एक ब्लैकआउट के लिए ये कैसा है? सोमवार सुबह करीब 369 मिलियन भारतीयों
को बिजली से महरूम रहना पड़ा। एक बड़े विघ्न ने मंगलवार को 600 बिलियन
लोगों को प्रभावित किया। ये व्यवधान इन गर्मियों में होने वाली कटौती की
असमान्य संख्या में सबसे अव्वल नंबर पर हैं। अब जनता सुधारों की मांग कर
रही है, जो नई दिल्ली बामुश्किल करने को तैयार है।
पिछले कुछ महीने की सरकारी प्रतिक्रियाएं सुझाती हैं कि मनमोहन सिंह
विद्युत संयत्रों में और कोयला झोंकने का आदेश देगें। प्रधानमंत्री को
लगता है कि समस्या तापीय संयत्रों में कोयले की कमी की है, जो ज्यादातर
आपूर्ति प्रदान करते हैं।
फिर भी 2003 के आंशिक सुधारों का शुक्रिया, जिनके चलते बिजली उत्पादन
को नियंत्रण मुक्त किया गया, आज यहां काफी निजी उत्पादक हैं और ज्यादातर
को आयातित कोयले की विश्वसनीय आपूर्ति होती है। हालांकि, जब विदेशी कोयले
के मूल्य में वृद्धि होती है, तब ये इसका भार ग्राहकों पर नहीं डाल सकते,
लिहाज़ा उत्पादन में कटौती कर देते हैं।
दूसरे शब्दों में कहें तो, समस्या वितरण में है, उत्पादन में नहीं।
2003 के सुधारों के चलते ये कारोबार काफी व्यवस्थित और राज्य के प्रभुत्व
वाला हो गया, जिसके चलते राजनेता लगातार मुफ्त बिजली की बंदरबांट कर रहे
हैं। इससे वितरकों को दो ट्रिलियन (36 बिलियन डॉलर) रूपए का नुकसान हो रहा
है। अब दिल्ली चाहती है कि राज्य सरकारें इन कंपनियों को घाटे से उबारें।
इस पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों की सोच अलग है। वो इस पर क्रोधवश
प्रतिक्रिया दे रहे हैं कि बिजली आपूर्ति बढ़ती मांग के मद्देनज़र लगातार
12 फीसदी से 15 फीसदी कम है। उनकी तत्काल ज़रूरतों ने बाज़ार के अन्वेषण के
लिए रास्ता खोल दिया है।
तमिलनाडु को ही लीजिए, जहां उद्योग प्रतिदिन छह घंटे के ब्लैकआउट के
चलते मुश्किलों में है और जहां इस वर्ष की शुरुआत में दशक में पहली दफा
मूल्यों में इज़ाफा हुआ। संकट ने राजनेताओं को इस हद तक केन्द्रीभूत कर
दिया है कि उन्होंने एक विवादास्पद परमाणु विद्युत संयत्र के निर्माण को
स्वीकृत कर लिया है।
चौंकाने वाली बात ये है कि सांख्यिकीयविद नीतियों के लिए कुख्यात राज्य
बाज़ार तंत्र के साथ परीक्षण कर रहे हैं। बिहार, पहले गरीबी का पर्याय हुआ
करता था, लेकिन अब नीतीश कुमार के नेतृत्व में प्रगति के पथ पर है, पिछले
हफ्ते इसने अपने सबसे बड़े शहर में बिजली वितरण का निजीकरण किया। फिर
महाराष्ट्र है, जो जून में ऐसा पहला राज्य बन गया, जिसने कुछ उपभोक्ताओं
को सीधे उत्पादक से प्रशुल्क लेने की छूट दी। ये चयन मध्यवर्ती वितरक के
लिए बदलाव या फिर एक किनारे हो जाने हेतु एक मज़बूत प्रोत्साहन है।
लेकिन शायद, राजनीतिक तर्कशीलता और नीतिगत रचनात्मकता का बेहतरीन
प्रदर्शन पश्चिमी राज्य गुजरात द्वारा किया जाता है। मुख्यमंत्री नरेन्द्र
मोदी की पहली जीत थी, बिजली चोरी रोकना, जो संचरण और वितरण के नुकसान की
एक वजह है।
हालांकि, श्री मोदी का वास्तविक अन्वेषण रहा, प्रतिस्पर्धी मूल्यों पर
किसानों को बिजली बेचने के लिए एक समांतर वितरण नेटवर्क तैयार करना।
उपभोक्ताओं की अब भी पुरानी ग्रिड और सब्सिडी वाले दामों तक पहुंच है,
लेकिन वो नियमित आपूर्ति के लिए तेज़ी से नई व्यवस्था की तरफ रुख कर रहे
हैं।
गुजरात अकेला ऐसा भारतीय राज्य है, जो उपभोग से ज्यादा बिजली पैदा करता
है। उपभोक्ताओं की पसंद ने वस्तुत: उन्हें पात्रता से पृथक किया है, ताकि
सब्सिडी वाली बिजली को चरणबद्ध तरीके से हटाया जा सके।
![]() | बिजली कटौती के दौरान यात्री प्लेटफॉर्म पर ट्रेन सेवा बहाल होने के इंतज़ार में, कुछ रेल ट्रैक पर भी बैठे हैं। | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सभी मुख्यमंत्री श्री मोदी जितने निडर नहीं हैं, ये स्पष्ट है कि
भारत के राज्य सुधारों की नई प्रयोगशालाएं हैं। राष्ट्रीय उपायों के तौर
पर कदाचित अब भी व्यापक बाज़ार को नई आकृति प्रदान करने की दरकार है,
लेकिन बिजली संकट दिखाता है कि राज्य सरकारें उपभोक्ताओं की जरूरतों को नई
दिल्ली से ज्यादा बेहतर ढंग से पूरा कर सकती हैं। लिहाजा ये समझने योग्य
है कि उन्हें ज्यादा जिम्मेदारियों के साथ सड़कें और पुल बनाने के अधिकार
भी प्रदान किए जाएं।
भयंकर ब्लैकआउट की सबसे बड़ी सीख ये है कि दिल्ली की असफलता
जरूरी नहीं कि अर्थव्यवस्था को मंदी में डाल दे। श्री सिंह की लापरवाही
भले ही आज भारत को बिजली से वंचित कर दे, लेकिन संघवाद श्री मोदी जैसे
नेता को पहल करने में सक्षम बनाता है। भारत को मंदी से बाहर निकलने हेतु
राज्यों को उतनी शक्ति देने की दरकार है, जितनी दी जा सकती है।
(ये संपादकीय द वॉल स्ट्रीट जर्नल के एशिया संस्करण के समीक्षा और दृष्टिकोण संभाग में आज प्रकाशित हुआ।)
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