Total Pageviews

Monday, June 20, 2011

फकीर की तड़प देखकर भगवान पिघल गए

कहते हैं कि चाह अगर सच्ची हो तो मंजिल तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता। जरूरत है उस तीव्र प्यास की जो सीधे आत्मा को परमात्मा से जोड़ देती है। ऐसे एक नहीं बल्कि सैकड़ों उदाहदण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि मनुष्य जब कुछ पाने के लिये अपने जीवन की बाजी लगाने को तैयार हो जाता है तो अपने मकसद में कामयाबी अवश्य ही मिलती है। इस बात की हकीकत और गहराई को समझने के लिये आइये चलते हैं एक सच्चे घटना प्रसंग की ओर...
एक गांव में एक फकीर रहता था। गांव के बच्चों को सत्य, प्रेम और दूसरों की मदद करने की शिक्षा देना ही उसका प्रतिदिन का पसंदीदा कार्य था। खाली वक्त में वह किसी एकांत स्थान पर जाकर ईश्वर का ध्यान करता और जिंदगी में आए अनेक दुखों को भुलाकर भगवान को हमेशा धन्यवाद ही देता रहता। वह अपना पेट भरने के लिये गांव में घर-घर जाकर भिक्ष
मांगता और पेट भरने के लिये पर्याप्त होने पर वापस लौट आता।
रोज की तरह ही एक दिन वह गांव में भिक्षा मांग रहा था। एक घर से दूसरे घर जाते हुए वह बिना देखे ही बस यही पुकारता  कि- भगवान तेरी जय हो। एक घर से दूसरे की ओर जाने में वह भूल ही गया कि वह जहां खड़े होकर भिक्षा के लिये पुकार रहा है वह किसी का घर नहीं बल्कि गांव की एक मात्र बहुत पुरानी मस्जिद है। उसकी आदत थी कि वह हमेशा अपना सिर झुकाकर ही रखता था इसलिये उसे पता ही नहीं चला कि वह मस्जिद के सामने खड़ा होकर भीख मांग रहा है। उस रास्ते से गुजरते हुए व्यक्ति ने उसे देखा तो फकीर के पास आकर बोला- बाबा क्या आपको दिखाई नहीं देता कि यह किसी का घर नहीं बल्कि मस्जिद है यहां तुम्हें कौन भिक्षा देगा। जाओ- जाओ किसी के घर जाकर मांगों जो अवश्य कुछ खाने को मिल जाएगा।
उस राहगीर की बात सुनकर उस फकीर के दिमाग में अचानक बिजली सी कोंध गई। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। फकीर सोचने लगा कि यह मस्जिद तो खुद ईश्वर का ही घर है, क्या यहां आकर भी मेरी झोली खाली रह जाएगी। जब एक सामान्य सा मनुष्य इतनी दया दिखाता है कि कुछ न कुछ तो दे ही देता है तो क्या इस संसार के मालिक को मुझ पर दया नहीं आएगी। कहते हैं कि यही सोचता हुआ वह फकीर मस्जिद के सामने ही बैठ गया। उसकी आंखों से लगातार आंसू बहते जा रहे थे, सुबह से रात हो गई लेकिन वह फकीर अपनी जगह से हिला तक नहीं। यहां तक कि पूरे तीन दिन हो गए लोंगों ने उसे खूब समझाने की कोशिश कर ली लेकिन वह बगैर जवाब दिये बस मस्जिद के भीतर ही देखता रहता। उसकी आंखों में आंसू थे लेकिन चेहरे पर हंसी थी उसे लगा जैसे आज उसकी असली आंखें खुल गईं।
और कहते हैं कि चोथें दिन सुबह-सुबह वहां एक चमत्कार घटित हो गया। बिजली सी चमक गई एक तेज रोशनी हुई और उस फकीर को जाने ऐसा क्या मिल गया कि वह तो बस नाचने लगा, झूमने लगा। लोग कहते हैं कि उस दिन के बाद से उस फकीर में कई चमत्कारी शक्तियां आ गईं थी। उसके छूने मात्र से लोगों के दु:ख, दर्द और बीमारियां मिट जाती थीं।

No comments:

Post a Comment

http://rktikariha.blogspot.com/