महत्वाकांक्षी भारत का सामाजिक स्तर पर व्यापक बदलाव के रूप में एक नया चेहरा सामने आ रहा है। हमारे छोटे शहरों व कस्बों के युवा भी अब आईआईएम व आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पढऩे का सपना देखने लगे हैं। आंकड़े कुछ इसी तरह का संकेत देते हैं। देश के प्रतिष्ठित आईआईएम संस्थान समेत विभिन्न बिजनेस स्कूलों में दाखिले के लिए इस साल ११ अक्टूबर से शुरू हुई 'कैट' परीक्षा के अभ्यर्थियों के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि इस परीक्षा में उपस्थित हुए २,१५,०७२ अभ्यर्थियों में से कम से कम ५०,000 अभ्यर्थी अनु. जाति/जनजाति जैसे पिछड़े समुदायों से हैं। वे न सिर्फ लघु कस्बाई या ग्रामीण भारत से ताल्लुक रखते हैं, वरन उनमें से कई झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे अल्प-विकसित राज्यों से आते हैं। पिछले साल के मुकाबले इस आंकड़े में तकरीबन १३ फीसदी उछाल आया है।
इसके अलावा युवा छात्राएं भी ऐसे संस्थानों का रुख कर रही हैं, जिन्हें पहले सिर्फ लड़कों का गढ़ समझा जाता था। २०१२ में उत्तराखंड के आईआईएम, काशीपुर को अपनी पहली छात्रा मिली, जबकि इसके समकक्ष संस्थान आईआईएम, कोझीकोड में छात्राओं की तादाद तकरीबन ३५ फीसदी है। ग्रामीण भारत लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए भेजना चाहता था, लेकिन स्थानीय जगह से दूरी न सिर्फ इन लड़कियों को हतोत्साहित करती थी, बल्कि उनके माता-पिता भी इसेे लेकर चिंतित रहते थे कि उनकी बच्ची के साथ वहां क्या होगा। बच्चियों से जुड़ा असुरक्षा का यह एहसास ही इन अभिभावकों को उन्हें उच्च शिक्षा के लिए शहर भेजने से रोकता था।
अब आईआईएम व आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के देश के अंदरूनी इलाकों व अल्प-विकसित राज्यों में पहुंचने के साथ छात्र/छात्राएं इनमें अध्ययन के लिए प्रोत्साहित हो रहे हैं। इन उभरते कस्बों में इनकी लोकप्रियता बढऩे के साथ और भी ज्यादा छात्र/छात्राएं इनका लाभ उठाने के लिए प्रेरित होंगे, जिससे आखिरकार लैंगिक संतुलन भी कायम होगा।
विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में मौजूदगी दर्ज कराने वाले अभ्यर्थियों का और विश्लेषण करने पर यह तथ्य भी उभरकर सामने आता है कि कार्यानुभव प्राप्त छात्र/छात्राएं दोबारा शिक्षा प्रणाली के साथ जुड़ते हुए ग्रामीण/कस्बाई भारत में खुलने वाले नए संस्थानों को गले लगा रहे हैं। ऐसा करने से दो साल के कार्यानुभव के साथ उनकी थोड़ी-बहुत बचत भी हो जाती है, जिससे उन्हें अपनी आगे की पढ़ाई के लिए कर्ज नहीं लेना पड़ता या कम मात्रा में लेना पड़ता है। इस तरह कैंडिडेट पूल में लैंगिक, सामाजिक संतुलन और कार्यानुभव के लिहाज से व्यापक बदलाव देखा जा रहा है। लेकिन जहां तक ग्रामीण/कस्बाई भारत की बात है तो ऐसे साफ संकेत मिल रहे हैं कि स्कूल या कॉलेज जाने वाला हरेक विद्यार्थी उच्च शिक्षा की ओर बढऩा चाहता है, जो सिर्फ ग्रेजुएशन तक सीमित नहीं है। यही कारण है कि २००८ से २०१२ में १२वीं कक्षा से ग्रेजुएशन में जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या १२.८ फीसदी से २० फीसदी तक पहुंच गई है। अभ्यर्थियों के आंकड़ों के विश्लेषण से यह सबक लिया जा सकता है कि ग्रामीण/कस्बाई भारत गुणताप्रधान पढ़ाई-लिखाई करना चाहता है, लेकिन कोई भी उन तक पढ़ाने के लिए नहीं पहुंचता।
इसके अलावा युवा छात्राएं भी ऐसे संस्थानों का रुख कर रही हैं, जिन्हें पहले सिर्फ लड़कों का गढ़ समझा जाता था। २०१२ में उत्तराखंड के आईआईएम, काशीपुर को अपनी पहली छात्रा मिली, जबकि इसके समकक्ष संस्थान आईआईएम, कोझीकोड में छात्राओं की तादाद तकरीबन ३५ फीसदी है। ग्रामीण भारत लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए भेजना चाहता था, लेकिन स्थानीय जगह से दूरी न सिर्फ इन लड़कियों को हतोत्साहित करती थी, बल्कि उनके माता-पिता भी इसेे लेकर चिंतित रहते थे कि उनकी बच्ची के साथ वहां क्या होगा। बच्चियों से जुड़ा असुरक्षा का यह एहसास ही इन अभिभावकों को उन्हें उच्च शिक्षा के लिए शहर भेजने से रोकता था।
अब आईआईएम व आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के देश के अंदरूनी इलाकों व अल्प-विकसित राज्यों में पहुंचने के साथ छात्र/छात्राएं इनमें अध्ययन के लिए प्रोत्साहित हो रहे हैं। इन उभरते कस्बों में इनकी लोकप्रियता बढऩे के साथ और भी ज्यादा छात्र/छात्राएं इनका लाभ उठाने के लिए प्रेरित होंगे, जिससे आखिरकार लैंगिक संतुलन भी कायम होगा।
विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में मौजूदगी दर्ज कराने वाले अभ्यर्थियों का और विश्लेषण करने पर यह तथ्य भी उभरकर सामने आता है कि कार्यानुभव प्राप्त छात्र/छात्राएं दोबारा शिक्षा प्रणाली के साथ जुड़ते हुए ग्रामीण/कस्बाई भारत में खुलने वाले नए संस्थानों को गले लगा रहे हैं। ऐसा करने से दो साल के कार्यानुभव के साथ उनकी थोड़ी-बहुत बचत भी हो जाती है, जिससे उन्हें अपनी आगे की पढ़ाई के लिए कर्ज नहीं लेना पड़ता या कम मात्रा में लेना पड़ता है। इस तरह कैंडिडेट पूल में लैंगिक, सामाजिक संतुलन और कार्यानुभव के लिहाज से व्यापक बदलाव देखा जा रहा है। लेकिन जहां तक ग्रामीण/कस्बाई भारत की बात है तो ऐसे साफ संकेत मिल रहे हैं कि स्कूल या कॉलेज जाने वाला हरेक विद्यार्थी उच्च शिक्षा की ओर बढऩा चाहता है, जो सिर्फ ग्रेजुएशन तक सीमित नहीं है। यही कारण है कि २००८ से २०१२ में १२वीं कक्षा से ग्रेजुएशन में जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या १२.८ फीसदी से २० फीसदी तक पहुंच गई है। अभ्यर्थियों के आंकड़ों के विश्लेषण से यह सबक लिया जा सकता है कि ग्रामीण/कस्बाई भारत गुणताप्रधान पढ़ाई-लिखाई करना चाहता है, लेकिन कोई भी उन तक पढ़ाने के लिए नहीं पहुंचता।
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