राजस्थान के एक सुदूर गांव का एक लड़का बीबीसी सुना करता था। पूरी दुनिया
के देशों के नाम उसकी जुबान पर रहते थे। जब बाकी लोग कोलकाता, मुंबई या
दिल्ली देखने की बात करते थे, वह टोक्यो या लंदन घूमने के इरादे जताया करता
था। दोस्त देखते और हंसते।
दसवीं कक्षा में वह जिला मुख्यालय पर आ गया और साधारण नंबरों से स्कूली शिक्षा पूरी करके उसने एक इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश ले लिया। वह इलेक्ट्रिकल का एक लेक्चरर ही बन सका। उसकी नौकरी देखकर कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि वह इससे ज्यादा आगे जा सकता है। करीब तीस साल बाद 14 अगस्त की सुबह जोहानिसबर्ग से अचानक आई एक सुखद कॉल ने स्तब्ध करते हुए आंखों को भिगो दिया।
वह दक्षिण अफ्रीका के फोर्डसबर्ग से उसी साधारण-से मित्र की कॉल थी। वह बात कर रहा था गांधीजी के स्मारक के पास खड़े होकर। इस स्मारक को बर्निग ट्रुथ या ज्वलंत सत्य भी कहा जाता है। अचरज इस बात का नहीं था कि वह गांधी स्मारक के पास खड़ा, इतनी दूर से इतने साल बाद कॉल कर रहा था। हतप्रभ कर देने वाली बात यह थी कि स्कूल के उन दिनों में वह गांधीजी को लेकर कोई बहुत अच्छे विचार प्रकट नहीं करता था। उसने बताया कि दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में वह अपनी पीएचडी थीसिस के सिलसिले में आया था और विश्वविद्यालय जाने से पहले वहां के प्रोफेसर ने उसे प्यार भरा निर्देश दिया : पहले गांधी स्मारक हो आओ, फिर रिसर्च संबंधी दस्तावेज के बारे में आपसे बात करेंगे।
गांधी के बारे में बदले हुए विचारों को लेकर उसने बताया कि भारत से जैसे ही एक दशक पहले वह निकला, दुनिया के आसमान में गूंजते हमारे जयघोष के स्वरों ने उसके मस्तिष्क को कांस्य पात्र की तरह झनझना दिया। वह सबसे पहले ओमान के एक विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग पढ़ाने लगा। अब वह साल भर में कुछ महीने स्कॉटलैंड तो कुछ महीने ओमान में रहता है। उसके ढेरों रिसर्च पेपर अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओंे में प्रकाशित हुए हैं।
जीवन के नैसर्गिक रास्तों पर चलकर आगे बढ़ने वाले ग्रामीण भारत के कितने ही लड़के-लड़कियां विदेशों में अपने-अपने हिस्से के नभ को अपने छोटे-छोटे पंखों से चीर रहे हैं। वे कभी नन्ही-सी कोंपल थे। डरे-सहमे और सकुचाए हुए। स्कूल या कॉलेज में भी कभी ऐसे अंक नहीं आए कि विशेष कहलाएं। लेकिन साधारण-से अंकों के साथ एक नया रास्ता देखा, घर छोड़ा। और फिर एक दिन देश से बाहर जाने का साहस जुटाया। इस नभ में उड़ने लगे तो विमान में ही एक नया भारत खुली आंखों में उतरने लगा। इस भारत की महक ही कुछ दूसरी है। इस भारत को आप तब तक अपनी धमनियों में महसूस नहीं कर सकते, जब तक आप बाहर नहीं निकलते। इसकी अनुगूंज भारत से बाहर एक नया इंद्रधनुष रचती है, जिसमें जिजीविषा कूट-कूट कर भरी है। भारतीय नैतिक मूल्य और दूरंदेशियों का प्रभामंडल दिपदिपाता है।
जिन्हें यहां रहते हुए गांधीजी या भारत कभी इतने प्रेरणास्पद नहीं महसूस हुए, उनके लिए इस देश की सीमाओं के बाहर दुनिया के किसी भी कोने में भारत, अहिंसा या गांधीजी शब्द एक अलग ही अर्थ रखते हैं। यह एक अलग भारत है..अनूठा, सबसे अलग रंग लिए, विश्व-विजेता की तरह सिर ताने। वह दोस्त फोन पर बता रहा था कि मेरे साथ लाहौर और इस्लामाबाद से आए कुछ पाकिस्तानी खड़े हैं। उनका कहना था : जिन्ना हमारे राष्ट्रपिता हैं, लेकिन गांधीजी हमारी आजादी की रवायत के पुरखे हैं। यहां हम सब हिंदुस्तानी या कहें कि भारतीय उपमहाद्वीप के लोग हैं। पाकिस्तानी या भारतीय नहीं, न ही वैसी डाह हम अपने भीतर महसूस करते हैं। यहां सब ऐसे हैं, जैसे एक मां के दो बिछड़े बेटे, जिन्हें अभी-अभी बताया गया है कि आप दोनों एक ही माता-पिता की संतानें हैं। दोनों एक दूसरे की बराबर इज्जत करते हैं..दोनों उत्थान-पतन, द्वंद्व-अंतर्द्वद्व और हषर्-विषाद से दूर।
