडा जाति समूह है और वे वहां के मूल बाशिंदे हैं जिनका अपनी भूमि पर से उत्तरोत्तर कब्जा छिनता चला गया है।
यदि कारोबारियों ने श्री कोडा को 4000 करोड रु रिश्वत में दिए, तो मंजूर की गई परियोजनाओं से उन्हें कम से कम 10,000 करोड रु क़ा लाभ तो हुआ ही होगा। 20 प्रतिशत लाभ की गुंजाइश रखते हुए, कुल व्यापार कम से कम 50,000 करोड रु क़ा रहा होगा। इतनी बडी रकम झारखंड के कुल राजस्व से तीन गुना ज्यादा है। जैसा कि कहा गया है, यदि अकेले कोडा ने इतनी राशि हडप ली है जो झारखंड के वार्षिक बजट की एक चौथाई के बराबर है, तो यदि राज्य न्यूनतम सार्वजनिक सेवाएं भी नहीं जुटा पाता तो यह हैरानी की बात बिल्कुल नहीं होगी। पुलिस का जनता के प्रति रवैया शत्रुतापूर्ण है और वे जनता को परेशान करते रहते हैं। इस स्थिति के प्रति स्वाभाविक प्रतिक्रिया नक्सलवाद का प्रसार है। अपने सब दोषों के बावजूद नक्सली एकमात्र संगठित राजनीतिक धारा है जो ताकतवरों की लूटपाट के खिलाफ अल्पाधिकार प्राप्त और शोषित लोगों की रक्षा करती है। नक्सलियों का प्रभाव इसलिए बढा है क्योंकि लोगों के पास कोई और सहारा नहीं है। जो स्थिति झारखंड की है, वही स्थिति छत्तीसगढ, अादिवासी उडीसा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के कुछ भागों की भी है। पूरी आदिवासी पट्टी में सार्वजनिक संसाधनों को लूटा जा रहा है। उडीसा में 16,000 करोड रु क़ा एक खनन घोटाला अभी-अभी सामने आया है। यहां तक की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह स्वीकार किया कि उन आधुनिक आर्थिक प्रक्रियाओं में, जो बेरहमी से आदिवासियों के रहने की जगहों पर दखल कायम करती जा रही है, उन्हें कुछ हिस्सा देने में हमारी व्यवस्था नाकाम रही है और यह कहा कि दशकों से आदिवासियों के बीच पैदा हुई अलगाव की भावना अब खतरनाक मोड लेती जा रही है। उन्होंने यह भी कहा था कि हमारे आदिवासियों के बराबर शोषण और उनके सामाजिक तथा आर्थिक दुरुपयोग को अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। व्यवस्था की नाकामी को स्वीकार करने वाले एकमात्र सरकारी पदाधिकारी नहीं हैं डा. सिंह। योजना आयोग द्वारा नियुक्त की गई बंदोपाध्याय समिति ने भी इसे नक्सलवाद के बढने के लिए उचित रूप से जिम्मेवार ठहराया है। टाटा स्टील छत्तीसगढ में 5000 एकड भूमि पर 19,500 करोड रु का स्टील प्लांट लगाने जा रहा है जिसके लिए पूरे 10 गांव खाली कराने पडेंग़े। एस्सार कॉर्पोरेशन छत्तीसगढ क़े बस्तर इलाके में घुसने के लिए जोर लगा रहा है। आदिवासियों को कई दशकों से लूटा जा रहा है। न्यायपालिका भी इस अपराध में शामिल है और कुछ शीर्ष कॉर्पोरेट वकील तो इस फिराक में हैं कि संविधान की पांचवीं अनुसूची को, जो कि आदिवासियों को कानूनी रक्षा प्रदान करती है, समाप्त कर दिया जाए ताकि विनाशकारी विकास परियोजनाओं को मंजूरी मिल सके। ऑपरेशन ग्रीनहंट के पिछे तर्काधार यही है। आदिवासी पट्टी को ''नपुंसक'' बनाकर उसे ''शांत'' करने के लिए एक बहुत बडे पैमाने पर सैनिक हमला किया जा रहा है। नक्सली तो केवल प्रतीक रूप में निशाना बनाए जा रहे हैं। असलीयत में यह राज्य द्वारा जनता के खिलाफ छेडी ग़ई एक जंग है। इस हमले की शुरूआत बस्तर मे की जाएगी और यह पांच साल तक चलेगा। इसमें लगभग 60,000 तक की संख्या में सशस्त्र सैनिक होंगे जिसमें 27 बटालियन सीमा सुरक्षा बल और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस भी शामिल होगी। इसका लक्ष्य होगा बस्तर में अबझमढ नामक 4,000 वर्ग किमी में फैला हुआ घने जंगलों का इलाका। भारतीय सेना बिलासपुर में एक ब्रिगेड मुख्यालय स्थापित करेगी जो भविष्य में माओ विरोधी ऑपरेशनों में भाग ले सकेगी। भारतीय वायु सेना बंदूकवाहक हेलीकॉप्टर जुटाएगी जिनमें उसके गरुड नामक विशेष बल तैनात होंगे। ऐसा पहली बार हो रहा है कि भारत की नियमित सशस्त्र सेनाएं जो हमारे बाहर के दुश्मनों से हमारी रक्षा करती है, देश के केंद्रीय भाग में भारतीय नागरिकों के खिलाफ बडे पैमाने पर हमला करने के लिए तैनात की जाएगी। यह आक्रामक ऑपरेशन एक बहुत बडे पैमाने पर मासूम नागरिकों को अपने पाशविक हमलों का शिकार बनाएगा और कष्ट और दुख में बढाेतरी करेगा। हमें इस ऑपरेशन के खिलाफ इसलिए नहीं खडा नहीं होना चाहिए कि हम माओवादियों का समर्थन करते हैं, बल्कि इसलिए कि बुनियादी लोकतांत्रिक मूल्य दांव पर लगा है। माओवादियों की हिंसक मनोवृति का किसी हाल में समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन राज्य द्वारा अपने ही लोगों के खिलाफ एक सामूहिक दंड के रुप में जंग छेडने का विचार ही घिनावन है। सामूहिक दंड न्याय के लिए घोषित मुद्दों के दौरान भी अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार वर्जित है। यदि भारतीय राज्य एक बडे पैमाने पर संगठित और सोची समझी हिंसा का सहारा लेती है, जिसमें मुख्यत: नागरिक ही मारे जाएंगे तो वह अपना कद छोटा कर लेगा और थोडा सा भी सभ्य कहलाने का दावा नहीं कर पाएगा। इस ऑपरेशन से तो अन्याय बढेंग़े और भागीदारी का विकास संभव नहीं होगा। आजादी के समय से ही राज्य आदिवासियों के साथ अनुचित व्यवहार करता रहा है और आदिवासी इलाकों में विकास और लोकतंत्र को क्षति पहुंचाता रहा है। उसे अपना रास्ता सुधारना चाहिए और एक ऐसी चेष्टा करनी चाहिए जो गुणात्मक दृष्टि से नई और अलग हो। ऑपरेशन ग्रीनहंट को हरगिज अंजाम नहीं दिया जाना चाहिए।
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