हमारे देश से ज्यादा तो पाकिस्तान में धमाके होते हैं।देखिये बयान एक पेपर टाईगर का।बेशर्मी और बेवकूफ़ी की मिसाल है ऐसी बयानबाज़ी।उदाहरण दिया तो किसका जिस पर हमारे देश के आतंकवादियों को शरण देने के आरोप हैं।आरोप इस्लिये कह रहा हूं ,कंही उन्हे बुरा न लग जाये कि और उन्हे ये ना लगे कि ये भी बिना ठोस सबूत के किसी मुस्लिम देश को बदनाम करने की भगवा साजिश है।क्या कहा जा सकता है इस देश के ज़िम्मेदार ठेकेदारों की लाचारी और चाटूकारिता पर्।अरे उदाहरण देना था तो देते अमेरिका का उदाहरण।कहते सीना ठोक कर कि हम घर में घुस कर मारेंगे दुश्मनों को।कहते कि मुम्बई में अब अगर दोबारा धमाका हुआ तो हम भी कई धमाके करवा देंगे।मगर अफ़सोस,देश की असंख्य जनता के ज़ख्मों पर मरहम लगाने की बजाय आपने अपने एक नेता को बचाने के लिये जनता के ज़ख्मों पर नमक-मिर्ची लगा दी।ठीक है कोई कुछ कह नही रहा है सबके सीने में धधक रहा गुस्सा ये कह रहा है कि अरे हिज़ड़ों,और कितना खून देखना है बहते हुये सड़को पर्?और कितनी लाशें गिनना है?मांस के लोथड़े देखने में मज़ा आता है क्या?क्या धमाकों के शिकार लोगों की चीखें,उनके रिश्तेदारों का रोना सुनकर शांति मिलती है क्या?क्या मुआवज़ा बांटने में ही आनंद आता है?और कितने धमाके होना चाहिये?और कितनी लाशें बिछ्ना चाहिये?और कितने परिवार उजड़ना चाहिये?और कितने बच्चे अनाथ और बहने विधवा होनी चाहिये?और कितनी जान की बलि चाहिये देश के ठेकेदारों,आप लोगों को?कब जागोगे?कब मारोगे?कब बचाओगे देश को?पकिस्तान जैसा हाल हो जायेगा तो फ़िर कौन बचा पायेगा?आयेगा अमेरिका जब मर्ज़ी घुस के मार के चला जायेगा।तब क्या तालियां बजाओगे?शर्म भी नही आती ऐसे गैर ज़िम्मेदाराना बयान देते हुये।और मुझे तो उन बेशर्मों से ज्यादा अपने ही भाई-बहनों पर शर्म आती है,कि आखिर वे इन कमीनो पर अपने तरकश में सज़े सवालों के तीर बरसाते क्यों नही?क्या एकाध राडिया केस और सामने आने वाला है?क्या कुछ बड़े पत्रकार और नंगे होने वाले हैं?क्यों नही सवाल करते उनसे जनता की आवाज़ बनकर?उन पांच बड़े लोगों की तो बात करना ही बेकार है जो देश के सबसे हीमैन-सुपरमैन-बैटमैन-रैटमैन प्रधानमंत्री से मिलकर आयें हैं।उन्होने तो इस बारे में शायद पूछा ही नही होगा।लेकिन जो मैदान में है उनको तो ऐसी बक़वास करने वालों को नंगा करना चाहिये,या फ़िर उनसे बात ही नही करनी चाहिये।काहे उनकी बक़वास सुनाते हैं जनता को?क्या वो पेड़ न्यूज़ है?क्यों जनता के ज़ख्मों पर मरहम की जगह चमचों की जली-कटी सुनाते हैं।ये भी समझ से परे है?क्या उनकी बक़वास के बिना काऊंटर बाईट नही मिलेगी?क्या अनाप-शनाप बक़वास दिखाने पर ही लोग टी वी देखेंगे?समझ में नही आता कि इस बात का क्या मतलब है,मुम्बई फ़िर दौड़ने लगी है?मुम्बई की हिम्मत की दाद देनी होगी?और दौड़ेगी नही तो क्या रुक जायेगी?हिम्मत नही दिखायेगी तो घर कैसे चलेगा?हिम्मत की दाद देना ही तो हमारे बेशर्म नेताओं के हिम्मत की दाद दो,जो बिना डरे सबके सामने बक़वास करते है,हमारे भाई सुनते हैं और फ़िर स्टूडियो जाकर सारे देश को सुनाते हैं।ऐसा लगता है कि ये उन निकम्मे नेताओं के नौकर हैं,बस और कुछ नही।उनकी भी ज़िम्मेदारी उतनी है जितनी सरकार के ज़िम्मेदार लोगों की।जिस दिन वे उन लोगों कू बेनक़ाब करना शुरू करेंगे तब कंही उनकी बक़वास पर लगाम लगेगी और शायद तब कुम्भकरण जागेंगे भी।वरना कह्ते रहेंगे नेता पाकिस्तान से तो अच्छे हैं।
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Friday, July 15, 2011
