भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् मूढ़मते।
संप्राप्ते सन्निहिते काले न हि न हि रक्षति डुकृग्करणे।।
संप्राप्ते सन्निहिते काले न हि न हि रक्षति डुकृग्करणे।।
इस मधुर गीत का पहला पद शंकर ने तब लिखा, जब वे एक गांव से गुजरते थे, और उन्होंने एक बूढ़े आदमी को व्याकरण के सूत्र रटते देखा। उन्हें बड़ी दया आई, मरते वक्त व्याकरण के सूत्र रट रहा है यह आदमी! पूरा जीवन भी गंवा दिया, अब आखिरी क्षण भी गंवा रहा है! पूरे जीवन तो परमात्मा को स्मरण नहीं किया, अब भी व्याक...रण में उलझा है! व्याकरण के सूत्र रटने से क्या होगा? शंकर की सारी वाणी में 'भज गोविन्दम्' से मूल्यवान कुछ भी नहीं है। क्योंकि शंकर मूलतः दार्शनिक हैं। उन्होंने जो लिखा है, वह बहुत जटिल है; वह शब्द, शास्त्र, तर्क, ऊहापोह, विचार है। लेकिन शंकर जानते हैं कि तर्क, ऊहापोह और विचार से परमात्मा पाया नहीं जा सकता; उसे पाने का ढंग तो नाचना है, गीत गाना है; उसे पाने का ढंग भाव है, विचार नहीं; उसे पाने का मार्ग हृदय से जाता है, मस्तिष्क से नहीं। इसलिए शंकर ने ब्रह्म-सूत्र के भाष्य लिखे, उपनिषदों पर भाष्य लिखे, गीता पर भाष्य लिखा, लेकिन शंकर का अंतरतम तुम इन छोटे-छोटे पदों में पाओगे। यहां उन्होंने अपने हृदय को खोल दिया है। यहां शंकर एक पंडित और एक विचारक की तरह प्रकट नहीं होते, एक भक्त की तरह प्रकट होते हैं।
'हे मूढ़, गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, क्योंकि अंतकाल के आने पर व्याकरण की रटन तुम्हारी रक्षा न करेगी।'
'हे मूढ़, गोविन्द को भजो।'
मूढ़ता क्या है? शंकर तुम्हें मूढ़ कह कर कोई गाली नहीं दे रहे हैं। अत्यंत प्रेमपूर्ण वचन है उनका यह।
भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़मते।
'हे मूढ़, भगवान को भज, गोविन्द को भज।'
मूढ़ता का क्या अर्थ है? मूढ़ता का अर्थ समझो।
'हे मूढ़, गोविन्द को भजो।'
मूढ़ता क्या है? शंकर तुम्हें मूढ़ कह कर कोई गाली नहीं दे रहे हैं। अत्यंत प्रेमपूर्ण वचन है उनका यह।
भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़मते।
'हे मूढ़, भगवान को भज, गोविन्द को भज।'
मूढ़ता का क्या अर्थ है? मूढ़ता का अर्थ समझो।
मूढ़ता का अर्थ अज्ञानी नहीं है; मूढ़ता का अर्थ है: अज्ञानी होते हुए अपने को ज्ञानी समझना। मूढ़ता पंडित के पास होती है, अज्ञानी के पास नहीं। अज्ञानी को क्या मूढ़ कहना! अज्ञानी सिर्फ अज्ञानी है--नहीं जानता, बात सीधी-साफ है। और कई बार ऐसा हुआ है कि नहीं जानने वाले ने जान लिया और जानने वाले पिछड़ गए; क्योंकि जो नहीं जानता है, उसका अहंकार भी नहीं होता; जो नहीं जानता है, वह विनम्र होता है; जो नहीं जानता है, नहीं जानने के कारण ही उसका कोई दावा नहीं होता।
लेकिन, पंडित बिना जाने जानता है कि जानता है। शब्द सीख लिए हैं उसने; ग्रंथों का बोझ उसके सिर पर है। वह दोहरा सकता है व्याकरण के नियम। उन्हीं में डूब जाता है।
लेकिन, पंडित बिना जाने जानता है कि जानता है। शब्द सीख लिए हैं उसने; ग्रंथों का बोझ उसके सिर पर है। वह दोहरा सकता है व्याकरण के नियम। उन्हीं में डूब जाता है।
