निगेहबाँ कुछ, निजामे-गुलसिताँ कुछ और कहता है
परिंदा कुछ, शज़र कुछ, आशियाँ कुछ और कहता है
है दावा राहबर का शर्तिया मंज़िल पै पहुँचूँगा
मगर हमदम गुबारे-कारवाँ कुछ और कहता है
तेरी बस्ती में सब महफूज़ हैं, मैं मान तो लेता
मगर दर-दर पै आतिश का निशाँ कुछ और कहता है
तेरी जुल्फें भी सुलझाना ज़रूरी हैं मेरे हमदम
तकाज़ा भूख का लेकिन यहाँ कुछ और कहता है
सबा से ताज़गी, गुंचों से रौनक, गुल से बू गायब
चमन का हाल कुछ है बागबाँ कुछ और कहता है
मैं मस्जिद की बता या मैकदे की बात सच मानूँ
ऐ वाइज़, तू यहाँ कुछ और वहाँ कुछ और कहता है
मेरा हमदम बड़ा 'मासूम' है जो देखता कुछ है
सुनाता है तो नादाँ दास्ताँ कुछ और कहता है
है दावा राहबर का शर्तिया मंज़िल पै पहुँचूँगा
मगर हमदम गुबारे-कारवाँ कुछ और कहता है
तेरी बस्ती में सब महफूज़ हैं, मैं मान तो लेता
मगर दर-दर पै आतिश का निशाँ कुछ और कहता है
तेरी जुल्फें भी सुलझाना ज़रूरी हैं मेरे हमदम
तकाज़ा भूख का लेकिन यहाँ कुछ और कहता है
सबा से ताज़गी, गुंचों से रौनक, गुल से बू गायब
चमन का हाल कुछ है बागबाँ कुछ और कहता है
मैं मस्जिद की बता या मैकदे की बात सच मानूँ
ऐ वाइज़, तू यहाँ कुछ और वहाँ कुछ और कहता है
मेरा हमदम बड़ा 'मासूम' है जो देखता कुछ है
सुनाता है तो नादाँ दास्ताँ कुछ और कहता है
मासूम गज़ियाबादी
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