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Wednesday, April 11, 2012

शिक्षा की स्थीति

काफी लंबे समय बाद फिल्म पाठशाला में शिक्षा के वर्तमान स्तर और कार्यशैली को लेकर जो चिंता की गई है वह जायज लग रही है। देर से ही सही मगर लोगों के सामने इस विषय का आना इस बात का संकेत है कि समाज के बुद्धजीवियों ने आखिरकार इस ओर सोचना शुरू तो किया है। मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है कि 2000 आबादी वाले मेरे छोटे से गांव में जब मैंने शहरी माहौल की तर्ज पर विज्ञान विषय लेकर पढ़ाई करने की बात कही तो परिवार तो खुश था लेकिन पहले ही दिन हमारे विज्ञान शिक्षक ने एक बात कह कर लगभग सारे सपनों में पानी फेर दिया बात तो छोटी थी लेकिन हमेशा के लिए दिल में बैठ गई, शिक्षक का कहना था कि इस स्कूल से आज तक ना तो कोई इंजीनियर निकला है औऱ ना ही ड़ाक्टर, बात आई और चली गई, मैं जिस स्कूल में पढ़ता था वह एक छोटे से गांव का एकमात्र सरकारी स्कूल था. आज इस फिल्म ने एक बार फिर उस डर को पैदा कर दिया है।
भारत गांवों का देश है आज भी देश की आधी आबादी से भी ज्यादा लोग गांव में रहते हैं और उनका मूल व्यवसाय खेती ही है। देश में शिक्षा का जितना भी प्रचार और प्रसार शहरों में हुआ है उसका 1 प्रतिशत भी इन गांवो में नहीं हुआ है। भारतीय सामाजिक वर्ण व्यवस्था की तरह ही शिक्षा में भी वर्ण व्यवस्था लागू है, मैं अच्छी शिक्षा के विरोध में नहीं हूं लेकिन मैं महंगी शिक्षा व्यवस्था, शिक्षा के साथ हो रहे भेदभाव और उसके बाजारीकरण के विरूद्ध हूं, जिस तेजी से देश में मंहगे और इंटरनेशनल स्कूलों का चलन बढा है उस व्यवस्था ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को विभाजित कर दिया है, एक तरफ मंहगे दून और कान्वेंट स्कूल से निकलने वाले वो बच्चे हैं जिन्हें इस दौर वो शिक्षा दी जारही है जिसके बलबूते पर यह तय होता है कि उनके लिए मल्टीनेशनल कंपनी के उच्च वेतनमान के पद खाली है(या सिर्फ वे ही इस पद के लिए गढ़े गये है)जिनमें उन्हें मिलना वाला मासिक वेतन गांवों के स्कूलों से निकलने वाले बच्चों की साल भर की कमाई से भी ज्यादा है. इन स्कूलों,कालेजों से निकलने वाले युवाओं के लिए यह तय होता है कि भविष्य के सीईओ और एमडी वही हैं.तो वही दूसरी तरफ वे लोग है जो इन सरकारी स्कूलों से निकल इस आस में भटकते रहते हैं कि शायद उनके नसीब में भी कुछ उन अभिजात्य लोगों की तरह की कुछ लिखा है लेकिन हकीकत तो यह कि इन सरकारी स्कूलों में उन्हें जो शिक्षा दी जाती है वह सिर्फ उन्हें बाबू या पानी पिलाने वाले तक ही सीमित रखती है हालांकि मैं इस बात से भी इंकार नहीं करता हूं कि कई ऐसे लोग भी हैं जो इस मुकाम तक पहुंचने क़ामयाब भी रहें हैं, लेकिन महज चंद ऊंगलियों में गिने जाने वाले इन लोगों के बलबूते पर हम विजय पताका फहराने की बात नहीं कह सकते हैं।