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Sunday, July 29, 2012

80 फीसदी हिस्सा अकेले दवा खरीदने में खर्च

पिछले कुछ दशकों में स्वास्थ्य एक वस्तु बन गई है. एक ऐसी वस्तु, जिसे मूल्य चुका कर बजाप्ता खरीदना पड़ता है. भारत जैसे देश में बीमार पड़ने पर चिकित्सा के लिये जो खर्च होता है, उसमें 50 से 80 फीसदी हिस्सा अकेले दवा खरीदने में खर्च होता है. देश की लगभग 70 से 80 फीसदी आबादी को स्वास्थ्य का खर्च खुद ही वहन करना पड़ता है. इस आबादी का एक हिस्सा सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा करवाता है लेकिन वह दवाइयां खुदरा दवा विक्रेता से खरीदता है. इन दवाइयों की कीमतें आसमान छू रही हैं.

कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने अपने चुनाव घोषणापत्र में वादा किया था कि चिकित्सा पर होने वाला खर्च, सकल घरेलू उत्पाद के 1.4 प्रतिशत से बढ़ा कर 2.5 प्रतिशत कर दिया जायेगा. इसी घोषणा के तारतम्य में सरकार ने उच्च स्तरीय विशेषज्ञों का एक समूह बनाया, जो ‘सभी के लिये स्वास्थ्य’ की योजना पर काम करते हुये अपनी अनुशंसाएं दे रहा है. हाल ही में दवाओं पर इसके कार्यदल की रपट भी आ चुकी है, जिसके अनुपालन के लिये केंद्र सरकार ने ‘सभी के लिये मुफ्त दवा’ की घोषणा भी कर दी है, जिसे इसी साल अक्टूबर-नवंबर तक लागू भी कर दिया जायेगा.

लेकिन इन घोषणाओं और लुभावने नारों के बाद क्या आम दवा कंपनियों के मुनाफा बटोरने की नीति पर कोई लगाम लग पाएगी ? यह एक बड़ा सवाल है, जिसके जवाब भले पेंचदार हों, लेकिन इसके निहितार्थ बहुत साफ है. आज की तारीख में भारत की 20 फीसदी आबादी चिकित्सा सेवा से ही वंचित है. 32 प्रतिशत नागरिक सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा करवाते हैं, जबकि शेष 48 प्रतिशत नागरिक निजी चिकित्सालयों की शरण लेते हैं. यह 48 प्रतिशत नागरिक ही निजी दवा कंपनियों के ग्राहक हैं. इसलिये केंद्रीय सरकार ने योजना ही ऐसी बनाई है, जिससे इन 48 प्रतिशत नागरिकों को बाहर रखा जा सके.

इसे एक उदाहरण से बेहतर तरीके से समझा जा सकता है, तमिलनाडु में 1995 से सरकार ने तमिलनाडु मेडिकल सर्विसेस कारपोरेशन बनाया है. यह TNMSC ही दवा कंपनियों से अत्यंत कम कीमत पर जेनेरिक दवायें खरीदती है तथा इन्हें सरकारी चिकित्सालयों में मुफ्त में बांटा जाता है. ये जेनेरिक दवायें उन्हीं दवा कंपनियों से खरीदी जाती हैं, जिनका उत्पादन संयंत्र ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के शेड्यूल एम के अनुरुप हो. इस प्रकार ये दवायें अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरुप ही होती हैं. इसके लिये तमिलनाडु सरकार का खर्च 209 करोड़ रुपये आता है. इन 2,09,20,29,782 रुपयों से 32 प्रतिशत नागरिकों को मुफ्त में दवाएं दी जाती हैं.

इसके अलावा तमिलनाडु सरकार को केंद्र से 144 करोड़ रुपया मिलता है. इस 1,44,27,79,160 रुपयों से उन 20 प्रतिशत नागरिकों को मुफ्त दवा दी जाती है, जो अब तक इस सुविधा से वंचित था. इस तरह तमिलनाडु की 7,21,38,958 जनता को 353 करोड़ रुपयों में ही मुफ्त दवा दी जाती है, जो कुल आबादी का 52 प्रतिशत के आसपास है.

अगर तमिलनाडु मेडिकल सर्विसेस कारपोरेशन की तुलना राजस्थान के चित्तौगढ़ में चलने वाली इसी तरह की योजना, LOCOST वडोदरा की दवायें, केंद्र सरकार के जन औषधालयों में मिलने वाली दवाओं तथा खुले बाज़ार में मिलने वाली ब्रांडेड दवाओं की कीमत से की जाये तो पता चलता है कि तमिलनाडु मेडिकल सर्विसेस कारपोरेशन द्वारा खरीदी एवं बांटी जाने वाली दवाएं आश्चर्यजनक रुप से सबसे सस्ती हैं. इसका एक मात्र कारण तो यही है कि जब सरकार खुद दवा कंपनियों से दवाएं खरीदती है तो वह इन कंपनियों से मोल-भाव करने की स्थिति में होती है. इतनी बड़ी मात्रा में दवाओं की खरीदी का लाभ सरकार को मिलता है.

