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Sunday, March 11, 2012

मूर्ख बन कर मूर्ख बनाने की कोशिश

अगर बहाने चुनावी जीत की प्राथमिक जरूरत होती, तो कांग्रेस अनंतकाल तक सत्ता में बनी रहती. दूसरे लोग तर्क देने के लिए थोड़े सही तर्क भी पेश करते हैं और इस बात का ख्याल रखते हैं कि कहीं उनकी बातें घातक नहीं हो जाये, लेकिन कांग्रेस पार्टी को इस बात का मलाल नहीं है. कांग्रेस अपनी बातों को तेजी और पूरे विश्वास के साथ रखती है, भले ही वे खोखले हों. एम जे अकबर की बाईलाइन.

नितिन गडकरी ने लोध जाति की उमा भारती तथा कुर्मी कुलदीपक बाबू सिंह कुशवाहा के माध्यम से प्रयोग की कोशिश की, भले ही असफल हो गए. मुस्लिम-यादव जुगलबंदी ने मुलायम सिंह को वैतरणी पार करा दी. मायावती दलित वोट बैंक पर कुंडली मार बैठ गईं. दिग्विजय के मुस्लिम प्रेम ने अगड़ों को भाजपा की झोली में डाल दिया. तब विलाप के अलावा राहुल गांधी के पास और क्या बचता? संविधान विशेषज्ञ कनक तिवारी का विश्लेषण.

पिछले साल महिला दिवस के दिन मुंबई की निधि गुप्ता नामक सीए ने मलाड के एक रिहायशी टावर के उन्नीसवें माले से अपने छह साल के बेटे गौरव और तीन साल की बेटी मिहिका को छत से नीचे फेंकने के बाद खुद कूद कर आत्महत्या कर ली. ऐसी आत्महत्याओं की खबरें अखबार में आती हैं और फिर खबरों की दुनिया में गुम हो जाती हैं. इन आत्महत्याओं का कभी विश्लेषण नहीं किया जाता. सुधा अरोड़ा के विचार.


प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के परिणाम के बहाने कई मुद्दों की पड़ताल की है.


एनबीसी न्यूज़ के साथ बात करते हुए बराक ओबामा ने फरवरी में कहा था कि ईरान पर इजरायल के साथ गठजोड़ कर हमले की सारी तैयारी लगभग पूरी कर ली गई है. इसके बाद ईरान को लेकर इजरायल ने जिस तरह का वैश्विक कुप्रचार की शुरुआत की, उसका सिरा भारत में इज़रायली दूतावास के सामने कार में हुए धमाके से लेकर, बैंकॉक में हुए तीन सिलसिलेवार धमाकों से जाकर मिलता है. दिलीप ख़ान का विश्लेषण.

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