चीन यात्रा पर गए भारतीय युवाओं के प्रतिनिधि मंडल कुछ कतिपय सदस्यों ने देश को शर्मसार करने वाली अपनी हरकतों से जता दिया कि नये वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा 21वीं सदी का भारत आज भी कितना सतही जीवन जी रहा हैं। भारतीय आवाम की संवेदना जाने कितने स्तरों पर बंट गया है, और देश के प्रति समवेत राष्ट्रीय सोच के बजाए जल्दी से जल्दी धन कूट लेने की पिपासा नैतिकता की सारी हदों को पार कर चुका है।
चीनी व साथ आए भारतीय लड़कियों पर की न सिर्फ अभद्र टिप्पणियां करने की खबर मिली है, बल्कि उन्हें लगातार परेशान भी किया गया। खेलकूद और युवा मामलों के मंत्रालय द्वारा यूथ एक्सजेंच दोनेां देशों की नई पीढ़ी के बीच आपसी मेलजोल, संस्कृतिक परिचय एवं एक-दूसरे को कई स्तरों पर समझने के लिए कराया जाता है। यात्रा पर जाने वाले नवजवानों से देश की पूरी इमेज जुड़ी होती है। लेकिन भारत सरकारी के कर्णधार दूसरे देशों को जाने वाले युवाओं के चयन में सावधानी बरतने की जहमत भी नहीं उठाता। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खेल स्पर्धाओं सहित अन्य क्षेत्रों में जिस तरह तिकड़म कर क्रीमीलेयर तबके के कतिपय लोग कई तरह का फायदा उठाते हैं, उसका दुष्परिणाम सबके सामने हैँ। सवा अरब की आबादी वाला देश ओलंपिक में एक स्वर्ण मेडल भी नहीं जीत पाता। इसके बावजूद खेल प्रेक्षक छ: पदकों मिलने को बड़ी सफलता बताते फिरते हैँ।
दरअसल, मसला यहंा सफलता या असफलता का नहीं। बल्कि देश के भीतर मचे उस घुड़दौड़ का है, जहंा सफलता के पैमाने का अर्थ गलत हो गया है। चीन यात्रा पर गए नवयुवाओं को गलत हरकत करते समय यह अहसास नहीं रहा होगा कि भारतीय प्रतिनिधि के रूप में उन पर दुनिया की नजर लगी हुई है। यही मानसिक उथलेपन का द्योतक है। स्वामी रामदेव ठीक कहते हैं कि करप्शन जैसे नकारात्मक चीजों के ओलंपिक स्पर्धा में भारत जरूर टाप पर रहेगा। वैसे भी राजनैतिक दलों से जुड़े युवाओं से किसी अच्छाई की उम्मीद करना बेमानी है। यह देश भी मान चुका है।
चीनी व साथ आए भारतीय लड़कियों पर की न सिर्फ अभद्र टिप्पणियां करने की खबर मिली है, बल्कि उन्हें लगातार परेशान भी किया गया। खेलकूद और युवा मामलों के मंत्रालय द्वारा यूथ एक्सजेंच दोनेां देशों की नई पीढ़ी के बीच आपसी मेलजोल, संस्कृतिक परिचय एवं एक-दूसरे को कई स्तरों पर समझने के लिए कराया जाता है। यात्रा पर जाने वाले नवजवानों से देश की पूरी इमेज जुड़ी होती है। लेकिन भारत सरकारी के कर्णधार दूसरे देशों को जाने वाले युवाओं के चयन में सावधानी बरतने की जहमत भी नहीं उठाता। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खेल स्पर्धाओं सहित अन्य क्षेत्रों में जिस तरह तिकड़म कर क्रीमीलेयर तबके के कतिपय लोग कई तरह का फायदा उठाते हैं, उसका दुष्परिणाम सबके सामने हैँ। सवा अरब की आबादी वाला देश ओलंपिक में एक स्वर्ण मेडल भी नहीं जीत पाता। इसके बावजूद खेल प्रेक्षक छ: पदकों मिलने को बड़ी सफलता बताते फिरते हैँ।
दरअसल, मसला यहंा सफलता या असफलता का नहीं। बल्कि देश के भीतर मचे उस घुड़दौड़ का है, जहंा सफलता के पैमाने का अर्थ गलत हो गया है। चीन यात्रा पर गए नवयुवाओं को गलत हरकत करते समय यह अहसास नहीं रहा होगा कि भारतीय प्रतिनिधि के रूप में उन पर दुनिया की नजर लगी हुई है। यही मानसिक उथलेपन का द्योतक है। स्वामी रामदेव ठीक कहते हैं कि करप्शन जैसे नकारात्मक चीजों के ओलंपिक स्पर्धा में भारत जरूर टाप पर रहेगा। वैसे भी राजनैतिक दलों से जुड़े युवाओं से किसी अच्छाई की उम्मीद करना बेमानी है। यह देश भी मान चुका है।
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