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Thursday, December 31, 2009

पैसा, शराब, साड़ी, कंबल के दम पर अब नहीं मिलते वोट

पैसा, शराब, साड़ी, कंबल के दम पर अब नहीं मिलते वोट
-किसी दुकान में नहीं बिकती निष्ठा
दुर्ग
महापौर के चुनावी नतीजें न सिर्फ कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है; बल्कि भाजपा के लिए चिंतन का सबब भी है। एक ओर 2004 के चुनाव में रिकार्ड बढ़त और इस चुनाव में एक-एक वोट के लिए संघर्ष के बीच सियासी हल्कों में यह सवाल कौंध रहा है, कि डेढ़ दशक से भाजपा के अभेद गढ़ में तब्दील च्दुर्गज् में भारतीय जनता पार्टी के उत्कर्ष के दिन कहीं लद तो नहीं गए? विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव फिर नगरीय निकाय चुनाव में यद्यपिभाजपा की जीत हुई, तथापि वोटों का एक बरस पहले हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी महज 702 वोटों के अंतर से चुनाव जीत सके थे। नगरीय निकाय चुनाव में भी कांटे के मुकाबले में भाजपा की स्थिति वही रही। हालांकि, कांग्रेस की दिशाहीनता के बनिस्बत् भाजपा का स्थायित्व मतदाताओं ने बड़ा फेक्टर समझा। मगर, चुनावी जीत की खुमारी में स्वाभिमान मंच को मिले जनसमर्थन को दरकिनार नहीं किया जा सकता। दुर्ग नगर निगम में भाजपा के कर्णधारों ने स्वयं ही जनता को दूसरा विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है। यदि अंचल की प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की स्थिति यूं ही रही, तो स्वाभिमान मंच का विकल्प तीसरे मोर्चे के रूप में खड़़ा है। मंच के आह्वान पर दुर्ग बंद की व्यापक सफलता को इसकी पुष्टि का संकेतात्मक अर्थ समझना चाहिए।
पहले की तरह इस चुनाव में भी दुर्ग के मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, अपनी जागरुकता व राजनीतिक विवेक का परिचय दिया। समझना मुश्किल नहीं कि सियासी दल व उनके नेताओं का तबका जनता को भरमाने कितनी भी कोशिश करे, वे किसी मुगलते में नहीं आने वाले। चुनावी पंडित यद्यपि इनके पीछे एंटीइंकंबेंसी व टीना जैसे फैक्टर गढ़कर चुनावी नतीजों के मतलब समझने का व्यर्थ स्वंाग करते है। मगर सीधा सा यह निष्कर्ष नहीं निकाल पाते, कि शराब, पैसा, कंबल व साड़ी के दम पर अब नतीजे प्रभावित नहीं होते। उम्मीदवार भले ही मतदाताओं को खरीदेने का भ्रम पाल लेते हैं, मगर निष्ठा किसी दुकान में नहीं बिकती।

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