सरकार भले ही लाखों करोड़ो रूपये खर्च करके शिक्षा के मौजूदा हालात को बदलने के दावे कर रही हो पर हकीकत आज भी यही है बढे वेतनमान पर काम रहे सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी अपने बच्चों को इन सरकारी स्कूलों में पढाने के बजाये निजी स्कूलों में भेज रहे हैं। कारण भी स्पष्ट है एक तो इन सरकारी स्कूलों में संसाधनों का अभाव होता है, पढाई के स्तर की बात हम ऊपर कर चुके हैं.दूसरा कारण है निजी स्कूलों में जिस तकनीक से भविष्य की योजनाओं को ध्यान में रखकर पढ़ाई का महौल तैयार किया जाता है, उस स्तर की कार्ययोजना सरकारी स्कूलों में मिल पाना (फिलहाल तो) असंभव है।जहां एक तरफ अभिजात्य वर्ग के स्कूलों में कोर्स का विभाजन, साल भर के टाइम टेबल के तहत तय होते उसकी तुलना में चौथे दर्ज के इन स्कूलों में इन्हीं कोर्सेस को पूरा करने के लिए कई साल लग जाते हैं साल भर में कोर्स पूरा करना तो बहुत दूर की बात है।
हालांकि सरकार ने एक अप्रेल से शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू कर दिया है, वैश्वीकरण की नवउदारवादी नीति की तर्ज पर बने इस सरकारी बिल के पैरोकार सरकार के बाहर भी हैं। उनका कहना है कि यह बिल निजी स्कूलों की भी जवाबदेही तय करता है। उनका इशारा उस प्रावधान की ओर है, जो निजी स्कूलों में कमजोर वर्गो और वंचित समुदायों के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित करता है। इनकी फीस सरकार की ओर से दी जाएगी। इससे बड़ा फूहड़ मजाक और क्या हो सकता था। एक, आज 6-14 आयु समूह के लगभग 20 करोड़ बच्चों में से ४ करोड़ बच्चे निजी स्कूलों में हैं। इनके 25 फीसदी यानी महज एक करोड़ बच्चों के लिए यह प्रावधान होगा। शेष बच्चों का क्या होगा? दूसरा, सब जानते हैं कि निजी स्कूलों में ट्यूशन फीस के अलावा अन्य कई प्रकार के शुल्क लिए जाते हैं, जिसमें कम्प्यूटर, पिकनिक, डांस आदि शामिल है। यह सब और इन स्कूलों के अभिजात माहौल के अनुकूल कीमती पोशाकें गरीब बच्चे कहां से लाएंगे? इनके बगैर वे वहां पर कैसे टिक पाएंगे? तीसरा, यदि किसी तरह वे 8वीं कक्षा तक टिक भी गए, तो उसके बाद उनका क्या होगा? ये बच्चे फिर सड़कों पर आ जाएंगे जबकि उनके साथ पढ़े हुए फीस देने वाले बच्चे १२वीं कक्षा पास करके आईआईटी व आईआईएम या विदेशी विश्वविद्यालयों की परीक्षा देंगे। मैं आपको ध्यान दिलाना चाहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट के उन्नीकृष्णन फैसले (1993) के अनुसार अनुच्छेद ४१ के मायने हैं कि शिक्षा का अधिकार 14 वर्ष की आयु में खत्म नहीं होता, वरन सैकंडरी व उच्चशिक्षा तक जाता है। फर्क इतना है कि 14 वर्ष की आयु तक की शिक्षा के लिए सरकार पैसों की कमी का कोई बहाना नहीं कर सकती, जबकि सैकंडरी व उच्चशिक्षा को देते वक्त उसकी आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखा जा सकता है।
