क्या क्रान्ति का भी सौदा या मोल भाव किया जा सकता है? यदि दिल्ली के रामलीला मैदान में पिछले बारह दिनों से चल रहे “अन्ना अनशन” एपिसोड को देखें तब तो क्रांतियों की भूमिका, उनकी परिभाषा और देश और समाज को उनके योगदान पर कई मर्तबा सोचना पड़ेगा.
जब “अन्ना अनशन” ड्रामा शुरू हुआ तो कहा गया गया था कि जब तक संसद में “जन लोकपाल” पारित नहीं हो जाएगा तब तक अन्ना हजारे का अनशन चलता रहेगा. लेकिन न तो संसद में “जन लोकपाल” पारित हुआ और न सरकार ने ऐसा कोई वायदा किया कि टीम अन्ना का “जन लोकपाल” हूँ-ब-हूँ पारित कर दिया जाएगा. फिर वे कौन सी परिस्थितियां थीं जिनके चलते श्री अन्ना हजारे साहब ने अनशन तोड़ने का ऐलान कर दिया?
क्या इसके पीछे टीम अन्ना ने कोई सौदेबाजी की है? अगर की है तो वह सौदेबाजी जनता के सामने आना चाहिए और यदि सौदेबाजी नहीं हुई है तो भी टीम अन्ना को ये बताना चाहिए कि आखिर अन्ना जी ने बिना जन लोकपाल पारित हुए अनशन तोड़ने का निर्णय क्यों लिया? अगर ऐसा करना ही था तो उसी वक़्त अनशन तोड़ने का फैसला क्यों नहीं लिया गया जब प्रधान मंत्री और समूचे विपक्ष ने उनसे अनशन तोड़ने का अनुरोध किया था? लेकिन उस वक़्त ऐसा नहीं किया गया. अब जब सारे दल खुल कर सामने आ गये और सब ने एक सुर से टीम अन्ना के जन लोकपाल को नकार दिया तो अनशन समाप्त करने का ऐलान कर दिया गया जबकि सुबह ही अन्ना ने कहा था कि वे अभी चार-पांच दिन और अनशन कर सकते हैं.
अहम् सवाल यह है कि देश के नवजवान वर्ग को ये झूठे सब्जबाग दिखाए गये थे और प्रचारित किया गया था कि ये आज़ादी की दूसरी लड़ाई है. तो क्या देश को दूसरी आज़ादी मिल गयी? क्या आज़ादी की पूरी लड़ाई मुकम्मल हो गयी? क्या इस तरह सीधे सीधे नौजवानों की भावनाओं के साथ अन्ना हजारे और उनकी टीम ने छल नहीं किया है???
जनता को ये जानने का हक है कि भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर उसके अरमानों और सपनों का सौदा किसने किया है? क्या अन्ना, केजरीवाल, भूषण या किरण बेदी इसका जवाब देंगे और उस सौदेबाज़ को जनता के सामने लायेंगे?
कल जब अन्ना जी अपना अनशन तोड़ेंगे तो उन्हें ये गारंटी लेनी ही होगी कि अब देश से भ्रष्टाचार समाप्त हो गया है, क्योंकि ऐसा उन्होंने और उनकी टीम ने देशवासियों से कहा था कि ये लड़ाई देश से भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए हो रही है. अगर अन्ना ये ऐलान नहीं करते हैं और ये जिम्मेदारी नहीं लेते हैं तो यह आज़ादी के बाद देश की जनता से सबसे बड़ा छल होगा!!!!
जब “अन्ना अनशन” ड्रामा शुरू हुआ तो कहा गया गया था कि जब तक संसद में “जन लोकपाल” पारित नहीं हो जाएगा तब तक अन्ना हजारे का अनशन चलता रहेगा. लेकिन न तो संसद में “जन लोकपाल” पारित हुआ और न सरकार ने ऐसा कोई वायदा किया कि टीम अन्ना का “जन लोकपाल” हूँ-ब-हूँ पारित कर दिया जाएगा. फिर वे कौन सी परिस्थितियां थीं जिनके चलते श्री अन्ना हजारे साहब ने अनशन तोड़ने का ऐलान कर दिया?
क्या इसके पीछे टीम अन्ना ने कोई सौदेबाजी की है? अगर की है तो वह सौदेबाजी जनता के सामने आना चाहिए और यदि सौदेबाजी नहीं हुई है तो भी टीम अन्ना को ये बताना चाहिए कि आखिर अन्ना जी ने बिना जन लोकपाल पारित हुए अनशन तोड़ने का निर्णय क्यों लिया? अगर ऐसा करना ही था तो उसी वक़्त अनशन तोड़ने का फैसला क्यों नहीं लिया गया जब प्रधान मंत्री और समूचे विपक्ष ने उनसे अनशन तोड़ने का अनुरोध किया था? लेकिन उस वक़्त ऐसा नहीं किया गया. अब जब सारे दल खुल कर सामने आ गये और सब ने एक सुर से टीम अन्ना के जन लोकपाल को नकार दिया तो अनशन समाप्त करने का ऐलान कर दिया गया जबकि सुबह ही अन्ना ने कहा था कि वे अभी चार-पांच दिन और अनशन कर सकते हैं.
अहम् सवाल यह है कि देश के नवजवान वर्ग को ये झूठे सब्जबाग दिखाए गये थे और प्रचारित किया गया था कि ये आज़ादी की दूसरी लड़ाई है. तो क्या देश को दूसरी आज़ादी मिल गयी? क्या आज़ादी की पूरी लड़ाई मुकम्मल हो गयी? क्या इस तरह सीधे सीधे नौजवानों की भावनाओं के साथ अन्ना हजारे और उनकी टीम ने छल नहीं किया है???
जनता को ये जानने का हक है कि भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर उसके अरमानों और सपनों का सौदा किसने किया है? क्या अन्ना, केजरीवाल, भूषण या किरण बेदी इसका जवाब देंगे और उस सौदेबाज़ को जनता के सामने लायेंगे?
कल जब अन्ना जी अपना अनशन तोड़ेंगे तो उन्हें ये गारंटी लेनी ही होगी कि अब देश से भ्रष्टाचार समाप्त हो गया है, क्योंकि ऐसा उन्होंने और उनकी टीम ने देशवासियों से कहा था कि ये लड़ाई देश से भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए हो रही है. अगर अन्ना ये ऐलान नहीं करते हैं और ये जिम्मेदारी नहीं लेते हैं तो यह आज़ादी के बाद देश की जनता से सबसे बड़ा छल होगा!!!!
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