दसवीं कक्षा में वह जिला मुख्यालय पर आ गया और साधारण नंबरों से स्कूली शिक्षा पूरी करके उसने एक इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश ले लिया। वह इलेक्ट्रिकल का एक लेक्चरर ही बन सका। उसकी नौकरी देखकर कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि वह इससे ज्यादा आगे जा सकता है। करीब तीस साल बाद 14 अगस्त की सुबह जोहानिसबर्ग से अचानक आई एक सुखद कॉल ने स्तब्ध करते हुए आंखों को भिगो दिया।
वह दक्षिण अफ्रीका के फोर्डसबर्ग से उसी साधारण-से मित्र की कॉल थी। वह बात कर रहा था गांधीजी के स्मारक के पास खड़े होकर। इस स्मारक को बर्निग ट्रुथ या ज्वलंत सत्य भी कहा जाता है। अचरज इस बात का नहीं था कि वह गांधी स्मारक के पास खड़ा, इतनी दूर से इतने साल बाद कॉल कर रहा था। हतप्रभ कर देने वाली बात यह थी कि स्कूल के उन दिनों में वह गांधीजी को लेकर कोई बहुत अच्छे विचार प्रकट नहीं करता था। उसने बताया कि दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में वह अपनी पीएचडी थीसिस के सिलसिले में आया था और विश्वविद्यालय जाने से पहले वहां के प्रोफेसर ने उसे प्यार भरा निर्देश दिया : पहले गांधी स्मारक हो आओ, फिर रिसर्च संबंधी दस्तावेज के बारे में आपसे बात करेंगे।
गांधी के बारे में बदले हुए विचारों को लेकर उसने बताया कि भारत से जैसे ही एक दशक पहले वह निकला, दुनिया के आसमान में गूंजते हमारे जयघोष के स्वरों ने उसके मस्तिष्क को कांस्य पात्र की तरह झनझना दिया। वह सबसे पहले ओमान के एक विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग पढ़ाने लगा। अब वह साल भर में कुछ महीने स्कॉटलैंड तो कुछ महीने ओमान में रहता है। उसके ढेरों रिसर्च पेपर अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओंे में प्रकाशित हुए हैं।
जीवन के नैसर्गिक रास्तों पर चलकर आगे बढ़ने वाले ग्रामीण भारत के कितने ही लड़के-लड़कियां विदेशों में अपने-अपने हिस्से के नभ को अपने छोटे-छोटे पंखों से चीर रहे हैं। वे कभी नन्ही-सी कोंपल थे। डरे-सहमे और सकुचाए हुए। स्कूल या कॉलेज में भी कभी ऐसे अंक नहीं आए कि विशेष कहलाएं। लेकिन साधारण-से अंकों के साथ एक नया रास्ता देखा, घर छोड़ा। और फिर एक दिन देश से बाहर जाने का साहस जुटाया। इस नभ में उड़ने लगे तो विमान में ही एक नया भारत खुली आंखों में उतरने लगा। इस भारत की महक ही कुछ दूसरी है। इस भारत को आप तब तक अपनी धमनियों में महसूस नहीं कर सकते, जब तक आप बाहर नहीं निकलते। इसकी अनुगूंज भारत से बाहर एक नया इंद्रधनुष रचती है, जिसमें जिजीविषा कूट-कूट कर भरी है। भारतीय नैतिक मूल्य और दूरंदेशियों का प्रभामंडल दिपदिपाता है।
जिन्हें यहां रहते हुए गांधीजी या भारत कभी इतने प्रेरणास्पद नहीं महसूस हुए, उनके लिए इस देश की सीमाओं के बाहर दुनिया के किसी भी कोने में भारत, अहिंसा या गांधीजी शब्द एक अलग ही अर्थ रखते हैं। यह एक अलग भारत है..अनूठा, सबसे अलग रंग लिए, विश्व-विजेता की तरह सिर ताने। वह दोस्त फोन पर बता रहा था कि मेरे साथ लाहौर और इस्लामाबाद से आए कुछ पाकिस्तानी खड़े हैं। उनका कहना था : जिन्ना हमारे राष्ट्रपिता हैं, लेकिन गांधीजी हमारी आजादी की रवायत के पुरखे हैं। यहां हम सब हिंदुस्तानी या कहें कि भारतीय उपमहाद्वीप के लोग हैं। पाकिस्तानी या भारतीय नहीं, न ही वैसी डाह हम अपने भीतर महसूस करते हैं। यहां सब ऐसे हैं, जैसे एक मां के दो बिछड़े बेटे, जिन्हें अभी-अभी बताया गया है कि आप दोनों एक ही माता-पिता की संतानें हैं। दोनों एक दूसरे की बराबर इज्जत करते हैं..दोनों उत्थान-पतन, द्वंद्व-अंतर्द्वद्व और हषर्-विषाद से दूर।
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