एक यातरा है समाज की और
और एक यात्रा है संन्यास की, दोनों पैदा होते है अकेलेपन से तन्हाई से
जो आदमी अकेलेपन को पहचानने लगता है , एक दिन पाता है , अकेलापन कैवल्य है
यह अकेला होना हमारा स्वभाव है और इस अकेले होने में कोई पीड़ा नहीं है कोई दुःख नहीं है
यह अकेला होना आनंद है ..यह अकेला होना हमारी स्वतंत्रता है मुक्ति है मोक्ष है.
समाज और संन्यास दोनों एक ही तथ्य से पैदा होते है .और वह तथ्य है तन्हाई अकेलापन, अगर भुलाने की कोशिश की तो भीड़ में खो जाओगे और अपने से दूर निकलते जाओगे और जितने दूर निकलोगे उतनी पीड़ा बढती जायेगी क्योंकि अपने से दूर जाना ही पीड़ा है
अगर संन्यास में उतरे अपने एकांत को ध्यान बनाया , एकांत एकांत है , अकेलापन नहीं , एकांत का सौंदर्य है , एकांत में कोई पीड़ा नहीं , एसी तुमने व्याख्या बदली और तुम धीरे धीरे अपने रस में डूबे , तुमने अपने में मजा लिया
.......ओशो
कोई आता है, आ रहा है, आएगा शायद
खूबसूरत ये हमे भ्रम है और तन्हाई
खूबसूरत ये हमे भ्रम है और तन्हाई
कोई आता है, आ रहा है, आएगा शायद
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