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Monday, March 5, 2012

दीपक परगनिहा की गिरफ्तारी


दुर्ग। नक्सली होने की आशंका में कोलकाता पुलिस द्वारा पकड़े गए भिलाई इस्पात संयंत्र के टेक्निकल स्टाफ में कार्यरत् दीपक परगनिहा की गिरफ्तारी इस क्षेत्र के लिए अत्यंत संवेदनशील मामला   साबित होगा। दीपक परगनिहा मूलत: बेरला विकासखंड के ग्राम देवादा का रहने वाला है। बीएसपी में नौकरी के चलते अपने परिवार के साथ चरोदा में रह रहा था। किंतु ढाई साल पहले पुलिस को जब दीपक के नक्सली मददगार होने का सुराग मिला, तब से वह भूमिगत हो गया था।  अभी कुछ दिन पहले नक्सली होने की आशंका में कोलकाता पुलिस ने जिन चार लोगों को गिरफ्तार किया, इत्तफाक से दीपक भी उनमें एक निकला। 2009 से फरार चल रहे दीपक परगनिहा को छत्तीसगढ़ पुलिस ट्रांजिट रिमांड पर लेकर गहन पूछताछ करेगी, तब कई अहम खुलासे होंगे, यह तय है।
नक्सली होने के आरोप में दीपक की गिरफ्तारी इसलिए एक सामान्य मसला नहीं है, क्योंकि वह समाज के कुर्मि बाहुल्य तबके से बावस्ता रखता है। इसकी वजह नितांत आर्थिक प्रलोभन होने की गुंजाइश कम ही है। दूसरा, वह न तो समाज से उपेक्षित अथवा सरकार से सताया हुआ है। फिर क्या विचारधारा के आधार पर वह नक्सलियों में शामिल हो गया?
पश्चिम बंगाल अथवा आंध्रप्रदेश में जिस तरह जमीनी प्रबुद्ध वर्ग के कई लोग नक्सली आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, वैसा छत्तीसगढ़ में नहीं । अब तक देखा गया है कि छत्तीसगढ़ में दीपक जैसे पढ़े लिखे नौकरीपेशा लोग नक्सली आंदोलनों से कोसों दूर रहते हैँ। यहां तक विचारधारा के स्तर पर भी ।
दीपक परगनिहा की गिरफ्तारी का दूसरा पहलू और भी चिंताजनक है। वह इसलिए, कि दीपक परगनिहा जैसे लोग यदि नक्सलियों के हार्डकोर दल में शामिल मिलते हैं, तो इसका आशय यह है कि नक्सलियों ने बस्तर व सरगुजा के पठारों के अलावा छत्तीसगढ़ के मैदान में भी अपनी भीतरी पकड़ मजबूत कर ली है। इस आशंका को  बल मिलती है कि न जाने दीपक जैसे कितने लोग शंात समाज के बीच रहकर नक्सली विचारधारा का आरोपण व पोषण कर रहे हैँ, और सुरक्षा तंत्र को  पता ही नहीं चल पाया।
दरअसल, नक्सलियों के सहयोगी होने के मामले में दुर्ग-भिलाई व रायपुर से पकड़े गए अधिकांश लोग नक्सली क्षेत्रों से आकर यहां ठिकाना बनाए हुए थे। पर दीपक परगनिहा इसी जमीन की उपज है।  स्थानीय समाज का वह वर्ग जो नक्सली विचारधारा और आंदोलनों से अब तक अछूता रहा है, भी विचारधारा के स्तर पर प्रदूषित होने लगा है। यदि यह सच है तो सरकार व प्रशासन के लिए यह  बहुत बुरी स्थिति है। यह सरकारी नेतृत्व के विंहगम पराजय का द्योतक है । इसे संकेत माना जा सकता है कि नक्सली समस्या हल होने के बजाए इस कदर जटिल हो गया है कि इससे निपटना सरकार के सर्वाधिक कठिन होगा। 

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