अंतकाल के आने पर, मृत्यु के आने पर, कितनी तुम भाषा जानते हो या कितनी भाषाएं जानते हो, कितना व्याकरण जानते हो--कुछ भी तो काम न पड़ेगा।
जो मौत में काम आ जाए, वह प्रज्ञा; और जो मौत में काम न आए, वह पांडित्य। मौत कसौटी है। तो जो भी तुम जानते हो, उसको इस कसौटी पर कसते रहना, कहीं भूल न हो। यह कसौटी सदा सामने रखना। जैसे सर्राफ कसता रहता है पत्थर पर सोने को, ऐसे इस कसौटी को रखे रहना सदा: जो मौत में काम आए, उसी को ज्ञान मानना; जो मौत में काम न आए, धोखा दे जाए, दगा दे जाए, उसे पांडित्य समझना।
जो मौत में काम आ जाए, वह प्रज्ञा; और जो मौत में काम न आए, वह पांडित्य। मौत कसौटी है। तो जो भी तुम जानते हो, उसको इस कसौटी पर कसते रहना, कहीं भूल न हो। यह कसौटी सदा सामने रखना। जैसे सर्राफ कसता रहता है पत्थर पर सोने को, ऐसे इस कसौटी को रखे रहना सदा: जो मौत में काम आए, उसी को ज्ञान मानना; जो मौत में काम न आए, धोखा दे जाए, दगा दे जाए, उसे पांडित्य समझना।
और जो मौत में काम न आए, वह जीवन में क्या खाक काम आएगा! जो मौत तक में काम नहीं आता, वह जीवन में कैसे काम आ सकता है? क्योंकि मौत जीवन की पूर्णाहुति है; वह जीवन का चरम शिखर है; वह जीवन का समारोप है। जो मौत में काम आता है, वही जीवन में भी काम आता है। यद्यपि जीवन में धोखा देना आसान है, लेकिन मौत में धोखा देना असंभव है। मौत तो सब उघाड़ कर सामने रख देगी।
शंकर किसे मूढ़ कहते हैं? उसे मूढ़ कहते हैं, जो जानता तो नहीं है, लेकिन व्याकरण को रट लिया है; शब्द का ज्ञाता हो गया है; शास्त्र से जिसकी पहचान हो गई है; जो शास्त्र को दोहरा सकता है, पुनरुक्त कर सकता है; शास्त्र की व्याख्या कर सकता है।
शंकर किसे मूढ़ कहते हैं? उसे मूढ़ कहते हैं, जो जानता तो नहीं है, लेकिन व्याकरण को रट लिया है; शब्द का ज्ञाता हो गया है; शास्त्र से जिसकी पहचान हो गई है; जो शास्त्र को दोहरा सकता है, पुनरुक्त कर सकता है; शास्त्र की व्याख्या कर सकता है।
पंडित को मूढ़ कह रहे हैं शंकर। अगर पंडित को मूढ़ न कहते होते, तो 'हे मूढ़, गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, क्योंकि अंतकाल के आने पर व्याकरण की रटन तुम्हारी रक्षा न करेगी', अचानक व्याकरण को याद करने की जरूरत नहीं थी। मूढ़ थोड़े ही--जिनको हम मूढ़ कहते हैं, अज्ञानी--वे थोड़े ही व्याकरण रट रहे हैं। पंडित रट रहा है। और भारत में यह बोझ काफी गहरा हो गया है। यह इतना गहरा हो गया है कि करीब-करीब हर आदमी को यह खयाल है कि वह परमात्मा को जानता है, क्योंकि परमात्मा शब्द को जानता है।
ध्यान रखना, परमात्मा शब्द परमात्मा नहीं है, न पानी शब्द पानी है। और प्यास लगी हो तो शब्द काम न आएगा, पानी चाहिए। और मौत सामने खड़ी हो तो अमरत्व के सिद्धांत काम न आएंगे, अमृत का स्वाद चाहिए। ...... ओशो ( भज गोविन्दम )
ध्यान रखना, परमात्मा शब्द परमात्मा नहीं है, न पानी शब्द पानी है। और प्यास लगी हो तो शब्द काम न आएगा, पानी चाहिए। और मौत सामने खड़ी हो तो अमरत्व के सिद्धांत काम न आएंगे, अमृत का स्वाद चाहिए। ...... ओशो ( भज गोविन्दम )
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