जनता को उम्मीद थी कि यह बिल उच्चशिक्षा के दरवाजे प्रत्येक बच्चे के लिए समानता के सिद्धांत पर खोल देगा। तभी तो रोजगार के लिए सभी समुदायों के बच्चे बराबरी से होड़ कर पाएंगे और साथ में भारत की अर्थव्यवस्था में समान हिस्सेदारी के हकदार बनेंगे। यकीकन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। मैं बहुत दूर या फिर बड़ी बात नहीं कह रहा हूं यह वास्तविकता है प्रतियागिता से भरे इस दौर मे हम सिर्फ औपचारिकताओं से ही काम नहीं चला सकते हैं, हमें कोई ठोस और सकारात्मक कदम उठाने पडेंगे.महंगाई अपने चरम पर है और इसके और अधिक विकराल होने की आशंका से हम मुकर भी नहीं सकते हैं.ऐसे मैं किसी निम्न औऱ काफी हद तक मध्यमवर्गीय परिवार पालकों की बच्चों के भविष्य को लेकर की जाने वाली चिंताओं से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है.ठीक है हमने शिक्षा का अधिनियम भी लागू कर दिया है लेकिन इस नियम के लिए क्या कोई ठोस रणनीति बनाई गयी है पहले से ही देश में कई तरह की शिक्षा योजना के तहत हर किमी में स्कूल खोल दिये गये हैं, जिसमें पढने वाले बच्चों को क्या शिक्षा मिल रही है यह हम सब जानतेहैं,इन एक कमरे में चलने वाले स्कूल मे आने वाले बच्चों का मुख्य उद्देश मध्यान भोजन है या फिर पढ़ाई यह एक अलग से सोचने का विषय है, यदि इन स्कूलों की तुलना अभिजात्य वर्ग के स्कूलों की नर्सरी के बच्चों से की जाये तो अंतर खुद ब खुद हमारे सामने आ जाता है। आज भी 12 वीं पास करने के बाद युवाओं का पहला लक्ष्य रोजगार होता है ताकि कर्ज के बोझ तले दबे अपने खेतीहर परिवार के लिए रोटी रोजी का इंतजाम हो सके। आखिर क्यों इतने लंबे समय से चले आ रहे कई सरकारी योजनाओं के बाद भी गांवो के छात्रों का सर्वांगिक विकास रूका हुआ है.जैसे तैसे अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद आज का युवा शहरी अंधानुकरण के चपेट में आकर सिर्फ और सिर्फ किसी भी तरह से हासिल होने वाली नौकरी तक ही सिमट कर रह जाता है. कहीं ना कहीं कमी हमारी शिक्षा व्यवस्था और उसके संचालन में ही है। निजी और सरकारी स्कूलों के दो पाटो के बीच फंसी भारतीय शिक्षा को आज भी किसी चत्मकार की प्रतीक्षा है।
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शिक्षा का वर्तमान प्रारूप समाज और देश के युवा वर्ग को एकांगी और अव्यावहारिक बना रहा है. वस्तुतः इस शिक्षा व्यस्था में ९०-९९ प्रतिशत अंक लाने वाले विद्यार्थी भी अपने आप को शिक्षा के बाजार में इतने बेबस पाते हैं कि उनको तथाकथित अच्छे विद्यालयों में प्रवेश ही नहीं मिलता. कुछ दिनों पहले ही समाचार पत्रों और टी वी चैनलों में सुना था  कि दिल्ली के एक महाविद्यालय में प्रवेश के लिए “कट ऑफ” का प्रतिशत १००% है. इसका मतलब इसमें प्रवेश के लिए डॉ राजेंद्र प्रसाद, महात्मा गाँधी, सुभाष चन्द्र बोस, रतन टाटा, धीरू भाई अम्बानी, न्यूटन, आइन्स्टाइन के अलावा और भी विश्व स्तर के कई महान, सफल, बुद्धिमान लोग और वैज्ञानिक भी योग्य नहीं होंगे. अब इस महाविद्यालय के छात्र शिक्षा प्राप्ति के बाद अपने जीवन में क्या गुल खिलाते है, यह शोध का विषय होना चाहिए.
