परम्परावाद , ट्रेडीशंनलिजम |
इसने भारत की प्रतिभा को विकसित नही होने दिया है | समस्याए रोज बदल जाती है और समाधान हमारे बदलते ही नही |समाधान हमारे शाश्वत हैं | और समस्याए क्षण - क्षण में बदल जाती है | इससे कोई समस्यायों को नुक्सान नही होता है , इससे पकड़े हुए जो समाधान को बैठे है वे पराजित हो जाते है , हार जाते है , और जीवन का मुकाबला नही कर पाते | बदली हुई समस्या बदला हुआ समाधान चाहती है | लेकिन परम्परावादी की दृष्टि यह होती है कि जो समाधान परम्परा ने दिया है , वही सत्य है | जो पुराने से आया है , वही सत्य है | नये की खोज करना पाप है , पुराने को मानना पुण्य है और धर्म है | और जो समाज पुराने को मानने को ही धर्म समझ लेता है और नये से भयभीत हो जाता है उस समाज की प्रतिभा का विकास अवरुद्ध हो जाए , तो आश्चर्य नही है | क्योंकि प्रतिभा विकसित होती है नये की खोज से | जितना हम नया खोजते है , उतना ही मस्तिष्क विकसित होता है |जितना हम पुराने को पकड़ लेते है , उतना ही मस्तिष्क के विकास की जरूरत समाप्त हो जाती है | नई समस्या एक मौक़ा बनती है कि हम नई चुनौती स्वीकार करे , नया समाधान खोजे , ताकि हम विकसित हो जाए | न समस्या का उतना मूल्य है , न समाधान का उतना मूल्य है , लेकिन समस्या समाधान को खोजने की चुनौती देती है | अंतिम मूल्य चेतना के विकास का हैं | लेकिन जो लोग पुराने समाधान से चिपट कर रह जाते है , उनकी चेतना चुनौती खो देती है , और वे विकसित नही हो पाते है |
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