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Wednesday, September 14, 2011

आतंकियों का दोष कहाँ, नेताओं की शय है

आतंकियों का दोष कहाँ, नेताओं की शय है दोस्त.
जब हत्यारों को हम, दामाद की मानिंद पालेंगे,
... नेतागण वोटों की खातिर, जब तक इन्हें बचालेंगे.
तब तक ऐसे हमलों में, नित लोग मरेंगे तय है दोस्त,
आतंकियों का दोष कहाँ, नेताओं की शय है दोस्त.
आई बी के अलर्ट पर, क्यों पुलिस नही होती गंभीर,
महज राजनैतिक विरोधियों पर, भांजते रहते हैं शमसीर,
मेरे घर घुस मुझको मारें, इतनी इनकी औकात नही,
लौह पुरुष सरदार पटेल सी, चिदम्बरम में बात नही.
कुत्तों सी अपने घर में, नेता करते जूतम पैजार,
पुलिस और प्रशासन को, जेबें भरने से नही फुर्सत यार,
अपने घर में भेद भाव के, बीज जिन्होंने बोये हैं,
उनके ही कारण भारत माँ के, लाखों नैना रोये हैं,
आतंक खात्मे की वास्तव में, इच्छा शक्ति है तुममे अगर,
जेलों से निकाल कर जिन्दा ही, इन्हें जला दो चौराहे पर,
क्यों करते इनपे करोड़ों खर्च, क्या ये बाप तुम्हारे हैं,
या तुम्हारे मुंह में नोटों की, ये जूती डारन हारे हैं.
गांधी, नानक, गौतम के देश में, भगत, शिवा बन जाना होगा,
अपने हत्यारों का गला रेट कर, इनको सबक सिखाना होगा,
खाल खींच कर इनके जिस्म से, मिर्च हमे भरनी होगी,
हर तिमाही में अन्यथा, लाखों गोदें सूनी करनी होगी.
जुर्म के सामने शान्ति गीत, अहिंसा नही कायरता है,
नौनिहाल या नौजवान, मेरा ही भाई मरता है,
मौत चीज क्या होती है, हमको इन्हें बताना होगा,
मौत के सौदागरों के दिल में, मौत का डर बिठलाना होगा.

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