anil pusadkar ki kalam se
हमारे देश से ज्यादा तो पाकिस्तान में धमाके होते हैं।देखिये बयान एक पेपर टाईगर का।बेशर्मी और बेवकूफ़ी की मिसाल है ऐसी बयानबाज़ी।उदाहरण दिया तो किसका जिस पर हमारे देश के आतंकवादियों को शरण देने के आरोप हैं।आरोप इस्लिये कह रहा हूं ,कंही उन्हे बुरा न लग जाये कि और उन्हे ये ना लगे कि ये भी बिना ठोस सबूत के किसी मुस्लिम देश को बदनाम करने की भगवा साजिश है।क्या कहा जा सकता है इस देश के ज़िम्मेदार ठेकेदारों की लाचारी और चाटूकारिता पर्।अरे उदाहरण देना था तो देते अमेरिका का उदाहरण।कहते सीना ठोक कर कि हम घर में घुस कर मारेंगे दुश्मनों को।कहते कि मुम्बई में अब अगर दोबारा धमाका हुआ तो हम भी कई धमाके करवा देंगे।मगर अफ़सोस,देश की असंख्य जनता के ज़ख्मों पर मरहम लगाने की बजाय आपने अपने एक नेता को बचाने के लिये जनता के ज़ख्मों पर नमक-मिर्ची लगा दी।ठीक है कोई कुछ कह नही रहा है सबके सीने में धधक रहा गुस्सा ये कह रहा है कि अरे हिज़ड़ों,और कितना खून देखना है बहते हुये सड़को पर्?और कितनी लाशें गिनना है?मांस के लोथड़े देखने में मज़ा आता है क्या?क्या धमाकों के शिकार लोगों की चीखें,उनके रिश्तेदारों का रोना सुनकर शांति मिलती है क्या?क्या मुआवज़ा बांटने में ही आनंद आता है?और कितने धमाके होना चाहिये?और कितनी लाशें बिछ्ना चाहिये?और कितने परिवार उजड़ना चाहिये?और कितने बच्चे अनाथ और बहने विधवा होनी चाहिये?और कितनी जान की बलि चाहिये देश के ठेकेदारों,आप लोगों को?कब जागोगे?कब मारोगे?कब बचाओगे देश को?पकिस्तान जैसा हाल हो जायेगा तो फ़िर कौन बचा पायेगा?आयेगा अमेरिका जब मर्ज़ी घुस के मार के चला जायेगा।तब क्या तालियां बजाओगे?शर्म भी नही आती ऐसे गैर ज़िम्मेदाराना बयान देते हुये।और मुझे तो उन बेशर्मों से ज्यादा अपने ही भाई-बहनों पर शर्म आती है,कि आखिर वे इन कमीनो पर अपने तरकश में सज़े सवालों के तीर बरसाते क्यों नही?क्या एकाध राडिया केस और सामने आने वाला है?क्या कुछ बड़े पत्रकार और नंगे होने वाले हैं?क्यों नही सवाल करते उनसे जनता की आवाज़ बनकर?उन पांच बड़े लोगों की तो बात करना ही बेकार है जो देश के सबसे हीमैन-सुपरमैन-बैटमैन-रैटमैन प्रधानमंत्री से मिलकर आयें हैं।उन्होने तो इस बारे में शायद पूछा ही नही होगा।लेकिन जो मैदान में है उनको तो ऐसी बक़वास करने वालों को नंगा करना चाहिये,या फ़िर उनसे बात ही नही करनी चाहिये।काहे उनकी बक़वास सुनाते हैं जनता को?क्या वो पेड़ न्यूज़ है?क्यों जनता के ज़ख्मों पर मरहम की जगह चमचों की जली-कटी सुनाते हैं।ये भी समझ से परे है?क्या उनकी बक़वास के बिना काऊंटर बाईट नही मिलेगी?क्या अनाप-शनाप बक़वास दिखाने पर ही लोग टी वी देखेंगे?समझ में नही आता कि इस बात का क्या मतलब है,मुम्बई फ़िर दौड़ने लगी है?मुम्बई की हिम्मत की दाद देनी होगी?और दौड़ेगी नही तो क्या रुक जायेगी?हिम्मत नही दिखायेगी तो घर कैसे चलेगा?हिम्मत की दाद देना ही तो हमारे बेशर्म नेताओं के हिम्मत की दाद दो,जो बिना डरे सबके सामने बक़वास करते है,हमारे भाई सुनते हैं और फ़िर स्टूडियो जाकर सारे देश को सुनाते हैं।ऐसा लगता है कि ये उन निकम्मे नेताओं के नौकर हैं,बस और कुछ नही।उनकी भी ज़िम्मेदारी उतनी है जितनी सरकार के ज़िम्मेदार लोगों की।जिस दिन वे उन लोगों कू बेनक़ाब करना शुरू करेंगे तब कंही उनकी बक़वास पर लगाम लगेगी और शायद तब कुम्भकरण जागेंगे भी।वरना कह्ते रहेंगे नेता पाकिस्तान से तो अच्छे हैं।
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