हमारी राष्ट्र की परिभाषा का मुख्य आधार संस्कृति है, जीवन
मूल्य हैं, यह हम ऋग्वेद में देख चुके हैं। अथर्ववेद मेंइसीभावना का
विस्तार है; इस के कुछ सूक्त इस परिभाषा को और सुदृढ़ करते हैं, जब वे जन
मानस में मानसिक एकता तथा समानता का उपदेश देते हैं। अथर्ववेद के
निम्नलिखित सूक्त राष्ट्र की भावनात्मक एकता के लिये बहुत ही उपयोगी
ज्ञान/ उपदेश देते है। वैसे तो यह ज्ञान मनुष्य मात्र की एकता का आह्वान
करता है, किन्तु विभिन्न देशों की प्रतिद्वन्द्वता को देखते हुए तथा कुछ
देशों के जीवन मूल्य इन भावनाओं के विपरीत होते हुए इऩ्हें हमारे राष्ट्र
की रक्षा के लिये अनिवार्य शिक्षा मानना चाहिये ।
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