जिसकी जैसी जेब है,वैसा उसका माप
वैसा उसका माप,कि बाबू पैसा आल इन वन
पैसा पास नहीं तो तय है मुरझाएगा मन
लाख पढ़ो,गुणवान बनो,बिन पैसे कुछ न होवे
अनपढ़ झूम रहा मस्ती में,ज्ञानी घर में रोवे
कह प्रीतम कविराय,रचा मालिक ने खेल निराला
मेहनतकश को मौत मिले पर मिलता नहीं निवाला
कुंवर प्रीतम
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