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Tuesday, August 2, 2011

बयानों की झड़ी से क्या नक्सल समस्या हल होगी

पिछले दिनों रायपुर जिले के देवभोग क्षेत्र में स्थित घुरवागोड़ा में आयोजित कांग्रेस के किसान सम्मेलन में भागीदारी कर वापस लौट रहे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल के काफिले पर नक्सली हमले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक नक्सलियों के हमले होते रहेगें? प्रश्न यह भी है कि क्यों नहीं भाजपा सरकार की रणनीति कामयाब हो रही है? तमाम सुरक्षा उपायों के बाद भी कैसे हमला हो गया? आखिर हमले के पीछे नक्सलियों का क्या उद्देश्य है? इस हमले में कहीं कोर्ई राजनीति तो नहीं है या कोई साजिश! हमले के बाद सरकार की कार्रवाई कितनी गंभीर है और भविष्य के लिए कोई उपाय किए जा रहे हैं या नहीं। इन सवालों के बौछार में बयानों की झड़ी पक्ष-विपक्ष ने लगा दी है। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का कहना है कि नक्सली समस्या के लिए कांग्रेस दोषी है। पूर्व में कांग्रेस की सरकारों ने ही इस समस्या को जन्म दिया। इतना ही नहीं वर्तमान में केन्द्र की कांग्रेस गठबंधन सरकार इस समस्या के लिए न तो राज्य सरकार को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध करवा रही है और ना ही कोई कदम। दूसरी तरफ कांग्रेस नेताओं ने हमले को सरकार की असफलता निरुपित करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से इस्तीफा मांगा है। इस्तीफा नहीं देने पर केन्द्र से राष्ट्रपति शासन की गुजारिश की है। नक्सल समस्या के हल हेतु राज्य सरकार को बातचीत की पहल का सुझाव देते हुए कांग्रेस के नेताओं ने बयानों की झड़ी लगा दी है। राज्य सरकार की बर्खास्तगी की मांग पर बीजेपी ने मुंबई में बम विस्फोट और आतंकी हमले के मामले में महाराष्ट्र की कांग्रेसनीत सरकार से इस्तीफे की सलाह कांग्रेस को दी है।
भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के इस बयानी हमलों से क्या नक्सली हमलों पर काबू पाया जा सकता है? याद दिला दें कि सलवा जुडूम अभियान और स्पेशल पुलिस आफिसर (एसपीओ) की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के खिलाफ निर्णय दिया है। एसपीओ की व्यवस्था समाप्त होने से नक्सली अभियान में सरकार की असफलता उजागर हो गई है तो विधानसभा में नक्सली समस्या की क्लोजडोर बैठक और ग्रीनहंट सहित गोपनीय रणनीति से भी समस्या कम होने की बजाय गंभीर ही हुई है। पूर्व पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन और गृहमंत्री श्री कंवर के बीच सार्वजनिक विवाद का खामियाजा जनता को भुगतना पड़ा है। तमाम बातों के बाद सबसे बड़ी बात यही है कि क्या राज्य सरकार नक्सल समस्या के प्रति सच में गंभीर है? क्या कोई उपाय है जो समस्या को बढऩे से रोक सकें। नक्सलियों से बातचीत का जो रास्ता स्वामी अग्निवेश की मध्यस्थ से खुला था वह भी बंद ही हो गया है। ऐसे में चिंतन और फौरी कार्रवाई की जरूरत है।

                                                                                                                                           तपेश जैन 

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