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Tuesday, July 5, 2011

बचपन के रंग ओंर मम्मी के संग


बचपन में माँ से लड़ना झगड़ना ।
उसके ही हाथों से रोटी फिर खाना ॥
उसके साथ ही चलना और घूमना ।
गोदी में चढ़कर उसके मचलना ॥
पापा से झट से पैसे ले लेना ।
पैसे से टाफी और इमली खाना ॥
चिढ़ना-चिढ़ाना रोना-रुलाना ।
लुकना-छिपना हँसना-हँसाना ॥
माँ की गोदी था प्यारा सा पलना ।
पकड़े जो कोई तो धोती में छिपना ॥
ऐसा था प्यारा सा बचपन का रंग ।
गुजरा था जो मेरे माँ बाप के संग ॥
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क्या आपने कभी गौर किया है की हम सबकी आंखों में क्या दिखाई देता है, वैसे तो आपने शायद ये भी गौर नहीं किया हो की हम अपनी आखों से सब कुछ देख सकते हैं मगर ख़ुद अपनी आंखों से अपनी आंखें नहीं देख सकते , बिना आईने की मदद के ।, खैर,
पिता की आंखों में क्या दिखता फ़र्ज़
माता की आंखों में क्या दिखता है ममता
बहन की आंखों में क्या दिखता है स्नेह
भाई की आंखों में क्या दिखता है प्यार
पत्नी की आंखों में क्या दिखता है समर्पण
प्रेमिका की आंखों में क्या दिखता है शंशय
बालक की आंखों में क्या दिखता है जिज्ञासा
शिष्य की आंखों में क्या दिखता है आदर
मित्र की आंखों में क्या दिखता है सहयोग
दुश्मन की आंखों में क्या दिखता है बदला
अमीर की आंखों में क्या दिखता है घमंड
गरीब की आंखों में क्या दिखता है आशा
सज्जन की आंखों में क्या दिखता है दया
तो देखा आपने देखने के कितने रूप और नज़रिये हैं।
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मन को वश में करो
फिर चाहे जो करो।
कर्ता तो और है
रहता हर ठौर है
वह सबके साथ है
दूर नहीं पास है
तुम उसका ध्यान धरो।
फिर चाहे जो' करो।
सोच मत बीते को
हार मत जीते को
गगन कब झुकता है
समय कब रुकता है
समय से मत लड़ो।
फिर चाहे जो करो।
रात वाला सपना
सवेरे कब अपना
रोज़ यह होता है
व्यर्थ क्यों रोता है
डर के मत मरो।
फिर चाहे जो करो।
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मां को कैसा लगता होगा?
जन्मा होगा जब कोई फूल
सारे दुःख भूली होगी
देख अपने लाल का मुंह ।
मां को कैसा लगता होगा?
बढ़ते हुए बच्चों को देख
हर सपने पूरी करने को
होगी तत्पर मिट जाने को।
मां को कैसा लगता होगा?
बच्चे हुए होंगे जब बड़े
और सफल हो जीवन में
नाम कमाएं होंगे ख़ूब ।
मां को कैसा लगता होगा?
बच्चे समझ कर उनको बोझ
गिनने लगे निवाले रोज़
देते होंगे ताने रोज़।
मां को कैसा लगता होगा?
करके याद बातें पुरानी
देने को सारे सुख उनको
पहनी फटा और पी पानी।
मां को कैसा लगता होगा?
होगी जब जाने की बारी
चाहा होगा पी ले थोड़ा
बच्चों के हाथों से पानी।
मां को कैसा लगता होगा?
जा बसने में बच्चों से दूर
टकटकी बांधें देखती होगी
उसी प्यार से भरपूर।
मां को कैसा लगता होगा?
मां को कैसा लगता होगा?
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माँ-बाप होने के नाते अपने बच्चों को खूब पढाना-लिखाना और पढा लिखा कर खूब लायक बनाना । मगर इतना लायक भी मत बना देना कि वह कल तुम्हें ही ‘नालायक’ समझने लगे । अगर तुमने आज यह भूल की तो कल बुढापे में तुम्हें बहुत रोना पछताना पडेगा
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रिश्ता ..............................
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(गुरुदेव पंकज जी के सुझाव पर तुम और तू के दोष को दूर करने के बाद)
जिस दिन
हमारे रिश्ते की अकाल मृत्यु हुई
कुकुरमुत्ते की तरह तुम्हारी यादें
सर उठाने लगीं
कंबल में जमी धूल सी तुम
तमाम कोशिशों के बावजूद
झाड़ी नही गयीं मुझसे
सफेदी की अनगिनत परतों के बाद भी घर की दीवारें
तुम्हारी यादों के मकड़-जाल से अटी पड़ी हैं
बारिश में उतरी सीलन सी तुम्हारी गंध
घर के कोने कोने में बस गयी है
यादों की धूल
वेक्युम चलाने के बावजूद
शाम होते होते
जाने कौन सी खिड़की से चुपचाप चली आती है
केतली से उठती भाप के साथ
हर सुबह तुम मेरे नथुनों में घुसने लगती हो
जब कभी आईना देखता हूँ
बालों में उंगलियाँ फेरने लगती हो
सॉफ करने पर भी
पुरानी गर्द की तरह
आईने से चिपकी रहती हो
घर के कोने कोने में तुम्हारी याद
चींटियों की तरह घूमने लगी है
स्मृतियों की धूल
कब जूतों के साथ घर आ जाती है
पता नही चलता
मैं जानता हूँ
इस रिश्ते की तो अकाल मृत्यु हो चुकी है
और यादों की धूल भी समय के साथ बैठ जाएगी
पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे

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