स्वतंत्र सोचना गुनाह है, सरोकार खत्म कर दिए गए हैं क्योंकि पत्रकारों को कर्मचारी बना दिया गया है। नौकरी बचाते हुए पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा करने की लड़ाई चल पड़ी है। इस लड़ाई का दायरा बहुत बड़ा है। कसौटियां वही हैं जो पराड़कर जी के समक्ष थीं।
तकनीक के दौर में पत्रकारिता मीडिया बन गई है। पत्रकारिता के मानदंड मीडिया के मानदंड नहीं रहे। आपातकाल के बाद पत्रकारिता में विश्वसनीयता का संकट आ गया। इस दौर में न केवल पत्रकारों ने बल्कि देश के बुद्धिजीवियों ने भी समर्पण कर दिया। कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया ने भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मीडिया के स्वामित्व का तरीका बदल दिया है। परिभाषाएं बदल गई हैं।वर्तमान में सरोकार और साख की चुनौतियां हैं। शब्द को ब्रह्म मानने की अवधारणा समाप्त होती जा रही है। इससे साख बिगड़ती जा रही है। पत्रकारिता में आपाधापी का युग है बावजूद इसके तथ्यों की भूल को माफ नहीं किया जा सकता है। सांस और संचार पत्रकारिता का मूल है। विकासशील समाज में विकास की पत्रकारिता सरोकार, मूल्य और दायित्व से परिपूर्ण होनी चाहिए। दबाव से पत्रकारों को निजात मिलनी चाहिए।
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