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Tuesday, October 26, 2010

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गिरीराज एक मूक-बधिर गांववासी हैं, जो एक समय पूरी तरह उपेक्षित जीवन जी रहे थे। पर आज वह न केवल स्क्रीन प्रिंटिंग का
कार्य बहुत अच्छी तरह सीख चुके हैं बल्कि अनेक युवाओं को प्रशिक्षण भी दे रहे हैं।
-नंदो बैसाखी की सहायता से चलती है व कम पढ़ी-लिखी है, पर उसने फोटोकॉपी करना सीखा और अब यह काम बखूबी कर रही है। जरूरत पड़ने पर वह फोटोकॉपी मशीन की छोटी-मोटी मरम्मत भी कर लेती है। औपचारिक स्कूली शिक्षा तो बहुत कम प्राप्त की पर उसने सौर ऊर्जा का कार्य सीखा और वह कई लोगों को इसका प्रशिक्षण दे चुकी है व गांवों में सोलर सिस्टम लगा भी चुकी है। उसकी सहेलियां सीता व श्यामा पेराबॉलिक सोलर कुकर लगाना जानती हैं।
-लक्ष्मण एक विकलांग कम पढ़े-लिखे गांववासी हैं जिन्होंने अब टेलिफोन एक्सचेंज ऑपरेट करने की क्षमता प्राप्त कर ली है।
ये कुछ उदाहरण हैं अजमेर जिले के सलोरा (किशनगढ़, जिला- अजमेर) ब्लॉक के गांवों के। इन छिपी प्रतिभाओं को आगे लाने का कार्य किया है सामाजिक कार्य और अनुसंधान केन्द्र (सा.का.अ.के.) नामक एक स्वैच्छिक संस्था ने, जिसे बेयरफुट कॉलेज के नाम से भी जाना जाता है। इस संस्था का गहरा विश्वास है कि कम पढ़े-लिखे और औपचारिक प्रशिक्षण से वंचित बहुत से ग्रामीणों में भी अपने आसपास की व्यावहारिक समस्याओं की गहरी समझ होती है और अवसर मिलने पर वे ऐसा बढ़िया समाधान दे सकते हैं, जो ऊंची डिग्री वाले शहरी बाबू नहीं दे सकते। इतना ही नहीं, नवीनतम उच्च तकनीक को व्यावहारिक स्तर पर अपनाने और अपनी जरूरतों के अनुसार उसका उपयोग करने की अनेक ग्रामीणों की क्षमता उससे कहीं अधिक है जितना कि आम तौर पर समझा जाता है। बेयरफुट कॉलेज के अनेक प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि ग्रामीण युवाओं को जब ऐसी जिम्मेदारियां दी गई तो उन्होंने उम्मीद से भी अधिक सफलता प्राप्त की। चाहे वह सौर ऊर्जा का क्षेत्र हो या जल संरक्षण का। चाहे वह दस्तकारी को बाजार की नई जरूरतों के अनुकूल ढालने की बात हो या शिक्षा के क्षेत्र में नए प्रयोग- हर लेवल पर साधारण ग्रामीणों ने असाधारण काम कर दिखाया है।
सौर ऊर्जा का क्षेत्र अभी हमारे अधिकांश ग्रामवासियों के लिए नया और अपरिचित है मगर तिलोनिया गांव में स्थित लगभग साठ हजार वर्ग फीट पर फैला हुआ इस संस्था का नया परिसर लगभग पूरी तरह सौर ऊर्जा से चालित है। यहां की रोशनी, काफी गहराई से पानी खींचने के पंप तथा अनेक कम्प्यूटरों की व्यवस्था सौर ऊर्जा द्वारा ही की जाती है, जिसकी व्यवस्था और देखरेख का कार्य मुख्य रूप से आसपास के गांवों से आए संस्था के सदस्य ही करते हैं। इस नई तकनीक के क्षेत्र में समय-समय पर कई समस्याएं भी आती रहती हैं और इस संबंध में बहुत कुछ परामर्श तो बाहरी विशेषज्ञों से प्राप्त करना ही पड़ता है, लेकिन फिर भी जितनी कुशलता से ग्रामीण कार्यकर्ताओं ने इस नई तकनीक को संभाला है उससे कई विशेषज्ञ चकित रह जाते हैं।
यहां के कुछ कार्यकर्ताओं ने लद्दाख के उन दुर्गम गांवों में भी यह तकनीक पहुंचाई है , जहां साधारण बिजली पहुंचने की उम्मीद भी अभी कई वर्षों तक नहीं है। यह कार्य लद्दाख के युवाओं के सहयोग से किया गया। ऐसे अनेक लद्दाखी युवा तिलोनिया स्थित संस्था के कार्यालय में आए और सौर ऊर्जा का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए लेह में संस्था का एक उप केन्द्र भी स्थापित किया गया। अरुणाचल प्रदेश सिक्किम के कुछ दुर्गम गांवों को भी सौर ऊर्जा से प्रकाशित किया गया है। इन सभी कार्यों में यह विशेष ध्यान रखा जाता है कि गांवों के गरीब परिवार के सदस्यों को आगे आने के अधिक अवसर दिए जाएं। इसी तरह महिलाओं और विकलांगों को ज्यादा अवसर देने का प्रयास किया जाता है।
बाबा आमटे ने कहा था कि हमारे गांव के गरीब और अनपढ़ लोगों को दया नहीं केवल अवसर चाहिए। बेयरफुट कॉलेज ने दिखा दिया है कि अवसर मिलने पर उपेक्षित ग्रामीण प्रतिभाएं काफी तेजी से खिल सकती हैं और उनकी सुगंध दूर - दूर तक जा सकती है।

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