अब  इन विद्यार्थियों की विद्वता के कुछ उदाहरण देता हूँ. मैं कुछ वर्षों तक एक विदेशी कंपनी में इंजीनियरों की भर्ती के लिए कार्यरत था. भारत के “टॉप” १०० इंजीनियरिंग संस्थान में मुझे प्रवेश परीक्षा का सञ्चालन करने और साक्षात्कार लेने का मौका मिला. इसके दौरान मैं यह देखकर चौंक गया कि ७०-८० % स्नातक/स्नातकोत्तर छात्रों को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और प्रथम राष्ट्रपति के नाम में “कन्फ्यूजन” था. वहीं ४०-५० % विद्यार्थियों को वर्तमान प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के नाम के मामले में तारे गिनने की बारी आ गई. कई विद्यार्थी तो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के पद में अंतर नहीं कर पाए. सबसे बड़ी शर्म की बात मुझे लगी (शायद बहुतों को न लगे) कि इनको स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस में अंतर पता नहीं था. और उसपर कैसे कैसे बहाने सुनने को मिले; पढ़ाई इतनी ज्यादा है कि GK की पुस्तक पढने का मौका नहीं मिलता, प्रोफेसरों ने यह नहीं बताया कि आपलोग GK भी interview में पूछेंगे इसलिए तैयारी नहीं की.  कुछ ने यहाँ तक कह डाला कि मैं इंजीनियर हूँ, राजनीति से मेरा और मेरे काम का कुछ लेना देना नहीं है. अब ये बात समझ में नहीं आती कि देश के प्रथम प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति के बारे में शायद पांचवी या छठी कक्षा में पढ़ाई गई होगी. स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस शायद हर साल प्रात्मिक विद्यालय स्तर पर मनाया होगा. इसका GK की तैयारी से कोई लेना देना नहीं है. जहाँ छोटे छोटे calculations के लिए इनको calculator चाहिए, वहीँ बचपन में मेरे गाँव के अनपढ़ और अंगूठा छाप व्यापारी और किसानों की जबान पर ढैया, पौना, सवैया के पहाड़े होते थे. बड़े बड़े हिसाब किताब जबानी ही हो जाया करते थे, और वो भी calculator से ज्यादा तेजी से. अगर प्राचीन भारतीय संस्कृति के बचे खुचे अवशेषों की बात करें, तो इसके बारे में वर्त्तमान पीढ़ी  के ज्यादातर लोगों को कुछ भी पता नहीं होगा क्योंकि शिक्षा व्यस्था के द्वारा विद्यार्थियों  के मन मष्तिष्क में कूट कूट कर यह बात बिठा दी गई है कि हमारे पूर्वज असभ्य, कमजोर और निकम्मे थे. अंग्रेज  यहाँ आये और हमें सभ्य, वैज्ञानिक और सुसंस्कृत कर के गए. हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और वैज्ञानिक धरोहरों के प्रति जनमानस के ह्रदय में हीन भावना का संचार करनेवाली शिक्षा व्यस्था हम पर थोप दी गई है. इससे छुटकारे का कोई मार्ग भी नहीं दिख रहा है.
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों की बनाई हुई है. आज की शिक्षा का उद्देश्य व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करना नहीं, अंक प्राप्त करने का प्रमाण पत्र मात्र लेना रह गया है, चाहे जैसे भी अंक आ जाए बस. शिक्षक और माता पिता यह नहीं देखते कि छात्र ने कितना ज्ञान पाया, कितनी बुद्धिमत्ता का प्रयोग कर पा रहा है. बल्कि ऐसे छोटे छोटे टिप्स देते हैं कि कैसे परीक्षा में ज्यादा अंक पाए जाएँ, भले ही उससे ज्ञान कि बढ़ोत्तरी हो या नहीं हो. ऐसी शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल गुलाम पैदा करना था जो ब्रिटिश सरकार कि मुलाजिमी कर सकें और आम जनता पर शासन करने में उनकी सहायता कर सकें. ज्ञान प्राप्त करने वाली शिक्षा से तो विद्रोह हो जाता है. जनता देश और समाज के क्रियाकलापों के प्रति संगठित और सचेत हो उठती है. आजादी के बाद की सरकारें आज भी वही कर रही है. पहले गुलामी सीधा विदेशी करवाते थे, आज अपने देश के ही कुछ सफेदपोश लोग  विदेशी कंपनियों और ताकतों के सानिध्य में उनके हित के लिए काम कर रहे हैं और जनता की स्थिति जस की तस गुलामों जैसी बनी हुई है. वे नहीं चाहते कि इस देश कि जनता को ज्ञान प्राप्त हो, जनता सुखी व समृद्ध हो. वे तो बस सिर्फ गुलामों पर राज्य करना चाहते है. लोकतंत्र का चोला पहने और लोकतंत्र की दुहाई देते ये तथाकथित जन प्रतिनिधि शायद ही जनता के प्रतिनिधित्वा धर्म का पालन करते हुए जनता के हित के नियम और कानून पिछले ६३ वर्षों में बना पाए हैं.  अगर कुछ बनाया भी तो इतने कमजोर तरीके से कि जनता को न्याय मिल ही नहीं पाए, पर इनका उल्लू जरूर सीधा हो. खैर, यह एक दूसरा विषय है. अब लौटते हैं अपने मुख्य विषय “शिक्षा व्यवस्था” पर.
