खौफ आसमान से बिजली गिरने का नहीं है,
डर जमीन के धसकने का भी नहीं है,
नहीं घबड़ाते सांप के जहर से
फिर भी दिल घबड़ाता है
इस बात से
रोज मिलने वाले इंसानों में
कोई शैतान तो नहीं है।
उसे खो दिया ....
मेरी खुली खिड़की पर वो रोज आकर
खड़ी हो जाती थी बिना कुछ कहे ...
फिर एक आवाज लगाकर भाग जाती थी ......
जब पहले मुझे फुर्सत होती थी मुझे
ये हरकत भातीथी उसकी ....
अब तो मैं बड़ा आदमी हो गया हूँ ...
मुझे थोड़े वक्त में कितने सारे काम करने होते है ......
मैं कितने लोगोको खुश करने में लगा रहता हूँ ....
क्योंकि मैं सफल कहलाना चाहता हूँ .....
अब भी वो आती है , आवाज लगाती है ...
अब उसकी हरकत मुझे ना भाती है ....
उसे कुछ ना कहते हुए बस उसे टालना शुरू किया ......
एक दिन अचानक ....
उसने आना बंद कर दिया ....
ना आने का कोई बहाना भी ना किया ....
बस खुली खिड़की भी उसका इंतज़ार करने लगी मेरी तरह ....
पर वो ना आई .....वो ना आई ....
अब सोचा मैंने भी ...
क्या माँगा था उसने ??? कुछ नहीं ...
कभी कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं बस दे जाती थी
एक प्यारी सी मुस्कान एक मीठी सी आवाज ....
आज दूसरों को खुश करते हुए मैंने उसे ही नाराज़ कर दिया ....
पूरी दुनिया को पाने की धुन में उसे ही खो दिया ...
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जिन्दा हूँ !!!!
मैं जिन्दा हूँ ये एहसास दिलाना पड़ता है खुद को हरवक्त ....
पता नहीं ये किस मोड़ पर जा चुकी है जिंदगी
पता ही नहीं चलता की ख़ुशी है या गम इन राहों में ....
जिंदगी यूँ दोराहो पर ना छोड़
या तो पूरी तरह गमके कांटे बन बिछ जा जिंदगी में
या फिर फूलों की चादर बनकर बिखरती रह यहाँ .....
तड़प गया हूँ .घुटन हो गयी है ....
बस एक सांस दे दे ...एक सदा दे ...
----- धोखा.......
उसकी मुस्कराहट हमें हरदम धोका देती रही ,
हम समजते रहे वो खुश रहती है हरदम ,
अश्कोंकी एक जुबाँ होती है चाहे ख़ुशी हो या गम ,
बस एक अदना सी इंसान है वो कोई खुदा नहीं ,
कसक होती होगी उसे भी बस ये गलतफहमी हो गयी एक पलमे
-------------------- उम्मीद से दुनिया कायम है ...
कहीं कोई उम्मीद बाकी है
वर्ना रोज खिड़की पर निगाहें नहीं दौड़ जाती !!!!
कहीं कोई उम्मीद बाकी है
वर्ना इंसानियतका नर्म चेहरा यूँ नज़र नहीं आता !!!
कहीं कोई उम्मीद बाकी है
वर्ना तुम पर यूँ ऐतबार कायम ना होता !!!!!
कहीं कोई उम्मीद बाकी है
ना उम्मीदीकी सारी वजह के बाद हमारी यूँ मुलाकात नहीं होती !!!!!
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जहा देखो हम ही हम हैं हम ही हम हैं तो क्या हम हैं जो देखा उसके दिल् मैं तो मेरे लिए क्या मुहब्बत कम है यूँ ग़लतफहमी मे जिए कब तक और ख़ुद पर ज़ुल्म ढाए कब तक जीना दुश्वार सा लगने लगा है हमे अब ख़ुद से डर लगने लगा है ख़ुद से भी डरें तो कब तक इतना ज़ुल्म ढाए तो कब तक क्योंकी....... हम ही हम हैं तो क्या हम हैं
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मुझको कोंई भी ना जान सका
अपना कोंई भी ना मान सका
जहा भी गए ठोकर ही खायी
मेरी वफा कोंई ना पहचान सका
well
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