अब जरा ‘सभी के लिये मुफ्त दवा’ की योजना पर गौर करें. इस योजना को जिस मॉडल पर तैयार किया गया है, उसे देखें तो यह बात साफ समझ में आती है कि इस योजना से दवा कंपनियों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. इसके उलट केंद्र सरकार ने जो नई नीतियां लागू की हैं, उससे दवा कंपनियों को तो कीमत बढ़ाने का अवसर मिला ही है, विदेशी दवा कंपनियों को भी भारत आने की खुली छूट दे दी गई है. ऐसे में नुकसान केवल और केवल मरीजों को है.

इस पूरी योजना की हकीकत को एक उदाहरण के सहारे बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. उदाहरण के लिये देश के छत्तीसगढ़ राज्य की जनसंख्या 2011 की गणना के अनुसार 2,55,40,196 के आसपास है. जबकि तमिलनाडु की जनसंख्या इससे 2.82 गुणा अधिक 7,21,38,958 है. ऐसे में छत्तीसगढ़ में इस योजना को लागू करने में होने वाला खर्च 2.82 गुणा कम होगा. नियमानुसार इस खर्च का 85 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार और 15 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार को वहन करना होगा.

तमिलनाडु में मुफ्त दवाओं के लिये कुल खर्च होता है 2,09,20,29,782 रुपये, जो 32 फीसदी जनसंख्या को लाभ पहुंचाता है. इसी तरह केंद्र के 1,44,27,79,160 खर्चे पर 20 प्रतिशत नागरिकों के लिये दवायें उपलब्ध करायी जाती हैं. यानी लगभग 353 करोड़ रुपये खर्च करके राज्य के 52 फीसदी लोगों को मुफ्त दवा उपलब्ध कराई जाती है.

अब इस आंकड़े को छत्तीसगढ़ की जनसंख्या के अनुसार देखें तो यहां यह रकम 2.82 गुणा कम हो जाएगी और आंकड़ा 1,25,34,78,348 यानी लगभग 125 करोड़ रुपये हो जाएगा. इस रकम का 85 फीसदी हिस्सा 1,06,54,56,595 रुपये केंद्र को देना होगा और छत्तीसगढ़ को 18,80,21,752 रुपये देना होगा. इस योजना के तहत TNMSC के अनुसार ही मोल-भाव कर, उसी मूल्य पर जेनेरिक दवाएं खरीदनी होंगी.

भारत में महाराष्ट्र में 1928 दवा उत्पादन संयंत्र, गुजरात में 1129, पश्चिम बंगाल में 694, आंध्र प्रदेश में 528, तमिलनाडु में 472 तथा अन्य प्रदेशों में 3423 संयंत्र हैं. कुल मिला कर इन 8174 दवा उत्पादन संयंत्रों से छत्तीसगढ़ सरकार को दवायें खरीदनी होंगी. 2012-13 के लिये पेश छत्तीसगढ़ का कुल बजट 38820 करोड़ रुपये का है. इस बजट में स्वास्थ्य पर 1,344.99 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान है. जाहिर है, ऐसे में प्रति वर्ष राज्य सरकार के लिये 18.8 करोड़ रुपये खर्च कर ‘सभी के लिये मुफ्त दवा’ की योजना को लागू करना बेहद सरल है. छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कारपोरेशन लि. के गठन की तैयारी भी शुरु कर दी गई है.

हालांकि इस योजना का नाम ‘सभी के लिये मुफ्त दवा’ है लेकिन क्या इस योजना से तमिलनाडु की ही तरह राज्य की 52 फीसदी आबादी भी लाभान्वित हो पाएगी ? यह संशय इसलिये है क्योंकि 2011 में पांचवीं कॉमन रिव्यू मिशन द्वारा जारी रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि राज्य के सरकारी चिकित्सालयों में 43,05,814 बाह्य रोगी देखे गये और 4,59,036 अंतः रोगी भर्ती किये गये. कुल मिला कर राज्य के सरकारी चिकित्सालयों में 47,64,850 मरीजों का इलाज किया गया, जो छत्तीसगढ़ की कुल आबादी का केवल 18.65 प्रतिशत है.

मामला केवल छत्तीसगढ़ का नहीं है. देश के दूसरे राज्यों में भी हालात कमोबेश ऐसे ही हैं. सरकारी अस्पतालों की हालत जिस तरह बना कर रखी गई है, उसके कारण देश के बहुसंख्य बीमार लोगों को निजी स्वास्थ्य क्षेत्रों के हवाले कर दिया गया है. ऐसे में सरकार की यह योजना लोगों को किस हद तक लाभ पहुंचाएगी, इसे देखना महत्वपूर्ण होगा.

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