अंग्रेजों के आने से पहले इस देश में गुरुकुल आधारित शिक्षा व्यवस्था थी. इसमें मानव जीवन, समाज, वातावरण और चारित्रिक उन्नति की शिक्षा दी जाती थी, जिसका उद्देश्य व्यक्ति को मानवता और राष्ट्र के लिए कल्याणकारी और उच्च चरित्र का बनाना होता था. पर आज तो खुले आम यौन शिक्षा और समलैंगिकता की बेशर्मी से पैरवी की जा रही है. योग और आवुर्वेद जैसे वैज्ञानिक और कल्याणकारी ज्ञान को हर विद्यार्थी को सिखाया जाता था, पर आज इसे  बार बार नीचा दिखाने और आम जनता को उससे दूर करने का कुचक्र इस खतरनाक शिक्षा व्यवस्था के द्वारा चलाया जा रहा है.  साथ ही पश्चिमी चिकित्सा प्रणाली के आधे अधूरे शोधों पर आधारित औषधियों को केवल कुतर्कों के आधार पर महत्व देने का षड़यंत्र रचा जा रहा है.  वहीं आयुर्वेद के निरापद औषधियों और प्रकृति चिकित्सा पद्धति के बारे में  कई प्रकार की भ्रांतियां फैलाई जा रही है.
अंग्रेजों के पहले १००० वर्ष के विदेशियों के शासन में भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था को ज्यादा नुक्सान  नहीं पहुंचाया जा सका. पर अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी और धूर्तता से उसको आमूल चूल रूप से बदल डाला. आज़ादी के बाद इस व्यवस्था को बदलकर पुनः  पूर्णतया भारतीय और ज्ञान प्राप्ति वाली शिक्षा व्यवस्था को लाने के बजाय अंग्रेजों वाली शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने पर जोर दिया गया. भारतीय भाषाओँ में शिक्षा प्राप्त करने वालो के बजाय अंग्रेजी भाषा में शिक्षा प्राप्त करनेवालों को प्राथमिकता दी गई. इसका दूरगामी प्रभाव अब दिखने  लगा है. देश और समाज मानसिक और सामाजिक रूप से दिवालिया होने के कगार पर पहुँच चुका है. शिक्षा और जीवन का उद्देश्य  अब केवल किसी तरह नौकरी पाना रह गया है. नौकरी पाने के बाद किसी तरह उस नौकरी को बचाना और उस नौकरी में पदोन्नति के लिए अपने आत्मसम्मान और मर्यादाओं की परवाह किये बिना कार्य करना रह गया है. देश, समाज, मानवता, सभ्यता और संस्कृति के हित का रखना ध्यान नगण्य हो गया है. इस प्रकार का आत्म केन्द्रित रवैया देश की सभ्यता, संस्कृति और संप्रभुता के लिए विनाशकारी है. 
---पब्लिक स्कूलों की मँहगी फीस न दे पाने के कारण गरीबों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने को मजबूर हैं.सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरते जाने के कारण ही विधायकों,सांसदों अफसरों व अन्य पूँजीपतियों के बच्चे इनमें नहीं पढ़ते हैं.सरकारें प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का अच्छा परिणाम प्राप्त किये बिना ही शिक्षकों के वेतन और मुँहमाँगी सुविधाएं बढ़ाती चली जा रही है.यही कारण है कि गरीब वर्ग आधुनिक उच्च शिक्षा से वंचित होकर विकास के दौड़ की प्रतियोगिताओं में पिछड़ता चला जा रहा है.

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